Wednesday, 14 October 2015

सोनिया गांधी की अध्यक्षता में क्षरण की ओर कांग्रेस 


अरूण जैन
यह घटना 1977 की है। नई दिल्ली के प्रगति मैदान के एक मंडप में विभिन्न राजनीतिक दलों ने अपने अस्तित्व खत्म कर जनता पार्टी का गठन किया था। चंद्रशेखर उस नवगठित जनता पार्टी के अध्यक्ष चुने गए थे। एक दिन पूर्व मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद की शपथ ले चुके थे। प्रधानमंत्री पद के दो और दावेदार थे, चौधरी चरण सिंह और जगजीवन राम। वरिष्ठता और चरण सिंह के खुले समर्थन के कारण जयप्रकाश नारायण ने भी मोरारजी देसाई का पक्ष लिया था। जगजीवन राम के समर्थक इससे कुपित थे। इस कुपित लोगों में चंदशेखर के अभिन्न मित्र रामधन भी थे जिन्होंने पार्टी से त्यागपत्र देने की धमकी सार्वजनिक तौर पर दे डाली थी। प्रगति मैदान से आकर अपने साऊथ एवेन्यु आवास पर बैठे थे। वे कुछ खिन्न थे। हम चार-पांच पत्रकार भी उनके साथ थे। इस बीच रामधन का फोन आया और दोनों के बीच काफी तल्ख संवाद हुए। वहां बैठे लोगों में खुसुर पुसुर चल रहा था कि चन्द्रशेखर के अत्यधिक नजदीकी और उनकी पत्रिका यंग इंडिया का सम्पादन कर रहे सिद्दीक अहमद सिद्दीक ने कहा− नेताजी (चन्द्रशेखर के लिए उनका यही संबोधन था) आप क्यों चिंतित हैं आप तो पार्टी के अध्यक्ष हो ही गए हैं और तब तक बने रहेंगे जब तक पार्टी निगम बोध घाट (श्मशान) न पहुंच जाये। खिन्न चन्द्रशेखर ने उन्हें बेहूदी बात करने पर झिड़की दी। सब चुप हो गए। लेकिन इतिहास गवाह है कि 1977 से लेकर 1988 तक कई बार बिखरित होने के बावजूद चंद्रशेखर जनता पार्टी का अस्तित्व रहने तक उसके अध्यक्ष बने रहे। इस बीच कौन कौन किन किन कारणों से जनता पार्टी छोड़ता गया उसकी कथा बहुत विस्तृत है। मेरा इरादा उसके विस्तार में जाने का नहीं है। लेकिन यह बताना शायद उचित होगा कि 1979 में चौधरी चरण सिंह का लोक दल और 1980 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृतव में जनसंघ-जनता पार्टी से अलग हुआ था। चन्द्रशेखर जनता पार्टी के प्रथम और अन्तिम क्षण तक अध्यक्ष बने रहे भले ही उसका क्षरण होता रहा। कुछ वर्षों तक सुब्रमण्म स्वामी ने अवश्य जनता पार्टी का नाम जीवित रखा। लेकिन वह बस नाम भर की पार्टी थी। अब वह भी नहीं रह गई है। मुझे जनता पार्टी के उदय से अन्त तक का इतिहास और सिद्दीकी की भविष्यवाणी का एकाएक स्मरण यह समाचार सुनकर आया कि कांग्रेस ने संगठनात्मक चुनाव टाल दिया है और सोनिया गांधी का अध्यक्षीय कार्यकाल एक वर्ष के लिए और बढ़ गया है। सोनिया गांधी 1997 में कांग्रेस अध्यक्ष चुनी गई थीं। इस प्रकार फिलहाल उनके कार्यकाल का 18वां वर्ष चल रहा है। उनकी अध्यक्षता मताधिकार की उम्र में आ गई है। देश की सबसे पुरानी और अधिकतम वर्षों तक सत्ता में रहने वाली इस पार्टी में कोई व्यक्ति इतने वर्षों तक अध्यक्ष पद पर नहीं रहा है। कांग्रेस के संस्थापक ह्यूम भी ग्यारह वर्ष तक अध्यक्ष रहे। सोनिया गांधी ने उनका रिकार्ड तो कबका तोड़ दिया था अब वे नया रिकार्ड भी बना चुकी हैं। इस अवधि में कांग्रेस में कोई टूट-फूट भी नहीं हुई सिवाय शरद पवार के−जो बाद में शरणागत हो गए। यहां तक कि नरसिंह राव के नेतृत्व के समय जो लोग तिवारी कांग्रेस के नाम से अलग खड़े हो गए थे वे सभी नारायणदत्त तिवारी, अर्जुन सिंह आदि फिर से पार्टी में लौट आये। ममता बनर्जी अवश्य अलग हुईं लेकिन साथ साथ खड़ी भी रहीं। जहां जनता पार्टी चन्द्रशेखर के ग्यारह वर्ष की अध्यक्षता में टूटती ही रही, कांग्रेस सोनिया गांधी के नेतृत्व में एक होती रही। फिर भी कांग्रेस की तकत घटती रही और 2014 के लोकसभा चुनाव में कुल 44 सीटें जीतकर उसने न्यूनतम होने का रिकार्ड बनाया है। इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री रहते हुए भी जिस रायबरेली से चुनाव हार गई थीं, सोनिया गांधी उस पर कब्जा बनाए रखने में सफल अवश्य रहीं लेकिन 1977 के घोर जनविरोध के बावजूद लोकसभा में कांग्रेस को डेढ़ सौ से अधिक सीटें मिली थीं और कांग्रेस का विभाजन हो जाने के बाद भी 1980 में इंदिरा गांधी फिर से सत्ता में आ गई थीं। सोनिया गांधी के नेतृत्व की एक ही उपलब्धि है, लोकसभा में सदस्यों की संख्या घटने के बावजूद मनमोहन सिंह के नेतृत्व में दस वर्ष तक यूपीए सरकार पर नियंत्रण। इस नियंत्रण का परिणाम कांग्रेस के लिए कैसा रहा यह 2014 के लोकसभा और उसके बाद होने वाली विधानसभा चुनाव परिणामों से स्पष्ट है। सोनिया गांधी के 18 वर्ष के कार्यकाल में सत्ता भले एक दशक तक हाथ में रही हो कांग्रेस का प्रभाव सिमटता ही गया और सिमटता ही जा रहा है। केंद्र के समान ही अधिकांश राज्यों में भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस से सत्ता छीन ली है। पश्चिम बंगाल, उड़ीसा और तामिलनाडू जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व है। देश के बड़े राज्यों की गिनती में कर्नाटका और असम में ही उसकी सरकार बची है। जिनके नीचे की धरती भी खिसक चुकी है। कुछ छोटे राज्यों जैसे- हिमाचल, उत्तराखंड और अरूणाचल में कांग्रेस की सरकार अवश्य है लेकिन वहां के लिए भी प्रश्न पूछा जाने लगा है कब तक? इस अवधि की एक और बड़ी उपलब्धि है स्कैंडल। यूपीए के दस वर्ष का कार्यकाल स्कैंडल के रूप में ही चर्चित है। तत्कालीन प्रधानमंत्री तक स्कैंडल के मामले में अदालती निगरानी के दौर से गुजर रहे हैं। सोनिया गांधी, उनके पुत्र राहुल गांधी और दामाद राबर्ट वाड्रा के खिलाफ भी मामला अदालत में पहुंच चुका है। लेकिन सोनिया गांधी कांग्रेस अध्यक्ष पद पर आसीन हैं। दिल्ली के अंतिम मुगल बादशाह शाह आलम के संदर्भ में एक कहावत प्रचलित है। शाह आलम लाल किले से पालम। लेकिन वे कहलाते थे हिन्दु स्थान के शाहे−शाह। सोनिया गांधी की मान्यता कांग्रेस चाहे जो स्थापित करने में लगी रहे, उनका अस्तित्व कुछ शाह आलम के समान ही होता जा रहा है। कांग्रेस पिछले कई वर्षों से राहुल गांधी को महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपने की अफवाहें फैलाती रही है। पिछले दिनों तो ऐसा आभास दिया जाने लगा था जैसे सोनिया गांधी, राहुल को सब कुछ सौंपकर संन्यास ले लेंगी। राहुल को कांग्रेसियों की मांग पर पहले पार्टी का महामंत्री बनाया गया उसके बाद और अधिक जिम्मेवारी की मुहिम चलवाकर उपाध्यक्ष बनाया गया। अब जबकि सोनिया गांधी का कार्यकाल एक वर्ष के लिए और बढ़ गया है जो आगे कब तक बढ़ता रहेगा कहना कठिन है तो यह कहा जा रहा है कि सोनिया गांधी के परिपक्व नेतृत्व में राहुल गांधी कांग्रेस को संगठनात्मक मजबूती प्रदान करेंगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि कांग्रेस में वही होता है जो मां और बेटे चाहते हैं। बाकी सभी गौण हैं। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री होते हुए भी यदि गौण थे ऐसे में यदि कांग्रेस का मतलब सोनिया गांधी और राहुल गांधी समझा जाये तो गलत नहीं होगा। राहुल गांधी को और जिम्मेदारी सौंपने की चर्चाओं का दौर चलते रहने के बावजूद सोनिया गांधी का आवरण बनाये रखना शायद इसलिए आवश्यक हो गया है क्योंकि जब से राहुल गांधी ने चुनावी अभियान की कमान संभाली है तब से उसे पराजय का ही सामना करना पड़ रहा है। अब बिहार के चुनाव सिर पर हैं और 2016 में कई विधानसभाओं के भी चुनाव हैं जिनमें उत्तर प्रदेश भी शामिल है। जहां भी चुनाव प्रस्तावित हैं कांग्रेस की दयनीय स्थिति है। पंजाब में उसकी स्थिति अकाली दल की धूमिल छवि के कारण मजबूत अवश्य है लेकिन वहां के मजबूत कांग्रेस नेता कैप्टन अमरेन्द्र सिंह क्षेत्रीय दल बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं। कर्नाटका में खींचतान से हालात बिगड़ रहे हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान और गुजरात जहां भाजपा ने उसे ध्वस्त कर दिया है इतना वैमनस्य है कि सभी कांग्रेसी एक मंच पर आने के लिए भी तैयार नहीं होते। जहां तक देश के सबसे राज्य उत्तर प्रदेश का सवाल है तो सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने रायबरेली और अमेठी से बाहर एक भी कदम नहीं रखा है। उन्होंने इस प्रदेश के कांग्रेसियों के साथ एक बार भी सामूहिक समागम भी नहीं किया। इसलिए राहुल को बदनाम होने से बचाने की जुगत में सोनिया गांधी अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी अनिश्चित काल तक संभाले रह सकती हैं और सोनिया गांधी में ही अपना भविष्य देखने वाले कांग्रेसी एक के बाद एक एक किला ध्वस्त होते देखते रहने की विवशता की जकडऩ से बाहर निकलने की मानसिक विहीनता से ग्रस्त रह सकते हैं। सोनिया गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष बनने पर किसी ने व्यंग्य पूर्वक कहा था कि जिस संस्था की स्थापना एक विदेशी मूल के व्यक्ति ने किया है उसका विसर्जन भी विदेशी मूल के व्यक्ति द्वारा होना सुनिश्चित है। यह कथन वैसा ही हास परिहास के लिए हो सकता है जिस भावना से सिद्दीकी ने जनता पार्टी के संदर्भ में चंद्रशेखर से कहा था, लेकिन ज्यों ज्यों सोनिया गांधी के अध्यक्षीय कार्यकाल का विस्तार होता जा रहा है कांग्रेस सिमटती जा रही है। लालकिले से पालम तक की कहावत बार−बार सुनने को मिल रही है। तो क्या यह समझा जाये कि कांग्रेस के विसर्जन का समय निकट आता जा रहा है। कुछ पुराने कांग्रेसी व्यंग्यपूर्वक कहते सुने जाते हैं कि महात्मा गांधी की सच्ची अनुयायी सोनिया गांधी हैं। अन्य कांग्रेसियों ने कांग्रेस को विसर्जित करने की गांधी की सलाह नहीं मानी। सोनिया गांधी उस पर अमल कर रही हैं। जनता पार्टी के समान ही कांग्रेस का क्षरण हो रहा है लेकिन दोनों के क्षरण में एक बड़ा अंतर भी है। जहां जनता पार्टी का क्षरण निरंतर टूटन से हुआ है वहीं कांग्रेस पार्टी में सोनिया गांधी के नेतृत्व संभालने के बाद ममता बनर्जी का अपवाद छोड़कर एकजुटता बढ़ी है। उनके और राहुल गांधी के नेतृत्व पर कोई विवाद कांग्रेस में नहीं है। इस एकजुटता के बावजूद यदि कांग्रेस का क्षरण होता जा रहा है तो उसके लिए नेतृत्व को ही दोषी माना जा सकता है।

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