Monday, 6 April 2015

लालबहादुर शास्त्री की ताशकंद में हत्या हुई थी, भारत सरकार जांच करवाए

(ताशकंद से लौटकर डाॅ. अरूण जैन)
भारत के प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की ताशंकद में स्वाभाविक मृत्यु नही हुई थी वरन एक सोचे-समझे राजनैतिक षडयंत्र के तहत उनकी हत्या की गई थी । इसकी पुष्टि करते हुए शास्त्रीजी की धर्मपत्नी श्रीमती ललिता शास्त्री ने स्वयं कहा था कि उनका पूरा शरीर नीला पड़ गया था । यह संभवतया किसी अत्यंत जहरीले विष के कारण था, जो उन्हे रात के खाने में किसी खाद्य पदार्थ में मिलाकर दिया गया था । पर न तो सोवियत (अविभाजित) सरकार और न ही भारत सरकार ने इस गंभीर हादसे की ईमानदार जांच करवाई ।
यह स्वीकारोक्ति ताशकंद गए भारत के पत्रकारों के एक वृहद प्रतिनिधिमंडल के समक्ष स्थानीय रहवासियों ने नववर्ष के प्रथम सप्ताह में की । पत्रकारों के दल ने व्यवसाइयों, कामगारों और अन्य विभिन्न वर्गों से पृथक-पृथक चर्चाएं की । इस दौरान यह गंभीर तथ्य उभरकर आया । हालांकि यह घटना अविभाजित रूस (यू.एस.एस.आर.) के समय हुई थी । अब विभाजन के पश्चात यह क्षेत्र उजबेकिस्तान के नाम से जाना जाता है और इसकी राजधानी ताशकंद है । स्थानीय रहवासी इस प्रश्न का संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके कि सोवियत सरंकार ने इस घटना की सही-सही जांच क्यों नहीं करवाई । परन्तु एक सर्वाधिक चैंकाने वाला पहलू यह है कि अविभाजित रूस के रहवासी भी भारतवासियों को बहुत प्यार करते थे और उजबेकिस्तान के रहवासी भी भारतीयों को बहुत प्यार और सम्मान करते हैं । फिल्म अभिनेता-निर्माता राजकपूर और भारतीय फिल्मों के प्रति रहवासियों का पागलपन तब भी था और आज भी है । 
भारतीय पत्रकारों के दल को भी ताशकंद, में काफी प्यार मिला । ‘इंडियन’ कहते ही स्थानीय रहवासियों के चेहरों पर आई मुस्कुराहट देखते ही बनती थी । भारतीयों के प्रति प्यार का एक व्यक्तिगत उदाहरण देना चाहूंगा । मै और मेरे मित्र दोपहर बाद चोरसू बाजार शाॅपिंग के लिए गए थे । वापसी में शाम हो चुकी थी और हम कुछ देर बाद ही मार्ग भटक गए । परेशान मित्र ने किसी से मदद लेने का मशविरा दिया । समीप एक कम्प्युटर बूथ पर कार्यरत महिला से मैने अंग्रेजी में बात करने का प्रयास किया । पर वह अंग्रेजी लगभग नहीं जानती थी । तभी वहां एक युवक आया । उसने मुझ से अंग्रेजी में पूछा कि क्या बात है । मैने मार्ग भटकने का हवाला देते हुए होटल उजबेकिस्तान जाने की बात कही । युवक ने दो मिनिट प्रतीक्षा करने को कहा । ‘कम्प्युटर हट’ पर कुछ भुगतान करने के बाद युवक ने हमें पीछे आने का संकेत दिया । हम आगे बढ़े पर मन में संशय था कि कुछ गड़बड़ न हो । युवक एक कार के समीप पहुंचा और हमें पीछे की सीट पर बैठने का ईशारा किया । दरवाजा खोलकर जैसे ही हम बैठने लगे तो देखा कि आगे की सीट पर एक नवयुवती बैठी है । साथ आया युवक चालक सीट पर बैठ गया । युवक -युवती ने स्थानीय भाषा में चर्चा की युवती ने अंग्रेजी में हमसे होटल उजबेकिस्तान जाने का पूछा जिस पर मैने हां कहा और कार चलदी । अनजान देश, अनजान शहर में मैं अभी भी शंका से भरा हुवा था । करीब आधे घंटे की यात्रा के बाद कार होटल उजबेकिस्तान के बाहर रूकी और हमने राहत की सांस ली । मैने चालक से किराया लेने को कहा तो युवती बोली कि यह न तो टेक्सी है और न हमने आपको पैसों के लिए बिठाया है । आप भारतीय है इसलिए आपको यहां लाकर छोड दिया । युवती ने यह भी कहा कि इंडिया बहुत खूबसूरत शहर है, पर मैं अभी तक इंडिया नहीं गई हूूं । हमने दोनों को धन्यवाद दिया और भारत आने का निमंत्रण दिया । युवक ने अपना नाम सुकरात बताया । इस युवा जोड़े के अपनेपन ने हमें उजबेकिस्तान का मुरीद कर दिया । भारतीयों और शास्त्रीजी के प्रति स्नेह का एक और उदाहरण यह है कि जिस फाॅरेन सेंटर पर ताशकंद समझौता हुवा था, उसके समीप एक चैराहे पर शास्त्रीजी का स्टेच्यू सरकार ने लगवाया है और लगी हुई सड़क को ‘शास्त्री स्ट्रीट’ का नामकरण किया गया है । पत्रकारों ने यहां काफी सारे चित्र खीचे ।
ताशकंदवासियों का अभी भी मत है कि प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री की मृत्यु की घटना की भारतीय सरकार को निष्पक्ष जांच करवाना चाहिए और उसके पीछे के समस्त तथ्य अथवा षडयंत्र देशवासियों के सामने उजागर किया जाना चाहिए । 

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