Wednesday, 17 April 2019

भाजपा के लिए लोकसभा चुनाव मोदी बनाम मोदी ही है

डाॅ. अरूण जैन


नरेन्द्र मोदी चुनाव मैदान में पूरी तरह सक्रिय हो गये हैं। वर्ष 2019 के आम चुनाव में अद्भुत, आश्चर्यकारी जीत के लिये उनके पास सशक्त स्क्रिप्ट है तो उनकी साफ−सुथरी छवि का जादू भी सिर चढ़कर बोल रहा है। चारों ओर से स्वर तो यही सुनाई दे रहा है कि यह चुनाव न तो मोदी बनाम राहुल है, और न ही मोदी बनाम मायावती, अखिलेश या ममता है। बल्कि यह चुनाव मोदी बनाम मोदी ही है। इसलिये भाजपा सरकार एवं मोदीजी के लिये यही वह समय है जिसका आह्वान है अभी और इसी क्षण भाजपा सशक्त भारत निर्मित करने का नक्शा प्रस्तुत करें। यही वह समय है जो थोड़ा ठहरकर अपने बीते दिनों के आकलन और आने वाले दिनों की तैयारी करने का अवसर दे रहा है। लोकसभा चुनाव की सरगर्मियां भाजपा को समीक्षा के लिए तत्पर कर रही है, वही एक नया धरातल तैयार करने का सन्देश भी दे रही है। इस नये धरातल की आवश्यकता क्यों है? क्योंकि सात दशकों के आजादी के सफर में देश ने खोया अधिक है और पाया कम है। अब नया भारत निर्मित करने के लिये नये संकल्प एवं नये धरातल तो चाहिए ही। मोदी सरकार ने यद्यपि बहुत कुछ उपलब्ध किया है, कितने ही नये रास्ते बने हैं। एक नया विश्वास जगा है। भारत मोदी के नेतृत्व में ही विश्व गुरु होने का दर्जा पाएगा। एक आर्थिक महाशक्ति बनेगा, दुनिया में शक्तिमान राष्ट्र होगा। मोदी के पक्ष में लोकप्रियता ने पिछले कुछ महीनों में लंबी छलांग लगाई है। इस बात का प्रमाण ओनिनियन पोल्स, सट्टा बाजार एवं चुनाव से पहले के शेयर बाजार की तेजी हैं। ये तीनों प्रमुख स्रोत यदि मोदी के पक्ष में हैं तो जाहिर है कि वर्ष 2013−14 के चुनाव से पूर्व मोदी लहर के ही इस बार भी और अधिक सशक्त होने के संकेत है। जिस तरह के संकेत 1971 मे इंदिरा गांधी के पक्ष में थे, कुछ वैसा ही इस बार मोदी के पक्ष में है। बालाकोट स्ट्राइक के बाद जाति, धर्म, वर्ग, वर्ण के मसले निस्तेज हो गये हैं, राम मन्दिर की जगह राष्ट्रवाद प्रमुख मुद्दा हो गया है। चुनाव से पहले ही देश ने अंतरिक्ष में एंटी सैटेलाइट का सफल परीक्षण करके दुनिया की चार बड़ी महाशक्तियों में जगह बना दी है। इस तरह मजबूत−सशक्त नेता और सुरक्षा ऐसे मुद्दे हैं, जिन्होंने भाजपा को राष्ट्रव्यापी बढ़त दी है। इन उपलब्धियों के बावजूद भाजपा के लिये यह अवसर जहां अतीत को खंगालने का अवसर है, वहीं भविष्य के लिए नये संकल्प बुनने का भी अवसर है। उसे यह देखना है कि बीता हुआ दौर उसे क्या संदेश देकर जा रहा है और उस संदेश का क्या सबब है। जो अच्छी घटनाएं बीते नरेन्द्र मोदी शासन में हुई हैं उनमें एक महत्वपूर्ण बात यह कही जा सकती है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जनजागृति का माहौल बना− एक  विकास क्रांति का सूत्रपात हुआ, विदेशों में भारत की स्थिति मजबूत बनी। लेकिन जाते हुए वक्त ने अनेक घाव भी दिये हैं, जहां नोटबंदी ने व्यापार की कमर तोड़ दी और महंगाई एक ऐसी ऊंचाई पर पहुंची, जहां आम आदमी का जीना दुश्वार हो गया है। नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे उद्योगों को पस्त कर दिया। ये छोटे उद्योग ही रोजगार उत्पन्न करते थे, फलस्वरूप रोजगारों का संकुचन हुआ। रोजगार के संकुचन से आम आदमी की क्रय शक्ति में गिरावट आयी है और बाजार में माल की मांग में ठहराव आ गया है। देश का युवा कैरियर एवं रोजगार को लेकर निराशा को झेल रहा है। मोदी सरकार का शासन कई दृष्टियों से भाजपा को सशक्त करता रहा है। गाय और राममंदिर के मुद्दों पर हिंदू वोट का ध्रुवीकरण करने की कोशिश हुई है। तलाक के नाम पर मुस्लिम महिलाओं के वोटों की दिशा को बदला है। अर्थव्यवस्था को विकसित देशों की तर्ज पर बढ़ाने की कोशिशें की गयी। स्टार्टअप, मेक इन इंडिया और बुलेट ट्रेन की नवीन परियोजनाओं को प्रस्तुति का अवसर मिला। नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया गया, भारत में भी डिजिटल इकॉनमी स्थापित करने के प्रयास हुए। भारत की विदेशों में साख बढ़ी। लेकिन घर-घर एवं गांव−गांव में रोशनी पहुंचाने के बावजूद आम आदमी अन्य तरह के अंधेरों में डूबा भी है। भौतिक समृद्धि बटोर कर भी न जाने कितनी तरह की रिक्तताओं की पीड़ा भोग रहा है। गरीब अभाव से तड़पा है तो अमीर अतृप्ति से। कहीं अतिभाव, कहीं अभाव। बस्तियां बस रही है मगर आदमी उजड़ता जा रहा है। भाजपा सरकार जिनको विकास के कदम मान रही है, वे ही उसके लिए विशेष तौर पर हानिकारक सिद्ध हुए हैं। इस पर गंभीर आत्म−मंथन करके ही भाजपा भविष्य का नया धरातल तैयार कर सकेगी। आदिवासी दलित समाज की नाराजगी भी एक अवरोध है। हर बार चुनाव के समय आदिवासी समुदाय को बहला−फुसलाकर उन्हें अपने पक्ष में करने की तथाकथित राजनीति इस बार असरकारक नहीं होने वाली है। क्योंकि आदिवासी−दलित समाज बार−बार ठगे जाने के लिए तैयार नहीं है। देश में कुल आबादी का 11 प्रतिशत आदिवासी है, जिनका वोट प्रतिशत लगभग 23 हैं। क्योंकि यह समुदाय बढ़−चढ़ का वोट देता है। बावजूद देश के आदिवासी−दलित के लिये सरकार कोई ठोस कार्यक्रम नहीं दे पायी। ये समुदाय दोयम दर्जे के नागरिक जैसा जीवन−यापन करने को विवश हैं। यह तो नींव के बिना महल बनाने वाली बात हो गई। भाजपा सरकार को आदिवासी−दलित हित और उनकी समस्याओं को हल करने की बात पहले करनी होगी।  भारत में अमीर देशों की पॉलिसी लागू करने से भारत की अर्थव्यवस्था बिगड़ गई है। अब भाजपा को कुछ ऐसे मौलिक कदमों को उठाने की रूपरेखा प्रस्तुत करनी होगी जिनसे अर्थव्यवस्था को दीर्घ स्तर पर नई दिशा मिले, जनता को संतुष्ट किया जा सके और आम आदमी का खोया विश्वास पुन: हासिल किया जा सके। जीएसटी से जुड़ी जटिलताओं को दूर करना होगा, क्योंकि इसी से जुड़ा रोजगार का मुद्दा है। रोजगार सृजन में ठहराव का यह प्रमुख कारण है। किसानों से जुड़ी समस्याओं पर भी केन्द्र सरकार को गंभीर होना होगा। धर्म से जुड़े मुद्दे भी सरकार के लिये घातक सिद्ध हुए हैं, उनके प्रति व्यावहारिक एवं उदार दृष्टिकोण अपनाना होगा। गंगा पर जहाज चलाने की योजनाओं पर भी पुनर्विचार अपेक्षित है। क्योंकि भारत में गंगा को मां माना जाता है।

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