Tuesday, 15 August 2017

विदेश यात्राओं पर सवाल उठाने से पहले उपलब्धियाँ देखें

डॉ. अरूण जैन
विपक्ष के लोग यद्यपि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर तरह तरह की टिप्पणियां करते हैं लेकिन इन यात्राओं की अनगिनत उपलब्धियों के कारण ही आज दुनिया जिस तरह से भारत की तरफ देख रही है वह ऐतिहासिक है। कुछ पंडित भारत की विदेश नीति के आक्रामक होने की बात कहते हैं लेकिन यह समय के साथ होने वाली स्पर्धा है जिसमें हमारे प्रधानमंत्री को यह सब करना पड़ा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता। अब जबकि मोदी के सत्ता में आये तीन वर्ष पूरे हो रहे हैं, भारत की विदेश नीति को लेकर चर्चायें होना स्वाभाविक है क्योंकि इसी दौर में दुनिया एक नए तरह के वातावरण में प्रवेश कर रही है। अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों में दक्षिणपंथ का उदय हो रहा है। वैश्वीकरण पर संकट के बादल हैं और दुनिया नयी परिभाषाओं के साथ आकार ले रही है। ऐसे में विवेचना दोनों की ही होनी चाहिए- इतिहास की भी और वर्त्तमान से जुड़े भविष्य की भी। एक तरह से देखने पर नरेंद्र मोदी की विदेश नीति भारत को अधिक प्रतिस्पर्धी, विश्वस्त और सुरक्षित देश के रूप में नए सिरे से तैयार करने में सक्षम प्रतीत होती है। यद्यपि मजबूत विदेश नीति की बुनियाद मजबूत घरेलू नीति ही होती है। वह भारत, जहाँ सम्पूर्ण विश्व का छठवां भाग निवास करता है, हमेशा अपनी शक्ति से बहुत कम प्रहार करता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वह नियम-निर्माता नहीं नियम मानने वाला देश रहा है। सुखी और शांत पड़ोसी  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की विदेश नीति में सुखी और शांत पड़ोसी बनाने की पहल सबसे बड़ी ताकत है। मोदी ने अपने शपथ ग्रहण के दिन से ही इसकी शुरुआत कर दी थी जिसे 5 मई को कर के भी दिखा दिया। यह अलग बात है कि इस दिशा में पकिस्तान एक नासूर ही बन कर सामने आता रहा है। पकिस्तान को छोड़ दीजिये तो आज हम यह कह सकने की स्थिति में हैं कि समूचा दक्षिण एशिया आज एक कुटुंब के रूप में उभर कर सामने आया है जो मोदी की नीतियों की सबसे बड़ी विजय है। इस बात को दक्षिण एशिया के सभी देशों ने भी स्वीकार किया है।
 इसरो की तरफ से दक्षिण एशिया संचार उपग्रह जीसेट-9 को लांच करने के बाद दक्षिण एशियाई देशों के राष्ट्राध्यक्षों ने भारत को शुक्रगुजार मानते हुए कहा कि भारत के इस कदम से क्षेत्रीय देशों का आपसी संपर्क बढ़ेगा। सैटेलाइट में उपग्रह छोड़े जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा कि यह लांच इस बात को प्रमाणित करता है कि जब क्षेत्रीय सहयोग की बात हो तो आसमान में कोई सीमा नहीं होती है। प्रधानमंत्री ने कहा कि क्षेत्रीय जरूरतों के हिसाब से इसरो की टीम ने दक्षिण एशिया सैटेलाइट का निर्माण किया। मोदी ने आगे कहा कि इस लांचिंग के मौके पर मुझसे जुडऩे के लिए अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भुटान, नेपाल, मालदीव और श्रीलंका के अपने सहयोगी नेताओं का शुक्रिया करता हूं। दुनिया में एक मिशन के तहत सबसे अधिक सैटेलाइट्स की सफल लॉन्चिंग के बाद भारत ने दक्षिण एशियाई देशों के लिए त्रस््रञ्ज-9 को अंतरिक्ष में भेज दिया। इस क्षेत्र के देशों के लिए यह काफी अहम उपहार है। बदलते दौर में अपने पड़ोसियों से संबंधों को मजबूत करने के लिए भी यह सैटेलाइट काफी अहम भूमिका निभाएगा। नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, मालदीव, श्रीलंका के लिए भारत का यह उपहार कई मायनों में अहम इसलिए भी है क्‍योंकि इन देशों का अपना या तो कोई सैटेलाइट है ही नहीं या फिर उससे मिलने वाली सेवाएं इतनी खास नहीं हैं। इस सैटेलाइट लॉन्चिंग से जुड़ी एक अहम बात यह भी है कि इस सैटेलाइट की सेवाओं के लिए भारत ने किसी भी अन्‍य देश से कोई राशि नहीं ली है। इसका अर्थ है कि इस क्षेत्र के सभी देश इस सैटेलाइट से मिलने वाली जानकारियों को अपने हित के लिए बिना किसी मूल्य के इस्तेमाल कर सकेंगे। हालांकि पाकिस्तान इसमें भागीदार नहीं है। अरब देशों से रिश्ते बेहतर करने की पहल पश्चिम एशियाई देशों से भारत की बढ़ती नजदीकी बहुत ज्यादा सुर्खियां नहीं बटोर रही है। मगर मोदी सरकार का अरब देशों से ताल्लुक बेहतर करने का मिशन कई लोगों को पसंद आया है। कई जानकारों को लगता है कि अरब मुल्कों से नजदीकी बढ़ाने से घरेलू मोर्चे पर मोदी सरकार ये संदेश भी देने में कामयाब होगी कि वह धर्मनिरपेक्ष है। प्रधानमंत्री मोदी का इरादा विदेश नीति में पश्चिमी एशियाई देशों को अहमियत देने का है। उन्होंने संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ईरान, इराक और कतर के अलावा फिलिस्तीन से ताल्लुक बेहतर करने पर जोर दिया है। हालांकि, इन नीतियों से भारत अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर संदेश देना चाह रहा है। मगर इसका घरेलू राजनीति पर भी असर होगा। भारत में 14 करोड़ मुसलमान रहते हैं, जो दुनिया के किसी देश में मुसलमानों की दूसरी सबसे ज्यादा आबादी है। प्रधानमंत्री मोदी की आर्थिक और विदेश नीति में काफी दिलचस्पी है। अरब देशों के साथ संबंध बेहतर करके वो मुस्लिम देशों के बीच पाकिस्तान के असर को भी कम करना चाह रहे हैं ताकि भारत के साथ विवाद में इन देशों का पाकिस्तान को मिल रहा समर्थन कमजोर हो। बहुत से लोग प्रधानमंत्री मोदी की इस नीति के समर्थक हैं। सूत्रों के मुताबिक, मोरक्को की राजधानी रबात से कुछ जानकारियां ऐसी मिली हैं कि आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा मोरक्को की जमीन का इस्तेमाल अपनी गतिविधियों के लिए कर रहा है।

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