Monday, 3 August 2015

हमें नही चाहिए, ऐसा प्रजातंत्र !

अरूण जैन
हमारे कानून में कहें अथवा देश के प्रजातांत्रिक ढांचे में ऐसी कौन सी व्यवस्था है अथवा लोच है कि सर्वोच्च न्यायालय से फांसी की सजा पाया व्यक्ति राष्ट्रपति के पास जाता है, खारिज होने पर फिर सर्वोच्च न्यायालय जाता है । वहां भी खारिज हो तो राज्य के गवर्नर के पास जाता है। यहां भी निराशा हो तो राज्य सरकार भी उसे मुक्त कर सकती है।
ऐसे एक नहीं अनेक प्रकरण हैं। जिनमें फांसी अथवा उम्र कैद की सजा पाए अपराधी मुक्ति पाने के अनेकानेक प्रयास करते हैं । इनमें आतंकवादी, तस्कर, देशद्रोही, राजनैतिक हत्यारे, दुष्कर्म और हत्या जैसे अपराधों के गंभीर आरोपी शामिल हैं । इनमें दो प्रमुख प्रकरणों का उल्लेख उदाहरण के तौर पर किया जा सकता है। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के हत्यारों को फांसी और फिर उम्र कैद की सजा के बाद तमिलनाडु सरकार ने रिहा करने का निर्णय ले लिया । इस पर संयोग से सर्वोच्च न्यायालय ने संज्ञान लेते हुए रोक लगा दी। दूसरा मामला मंुबई हमलों के गुनहगार याकूब मेनन का है। इसके फांसी के निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय ने तीनों बार बहाले रखा । तब वह राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिकाएं ले गया । वह खारिज होने पर फिर सर्वोच्च न्यायालय चला गया। पिटीशन खारिज होने पर राज्यपाल के समक्ष चला गया। शायद यह हमारे ही देश के संविधान, कानून अथवा प्रजातांत्रिक व्यवस्था का लचीलापन है अथवा धर्मनिपेक्षता की थोथी आवरण व्यवस्था है कि अपराध के मामले में सर्वोच्च संस्था होते हुए भी कोई सर्वोच्च नही है। क्यों सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद राष्ट्रपति के समक्ष अपील की इजाजत होना चाहिए ? क्यों सिंगल बैंच के निर्णय को डबल बैंच और फुल बैंच में ले जाने की इजाजत दी जाना चाहिए । राज्यपाल और राज्य शासन को भी ऐसी सुनवाई का अधिकार क्यों दिया जाना चाहिए । एक बार सर्वोच्च न्यायालय जैसी संस्था के फैसले के बाद केवल उसका क्रियान्वयन किया जाना चाहिए, बस। दोहरी-तिहरी व्यवस्थाए अपराधों में समाप्त होना चाहिए । आश्चर्य तो यह है कि इसका फायदा भी राजनीति से जुड़े अथवा रसूखदार लोग ही ज्यादा उठाते हैं। गरीब और सामान्य आदमी तो पहले फैसले में ही जेल भेज दिया जाता है। वह, और कुछ ऐसा कर ही नही पाता अथवा शायद सक्षम नही होता । जब देश का कानून सबके लिए एक जैसा है तो इस प्रकार की व्यवस्थागत लोच का लाभ स्पष्ट रूप से बंद करना चाहिए। यदि यही प्रजातंत्र है तो कृपया माफ कीजिए हमें नही चाहिए ऐसा प्रजातंत्र !

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