Sunday, 13 December 2015

क्या नरेंद्र मोदी का जादू कम हो गया है? 

डॉ. अरूण जैन

नरेंद्र मोदी का जादू कम हो गया है या चुनाव प्रचार गलत ढंग से हुआ। वजह कुछ भी हो, वास्तविकता यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का बिहार में सफाया हो गया। भाजपा आत्मविश्वास दिखा रही है और उसे लगता है कि विपक्षी एकता उसके नुकसान का कारण है। फिर भी, बिहार के चुनावों ने भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री-पार्टी अध्यक्ष के रूप में मोदी और अमित शाह की जोड़ी के मंसूबों पर करारा प्रहार है। एक दूसरे पर दोष लगाने का सिलसिला, जो मतगणना के कुछ घंटों के बाद ही शुरू हो गया था, लगातार जारी है। नेतृत्व वर्ग में क्रोध के स्वर बढ़ते जा रहे हैं। आने वाले समय में यह और भी बढ़ेगा। हर चुनाव के बाद जिस तरह विश्लेषण होते हैं, बिहार का भी बार-बार विश्लेषण किया जाएगा। बेशक, किसी समय में लड़े जाने वाले चुनाव के मुकाबले सबसे ज्यादा तीखे ढंग से लड़ा गया चुनाव था। पहले कोई भी चुनाव सांप्रदायिक नफरत के आधार पर बांटने वाली राजनीति और धार्मिक असहिष्णुता के आधार पर नहीं लड़ा गया है। हमने ऐसा कोई विधानसभा चुनाव नहीं देखा जिसमें दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों ने प्रचार किया हो और प्रधानमंत्री ने 30 रैलियों में भाषण किया हो। पार्टी अमित शाह रणनीति तैयार करने के लिए आठ महीनों से भी ज्यादा बिहार में जमे रहे। लेकिन परिणाम आए तो महागठबंधन को सफलता हाथ लगी। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी कांग्रेस, जिसे 2014 के आम चुनावों के बाद से मिल रही लगातार पराजय के बाद अपनी स्थिति में बदलाव जरूरत थी, के साथ खामोशी से भारी विजय की ओर बढ़ गई। यह आरएसएस और भाजपा की बांटने वाली राजनीति के मुकाबले सामाजिक कल्याण और आर्थिक विकास के लिए वोट था। अंत में, जैसा पाया गया कि बिहार के लोगों ने मोदी के जोर और तथाकथित गुजरात मॉडल के कारण 2014 में केंद्र की सत्ता में आई भाजपा की पूरी तरह नकार दिया। वास्तव में दोनों को अस्वीकार करने में दिल्ली पहली थी जो 70 में से 67 सीटें देकर आम आदमी पार्टी को सत्ता में ले आई। बेशक, भाजपा ने कुछ राज्यों में सफलता का स्वाद जरूर चखा। झारखंड और हरियाणा में उसे सफलता मिली और जम्मू-कश्मीर में उसने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ सरकार बनी ली। लेकिन बिहार एक ऐसा राज्य था जहां भाजपा को मुश्किलों को पार कर लेने का भरोसा था। दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं होना था। मेरी राय में भाजपा के नुकसान के कई कारण हैं- ध्रुवीकरण, आरक्षण, गाय आदि। लेकिन मेरे हिसाब से, पिछले दो कार्यकलापों में नीतिश कुमार ने जो सुशासन दिया वह साफ दिखाई देता है। नीतीश कुमार ने उपहार के रूप में थोड़े समय के लिए सत्ता जीतनराम मांझी को चलाने दी। इसे एक छोटा भटकाव मानकर भूल जाना चाहिए। दूसरों शब्दों में कहें, बिहार के लोग सुशासन का चेहरा बन चुके नीतीश कुमार को इसके बावजूद चुनना चाहते थे कि उन्होंने अपने घोर विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव से हाथ मिला था। आरजेडी को जनता दल युनाइटेड से ज्यादा सीटें मिली हैं और लालू यादव मंत्रिमंडल बनाने में तकलीफ देने वाली कीमत मांग सकते हैं। लेकिन मुझे विश्वास है कि नीतीश कुमार बागडोर थामेंगे और लोगों को निराश नहीं करेंगे जिन्होंने उनमें विश्वास जाहिर किया है। मुझे यह भी उम्मीद है कि कांग्रेस, जिसकी विधानसभा में अच्छी संख्या है, आसपास में जो कुछ हो रहा है उसे नजरअंदाज नहीं करेगी। मैं इसे कोई ज्यादा मायने की बात नहीं समझता कि लालू ने कहा कि नीतीश बिहार में शासन करेंगे और वह खुद केंद्र में मोदी का मुकाबला करेंगे, बिहार के मामलों में दखलदाजी किए बगैर। मैं यह बड़बड़ाहट सुन सकता हूं कि लालू के बेटों को मंत्रिमंडल में लिए जाने और एक को उपमुख्यमंत्री बनाने का संकेत दिया जा रहा है। यहीं पर नीतीश को संतुलन बनाना होगा क्योंकि भाजपा और एनडीए में उनके प्रतिद्वंदियों को ऐसे ही मौके की तलाश है ताकि वे कूदकर उसे दोनों हाथ से लपक लें। मैं इसमें नहीं जाना चाहता कि भाजपा से कहां चूक हुई क्योंकि पार्टी में चुनाव मैनेजर हैं जो इसका विश्लेषण करेंगे। लेकिन मैं अधिकार के साथ कह सकता हूं कि बिहार के उदाहरण ने भविष्य में आ रहे चुनावों के लिए एक ढांचा दे दिया है। अगले साल असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु को चुनाव में जाना है तो क्षेत्रीय पार्टियां हर राज्य में बिहार के मॉडल पर भाजपा के खिलाफ कुछ गठबंधन बना सकती है। निस्संदेह, हर राज्य की अपनी जरूरतें हैं और विकास के कार्यक्रम हैं, इसके अलावा अपने स्थानीय नेताओं के साथ खास मॉडल पर काम करते है। सिर्फ एक चालाक गठजोड़ जो लालू और नीतीश कुमार की तरह का हो और जिसे स्थानीय मतदाताओं की नब्ज की पहचान हो, उस हद तक सफलता हासिल कर सकता है जिस हद तक बिहार में सफलता मिली है। चुनाव के पहले का समझौता निश्चित और स्थानीय जरूरतों की पक्की समझदारी के आधार पर होना चाहिए। मोदी-शाह के नेतृत्व माडल पर लौटें तो मुझे यह कहते हुए दुख है कि दोनों ने चीजों को महत्व नहीं दिया। चुनाव अभियान के दौरान दिखाया गया उनका घमंड पार्टी के सफाए का एकमात्र कारण हो सकता है। निश्चित तौर पर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण का मुद्दा उठा कर आग में घी डाला। यहां तक कि बिहार के भाजपा नेतृत्व ने कई बयान दिए हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि पार्टी कुछ मुद्दों पर अंतिम हद तक गई और वे यह बताते दिखते हैं कि आरएसएस प्रमुख के बयान बिहारियों को ठीक नहीं लगे। ऐसा लगता है कि मोदी रास्ता भटक गए हैं और नहीं जानते कि नौकरशाही की खामियों पर किस तरह काबू पाया जा सकता है, ऐसी चीज जिसका सामना पहले शासन करने वालों को करना पड़ा था। पार्टी की ओर से घोषित आर्थिक सुधार देश को निर्लज्जता से दक्षिण पंथ की ओर ले जाता है। अगर जवाहर लाल नेहरू की समाजवादी जैसी पद्धति बहुत ज्यादा है, तो ज्यादातर गरीब जनता वाले देश में भाजपा अमीरों और कारपोरेट समर्थक होने का आभास नहीं दे सकती और उसे दक्षिणपंथी नीतियों से बाहर आना होगा। मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि पार्टी भारतीय संविधान की प्रस्तावना के हर अक्षर का पालन करे। लेकिन वह ऐसी कोई राह नहीं अपना सकती जो संविधान के भावना के एकदम विपरीत हो, ऐसा शासन जो उस कदम के खिलाफ हो जो अमीरों और गरीबों के बीच कम करने के लिए उठाया गया हो। मोदी और उनकी पार्टी जितनी जल्दी यह समझ लें, उतना बेहतर होगा।

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