Monday, 8 February 2016

यादगार पल सहेजने देना होगी यादगार दक्षिणा

डॉ. अरूण जैन
एक साधु महाराज ने जनसम्पर्क विभाग के बड़े साहब की टेबल पर एक रुक्का धर दिया। अनुशन्सा प्रदेश के मुखिया की और डिमांड दस लाख रुपए के विज्ञापन आरओ की थी। मौका था महाराज की किसी स्मारिका के प्रकाशन का। साहब ने नियम दिखाए, कायदे समझाए, इतना विज्ञापन न दे पाने के दस कारण गिनाए। महाराज ने फिर मुखिया जी का फोन नंबर डायल कर मोबाइल साहब की तरफ सरकाने की प्रक्रिया की। मरता, क्या न करता, साहब को वह करना पड़ा, जो वह करने की मन्शा नहीं रखते थे। इस आरओ को जारी न करने के पीछे साहब दर्द नियमों का अनदेखापन नहीं था, बल्कि बिना दक्षिणा हाथ से फिसलते बड़े आरओ ने उन्हें आहत कर दिया था। हजारों सन्स्थान, एनजीओ और तरह-तरह की दुकानें मौजूद हैं। साल में एक बार स्मारिका के नाम पर 25 से 35 हजार रुपये देने का सरकारी प्रावधान। इससे ज्यादा पाने के लिए पचासों तरह के हथकन्डे। रजिस्टर्ड सन्स्था का जनक भले भूल जाए, लेकिन जनसम्पर्क का एक अमला विशेष इसे नहीं भूलता। शहरभर (या प्रदेशभर कहना भी अतिशयोक्ति भरा नहीं होगा) में फैले गोरखधंधा विशेषज्ञों के अय्यार चुन चुनकर सन्स्थाए जनसम्पर्क की झोली में डाल देते हैं। सन्स्थान सन्चालक(?) के हिस्से आता है जारी विज्ञापन राशि का 30 से 35 फीसदी, 10-15 प्रतिशत बकरा लाने वाले अय्यार की झोली में और बची रकम साहब तथा साहब के कारिन्दो के जेब में। सिलसिला सालों का है, आगे भी जारी रहने की प्रबल संभावना हैं। दस-बीस पेज की मुड़ी तुड़ी मैग्जिन में छपे एक सरकारी विज्ञापन से सरकार की किसी योजना का प्रचार प्रसार की उम्मीद नहीं की जा सकती। सरकार की मन्शा भी इन संस्थाओं को आर्थिक मदद पहुंचाने भर की ही होती है। लेकिन मदद की इस मद से कौन मदमस्त हो रहा है, सब जानते हैं। पुछल्ला एक बड़े साहब, एक उनसे भी बड़े साहब। छोटे छोटे साहबों की भी भरमार। छोटे बाबू, बड़े बाबुओं की फौज से फारिग होते चतुर्थ श्रेणी अधिकारियों की सीरीज कहाँ शुरु हो जाती है, पता ही नहीं लगता। कोई काम लेकर पहुंचे तो मिले किससे? चक्रव्यूह को भेदने की महारत सिर्फ एक ही अभिमन्यु जानता है, वह हैं के अधिकारियों के मुह लगे दलाल।

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