Wednesday, 7 October 2015

हिंद महासागर में चीन की चौंकाने वाली गतिविधियाँ 


डॉ. अरूण जैन
हिंद महासागर में चीन की बढ़ती सक्रियता और वहां की कम्यूनिस्ट सरकार की यह धमकी कि भारत हिंद महासागर को अपना आंगन न समझे, हमारे लिए चिंता का कारण बनती जा रही है। क्योंकि चीन न सिर्फ हिंद महासागर में अपनी जल सेना का जमावड़ा बढ़ा रहा है, बल्कि भारत के चारों ओर अपनी सैन्य ठिकाने भी बनाता जा रहा है। चीन अपनी सैन्य ताकत और आर्थिक महाशक्ति होने के कारण आस-पास के सभी प्रमुख देशों में बंदरगाहों और जल क्षेत्रों पर कब्जा जमाता जा रहा है। चीन ने बांग्लादेश के चित्तगांव में, श्रीलंका के हमबनटोटा में, सेसेल्स में, पाकिस्तान के ग्वादर में, केन्या के लामू में और तंजानिया के बागामोयो में अपने ठिकाने स्थापित कर लिया है और वहां से वह भारत की पूरी नजर रखे हुए है। ये सारे बंदरगाह न सिर्फ चीन के व्यापारिक और आर्थिक हितों को संवर्धित और संरक्षित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, बल्कि भविष्य में भारत और अमेरिका के लिए खतरा भी पैदा करने वाले हैं। चीन यह जानता है कि आने वाले समय में कच्चे तेल पर निर्भरता और बढऩे वाली है और इसलिए हिंद महासागर पर वह कब्जा करने की तैयारी कर रहा है ताकि वह कच्चे तेल के व्यापार पर अपना नियंत्रण रख सके और तेल के व्यापार का लीडर बन सके। एक तरफ चीन यह दावा करता है कि उसका हिंद महासागर में अभियान विशुद्ध रूप से व्यावसायिक है और वह किसी तरह के सैन्य ताकत बढ़ाने के अभियान में नहीं लगा है, वहीं दूसरी तरफ बंगाल की खाड़ी में उसने इलेक्ट्रानिक इंटेलिजेंस गैदरिंग फैसिलिटीज स्थापित कर वह भारत की वह गतिविधि पर नजर रख रहा है। यही नहीं चीन ने थाईलैंड के क्रा इस्थुमस में नहर बनाने में पूरा निवेश कर रहा है और कमबोडिया के साथ दक्षिण चीन महासागरमें सैन्य समझौता कर रहा है। ये सारी गतिविधियां बताती है कि चीन का उद्देश्य सिर्फ व्यापारिक मजबूती नहीं बल्कि सामरिक प्रभुत्व स्थापित करना ज्यादा है। पाकिस्तान के ग्वादर में डीप-सी पोर्ट बनाकर चीन एक तरह से अरब सागर में भारत की हर गतिविधि पर नजर रख रहा है। इसके अतिरिक्त चीन का हैनान द्वीप में नौसेना आधार कैंप भारत समेत अमेरिका के लिए भी खतरा बन सकता है। क्योंकि यहां से चीन कभी भी जहाजों का आना जाना रोक सकता है। चीन लाख कहे कि वह चीन से बाहर किसी तरह की सैन्य स्थापना नहीं करना चाहता पर चीन के ही जल सेना के रणनीतिकार शेन डिंगी खुलेआम कहते हैं कि चीन के लिए बाहर मिलिट्री बेस बनाना बहुत आवश्यक है। दरअसल चीन नहीं चाहता कि हिंद महासागर में वह अपने तेल आयात के लिए भारत या अमेरिका से सुरक्षा की कोई उम्मीद करे वह चाहता है कि हिंद महासागर में पेट्रोलिंग बोर्ट से लेकर युद्ध पोत तक बेधड़क ले जा सके। इसका मतलब यह हुआ कि हिंद महासागर में जहाजों की आवाजाही को लेकर किसी तरह का कोई विवाद खड़ा होता है तो चीन अपनी ताकत दिखाने से नहीं चूकना चाहता। एक तरह से चीन हिंदी महासागर में अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता है, जो कि वह कई जगह कर भी चुका है। कोलंबो के बंदरगाह पर अपने युद्ध सबमेरिंस की तैनाती कर चीन पहले भी हमारी जल सेना के लिए चुनौती पेश कर चुका है। इस समय चीन के पास सबसे शक्तिशाली जल सेना है। एशिया में चीन ही वह देश है जिसके पास सबसे बड़ा जहाज है जिस पर परमाणु हथियारों से लैस युद्धक विमान हमेशा तैयार रहते है। हमारे लिए यह खतरे की घंटी से कम नहीं है कि चीन बंगाल की खाड़ी में लगातार न्यूक्लियर सबमेरिंस के साथ पेट्रोलिंग कर रहा है। यह भारत के परमाणु कार्यक्रम के लिए भी खतरा है। भारत इस खतरे के प्रति पूरी तरह सचेत है। अपनी सरकार बनते ही प्रधानमंत्री मोदी चीन के इस अभियान की गंभीरता को समझते हुए अमेरिका के साथ साझा रणनीति बनाने में जुट गए है। सितम्बर 2014 में अपनी अमेरिकी यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों के मद्देनजर सभी देशों के संयुक्त सैन्य पेट्रोलिंग व्यवस्था पर बातचीत की ताकि यहां व्यापारिक जहाजों की आवाजाही शांतिपूर्ण माहौल में होती रहे। यहीं नहीं जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा इस साल जनवरी में भारत आए तब भी इन मुद्दों पर गंभीर चिंतन किया गया और दोनों नेताओं ने फिर से यह दोहराया कि दक्षिणी चीन महासागर में समुद्री सुरक्षा के लिए जरूरी है कि सभी देश मिलकर एक व्यवस्थाएं बनाए ताकि मालवाहक जहाज बिना किसी फिक्र के आ जा सके और समुद्र के ऊपर के हवाई मार्ग भी पूरी तरह सुरक्षित रहे। दोनों नेताओं ने यह बयान भी जारी किया कि किसी भी देश को जल सीमा से संबंधित किसी भी विवाद के लिए सैन्य शक्ति के प्रयोग से बचना चाहिए। चीन ने भारत अमेरिका के इस साझा बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया जाहिर की और कहा कि सिर्फ वे ही देश आपसी समझौते पर काम करें जिनके बीच विवाद हो। स्पष्ट है कि चीन नहीं चाहता कि अमेरिका इस मामले में भारत के साथ खड़ा हो। प्रधानमंत्री मोदी ने न सिर्फ अमेरिका के साथ बल्कि जापान के साथ भी इन मुद्दों को उठाया और कोशिश की कि चीन के मामले में भारत के साथ अमेरिका और जापान दोनों एक मंच पर खड़े हो। अगस्त 2014 में अपनी जापान यात्रा के दौरान मोदी जिन प्रमुख समझौतों पर दस्तखत किए उनमें से एक समझौता जापान द्वारा भारत को सबमेरिन से उड़ान भरने वाले युद्धक विमान खेप देने का भी था। विशेषज्ञ यह मानते हैं कि चीन की विस्तारवादी नीति को देखते हुए भारत का जापान से युद्धक विमान खरीदने का समझौता बहुत ही महत्वपूर्ण था। इससे एशिया के दो बड़े देशों के बीच शक्ति संतुलन कायम होगा। चीन की साम्राज्यवादी नीति की काट के लिए भारत ने कूटनीतिक प्रयास भी तेज कर दिए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने 1990 में शुरू की गई लुक ईस्ट पॉलिसी का नाम बदलकर एक्ट ईस्ट पॉलिसी कर दिया है और उसी के अनुसार न सिर्फ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ बल्कि आस्ट्रेलिया के आगे के देशों के साथ भी संबंध सुधारने और समन्वय बढ़ाने की नीति को जोरदार ढंग से आगे बढ़ाया है। भारत कभी नहीं चाहता कि वह चीन के साथ सीधे तौर पर टकराए। इसलिए भारत की कोशिश है कि दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के साथ उसके व्यापारिक संबंध बहुत ही दृढ़ रहे ताकि चीन इसकी गर्मी महसूस कर सके। जब तक चीन के ऊपर क्षेत्रीय गठबंधन का दबाव नहीं बनेगा, तब तक वह भारत के साथ बराबरी के आधार पर बातचीत नहीं करेगा। चीन की बढ़ती सैन्य शक्ति और उसके बदलते रूख का भांप कर भारत ने क्षेत्रीय संतुलन अपने पक्ष में करने की रणनीति अपनायी है। मालदीव, मडागास्कर और म्यामार के साथ अपने व्यापारिक संबंधों को नये सिरे सुधारने के साथ ही भारत सिंगापोर, इंडोनेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, ताइवान और फिलिपिंस के साथ भी अपने संबंध मजबूत किए हैं। जापान और आस्ट्रेलिया के साथ-साथ दक्षिण कोरिया को भी प्रधानमंत्री मोदी ने दौरे कर अपने पक्ष में खड़ा करने का प्रयास किया है। भारत को इसमें सफलता भी मिली है। 1993 में मलेशिया के साथ हुए हमारे सैन्य समझौते के बाद स्थितियां कुछ हद तक हमारे अनुकूल हुई हैं। मलेशिया में भारत का सैन्य मिशन काफी बड़ा है और 2008 के समझौते के बाद इसमें तेजी आई है। सिंगापोर पूरब में हमारा सबसे विश्वसनीय रक्षा साझेदार है। थाईलैंड भी हमारे साथ संयुक्त रूप से सैन्य अभ्यास में जुटा हुआ है।

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