Friday, 28 August 2015

इकॉनामी पर गॉड, गोल्ड और ऑइल की मेहरबानी

डॉ. अरूण जैन
कंपनियों और उपभोक्ताओं के लिए हालात बेहतर होते दिख रहे हैं। इसके लिए गॉड, गोल्ड और ऑइल के बदले रुख को श्रेय दिया जा सकता है। बारिश अच्छी रही है और मॉनसून का मिजाज ठंडा रहने के अनुमान अब तक सही साबित नहीं हुए हैं। वर्षा का स्तर सामान्य से महज 6त्न कम है। वहीं ऑइल और गोल्ड की कीमतों में तेज गिरावट आई है। भारत जिन चीजों का आयात करता है, उनमें गोल्ड और ऑइल टॉप पर हैं। कीमत घटने से इस मोर्चे पर राहत मिलेगी। पिछले एक महीने में ऑइल की कीमतें 15त्न घटी हैं और पिछले साल जून के मुकाबले आधे पर चल रही हैं। गोल्ड कई साल के निचले लेवल पर आ गया है। ज्यादातर ऐनालिस्ट्स का मानना है कि यह रुझान आगे भी बना रहेगा। निकट भविष्य में बारिश, सोने और तेल के इस मिजाज के बने रहने की उम्मीद का मतलब यह है कि आगामी फेस्टिवल सीजन में कन्जयूमर्स अपनी बंधी मु_ी ढीली कर सकते हैं। यह इंडिया में कन्जयूमर प्रॉडक्ट्स की खरीद-फरोख्त का सबसे अहम सीजन होता है। कंपनियां अच्छी डिमांड की गवाह बनेंगी और ब्याज दर बढऩे का डर भी नहीं होगा। सरकार को भी करंट अकाउंट और फिस्कल डेफेसिट के मोर्चे पर बेहतर स्थिति के चलते इकॉनमी में पैसा झोंकने में सहूलियत हो सकती है। सोना सस्ता हो रहा है और फसल अच्छी होने से ग्रामीण इलाकों में कार, मोटरसाइकिल, ट्रैक्टर, जूलरी और एफएमसीजी प्रॉडक्ट्स की डिमांड बढ़ सकती है। बारिश के लगभग सामान्य स्तर के अलावा ऑइल और गोल्ड का इंपोर्ट बिल कम रहने का मिलाजुला असर यह होगा कि सरकार और आरबीआई को महंगाई बढऩे की चिंता नहीं सताएगी। इस तरह ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव शायद ही रहे। एचडीएफसी बैंक की प्रिंसिपल इकनॉमिस्ट ज्योतिंदर कौर ने कहा कि भारत भाग्यशाली है कि कमोडिटीज, खासतौर से एनर्जी की वैश्विक कीमतों में नरमी आ गई है। उन्होंने कहा, इसके चलते इन्फ्लेशन को आरबीआई के 6त्न के नियर-टर्म टारगेट से नीचे रखने में मदद मिलेगी। ऐनालिस्ट्स ने कहा कि प्राइवेट सेक्टर की ओर से कैपिटल एक्सपेंडिचर में दिख रही सुस्ती की भरपाई के लिए सरकार अपनी ओर से निवेश बढ़ा सकती है और साथ ही, डिसइनवेस्टमेंट से ज्यादा रकम जुटा सकती है क्योंकि तेल कंपनियों का वैल्यूएशन अब बेहतर हो गया है। ऑइल के दाम में गिरावट से रिफाइनिंग करने वाली कंपनियों की उधारी घटेगी और ओएनजीसी पर सब्सिडी का बोझ कम होगा। ढ्ढष्टक्र्र के सीनियर वाइस प्रेजिडेंट और को-हेड (कॉर्पोरेट रेटिंग्स) के रविचंद्रन ने कहा, पॉलिसी रिफॉर्म्स के साथ यह बात इस सेक्टर के लिए अच्छी है। सरकार अगर इन कंपनियों में डिसइन्वेस्टमेंट पर कदम बढ़ाए तो उसे अच्छा वैल्यूएशन मिल सकता है। ऑइल प्राइसेज में गिरावट का दोहरा फायदा है। कन्जयूमर्स की जेब कम ढीली हो रही है, वहीं सरकार ने इस मौके का फायदा उठाकर एक्साइज ड्यूटी बढ़ा दी है। ऐनालिस्ट्स का कहना है कि इस तरह इंडिया को एक लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का फायदा हो सकता है, जो कीमतें न घटने की सूरत में ऑर्गनाइजेशन ऑफ पेट्रोलियम एक्सपोर्टिंग कंट्रीज यानी ह्रक्कश्वष्ट के कुछ मेंबर्स के पास चले गए होते। फिर ऑइल सेक्टर की कंपनियों के लिए बेहतर कैश फ्लो का मतलब यह है कि ये अपने इन्वेस्टमेंट प्लान पर उत्साह से कदम बढ़ा सकती हैं, जिनसे इकॉनमी में गुड्स और सर्विसेज की डिमांड बढ़ेगी। गोल्ड का गणित बिल्कुल साफ है। अगर किसी व्यक्ति ने दो साल पहले 10 ग्राम सोना खरीदने के बजाय वह रकम अपने सेविंग्स बैंक अकाउंट में रखी होगी तो आज वह उसी पैसे से 15 ग्राम गोल्ड खरीद सकता है। गोल्ड और ऑइल की कीमतों में गिरावट का अर्थ यह है कि रुपये में स्थिरता रहेगी और देश के खजाने पर दबाव नहीं होगा। इससे फाइनैंस मिनिस्टर अरुण जेटली को इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च बढ़ाने और डायरेक्ट टैक्सेज घटाने की सहूलियत मिलेगी। आरबीआई रेट घटाएगा तो लोगों के पास खर्च करने लायक रकम ज्यादा बचेगी और इससे इकॉनमी में डिमांड और बढ़ेगी। डेलॉयट इंडिया के चीफ इकनॉमिस्ट और सीनियर डायरेक्टर अनीस चक्रवर्ती ने कहा, मॉनसून में सुधार के साथ क्रूड ऑइल और गैस की कीमतों में कमी ने फिस्कल डेफेसिट और करंट अकाउंट के मामले में राहत दी है। इससे सरकार को दमदार ढंग से निवेश करने में अधिक सहूलियत होगी। इन बातों का यह मतलब नहीं है कि इकॉनमी रॉकेट की तरह फर्राटा भरेगी, लेकिन यह तो है ही कि फाइनैंस मिनिस्टर को कई कदम उठाने में ज्यादा आसानी होगी।

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