Monday, 6 April 2015

उजबेकिस्तान यात्रा .3 

समृद्ध इतिहास को समेटे समरकंद

डाॅ. अरूण जैन

इतिहास इस बात का गवाह है कि अंग्रेजों के आने के पूर्व तक एक लंबे समय भारत देश पर मुस्लिम शासकों ने शासन किया । इसका सिलसिला मंगोल शासक शासन चंगेजखान और तैमूर लंग से शुरू होकर बहादुरशाह ज़फर तक जाता है । इन सभी मुस्लिम शासको का अंतरंग सबंध किसी न किसी रूप में समरकंद से रहा है, जो उजबेकिस्तान का एक महत्वपूर्ण शहर है और राजधानी ताशकंद से 400 किलोमीटर दूर है । कहा जाता है कि इतिहास के पन्नो में एक आर्यावर्त खंड का उल्लेख है । यह खंड हिन्दु-कुश पर्वत श्रंखला और हिमालय के मध्य बसा हुवा था । उस मान से उजबेकिस्तान, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, भारत, ब्रम्हा (अब म्यांमार), बांग्लादेश आदि उसी आर्यवर्त के अविभाजित हिस्से थे । हिन्दुकुश पर्वत श्रंखला उजबेकिस्तान से प्रारम्भ होकर सतत 600 किलोमीटर की लम्बाई में फैली हुई हैं, जो हिमालय पर्वत श्रंखला पर समाप्त होती है । दोनोे पर्वत श्रंखलाओं के मध्य का यह हिस्सा लगभग समुद्र रहित और सम्पूर्ण भूखंड है ।
हम पत्रकारों को प्रातः 8 बजे के पूर्व ताशकंद रेल्वे स्टेशन पहुॅंचना था । स्वाभाविक रूप से होटल उजबेकिस्तान प्रबंधन ने हमें प्रातः 5.30 बजे ‘वेकअप काॅल’ दी । फटाफट तैयार हो कर हम 18 मंजिला होटल के 12 वें माले से भूतल पर पहुंच चुके थे । प्रातः 7 बजे बसें रेल्वे स्टेशन रवाना हुई । साढ़े 7 बजे हम रेल्वे स्टेशन पहुॅंच गए । स्टेशन भवन से कुछ दूर परिसर में पुलिस निरीक्षण चैकी थी, जिससे होकर ही परिसर में प्रवेश किया जा सकता था । पुलिस अधिकारी ने पहले हमारे टिकिट देखे और फिर एक-एक कर प्रवेश दिया । उसके बाद एक और चेक नाका था । यह गलियारानुमा था । यहां तीन-चार अधिकारी थे । उन्होने सुरक्षा जांच के बाद रेल्वे स्टेशन भवन की ओर क्रम से जाने दिया, जो कुछ दूरी पर था । रेलवे, भवन में प्रवेश के पूर्व सारे हेंडबेग, मोबाइल, कैमरे एक्सरे मशीन से गुजरे । हमारे शरीर की भी एक और सुरक्षा जांच हुई । इसके बाद भवन के खुले हाल में हमें कुर्सियों पर प्रतीक्षा करने को कहा गया । प्लेटफार्म पर जाने के मार्ग के दरवाजे बंद थे । ये दरवाजे प्लेटफार्म पर ट्रेन पहुंचने पर ही खुलते हैं । करीब पौने आठ बजे ट्रेन प्लेटफार्म पर आई और हमें प्लेटफार्म पर जाने देने के लिए पुलिस ने दरवाजे खोले । खुलते ही सब एक के पीछे एक प्लेटफार्म पर पहुंचे और लाइन में ही रेलवे कोचेज को पार करते गए । हर कोच के बाहर दो महिला-पुरूष कंडक्टर नीचे खड़े थे । इच्छित कोच के पास पहुंचने पर संबंधित कोच कंडक्टर ने हमे कोच में चढने का संकेत दिया । मार्गदर्शक ने बताया कि आधे लोग एक हिस्से में और-आधे दूसरे हिस्से में बैठें । यह बुलेट ट्रेन थी, जो ताशकंद से समरकंद नाॅन-स्टाॅप जाती थी । करीब 200 से 250 किलोमीटर प्रति घंटा रफ्तार वाली यह बुलेट आठ बजे रवाना हुई । सभी कोचेज वातानुकूलित और टीवी युक्त थे । किराए में प्रातः का नाश्ता भी शामिल था जो वायुसेवा की तर्ज पर था । दो घंटे में ट्रेन समरकंद पहुंच गई । मार्ग में कंट्री साइड का द्रष्य अत्यन्त मनोरम था और पूरा रेलवे टेªक दोनों ओर से पूरी तरह जालनुमा वायर फेंसिग द्वारा सुरक्षित बनाया गया था, जिससे होकर मनुष्य तो दूर जानवर भी पटरी पर प्रवेश नही कर सकता । 
समरकंद रेलवे स्टेशन से बाहर-आते ही बसें तैयार थी, जो हमें लेकर मुस्लिम शासक तैमूरलग के मकबरे की ओर रवाना हो गई । चंगेज यही शासक बना । तेमूरलग का जन्म इसी जमीं पर हुवा था । उन्होने 13वीं से 15वीं सदी के बीच शासन किया । सत्ता की भूख इन्हे भारत तक ले गई । परन्तु वे सम्पूर्ण भारत पर फतह न कर सके । दिल्ली पर जरूर कब्जा किया । तैमूरलंग को यहां ‘‘आमिर तैमूर’’ के नाम से पुकारा जाता है । एक बड़े क्षेत्र में आमिर तैमूर का मकबरा है । समीप ही एक चैराहे पर तैमूर लंग का आदमकद स्टेच्यू लगाया गया है । इस शांत शहर में लगभग तीन घंटे भ्रमण के दौरान सड़कों के दोनों ओर उंचे खाली स्थानों पर मकबरे ही मकबरे नजर आए । ऐसा लगता था मानो यह मकबरों का शहर हो । वैसे 30 लाख की जनसंख्या वाले इस शहर में सूखे मेवों का व्यापार मुख्य रूप से होता है । एक विशाल स्थायी मंडी व्यापार के लिए निर्मित की गई है, जहां व्यापार के लिए ओटले बने हुए है । ‘अखरोट, काली किशमिश, अंजीर, बादाम, चिलगोजे और काजू मुख्य मेवा है और प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है । निश्चित रूप से भारत की तुलना में मेवे का भाव कम ही है । सो सभी ने जी भरकर सूखा मेवा खरीदा । दोपहर को हमें एक स्थानीय घरेलू रेस्टोरेंट ले जाया गया । घरेलू इस माने में कि आवासीय क्षेत्र में कुछ कमरे और हाल बनाए गए थे । पूरा संचालन एक परिवार के हाथों में था। परिवार के बुजुर्ग माॅं-बाप बड़े प्रवेश द्वार पर आगवानी के लिए खड़े थे । अन्य युवा, महिला-पुरूष खाने की व्यवस्था में लगे थे । खाना भी लीक से हटकर था । प्रारंभ में पाव रोटी, फल, सूप लाया गया जिसमें चांवल, मूंग की दाल, टमाटर और सब्जियां थी । पुलाव मोटे चांवल के बावजूद बेहद जायकेदार था ।
समरकंद से जुडे मंगोल मुस्लिम शासको के इतिहास और उस समय की घटनाओं के ब्यौरे ने स्पष्ट कर दिया कि उजबेकिस्तान और भारत के गहरे संबंध रहे हैं, जिनमें व्यापारिक सौदे भी शामिल है । लंबी-चैड़ी पर्वत श्रंखलाऐं और विराट होने के कारण और सुरक्षित क्षेत्र होने के कारण मुस्लिम शासकों ने भारत पर लंबे समय तक शासन किया । अंग्रेजों के आने तक वे वंश-दर-वंश यहां काबिज रहे । शाम 6 बजे हम समरकंद रेलवे स्टेशन वापिस पहुंचे और ताशंकद की ओर रवाना हो गए ।

No comments:

Post a comment