Thursday, 14 April 2016

यूपी में प्रशांत किशोर के सहारे मंजिल पाने का प्रयास 
डॉ. अरूण जैन
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर से खड़ा होना चाहती है। इसके लिये 2017 के विधानसभा चुनाव से बेहतर मौका और क्या हो सकता है। वैसे यह पहला प्रयास नहीं है और आखिरी भी नहीं होगा। करीब दो दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है। परम्परागत रूप से किसी भी चुनाव से पूर्व कांग्रेसी वापसी का ढिंढोरा पीटने लगते हैं। यह और बात है कि जब नतीजे आते हैं तो कांग्रेस जीत तो दूर तीसरे/चौथे स्थान पर दिखाई देती है। हर हार के बाद कुछ समय के लिये कांग्रेसी खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं और दिन बीतने के साथ चादर खिसकती जाती है। जब कांग्रेसियों के पास कोई विजन नहीं होता है तो जनता को बार−बार नेहरू−गांधी परिवार की कुर्बानी की याद दिलाकर भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जाता है। एक समय था उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास जनाधार वाले तमाम नेताओं की लम्बी−चौड़ी फौज हुआ करती थी। नारायण दत्त तिवारी, वीर बहादुर सिंह, लोकपति त्रिपाठी, वासुदेव सिंह, बलदेव सिंह आर्य, सईद्दुल हसन, नरेन्द्र सिंह, राजा अजीत प्रताप सिंह, स्वरूप कुमारी बख्शी, अरूण कुमार सिंह मुन्ना, महावीर प्रसाद, सिब्ते रजी, प्रवीण कुमार शर्मा, सुनील शास्त्री, हुकुम सिंह (अब दोनों भाजपा में), शिव बालक पासी, जफर अली नकवी, दीपक कुमार, मानपाल सिंह, सुखदा मिश्रा जैसे तमाम नेताओं की अपने−अपने इलाकों में तूती बोला करती थी। एक तो इन ताकतवर नेताओं की फौज और उस पर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे नेताओं की सरपरस्ती ने कांग्रेस को कई दशकों तक यूपी में कमजोर नहीं होने दिया, लेकिन इंदिरा और राजीव गांधी की मौत के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ तितर−बितर हो गया। न तो कांग्रेस की डूबती नैया को सोनिया गांधी उबार पाईं न ही राहुल गांधी की कोशिशें कामयाब हुईं। नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री साबित हुए जो 1989 तक सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे थे। कांग्रेस में ताकतवर नेताओं की कमी सबको खलती रही, लेकिन इस दौरान कोई नई लीडरशिप नहीं उभरी। चंद नाम जरूर सामने थे, लेकिन यह सर्वमान्य नहीं थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, संजय सिंह, आदित्य जैन, सलमान खुर्शीद, पूर्व नौकरशाह से नेता बने पीएल पुनिया, समाजवादी पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, फिल्म अभिनेता से नेता बने राज ब्बर किस किस का नाम गिनाया जाये, कोई भी कांग्रेस को मझधार से नहीं उभार पाया। बात यहीं आकर खत्म नहीं हुई थी, जिस कांग्रेस का सिक्का पूरे देश में चलता था, उस कांग्रेस के दिग्गज नेताओं सोनिया−राहुल गांधी तक को अपनी जीत पक्की करने के लिये समाजवादी पार्टी से वॉकओवर लेना पड़ जाता था। अमेठी और रायबरेली में सोनिया−राहुल की जीत पक्की करने के लिये समाजवादी पार्टी अपना प्रत्याशी नहीं उतारती तो उपकार स्वरूप कांग्रेस नेतृत्व कन्नौज और मैनपुरी में अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा करती ताकि मुलायम सिंह परिवार के सदस्य आसानी से अपनी जीत सुनिश्चित कर सकें। यूपी की तरह ही बिहार में भी कांग्रेस और राहुल गांधी नीतिश कुमार और लालू यादव के पिछल्लूग नजर आये। बात ज्यादा पीछे न जाकर 2007 और 2012 के विधान सभा चुनाव, 2009 एवं 2014 के लोकसभा चुनाव के अलावा बीते लगभग चार वर्षों में हुए विधान सभा के उप−चुनाव की कि जाये तो कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नहीं दिखी। उक्त चुनावों और उसमें कांग्रेस की पतली हालत की चर्चा इसलिये हो रही है क्योंकि इन सभी चुनावों में कांग्रेस ने अपने युवराज राहुल गांधी को आगे करके जीत के बड़े−बड़े दावे किये थे। जीत का स्वाद चखने के लिये राहुल गांधी ने दलितों के यहां जाकर कई दिन गुजारे। उनकी झोपड़ी में बैठकर खाना खाया। मच्छरों के बीच चरपाई पर सोये। जिस तरह राहुल ने दलितों को लुभाने के लिये अभियान चलाया था, उसी प्रकार मुसलानों को रिझाने के लिये भी उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। मुजफ्फरनगर दंगे हों या फिर दादरी कांड अथवा साम्प्रदायिक हिंसा का और कोई मामला राहुल स्वयं ऐसे मौकों पर गये और एक वर्ग विशेष के साथ एक पक्ष बनकर खड़े रहे। इसके बाद भी हाल ही में सम्पन्न हुए यूपी के पंचायत चुनावों में रायबरेली को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस का खाता नहीं खुला। सबसे करारी हार राहुल के अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी में हुई है। इस हार की ठीकरा राहुल गांधी और उनके खास लोगों के सिर पर फूटने से बचाने के लिए टीम राहुल व उनके करीबी लोगों ने यह बहाना बनाना आरम्भ कर दिया है कि पंचायत चुनाव चूंकि सिम्बल पर नहीं लड़े गए थे, इसलिए हार की जिम्मेदारी राहुल गांधी पर डालना नाइंसाफी होगी। हालांकि पार्टी में कई लोग इस तर्क से सहमत नहीं थे। कई जिलों में बेकार उम्मीदवारों के चयन के लिए सीधे तौर पर राहुल के करीबी लोगों पर अंगुलियां उठाई जा रही हैं। कांग्रेस के एक नेता ने कई जिलों की एक सूची बताई जहां पंचायत चुनाव अध्यक्षों की उम्मीदवारी तय करते समय उन जिलों के कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं से चर्चा करना तक जरुरी नहीं समझा गया था। टीम राहुल के करीबी लोग कांग्रेस की हार के बचाव में विगत दो दशकों का आंकड़ा देते हुए यह भी तर्क गढ़ रहे हैं कि यूपी में जिसकी सरकार रहती है, उसी पार्टी के लोग ही पंचायत चुनावों में जीतते रहे हैं। कांग्रेस को लगातार पराजय मिल रही है, लेकिन आज भी यूपी में गांधी परिवार की उपस्थिति अमेठी, रायबरेली, इलाहाबाद और थोड़ी−बहुत सुखा प्रभावित बुंदेलखंड आदि इलाकों तक सीमित है। कांग्रेस के पास कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जिसे मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा सके। निर्मल खत्री, मधुसूदन मिस्त्री के सहारे संगठन अगर आगे बढ़ सकता तो कब का बढ़ गया होता। कांग्रेस में सर्वमान्य नेता का अभाव है तो सीएम के नाम पर जब चर्चा होती है तो कांग्रेसियों की सुई प्रियंका वाड्रा के नाम पर अटक जाती है। ऐसी हालत में कांग्रेस 2017 में कैसे वापसी कर सकती है। इसका जवाब लोग राहुल से पूछ रहे थे तो राहुल गांधी किसी परिपक्व नेता की तरह जवाब देने की बजाय प्रशांत किशोर की शरण में चले गये। पहले मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में और हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव में जदयू−राजद−कांग्रेस गठबंधन की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर राहुल की मर्जी के अनुसार अब यूपी चुनावों में कांग्रेस की कमान संभालेंगे। हाल ही में नई दिल्ली में यूपी चुनावों को लेकर कांग्रेस की बैठक में जब प्रशांत किशोर दिखाई दिये तो सियासी प्याले में उफान आ गया। बाद में पता चला कि प्रशांत किशोर के कंधों पर राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी डाली है। पिछले करीब तीन दशकों से कांग्रेसी यूपी में सत्ता का स्वाद चखना तो दूर दो अंकों से आगे नहीं बढ़ पाये लेकिन प्रशांत किशोर का साथ मिलते ही कांग्रेसी 2017 के चुनाव में भाजपा, सपा और बसपा को चारों खाने चित कर देने का दावा करने लगे हैं।

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