Monday, 7 December 2015

कितना कामयाब रहेगा बिहार का नया राजनैतिक संयोजन 
अरूण जैन
बिहार में नयी सरकार के गठन के बाद मंत्रिमंडल का जो स्वरूप उभर कर आया है उस पर कई सवाल खड़े किये जा रहे हैं। मात्र आठवीं कक्षा पास व्यक्ति यदि आज के दौर में भी किसी राज्य का उपमुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो पाया है तो इसे भारतीय लोकतंत्र का कमाल नहीं बल्कि खामी कहा जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि महागठबंधन में सबसे ज्यादा विधायकों वाली पार्टी राष्ट्रीय जनता दल है और उसके प्रमुख लालू प्रसाद यादव के दोनों युवा पुत्र राज्य मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाये गये हैं। यह दोनों मंत्रिमंडल में कितने वरिष्ठ हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगा लेना चाहिए कि तमाम वरिष्ठों और अनुभवी नेताओं को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री के बाद लालू पुत्रों को शपथ दिलाई गई। लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री बनाये गये हैं और वह सड़क निर्माण विभाग संभालेंगे जबकि उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव जोकि शपथ लेते वक्त उच्चारण भी सही तरह से नहीं कर पा रहे थे अब स्वास्थ्य, सिंचाई और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण महकमों की जिम्मेदारी संभालेंगे। यह सही है कि बिहार या देश में कम शैक्षणिक योग्यता वाले व्यक्ति का मंत्री या मुख्यमंत्री बनना कोई नयी बात नहीं है लेकिन आज जबकि भारत तेजी से तरक्की कर रहा है और उसे विश्व के अन्य देशों के साथ सतत संपर्क की जरूरत है और तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया से सांमजस्य बनाने की जरूरत है, ऐसे में हमारे नेता यदि कोई पत्र आदि पढऩे लिखने के ही काबिल नहीं हों तो उन्हें पूरी तरह प्रशासनिक अधिकारियों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यदि कोई वाकई नेक इरादों के साथ राजनीति में आया हो और जनहितकारी नीतियों को लागू कराना चाहता हो लेकिन शिक्षित नहीं हो तो वह अपनी अज्ञानता के चलते काम नहीं कर पाएगा। नीतीश कुमार बिहार की छवि बदलने के प्रयास में लंबे समय से लगे हैं और इस काम में उन्हें सफलता भी मिल रही है लेकिन यह भी गौरतलब है कि बिहार में नकल करते छात्रों और नकल करवाते लोगों तथा पुलिस के मूक दर्शक बने रहने की तसवीरें पिछले दिनों वायरल हो गयी थीं। उसी तरह अब बिहार के मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पा रही है। बढ़ते बिहार ही नहीं बढ़ते भारत की छवि पर भी इन सबसे प्रभाव पड़ रहा है लेकिन राजनीति की अपनी मजबूरियां भी हैं क्योंकि सामाजिक गणित को साधने और राजनीति में परिवारवाद के चलते एडज़स्ट करने के चक्कर में कई बार राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों को मंत्री बनाना पड़ता है जोकि काबिल नहीं होते हैं। पिछले दिनों देखने में आया कि कुछ राज्य सरकारों ने पंचायत चुनाव लडऩे के लिए शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने की दिशा में कदम उठाया लेकिन जब ऐसा ही कदम विधानसभा और लोकसभा के उम्मीदवारों के लिए उठाने की मांग उठती है तो उसे खारिज कर दिया जाता है। ज्यादा दूर नहीं जाएं तो एकदम बगल यानि पड़ोसी पाकिस्तान में भले लोकतंत्र नाम का ही हो लेकिन वहां पर संसद का चुनाव लडऩे के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक निर्धारित है। एक बड़ा सवाल और उठता है कि जब कुछ राज्यों जैसे हाल ही में राजस्थान और हरियाणा ने विधानसभा से अध्यादेश पास कर जिला परिषद के चुनाव लडऩे के लिए न्यूनतम दसवीं पास और सरपंच पद के लिए चुनाव लडऩे की योग्यता कम से कम आठवीं पास होना अनिवार्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो केंद्र सरकार को भी चाहिए कि लोकसभा और विधानसभा के लिए भी ऐसी व्यवस्थाएं करने के लिए कदम बढ़ाए। यदि बहाना यह है कि ऐसा करने से ज्यादातर आबादी का चुनाव लडऩे का अधिकार वंचित होगा तो सरकारों को अपने सर्वशिक्षा अभियान की सफलता और स्कूल छोडऩे वालों की संख्या में कमी आने के दावों पर गौर करना चाहिए। हरियाणा सरकार ने जब पंचायत चुनावों में शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो मामला सर्वोच्च अदालत तक गया और वहां पर दलील दी गयी कि यह अध्यादेश असंवैधानिक है और इसे लागू नहीं किया जा सकता। कहा गया कि इस अध्यादेश से संविधान द्वारा दिए गए चुनाव लडऩे के अधिकार का हनन हो रहा है और अगर इसे लागू किया जाएगा तो करीब 95 फीसदी महिलाएं अपने हक से वंचित हो जाएंगी, जबकि 80 फीसदी लोग इससे प्रभावित होंगे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि वह चुनाव लडऩे के लिए पात्रता मापदंड के रूप में शैक्षणिक योग्यता के खिलाफ नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत यह भेदभाव पूर्ण है, क्योंकि यह अनुच्छेद बराबर अवसर की गारंटी देता है। बहरहाल, विकास के नारे और अपनी साफ छवि की बदौलत चुनाव जीते नीतीश कुमार की राह जनता ने इस बार जितनी आसान की है उतनी ही कठिनाई महागठबंधन के सहयोगी पैदा भी कर सकते हैं। मुख्यमंत्री भले जनता दल युनाइटेड का है लेकिन वह विधायकों की संख्या मामले में दूसरे नंबर का दल है। देखना होगा कि राजद कोटे के मंत्री यदि आगे चलकर विवाद पैदा करते हैं तो नीतीश उन पर कैसे लगाम लगाते हैं। जहां तक नीतीश के मंत्रिमंडल में सर्वसमाज की भागीदारी का सवाल है तो यकीनन उन्होंने मंत्रिमंडल गठन में सामाजिक जातिगत आंकड़ों को ध्यान में रखा है। मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा यादव जाति से 7 मंत्री बने हैं जबकि पांच लोग दलित हैं। चार अति पिछड़ा वर्ग से और चार मुस्लिम हैं। चार मंत्री पद सर्वणों को दिये गये हैं जबकि तीन पद कोइरी और एक कुर्मी (मुख्यमंत्री को छोड़कर) मंत्री बना है। इन मंत्रियों में मात्र दो महिलाएं हैं। नीतीश के 28 सदस्यीय मंत्रिमंडल में 17 लोग पहली बार मंत्री बने हैं इसलिए माना जाना चाहिए कि सरकार नये उत्साह के साथ काम करेगी।

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