Tuesday, 21 April 2015

राहुल की अग्निपरीक्षा


डॉ. अरूण जैन
जहां राहुल गांधी की गुमशुदगी एक कौतूहल का विषय थी वहीं उनकी वापसी ने कांग्रेस के नेतृत्व के सामने समस्या पैदा कर दी है। कांग्रेसियों में दो फाड़ हो गया है, एक वर्ग सोनिया को तो दूसरा राहुल को अध्यक्ष बनाना चाहता है। अर्थात गांधी परिवार की चित भी और पट भी। कुछ समय से कांग्रेस नेतृत्व को लेकर जूझ रही है और उसके सामने तीन विकल्प हैं। एक, कोई योग्य कांग्रेसी गांधी परिवार के बाहर का नेतृत्व संभाले। दो, गांधी परिवार से राहुल की जगह प्रियंका कांग्रेस को नेतृत्व दें और तीन, स्वयं राहुल ही नेतृत्व करें। ऐसा लगता है कि राहुल की गुमशुदगी के प्रकरण में इन विकल्पों में से अंतिम विकल्प को अमली जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है। इसका कारण यह है कि इस बहस का ध्येय प्रथम दो विकल्पों को पूरी तरह से खत्म करने का है अर्थात अब नेतृत्व के केंद्र में केवल और केवल राहुल हैं, प्रियंका या गांधी परिवार से बाहर का कोई नहीं। यह एक सोची समझी रणनीति लगती है। लेकिन क्या राहुल में कांग्रेस का नेतृत्व करने की क्षमता है? क्या उन्होंने अपने दस-ग्यारह वर्षों के संसदीय जीवन में कोई भी ऐसा काम किया है जिससे उनकी अपनी, कांग्रेस पार्टी या देश की साख अच्छी हुई हो? कांग्रेस में एक से एक वरिष्ठ और योग्य लोग हैं, क्या उनको राहुल का नेतृत्व स्वीकार होगा? ये सभी प्रश्न राहुल और कांग्रेस, दोनों के भविष्य के लिए गंभीर हैं। जो कांग्रेसी राहुल के पक्ष में बोल रहे हैं वे संभवत: सोनिया के निर्देश पर ऐसा कर रहे होंगे, लेकिन सोनिया बनाम राहुल जैसे संवेदनशील मसले पर राय देने में जाहिर है हर कांग्रेसी असहज महसूस कर रहा होगा कि पता नहीं ऊंट किस करवट बैठ जाए। वैसे सभी जानते हैं कि अगर सोनिया राहुल को कांग्रेस की बागडोर सौंपना ही चाहती हैं तो उसे टाला नहीं जा सकता भले ही उसमें कुछ समय लग जाए। राहुल को कांग्रेस की बागडोर औपचारिक रूप से सौंपने के पूर्व पार्टी उनको दलीय निर्णय की प्रक्रिया में कुछ मुद्दों पर प्रभावी भूमिका दे सकती है, जिससे न केवल उनकी राष्ट्रीय फलक पर उपस्थिति बढ़े, बल्कि यदि वे उन भूमिकाओं का सफलतापूर्वक निर्वहन कर सकें तो पार्टी उस सफलता का श्रेय राहुल को देकर उनको अध्यक्ष पद पर स्थापित कर सके। भूमि-अधिग्रहण कानून तथा बिहार, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनाव ऐसे कुछ मुद्दे हो सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि कोई भी विश्वास के साथ यह नहीं कह सकता कि इन मुद्दों पर राहुल और कांग्रेस सफल होंगे या उनका ग्राफ और नीचे चला जाएगा। कारण यह है कि कोई भी कांग्रेस का नेतृत्व करे, उसे इस जमीनी हकीकत से रूबरू होना पड़ेगा कि पार्टी का संगठन अब जमीन पर नहीं, बल्कि कागजों पर चलता है। बिहार और उत्तर प्रदेश, दोनों ही राज्यों में पिछले 25-26 वर्षों से कांग्रेस की कोई सरकार नहीं बनी। बिहार में जगन्नाथ मिश्र (मार्च 1990) और उत्तर प्रदेश में नारायण दत्त तिवारी (दिसंबर 1989) अंतिम कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे। इतने लंबे समय तक सत्ता से दूर रहने से पार्टी कार्यकर्ताओं को भी लगने लगा है कि उनकी पार्टी सत्ता में वापसी नहीं कर पाएगी। अत; वे उससे छिटककर दूर चले गए हैं। मुस्लिम और दलित, जो कभी कांग्रेस का जनाधार हुआ करते थे, आज वे जनता-परिवार के किसी घटक या अन्य किसी क्षेत्रीय पार्टी का हिस्सा बन चुके हैं। राहुल या किसी भी कांग्रेसी के पास उनको वापस लाने का क्या कोई भी फार्मूला है? क्या राहुल अपने अज्ञातवास में इन दोनों राज्यों में कांग्रेस को फिर से जीवित करने का कोई गुरुमंत्र सीख कर आए हैं? अगले कुछ वर्ष राहुल की अग्निपरीक्षा होगी। उस परीक्षा की सबसे खास बात यह है कि जहां जनता क्षेत्रीय राजनीति के लिए क्षेत्रीय दलों को तरजीह देती है वहीं वह राष्ट्रीय राजनीति के लिए राष्ट्रीय दलों को ही बागडोर सौंपना चाहती है और इस श्रेणी में फिलहाल केवल भाजपा और कांग्रेस ये दो दल ही आते हैं। लोग मोदी और भाजपा को राष्ट्रीय राजनीति में कितना वक्त देंगे? शायद दस वर्ष? फिर? तो घूम-फिरकर कांग्रेस को भी सत्ता में आना ही है। लेकिन इसे स्वयं सिद्ध प्रमेय न मानकर एक स्वर्णिम संभावना माना जाना चाहिए। और इसीलिए राहुल गांधी को अभी विजय और पराजय के चक्रव्यूह से निकल कर कांग्रेस की नींव मजबूत करने के लिए दूरगामी कदम उठाने चाहिए। यह न केवल कांग्रेस, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक सकारात्मक पहल होगी। इधर कुछ समय से भारतीय राजनीति में दो नई प्रवृत्तियां मुखर हो रही हैं। एक, 'विकास पर स्पर्धा और दो, जातिवादी राजनीति में कुछ कमी। इन दोनों का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जाता है। उन्होंने देश में राजनीति के विमर्श को एक नई दिशा जरूर दी है। राज्यों और उनके मुख्यमंत्रियों को स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर वे अपने-अपने राज्यों में विकास नहीं करेंगे तो वे राजनीति में एक हारने वाली पारी खेल रहे होंगे। विकास तो सभी का होना चाहिए चाहे वे किसी भी धर्म या जाति के हों। इससे मोदी ने समावेशी राजनीति की शुरुआत की है, जिसमें वास्तव में सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय का उद्देश्य है। वे सदैव 125 करोड़ भारतवासियों की बात करते हैं और उनके अभी तक के निर्णयों में कोई निर्णय ऐसा नहीं जिससे किसी भेदभाव की बू आती हो। इसके कारण कभी शहरी और मध्य-वर्ग की कही जाने वाली भाजपा आज सभी क्षेत्रों और सभी वर्गों को आकर्षित कर रही है। राहुल को भी इस स्पर्धा में कूदना पड़ेगा और विकास-मूलक तथा समावेशी राजनीति की शुरुआत करनी पड़ेगी। अच्छी बात यह है कि इसके लिए अभी उनके पास कुछ समय है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या उनके पास ऐसा करने की इच्छा-शक्ति भी है? देश में कांग्रेस के सिमटते जनाधार और गांधी-परिवार द्वारा नेतृत्व की अपरिहार्यता के टूटते मिथक के बीच राहुल को एक त्वरित, संकल्पयुक्त एवं आशावादी निर्णय लेना होगा, लोगों को संदेश देना होगा कि वह देश की राजनीति के एक समर्पित सिपाही हैं अन्यथा न केवल उनके, बल्कि कांग्रेस के भी भविष्य पर एक गंभीर और स्थायी प्रश्न-चिह्न लग जाएगा।

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