Sunday, 13 December 2015

सिर्फ वंचितों को आरक्षण देने की दलील में गलत क्या? 


डॉ. अरूण जैन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने आरक्षण के बारे में ऐसा क्या कह दिया कि राजनीति को महज वोट बैंक तक समेट देने वालों के समान ही भारतीय जनता पार्टी उसकी मुखालफत में मुखरित हो गई? क्या किसी व्यवस्था का उद्देश्य के अनुरूप क्रियान्वयन की समीक्षा करने से हमें गुरेज करना चाहिए। यह माना जाता है और प्राय: सभी सरकारें और संगठन निर्धारित किए गए कार्यक्रम और योजनाओं की नित्य ही समीक्षा करते रहते हैं। समीक्षा को क्रियान्वयन को सुनिश्चित कराने का सर्वोच्च उपाय माना जाता है। यदि मोहन भागवत ने चौथाई शताब्दी पहले पिछड़े वर्ग के और आधी शताब्दी से भी अधिक समय से अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए लागू आरक्षण की समीक्षा की आवश्यकता जतायी तो किसके सामने से परोसी थाली खिसका ली और आरक्षण के नाम पर जो कुछ देश में हो रहा है उसको देखते हुए आरक्षण को राजनीति का मुद्दा बनाने का परामर्श दिया? ऐसा उन्होंने नहीं किया है। समय−समय पर देश के तमाम विचारवान लोगों यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने आरक्षण के लिए लिये जाने वाले राजनीतिक निर्णय पर न केवल विपरीत टिप्पणी की है अपितु उसे खारिज भी कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि वह सत्ता के लिए राजनीति नहीं करती इसलिए उसका वोट बैंक की रणनीति में भरोसा नहीं है लेकिन आरक्षण के संदर्भ में श्री भागवत की अभिव्यक्ति पर उसकी प्रतिक्रिया शाब्दिक भेद के अलावा उन लोगों से भिन्न नहीं कही जा सकती जो केवल सत्ता से सम्पन्नता के लिए वोट बैंक की राजनीति में आकंठ डूबे हुए हैं। अर्ध और चौथाई शती से जो व्यवस्था लागू है क्या उस उद्देश्य की प्राप्ति में सफल रही है जिसको संज्ञान में लेकर उसे लागू किया गया था? समय−समय पर जो तथ्य उभरकर आते रहे हैं उससे तो यही पता चलता है कि इतनी अवधि बीत जाने के बाद भी अभी भी सत्तर प्रतिशत से अधिक लोग इसके संपर्क से भी अछूते हैं। कुल तीस प्रतिशत लोगों में यह व्यवस्था सिमट कर रह गई है और यही तीस प्रतिशत शेष के भी प्रवक्ता बनकर किसी भी समीक्षा के खिलाफ मुखरित हो उठते हैं। आरक्षण जो कि सामाजिक बराबरी के लिए आर्थिक उत्थान की अवधारणा से लागू किया गया था वह अब हक के रूप में परिवर्तित हो चुकी है तथा सामाजिक विषमयता और संघर्ष का कारण बनती जा रही है। संघ एक ऐसा संगठन है जो सामाजिक समरसता के लिए काम करता है। ऐसी स्थिति में उसका चिन्तित होना अस्वाभाविक नहीं है। आरक्षण की समीक्षा के लिए मोहन भागवत द्वारा की गई अभिव्यक्ति के बाद राजस्थान की भाजपा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमा−पचास प्रतिशत−को नजरंदाज कर आरक्षित वर्ग को उनहत्तर प्रतिशत कर दिया है। समय−समय पर विभिन्न राज्य सरकारें वर्गों और सम्प्रदायों के आग्रह पर ऐसा ही विधेयक पारित करती रही हैं। क्या हुआ उनका परिणाम? सभी को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार कर दिया और वे लागू नहीं हो सकी। जिन सरकारों ने उन्हें लागू किया था उन्होंने मांगकर्ताओं से मुक्ति पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सहारा लिया। राजस्थान सरकार के निर्णय का भी वही हश्र होने वाला है। आरक्षण की परिधि में शामिल किए जाने के लिए जो आंदोलन हो रहे हैं उससे अपनी साख को बचाने के लिए जानते हुए भी कि वह असंवैधानिक है, सरकार कानून बनाने से परहेज नहीं कर रही है। उन पर अमल नहीं हो सकेगा इसके लिए आश्वस्त होते हुए भी लिये गये निर्णय से ऐसी सरकारें जिस आकांक्षा को बलवती बना रही हैं वह हिंसक होती जा रही है। गूजरों ने लगभग एक महीने तक रेलपथ को घेरे रखा उनका अनुसरण अब सभी करने लगे हैं। चाहे पश्चिम उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट हों या फिर गुजरात का पाटीदार समुदाय, आवागमन बाधा से अरबों रूपये की क्षति हो रही है। तोड़ फोड़ से सरकारी सम्पत्ति को नष्ट किया जा रहा है। इसकी भरपायी किसको करनी पड़ेगी या पड़ रही है? सरकारी सम्पत्ति किसकी सम्पत्ति है? शायद ही किसी को इसकी परवाह होगी। उत्तर प्रदेश में आरक्षण ने एक अलग समस्या खड़ी कर दी है जिससे सम्पूर्ण प्रश्नतंत्र लुंज पुंज हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण का क्रियान्वयन जिस ढ़ंग से किया, उसके फलस्वरूप कनिष्ठ−ज्येष्ठ हो गए और ज्येष्ठ कनिष्ठ। इसके विरूद्ध प्रभावित लोग उच्च न्यायालय की शरण में गए। न्यायालय ने सरकार के निर्णय को गलत करार कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले की ही पुष्टि की और वर्तमान सरकार को एक निर्धारित समय सीमा में दुरूस्ती का निर्देश दिया। उहापोह के बाद सरकार को न्यायालय के निर्देश के अनुसार काम करना पड़ा है। राज्य का कर्मचारी दो भागों में बंट गया है। धरना−प्रदर्शन से आगे बढ़कर धमकियां दी जाने लगी हैं। यह तनाव धमकियों से आगे भी बढ़ सकता है ऐसे संकेत मिल रहे हैं। आरक्षण ने युवा पीढ़ी को उत्तेजित और गुमराह करने का काम किया है और राजनीतिक दलों को वोट बैंक बनाने के लिए प्रेरित किया है। हमने जाति आधारित सामाजिक पिछड़ापन को आरक्षण का आधार माना है तो फिर मजहब के आधार पर आरक्षण दिलाने के वादे क्यों किए जा रहे हैं। यदि तथाकथित सवर्ण वर्ग को हमने सामाजिक पिछड़ा नहीं माना है तो फिर उनमें आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण का नारा हर राजनीतिक दल क्यों बुलंद कर रहा है। हमने ऐसे कानून बना लिए हैं जिसमें जन्म के आधार पर असमानता अपराध बन गया है। इसलिए जाति या सम्प्रदाय के आधार पर पिछड़ापन का कोई औचित्य नहीं है। पिछड़ा वह है जो वंचित है, जो वंचित है वही शोषित है वही असमानता का शिकार है। तो क्या यह औचित्य पूर्ण नहीं होगा कि वंचितों की पहचान जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र आदि के बजाय उनकी वंचित स्थिति को संज्ञान में लेकर की जाये। इस पहचान के आग्रह को शताब्दियों से शोषण कर रहे लोगों की साजिश की संज्ञा प्रदान कर शोर मचाया जाता है। यद्यपि इस शोर का कोई औचित्य नहीं है लेकिन क्योंकि राजनीति वोट बैंक की हो गई है इसलिए कोई भी दल इसके औचित्य का प्रतिपादन करने के लिए मुखरित नहीं होता। इसलिए यह कहा जाने लगा है कि क्या जिन वर्गों को सामाजिक बराबरी और आर्थिक उत्थान के लिए आरक्षण दिया जा रहा है, क्या इस वर्ग को उसका समुचित लाभ हुआ है या नहीं इसकी समीक्षा होनी चाहिए। और जो लोग आर्थिक उत्थान के कारण सामाजिक पिछड़ेपन के दायरे से बाहर हो गये हैं क्या उनको आरक्षण से लाभान्वित होने से वंचित कर जो वंचित हैं उनको लाभ नहीं पहुंचाया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़े वर्ग में ऐसे लोगों के लिए क्रीमीलेयर निर्धारित करने का निर्देश भी दिया लेकिन सरकारों ने क्रीमीलेयर के लिए जो मानक तय किया है उससे अरब खरबपति भी प्रभावित नहीं होता। अनुसूचित वर्ग में तो इस लेयर की चर्चा भी करना पाप कृत्य बन जाता है। फलत: आरक्षण कुछ परिवारों में ही बंधुआ बन गया है। यद्यपि अनुसूचित जाति आयोग के वर्तमान अध्यक्ष पीएल पूनिया ने जो एक प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं, समीक्षा के ओचित्य का प्रतिपादन किया है तथापि उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान ही असर करने वाली साबित हुई है। कई दलित लेखकों और उद्यमियों ने भी आरक्षण के वर्तमान स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं लेकिन वोट बैंक के सौदागरों द्वारा भयदोहन अभियान से उसे कुंठित कर दिया गया।

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