Tuesday, 15 August 2017

नीतीश ने मोदी को अपना नेता मान लिया


डॉ. अरूण जैन
लालू परिवार से पिंड छुड़ाकर  भाजपा के समर्थन से सत्ता में वापस आ जाना यह जानने के लिए काफी है कि यूं ही नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति का चाणक्य नहीं कहा जाता। वह छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। अपने पत्ते बेहद सोच समझकर चलने वाले नीतीश कुमार के बारे में लालू प्रसाद का कहना है कि उनका दांत मुंह में नहीं आंत में है। अंतिम समय तक कोई यह भांप नहीं सका कि आखिरकार नीतीश के मन में चल क्या रहा है। लालू परिवार पर सीबीआई के छापे व एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही नीतीश ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी, हालांकि उनकी अगली चाल क्या होगी इसकी भनक किसी को भी नहीं लगी। 66 वर्षीय नीतीश कुमार ने राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री पद से बुधवार शाम को इस्तीफा दिया और तीन घंटे से भी कम समय में भाजपा ने उन्हें समर्थन देकर फिर बिहार की गद्दी सौंपने का रास्ता साफ कर दिया। उस दिन घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि बड़े बड़े राजनीतिक पंडित भी भौंचक्के रह गये। लालू के पुत्रमोह ने जहां 80 विधायकों वाली राजद को सत्ता से बाहर कर दिया वहीं मूकदर्शक बनकर तमाशा देखने वाली कांग्रेस भी महागठबंधन से पूर्व के दौर में पहुंच गई। सोशल मीडिया पर कांग्रेस की यह कहकर खिल्ली उड़ाई जा रही है कि तलाक राजद व जदयू का हुआ लेकिन विधवा कांग्रेस हो गई। बहरहाल, नीतीश कुमार के इस दांव से जहां राजद व कांग्रेस बौखलाई हुई है वहीं भाजपा की बांछें खिल गई हैं। भाजपा की खुशी का कारण यह नहीं है कि उसके कुछ विधायक मंत्री बन गये। उसकी प्रसन्नता की असली वजह यह है कि साल 2019 के आम चुनाव में विपक्ष के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकने लायक अब कोई मजबूत चेहरा नहीं बचा है। माना जा रहा था कि नीतीश कुमार को आगे कर विपक्ष आम चुनाव में मोदी को चुनौती देने की मंशा पाले हुए था लेकिन अब नीतीश कुमार के भाजपा की छतरी तले अपना भविष्य सुरक्षित कर लेने से विपक्ष का मंसूबा ध्वस्त हो गया है।   एक वक्त नरेंद्र मोदी की परछाई से भी दूर भागने वाले नीतीश कुमार ने बिहार की सियासत को 180 डिग्री घुमा दिया है। इससे न केवल नीतीश कुमार छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं बल्कि पीएम मोदी के कांग्रेसमुक्त भारत के सपने को कुछ और आसान बना दिया है। अब देश के 18 राज्यों में भाजपा व उसके सहयोगियों की सरकार है। यानी पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश की 67 प्रतिशत जनता पर भाजपा या उसके सहयोगियों का शासन है। अगर गहराई से देखें तो इस सियासी बदलाव में असली जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुई है। नरेंद्र मोदी ही वह शख्स थे जिन्हें भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किये जाने के बाद नीतीश कुमार ने एनडीए से अपना 17 साल पुराना रिश्ता एक झटके में खत्म कर लिया था। मोदी व नीतीश के बीच की खाई कई बार मीडिया की सुर्खियां बनती रही हैं। लेकिन अब वह सब पुराने दिनों की बात हो गई है।  अब नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी की छतरी तले बिहार का शासन चलाने में कोई भी आपत्ति नहीं है। उन्होंने नरेंद्र मोदी को अपना नेता मान लिया है। मोदी भी तो यही चाहते थे। बिहार में विजय रथ के थम जाने की कसक भी इसी के साथ खत्म हो गई है। नीतीश कुमार ने भी उनका नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। इसकी पृष्ठभूमि जैसा कि विरोधी दल कह रहे हैं बहुत पहले से ही तैयार हो रही थी। इसकी बानगी राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार के नाम पर विचार करने के लिए आयोजित सोनिया गांधी के भोज से दूरी व उसके 24 घंटे बाद ही प्रधानमंत्री मोदी की डिनर पार्टी में शामिल होने के रूप में देखा जा सकता है।  दोनों नेताओं के रिश्तों के बीच जमी बर्फ उसके बहुत पहले पिघलनी शुरू हो गई थी। इसकी पहल खुद नीतीश कुमार की ओर से ही की गई थी। नोटबंदी के दौरान जहां पूरा विपक्ष दाना पानी लेकर मोदी पर चढ़ दौड़ा था वहीं नीतीश कुमार ने न केवल इसका समर्थन किया बल्कि बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी कार्रवाई करने की मांग कर दी। इसी तरह उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक की भी खुले मन से सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने भी नीतीश को निराश नहीं किया। पटना में आयोजित प्रकाश पर्व के दौरान नीतीश कुमार की शराबबंदी की जमकर सराहना की। धीरे धीरे दुश्मनी दोस्ती में बदली और परिणाम तब दिखा जब राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर रामनाथ कोविंद का नाम घोषित किये जाने के बाद नीतीश ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी एनडीए उम्मीदवार को वोट देगी। बहरहाल, एक बात तो तय है कि बिहार के इस राजनीतिक उलटफेर का 2019 के लोकसभा चुनाव पर गहरा असर पड़ेगा।

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