Friday, 15 April 2016

हनीमून की जगह ऐसी हो जिसे संजो लें अपने दिलों में 


डॉ. अरूण जैन
शादियों का मौसम शुरू हो गया है। ऐसे में शादीशुदा जोड़े को तलाश होती है ऐसी जगह की जहां वे अपने साथी को समझ सकें और उसके साथ सुकून के पल बिता सकें। साथ ही उस जगह की खूबसूरती को जीवन भर के लिए स्मृतियों में सहेज सकें। भारत में हनीमून मनाने की ऐसी कई जगह हैं, जहां की खूबसूरती नवविवाहित युगल के हर पल को यादगार बनाती हैं। ऐसे ही कुछ स्थानों के बारे में हम बता रहे हैं। जम्मू और कश्मीर- दुनिया का स्वर्ग कहा जाने वाला कश्मीर सबसे बेहतरीन स्थान माना जाता है। हरी-भरी घाटियां, चमचमाती झीलें, ऊंचे पहाड़ और प्राकृतिक नजारे, नवविवाहित युगल के लिए बेहतर गंतव्य है। यहां के नजारे हमेशा के लिए यादगार बने रहेंगे। गोआ- पूरे भारत में नवविवाहित जोड़ों के लिए गोआ बेहतरीन जगह है। सूरज की धरती, रेत और समुद्र का मेल इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा देते हैं। पूरी दुनिया से जोड़े यहां घूमने और साथ समय बिताने आते हैं। समुद्री किनारा, सुंदर दृश्य, बेहतरीन मौसम और ढेर सारी मस्ती हर पल को बेहद रोमांटिक बना देते हैं। कुर्ग- दक्षिणी भारत का कुर्ग छोटा सा खूबसूरत शहर है। इसे भारत का स्कॉटलैंड भी कहा जाता है। कॉफी की तरोताजा कर देने वाली खुशबू, नारंगी रंग के बाग और कई एकड़ तक फैली हरियाली हनीमून जोड़े के लिए बेहतरीन जगह है। नैनीताल- उत्तराखंड का नैनीताल रोमांटिक हिल स्टेशन है। यह जोड़ों के लिए बेहतरीन जगह है। मनमोहक झीलें, खूबसूरत दृश्य, बोट राइड्स और सुखद मौसम नैनीताल को और भी रोमांटिक बना देते हैं। जैसलमेर- अगर आप अपने हनीमून को थोड़ा शाही अंदाज देना चाहते हैं तो राजस्थान का जैसलमेर सबसे बेहतर है। यह शहर ऐतिहासिक है। यहां हाथी और ऊंट की सवारी और बहुत कुछ मशहूर है। इसके अलावा राजस्थान में ही और कई जगह घूम सकते हैं- जैसे माउंट आबू, बीकानेर, जयपुर, जोधपुर और उदयपुर। शिमला- हिमाचल प्रदेश का शिमला नवविवाहितों को हमेशा से आकर्षित करता आया है। दिल्ली की चिलचिलाती गर्मी से निजात पाने के लिए यह बेहतरीन जगह है। शिमला बेहद शांत स्वच्छ और प्राकृतिक खूबसूरती से भरा पड़ा है। ऊटी- नीलगिरी पहाडिय़ों में बसा तमिलनाडु का ऊटी बेहतरीन हिल स्टेशनों में से एक है। रोमांटिक जगहों में ऊटी सबसे बेहतर शहर माना जाता है। यहां का बोटेनिकल गार्डन, रोज गार्डन, ऊटी झील और डोडाबेटा चोटी इस जगह में और रोमांच भर देते हैं। दार्जीलिंग- सुंदर हिल स्टेशनों में दार्जीलिंग बेहतर विकल्प है। यह आपके हनीमून को यादगार बना देगा। कई एकड़ में फैले चाय के बागान और बर्फीला मौसम यहां बिताए आपके लमहों को अविस्मरणीय बना देगा। बैकवॉटर- केरल का बैकवॉटर भगवान का देश माना जाता है। हनीमून के लिए यह स्वर्ग कहा जाता है। झीलों का फैला जाल, नहर और नदियां ये सब इस जगह में चार चांद लगा देती हैं। आप पारम्परिक तरीके में हाउसबोट पर इन जगहों की सैर भी कर सकते हैं।

एनपीए की कीमत कौन चुकाता है


डॉ. अरूण जैन
हालांकि बैंकों के एनपीए (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स) यानी गैर-निष्पादित संपत्तियों का मसला काफी समय से चला आ रहा है, लेकिन इधर बीच इसको लेकर चिंता बढ़ी है। वित्तमंत्री कई दफा कह चुके हैं कि एनएपी से निपटने के लिए बैंकों के पास पर्याप्त अधिकार हैं, वहीं रिजर्व बैंक के गवर्नर ने भी पिछले दिनों एनपीए की समस्या से सख्ती से निपटने का आह्वान बार-बार किया है। पर सवाल यह है कि जब वित्त मंत्रालय और रिजर्व बैंक, दोनों इस समस्या को लेकर समान रूप से चिंतित है, तो समाधान क्यों नहीं निकल पा रहा है? गाड़ी कहां अटकी है? कहीं ऐसा तो नहीं कि हम समस्या के असल स्वरूप को ही नजरअंदाज कर रहे हैं, या समस्या को जानते-पहचानते तो हैं, मगर उस पर काबू पाने के लिए जिस राजनीतिक इच्छाशक्ति या साहस की दरकार है उसे नहीं जुटा पा रहे हैं! लोगों की धारणा है कि बैंकों के एनपीए में सबसे बड़ा हिस्सा आम लोगों द्वारा लिये गए कर्ज का है, जबकि हकीकत है ठीक इसके विपरीत। आंकड़ों के अनुसार एनपीए का सबसे बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट कर्ज का है। आमतौर पर औद्योगिक विकास के नाम पर कॉरपोरेट जगत को विशेष सुविधा दी जाती है। नया कंपनी कानून 2013 में लाया गया था, जिसने साठ साल पुराने कानून की जगह ली है। इस कानून के मुताबिक नई कंपनी शुरू करने के लिए केवल एक-दो दिन का समय लगना चाहिए। पहले यह समय-सीमा नौ-दस दिनों की थी, जिसे मौजूदा समय में कम करके चार-पांच दिनों पर लाया गया है। गौरतलब है कि बैंकों को भी कर्ज देने में समय-सीमा का पालन करना होता है, जो कॉरपोरेट कर्ज के मामले में भी लागू होता है। अमूमन कंपनियों को जल्द से जल्द कर्ज स्वीकृत करने के लिए बैंक अधिकारियों पर दबाव बनाया जाता है। ऐसी स्थिति में कभी-कभी कंपनियों की वित्तीय सेहत का सही परीक्षण नहीं हो पाता है, और कॉरपोरेट कर्ज एनपीए में तब्दील हो जाते हैं। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन कॉरपोरेट कर्ज के ऊंचे स्तर और उसे चुकाने संबंधी उद्योग जगत की क्षमता पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। रघुराम राजन का मानना है कि अधिकतर कंपनियों के मुनाफे में कमी आ रही है, जिससे उन्हें कर्ज की किस्त तथा ब्याज चुकाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। बढ़ती चूक के कारण कारपोरेट जगत के 'पुनर्गठितÓ कर्ज की व्यापकता तथा एनपीए में लगातार इजाफा हो रहा है। रघुराम राजन के मुताबिक उद्योग जगत का करीब बीस प्रतिशत कर्ज डूबने के कगार पर है। बहुत सारी कंपनियों ने वित्तवर्ष 2014-15 में परिचालन-घाटा दर्ज किया या उनका परिचालन-लाभ बैंक-कर्ज अदा करने के लिए पर्याप्त नहीं था। इन कंपनियों का परिचालन-मुनाफा ब्याज लागत या ब्याज कवरेज अनुपात एक प्रतिशत से कम होने के कारण वे बैंक कर्ज एवं किस्त की अदायगी नहीं कर सकते हैं। पिछले वित्तवर्ष में सड़सठ कंपनियों के बहीखाते पर कुल 5.65 लाख करोड़ रुपए का बैंक-कर्ज दर्ज था, जो देश की शीर्ष 441 गैर-वित्तीय कंपनियों के कुल कर्ज का तकरीबन बीस प्रतिशत है। गौरतलब है कि इन सड़सठ कंपनियों में से अधिकांश की हैसियत मौजूदा समय में नकारात्मक हो चुकी है। इन कंपनियों की संख्या वित्तवर्ष 2014-15 में बढ़ कर सड़सठ हो गई, जो पिछले साल उनचास, तीन साल पहले उनतीस और वित्तवर्ष 2009-10 के अंत तक सोलह थी। मालूम हो कि यह आंकड़ा बीएसई 500, बीएसई मिडकैप और बीएसई स्मॉलकैप सूचकांकों में शामिल चुनिंदा कंपनियों के आंकड़ों पर आधारित है। वित्तवर्ष 2014-15 में 441 गैर-वित्तीय कंपनियों का कुल कर्ज 28.5 लाख करोड़ रुपए था, जो सभी 654 गैर-वित्तीय कंपनियों के कुल कर्ज का लगभग 98.1 प्रतिशत है। दूसरी तरफ इसी वित्तवर्ष में कर्ज लेने वाली कंपनियों का कुल कर्ज उनकी कुल शुद्ध बिक्री के 80.7 प्रतिशत, परिचालन मुनाफे के 68.9 प्रतिशत और कुल 654 कंपनियों के शुद्ध मुनाफे के 39.4 प्रतिशत के बराबर है। इन कंपनियों का पूंजी निवेश पर रिटर्न (आरओसीई) वित्तवर्ष 2014-15 में घट कर 7.4 प्रतिशत पर आ गया है, जो दशक का न्यूनतम स्तर है। यह 7.1 प्रतिशत की औसत ब्याज लागत से कुछ आधार अंक ही अधिक है। इस दर पर कई कंपनियां कर्ज अदायगी में चूक कर सकती हैं, क्योंकि बैंक कर्ज की किस्त तथा ब्याज लागत अदा करने के लिए उनका परिचालन-मुनाफा पर्याप्त नहीं होगा। इन कंपनियों के पूंजी निवेश पर रिटर्न के मुकाबले बढ़ते कर्ज की ब्याज लागत में कहीं अधिक इजाफा हो रहा है। वित्तवर्ष 2014-15 में बढ़ते कर्ज की लागत बढ़ कर 11.8 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो पूंजी निवेश पर रिटर्न के आकलन से करीब 440 आधार अंक अधिक है। वित्तवर्ष 2004-05 के दौरान इन कंपनियों ने पूंजी निवेश पर 18.7 प्रतिशत रिटर्न दर्ज किया, जो उनकी 6.9 प्रतिशत की औसत ब्याज लागत के मुकाबले दोगुने से भी अधिक है। इन कंपनियों ने 2014-15 में 2.03 लाख करोड़ रुपए ब्याज-लागत भुगतान के तौर पर खर्च किए, जबकि एक साल पहले यह आंकड़ा करीब 1.83 लाख करोड़ रुपए रहा था। इस प्रकार कंपनियों के परिचालन मुनाफे का एक बड़ा हिस्सा पूंजीगत खर्च और वृद्धि के बजाय ब्याज-लागत अदा करने के मद में चला गया। जाहिर है, अगर कंपनियों की आय में तेजी नहीं आती है तो बैंकों की परेशानी में इजाफा हो सकता है। अर्थशास्त्र के सिद्धांत के मुताबिक ऋण लेने वालों को मुद्रास्फीति से लाभ होता है और देने वालों को नुकसान। मुद्रास्फीति में ऋण लेने वालों के लिए उसे चुकाना आसान होता है। भारत की औसत थोक मूल्य महंगाई सन 1970 से 2010 के बीच के चार दशक में 7.6 प्रतिशत के आसपास रही है, जबकि खुदरा महंगाई आठ प्रतिशत रही है। इस कारण से कारपोरेट्स में कर्ज को चुकाने के मामले में आश्वस्ति का भाव पैदा हुआ और वे कर्ज चुकाने को लेकर लापरवाह हो गए। फिर कुछ कंपनियां जान-बूझ कर ऐसा कर रही हैं। इधर, बैंक-कर्ज को पचाने के लिए कुछ कंपनियों द्वारा खुद को दिवालिया घोषित करने के मामलों में बढ़ोतरी हुई है। कॉरपोरेट्स से उम्मीद की जाती है कि वे आर्थिक सुधार की बुनियाद तैयार करेंगे, लेकिन वे आज स्वयं बैंक कर्ज में डूब गए हैं या डूबने वाले हैं। बहरहाल, वर्तमान माहौल में ऐसी कंपनियों की बैलेंस शीट में सुधार लाना आसान नहीं है, क्योंकि कम मुद्रास्फीति वाले माहौल में ऐसा करना संभव नहीं है। दूसरी तरफ, कॉरपोरेट्स की आय में तेजी नहीं आ रही है, जबकि बैंक-कर्ज की ब्याज-दर लागत लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई है। अगर मौजूदा माहौल में सुधार नहीं होता है तो उद्योग जगत के लिए पूंजी जुटाना मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि बैंक, मौजूदा समय में उद्योग जगत को कर्ज देने से परहेज कर रहे हैं। ऐसी स्थिति निजी निवेश में इजाफा करने की सरकार की कोशिशों के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। विकास के लिए निजी क्षेत्र में निवेश करना आवश्यक है, लेकिन बैंक बढ़ते एनपीए से परेशान होकर उद्योग जगत को कर्ज नहीं देना चाहते हैं, जबकि अर्थव्यवस्था को मजबूत करने और विकास दर में इजाफा करने के लिए आवश्यक है कि बैंक, कंपनियों को कर्ज वितरण में कोताही न बरतें, क्योंकि उद्योग जगत को कर्ज मिलने से ही विनिर्माण क्षेत्र में तेजी, रोजगार में बढ़ोतरी, विविध उत्पादों की बिक्री में तेजी आदि संभव हो सकते हैं। इधर, बैंकों का एनपीए और 'पुनर्गठितÓ कर्ज छह लाख करोड़ रुपए से अधिक हो चुका है। बासेल तृतीय के विविध मानकों को पूरा करने के लिए भी बैंकों को लाखों करोड़ रुपए की जरूरत है। लब्बोलुआब यह कि कंपनियों को कर्ज देने में या उनके कर्ज को पुनर्गठित करने में जिस तरह से बैंक लचीला रुख अपना रहे हैं, उससे नुकसान अंतत: आम आदमी और देश को हो रहा है। ऐसे मामलों में राजनीतिक दलों के हस्तक्षेप के मामले भी देखे जाते हैं, जिससे बैंक गलत कंपनियों को कर्ज देने के लिए मजबूर होते हैं। बुरे कर्ज के कुछ मामलों में आवेदन की जांच-पड़ताल में कोताही एक प्रमुख वजह रहती है। यानी आवेदन से संबंधित परियोजना की व्यावहारिकता और लाभप्रद है या नहीं, इसका ठीक से आकलन किए बगैर कर्ज जारी कर दिया जाता है। कुछ मामलों में भ्रष्टाचार भी एक कारण रहता होगा। पर भ्रष्टाचार के साथ-साथ कर्ज-वसूली में बैंकों तथा सरकार का ढीला-ढाला रवैया भी कॉरपोरेट कर्ज के एनपीए में तब्दील होने का अहम कारण है। एनपीए वसूली नहीं होने या उसमें हो रही देरी के लिए भी ऐसी वजहें जिम्मेवार हैं। उदाहरण के तौर पर माल्या को कर्ज देने में लचीला रुख अपनाया गया और अब उसके एनपीए होने के बाद उसकी वसूली में भी लापरवाही बरती जा रही है, जिसके लिए निश्चित रूप से हमारी मौजूदा प्रणाली दोषी है। राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए हर तरह की सबसिडी की सीमा बांधी जा रही है। लेकिन अर्थव्यवस्था की छाती पर एनपीए के रूप में जो सबसे बड़ा बोझ है उससे मुक्ति के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं? एनपीए न सिर्फ बैंकों के लिए, बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह हैं। इसके चलते बैंकों के पास कारोबारी पूंजी कम हो जाती है, जिससे कई बहुत अच्छे प्रस्तावों के लिए भी कर्ज देने को उनके पास पर्याप्त रकम नहीं होती। यही नहीं, डूबी रकम की भरपाई के लिए वे नए कर्जों पर ब्याज दर बढ़ा सकते हैं, जिसका खमियाजा ग्राहकों को भुगतना पड़ेगा। 
गंगाजल कब होगा अविरल-निर्मल
डॉ. अरूण जैन

गंगा की सफाई के नाम पर तीन दशकों में करोड़ों के वारे-न्यारे हो चुके हैं। मगर स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। कभी गंगा को भारतीय संस्कृति का हिस्सा बताकर तो कभी जीवनरेखा बताकर सभी सरकारों ने इसकी महिमा गाने में कसर नहीं छोड़ी है। निर्मलता और अविरलता का दावा हकीकत में कोरा साबित हो रहा है। क्यों हो रही है इस पावन नदी की दुर्दशा और कौन है जिम्मेदार? न दशकों में गंगा की सफाई के नाम पर तीन हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। लेकिन गंगा की दशा नहीं सुधरी और इन सालों में गंगा की और भी ज्यादा दुर्दशा हो गई है। 1985 में तबके प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने गंगा सफाई की योजना शुरू की थी। लेकिन इस योजना ने लालफीताशाही के चलते दम तोड़ दिया। केंद्र में भाजपा नीत राजग सरकार आने के डेढ़ साल बाद भी धरातल पर गंगा को साफ करने का कोई काम नहीं दिखाई दे रहा है। एक सर्वे के मुताबिक हरकी पैड़ी हरिद्वार में भी गंगा का जल आचमन करने के लायक नहीं है। एक ओर जहां गंगाजल का तापमान बढ़ा है वहीं दूसरी ओर गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्रा घटी है, जो जीवनदायिनी गंगा के लिए तो खतरे की घंटी है ही, साथ ही इंसान और गंगा पर निर्भर जीव-जंतुओं के जीवन के लिए भी खतरे के संकेत हैं। गोमुख से लेकर हरिद्वार तक प्रदूषित पानी के सतहत्तर नाले गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिर रहे हैं। ऋषिकेश से हरिद्वार तक 248 आश्रम, होटल और धर्मशालाएं गंगा के किनारे बने हुए हैं। इनकी गंदगी गंगा में जाती है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) ने हरिद्वार और ऋषिकेश में पॉलीथीन और प्लॉस्टिक पर पूरी तरह से पाबंदी लगा रखी है। लेकिन स्थानीय प्रशासन की लापरवाही के चलते यहां धड़ल्ले से पॉलीथीन बिक रही है। हरिद्वार और ऋषिकेश में गंगा प्रदूषण नियंत्रण विभाग ने 1985 से लेकर 2010 कुंभ मेले तक गंगा में गिर रहे जितने भी सीवर और गंदे पानी के नाले बंद किए थे, उनमें से अधिकांश आज भी गंगा नदी में गिर रहे हैं। हरिद्वार में 1985 और 2010 के कुंभ मेले में जगजीतपुर में दो जल-मल शोधन संयंत्र 18 एमएलडी और 27 एमएलडी के लगाए गए थे। लेकिन यह संयंत्र गंदा पानी साफ करने की क्षमता खो चुके है। इस समय गंगा में बिना साफ किए 30 एमएलडी सीवर का गंदा पानी रोजाना गंगा में छोड़ा जा रहा है। हरिद्वार में हरकी पैड़ी से उत्तर दिशा की ओर गंगा के ऊपरी भाग में पंतद्वीप पार्किंग का गंदा पानी खुलेआम गंगा में जा रहा है। हरकी पैड़ी से पहले लोकनाथ घाट नाला, कांगडा मंदिर नाला, नाई सोता नाला, नांगों की हवेली का नाला और गऊ घाट नाले से भी रिस-रिसकर गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। हरिद्वार में ललतारो पुल और बिड़ला घाट के आसपास बने धर्मशालाओं, होटलों और अवैध बस्तियों का गंदा पानी खुलेआम गंगा में गिरकर जल को प्रदूषित कर रहा है। और यहां गंगा के तट पर जगह-जगह सूअर घूमते हुए नजर आते है। इसके अलावा कनखल में दरिद्र भंजन मंदिर और मातृसदन के पास सीवर के गंदे पानी के नाले खुलेआम गंगा में गिर रहे हैं। मायापुर से लेकर पुल जटवाडा ज्वालापुर तक गंगा नहर में तीन नाले- गोविंदपुरी , कसाई नाला और हरिद्वार औद्योगिक क्षेत्र के मायापुर नाले का रसायनयुक्तयुक्त प्रदूषित पानी गिर रहा है। जिससे सिंचाई के लिए खेतों में जा रहा गंगा जल प्रदूषित हो रहा है। इसका दुष्प्रभाव फसलों पर पड़ रहा है। हरिद्वार में चंडीघाट और बैरागी कैंप के बीच में बने टापुओं में और गोविंदपुरी में गंगा नहर के किनारे बनी अवैध बस्तियों का गंदा पानी गंगा में गिर रहा है। एनजीटी ने हरिद्वार में सत्तरह आश्रमों और बाईस होटलों को गंगा में गंदा पानी डालने पर नोटिस दिया था। इन होटलों और आश्रमों के खिलाफ अब तक जिला प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की है। हरिद्वार में एनजीटी के आदेश बेमतलब साबित हो रहे हैं। जिला प्रशासन एनजीटी के आदेशों का पालन कराने में कोई रुचि नहीं दिखा रहा है। जबकि एनजीटी के कमिश्नर एसए जैदी दो दफा हरिद्वार का दौरा कर चुके हैं। जैदी का कहना है कि जिला प्रशासन पर एनजीटी के आदेशों का पालन कराने के लिए सामाजिक संगठनों को दबाव बनाना होगा। एनजीटी ने जनता को गंगा में प्रदूषण फैलाने वालों के खिलाफ एक हथियार दे दिया है। जनता को कानून के दायरे में रहकर उसका प्रयोग करना चाहिए। हरिद्वार में गंगा के किनारे आश्रमों, होटलों और अपार्टमेंट के नाम पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण हो रहे है। लेकिन अवैध निर्माणों को रोकने वाली सरकारी एजेंसी हरिद्वार रूडकी विकास प्राधिकरण के अधिकारी हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक गोमुख से लेकर हर्षिल तक ही गंगा का पानी पीने योग्य है। और देवप्रयाग में गंगा का पानी नहाने और आचमन के लायक है। जबकि ऋषिकेश से हरिद्वार तक गंगा का पानी आचमन के लायक भी नहीं रहा। विश्वविद्यालय के पर्यावरण विज्ञान विभाग के अध्यक्ष रमेश चंद्र शर्मा का कहना है कि गंगोत्री से लेकर हरिद्वार तक और बद्रीनाथ से लेकर देवप्रयाग तक जिस तरह से इन क्षेत्रों में आबादी का दबाव बढ़ा है और शहरीकरण हुआ है, उससे पर्यावरण को बेहद नुकसान पहुंचा है। श्रीनगर गढ़वाल में गंगा की सबसे प्रमुख सहायक अलकनंदा नदी पर बने बांध ने इस नदी के पानी को सबसे ज्यादा प्रदूषित किया है। श्रीनगर के पास कीर्तिनगर में अलकनंदा का पानी नहाने लायक भी नहीं रहा है। उसका बुरा असर गंगा नदी पर भी पड़ रहा है। 'नमामि गंगेÓ कार्यक्रम के तहत केंद्र सरकार की योजना अगले साल जनवरी में हरिद्वार में लगने वाले अर्द्धकुंभ मेले से पहले गंगा का जल बिल्कुल स्वच्छ करने की है। लेकिन, जिस तरह गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा में गिर रहे गंदे नालों को रोकने की सरकारी योजना चल रही है, उससे नहीं लगता कि अर्द्धकुंभ तक गंगा साफ हो जाएगी। उत्तराखंड पेयजल निगम (गंगा) के महाप्रबंधक वाईके मिश्रा के मुताबिक इस साल सितंबर में गोमुख से लेकर हरिद्वार तक गंगा में गिर रहे नालों को बंद करने की 502 करोड़ रुपए की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) केंद्र सरकार को राज्य सरकार की तरफ से भेज दी गई थी। लेकिन अब तक केंद्र सरकार की तरफ से इस मामले में कोई मंजूरी नहीं मिली है। मिश्रा का कहना है कि गोमुख से देवप्रयाग तक भागीरथी नदी में, बद्रीनाथ से देवप्रयाग तक गंगा की सबसे बड़ी सहायक नदी अलकनंदा में और देवप्रयाग से हरिद्वार तक गंगा नदी में कुल एक सौ तैंतालीस नाले मिलते है। इनमें से एक सौ पैंतीस नालों में प्रदूषित पानी आता है, जिनमें से अ_ावन नाले जल संस्थान ने बंद करने का दावा किया है। और अब भी सतहत्तर नालों का गंदा पानी सीधे गंगा और उसकी सहायक नदियों में गिरता है। इन 143 नालों में से केवल आठ नालों में ही प्राकृतिक स्रोतों का साफ पानी आता है। जगजीतपुर हरिद्वार में गंगा किनारे सत्तर करोड़ रुपयों की लागत का प्रस्तावित चालीस एमएलडी के जल-मल शोधन संयंत्र (एसटीपी) का काम अभी तक शुरू नहीं हुआ है। उत्तराखंड जल संस्थान अनुरक्षण शाखा (गंगा) के अधिशासी अभियंता अजय कुमार का कहना है कि हरिद्वार शहर के पचहत्तर एमएलडी सीवर के गंदे पानी में से केवल पैंतालीस एमएलडी सीवर के पानी का ही ट्रीटमेंट हो पा रहा है। और तीस एमएलडी सीवर का गंदा पानी गंगा नदी में छोडऩा पड़ रहा है। 1985 और 2010 के कुंभ मेले में गंगा प्रदूषण नियंत्रण इकाई द्वारा हरिद्वार शहर की नालियां और सीवर लाइनें बंद की गई थीं। लेकिन बंद करने के लिए जो तरकीब अपनाई गई, वह कारगर नहीं है। हल्की सी बरसात होने पर इन नालों का गंदा पानी उछल कर सीधे गंगा में जाता है। इंडियन एकेडमी ऑफ एनवायरनमेंट साइंसेज के राष्ट:ीय अध्यक्ष बीडी जोशी के अनुसार पिछले तीस सालों में गंगाजल का तापमान दो डिग्री सेल्शियस बढ़ चुका है। 1985 में गंगाजल का तापमान 12.5 डिग्री सेल्शियस था, जो 2015 में बढकर 14.5 डिग्री सेल्शियस हो गया है। इसी तरह गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्रा भी घटी है। गंगाजल में ऑक्सीजन की मात्रा 1985 में 10.8 मिलीग्राम प्रतिलीटर थी जो कि अब घटकर 8.2 मिलीग्राम प्रतिलीटर रह गई है। साथ ही गंगाजल की पारदर्शिता 1985 के मुकाबले 60 फीसद से घटकर 29 फीसद रह गई है। गंगा में भारी मात्रा में कूडा, कचरा और सीवर का पानी डालने से गंगा में टीडीएस की मात्रा 287.8 मिलीग्राम प्रतिलीटर से बढकर 412.7 मिलीग्राम प्रतिलीटर हो गई है। सभी आंकडेÞ बताते है कि अमृत तुल्य गंगाजल के अस्तित्व पर आज संकट के बादल मंडरा रहे हैं। नेशनल एनवायरनमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंन्स्टीट्यूट (नीरी) द्वारा किए गए एक सर्वे के मुताबिक गंगाजल के नमूनों में कोलीफोर्म, फिकल कोलीफार्म, इ-कोलाई और फीकल स्ट्रैप्टोकोकाई नामक नुकसानदेह तत्त्व पाया गया है। जांच में यह तथ्य सामने आया कि गंगा नदी के मैदानी क्षेत्रों में मानव-मल से पैदा होने वाले प्रदूषण की मात्रा काफी ज्यादा बढ़ गई है और गंगा घाटी की इस पट्टी में पित्त की थैली के कैंसर के मामले अन्य स्थानों के मुकाबले ज्यादा पाए गए हैं। इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च अपोलो हॉस्पिटल बंग्लुरू (कर्नाटक) के वरिष्ठ सलाहकार और कैंसर विशेषज्ञ पीपी वाप्सी के मुताबिक इन क्षेत्रों में चिकित्सा विज्ञान के विशेषज्ञों की एक समिति गठित कर और ज्यादा तथ्य जुटाने की आवश्यकता है, ताकि इन क्षेत्रों में कैंसर की रोकथाम की जा सके। उत्तराखंड आयुर्वेदिक विश्वविद्यालय के शिक्षक सुनील जोशी का मानना है कि मैदानी क्षेत्रों में सीवर का पानी जिस तेजी के साथ गंगा में मिल रहा है, उससे जलजनित पेट की बीमारियों का तेजी से फैलने का खतरा बढ़ जाता है। पित्त की थैली के साथ-साथ लीवर के कैंसर का भी खतरा पैदा हो जाता है। उन्होंने सुझाव दिया कि गंगा के तट पर नीम, हरड़, बहेड़ा, गूलर, पीपल जैसे पेड़ों को लगाने की जरूरत है, जो गंगाजल को शुद्ध रखने में सहायक होगें। 1985 में गंगा एक्शन प्लान के तहत विद्युत शवदाह गृह, सीवर ट्रीटमेंट प्लांट और नालों को बंद करने सिलसिला शुरू हुआ था, लेकिन बाद में उस तरफ से ध्यान हटा लिया गया। हरिद्वार में बना विद्युत शवदाह गृह कई सालों से बंद पड़ा है। श्रीनगर गढ़वाल में बना जल-मल शोधन संयंत्र कभी ढंग से काम नहीं कर पाया। इन लापरवाहियों की वजह से गंगा एक्शन प्लान ने बीच में ही दम तोड़ दिया। गंगा नदी के नाम पर धर्म और आस्था की दुकान चलाने वाले साधु-संत और मठाधीशों के बड़े-बडेÞ आश्रम और अखाडे गंगा को प्रदूषित करने में पीछे नहीं रहे हैं। गोमुख और बद्रीनाथ से हरिद्वार तक गंगा और अलकनंदा के तट पर बने सैकडों आश्रमों का गंदा पानी सीधे गंगा में जा रहा है। खनन माफियाओं ने खनन के नाम पर किनारे लगे पेड़ों को काट डाला और गंगा का जिस तरह दोहन किया उससे गंगा के अस्तित्व पर ही संकट खड़ा हो गया है। गंगा रक्षा के काम में लगी संस्था मातृसदन के स्वामी शिवानंद सरस्वती का कहना है कि जिस तरह से गंगा में खनन करने के नाम पर गंगा के टापुओं को बर्बाद किया जा रहा है उससे गंगा का वजूद मिटते हुए देर नहीं लगेगी।
नई इबारत लिखने का वक्त

डॉ. अरूण जैन
भारत-पाकिस्तान के बीच मैत्रीपूर्ण संबंधों की जीवन भर वकालत करते रहे चोटी के शायर अहमद फराज का एक शेर है, 'रात नाम लेती नहीं है खत्म होने का, यही तो वक्त है सूरज तेरे निकलने का।Ó भारत-पाकिस्तान संबंधों के हवाले से यह बेहद मौजूं शेर है। मास्को से बारास्ता काबुल स्वदेश वापस आते वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अचानक से लाहौर जाकर प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से मुलाकात करना बहुत कुछ कह गया है। लाहौर हवाई अड्डे पर मोदी-शरीफ गर्मजोशी से गले मिले। यानी अब उन ताकतों को सावधान हो जाना चाहिए जो भारत-पाकिस्तान के आपसी संबंधों में कभी चाशनी घुलते देखना नहीं चाहतीं। भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर हालिया हलचल संदेश दे रही है कि मोदी-शरीफ वाकई दोनों देशों के दशकों से उलझे हुए मसलों को सुलझाने को लेकर गंभीर हैं। गुफ्तुगू के दौर शुरू हो चुके हैं और इसे जारी रखा जाएगा। अब कश्मीर से लेकर आतंकवाद से जुड़े मसलों पर कोई सहमति बनेगी। आपसी व्यापारिक संबंध बेहतर किए जाएंगे। मोदी अचानक से लाहौर पहुंचे या उनकी यात्रा सुनियोजित थी, इसपर बुद्धिविलास से फर्क ही क्या पड़ता है? नरेंद्र मोदी ने अपने हालिया लाहौर दौरे से अपने पूर्ववर्ती के ख्वाब को सच करके दिखा दिया। मनमोहन सिंह ने 2007 में कहा था कि मेरी चाहत है कि दोनों मुल्कों के लोगों को इस बात की छूट मिले कि वे नाश्ता अमृतसर में करें, लंच लाहौर में और रात की दावत रावलपिंडी में। दरअसल, विदेशमंत्री सुषमा स्वराज की हालिया पाकिस्तान यात्रा संदेश दे गई थी कि भारत-पाकिस्तान संबंधों पर पड़ी बर्फ की चादर जल्द ही पिघलेगी। दोनों मुल्क स्थायी रूप से शत्रु बनकर नहीं रह सकते। बुजुर्गों का पुराना कहना है कि अगर सुख और शांति से रहना चाहते हो तो पड़ोसियों को अच्छा मित्र बनाओ ताकि वे तुम्हारे सुख-दुख में साथ खड़े नजर आएं। अपने शपथग्रहण समारोह में मोदी ने नवाज शरीफ को निमंत्रण देकर एक तरह से अपनी मंशा साफ कर दी थी कि उनकी सरकार पाकिस्तान से सद्भावनापूर्ण संबंध चाहती है। अभी तक दोनों मुल्कों के संबंधों में 'कभी खुशी-कभी गमÓ का भाव रहता है। अब कोशिश यह होनी चाहिए कि दोनों उन अवरोधों को पार करते रहें जो उनके सामने संबंधों को सुधारने के रास्ते में आएंगे। इस लिहाज से पाकिस्तान के सामने बड़ी चुनौती है। वहां पर फौज का असर खासा रहा है। फौज का मूल चरित्र शुरूसे ही घोर भारत-विरोधी रहा है। पाकिस्तान के सेना-प्रमुख आर्मी राहील शरीफ भारत के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। उन्होंने कुछ समय पहले ही जंग की सूरत में भारत को अंजाम भुगतने की चेतावनी दी थी। राहील शरीफ कश्मीर के मसले पर भी टिप्पणी करने से बाज नहीं आते। साफ है कि नवाज शरीफ अगर राहील शरीफ को कसें तो दोनों देशों के संबंधों में मिठास घुल सकती हैं। हालांकि बीते दिनों यह सुनकर अच्छा लगा था कि नवाज शरीफ ने अपने मंत्रियों और सहयोगियों को भारत के खिलाफ गैर-जिम्मेदराना और भड़काऊ बयान देने से बचने के लिए कहा था। पर बेहतर होगा कि राहील शरीफ की जुबान पर ताला लगाएं नवाज शरीफ। राजमोहन गांधी ने अपनी किताब 'पंजाब: ए हिस्ट्री फ्रोम औरंगजेब टु माउंटबेटनÓ में लिखा है कि पाकिस्तान की सेना पर पंजाबियों का वर्चस्व साफ है। उसमें अस्सी फीसद से ज्यादा पंजाबी हैं। ये घोर भारत-विरोधी हैं। इस भावना के मूल में पंजाब में देश के विभाजन के समय हुए खून-खराबे को देखा जा सकता है। शरीफ को पाकिस्तान के हिस्से वाले पंजाब में भारत-विरोधी ताकतों को भी कुचलना होगा। पाकिस्तान का पंजाब इस्लामी कट्टरपन की प्रयोगशाला है। वहां पर हर इंसान अपने को दूसरे से बड़ा कट्टर मुसलमान साबित करने की होड़ में लगा रहता है। हालांकि यह भी सच है कि अब पाकिस्तान में निर्वाचित सरकार गुजरे दौर की तुलना में कहीं ज्यादा शक्तिशाली है। आज के दिन उससे सेना भी पंगा लेने से बचती है। शरीफ ने अपने मंत्रियों को भारत-विरोधी बयानबाजी से बचने की सलाह देकर परोक्ष रूप से सेना को संदेश दे दिया कि अब उसे अनावश्यक रूप से निर्वाचित सरकार के कामकाज में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। इधर, भारत में भी पाकिस्तान विरोधी ताकतों को शांत होना होगा। भारत-पाकिस्तान के संबंधों की तुलना किसी अन्य दो देशों से करना बेमानी होगा। एक ही लोग, एक खान-पान, एक पहनावा, पर गिले-शिकवे हजार। दोनों को एक-दूसरे से शिकायतें हैं तमाम। कश्मीर से लेकर करगिल तथा सर क्रीक के अनसुलझे सवाल। मुंबई में 26/11 के लिए जिम्मेवार लोगों का अभी तक कानूनी शिकंजे से बचे रहना। पर इन गिले-शिकवों के बीच दोनों देशों के अवाम में एक दूसरे को लेकर प्रेम है। गुजरे दौर की कड़वी यादें खत्म हो रही है। एक-दूसरे के साथ मिलने की ख्वाहिश बढ़ रही है। मोदी की पाकिस्तान यात्रा से दोनों पड़ोसी मुल्कों की फिजाओं में मैत्री का रंग और गाढ़ा हुआ है। आम राय यह बन रही है यहां-वहां के कश्मीर को छोड़ कर सियाचिन और सरक्रीक जैसे समाधान-योग्य मुद््दों पर आगे बढऩा चाहिए और द्विपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देना चाहिए। एक बात और। मोदी ने काबुल के बाद लाहौर जाकर मानो पाकिस्तान को भरोसा दिला दिया कि उनका देश काबुल को इस्लामाबाद के खिलाफ इस्तेमाल नहीं करेगा। भारत के इस कदम का स्वागत होगा, क्योंकि पूरी दुनिया अफगानिस्तान में तालिबान का सफाया चाहती है। इसके साथ ही अब भारत-पाकिस्तान के व्यापारिक संबंधों में भी नई जान फूंकने की आवश्यकता है। भारत-चीन के बीच जटिल सीमा विवाद के बाद भी व्यापारिक रिश्ते जिस तेजी से कदमताल कर रहे हैं, उसी तरह से भारत-पाकिस्तान के व्यापारिक संबंध भी आगे बढऩे चाहिए। चालू वित्तवर्ष के अप्रैल-दिसंबर के नौ माह में 49.5 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार के साथ चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझीदार देश बन गया है। ये आंकड़े बहुत कुछ कहते हैं। भारत-चीन के व्यापारिक रिश्ते जिस तरह से छलांग लगा रहे हैं, वे उन तमाम देशों के लिए उदाहरण हो सकते हैं जो सीमा विवाद में उलझने के कारण आगे नहीं बढ़ रहे। दरअसल, भारत-चीन का नेतृत्व जन्नत की हकीकत से वाकिफ है। उसे आपसी सहयोग के महत्त्व और लाभ का अहसास है। क्या अब भारत-चीन की तरह भारत-पाकिस्तान संबंध भी मजबूत होंगे? भारत ने पाकिस्तान के साथ व्यापार समझौता करने का प्रस्ताव रखा था और 2016 तक सभी वस्तुओं से शुल्क हटाने का वादा किया था। भारत ने पाकिस्तान को 1996 में ही सर्वाधिक वरीयता प्राप्त देश का दर्जा दे दिया है। यह विश्व व्यापार संगठन का नियम है जिसके तहत देशों को व्यापार में समान नियम लगाना जरूरी है। अब पाकिस्तान को तिजारती संबंधों को गति देने के लिए अलग से ठोस पहल करनी होगी। मोदी उस राज्य से आते हैं जहां के लोग दुनिया भर में अपने कारोबारी मिजाज के लिए जाने जाते हैं। उधर शरीफ भी मूलत: व्यापारी हैं। दोनों नेताओं को मालूम है कि अगर वे पुराने जटिल मसलों को हल करने के रास्ते ही तलाशते रहे तो बात नहीं बनेगी। वक्त आगे बढ़ रहा है, दुनिया आगे बढ़ रही है। आर्थिक सवाल अब ज्यादा खास हो गए हैं। इसलिए वक्त का तकाजा है कि उन्हीं सवालों में से संभावनाओं को तलाशा जाए जिससे कि सरहद के आर-पार रहने वालों की जिंदगी बेहतर हो सके। पाकिस्तानी नेतृत्व समझ रहा है कि कश्मीर तक संवाद को सीमित रखने से देश के सामने खड़े बड़े सवालों के जवाब नहीं खोजे जा सकेंगे। निर्विवाद रूप से दोनों देशों में अमन की राह पर चलने वालों की संख्या बढ़ी है। यह अहसास जोर पकड़ रहा कि इस उपमहाद्वीप में खुशहाली के लिए शांतिपूर्ण माहौल बेहद जरूरी है। जब सैकड़ों साल लड़ाई लडऩे के बाद सारा यूरोप एक हो सकता है, यूरोपीय संघ एक मुद्रा और एक झंडे का इस्तेमाल करने लगा है, तो यह सवाल उठने लगा है कि भारत और पाक अपनी अदावत क्यों नहीं भूल सकते! यहां इस बात का जिक्र जरूरी है कि महान समाजवादी चिंतक डॉ राममनोहर लोहिया और भारतीय जनसंघ के महामंत्री दीनदयाल उपाध्याय ने 1966 में भारत-पाक संघ का प्रस्ताव रखा था, जिसे तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मजाक उड़ा कर अस्वीकार कर दिया था। क्या अब दीनदयाल-लोहिया के सपने को पूरा होने का वक्त आ गया है?पाक में बेरोजगारी व महंगाई ने भी सिर उठाया हुआ है। बिजली की सख्त कमी व लोडशेडिंग से जनता बेतरह परेशान है। अगर आप पाकिस्तान के अखबार पढ़ें तो पाएंगे कि वहां पर बिजली की किल्लत उपद्रव का कारण बन रही है। देश की आर्थिक दशा बिल्कुल चरमरा गई है। इस परिप्रेक्ष्य में माना जा सकता है कि दोनों मुल्क आर्थिक क्षेत्र में सहयोग बढ़ाएंगे तो मामला कुछ हद तक पटरी पर जरूर आएगा।
इसमें दो राय नहीं कि भारत-पाकिस्तान के बीच व्यापार में बढ़ोतरी से वे ताकतें मजबूत होंगी जो शांति चाहती हैं और उनको नुकसान होगा जो चरमपंथ के रास्ते पर हैं। बेशक, यह भारत-पाकिस्तान के संबंधों की नई इबारत लिखे जाने का वक्त है।

मोदी सरकार गुपचुप कर रही है राम मंदिर बनाने की तैयारी!


डॉ. अरूण जैन
क्या मोदी सरकार अंदर ही अंदर अयोध्या में राम मंदिर बनाने की तैयारी कर रही है? क्या 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी राम मंदिर के अपने वादे को पूरा करके ही जायेगी? यह सम्भावना उस समय और मजबूत दिखी जब उन्नाव से बीजेपी के सांसद, अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस के आरोपी और राम जन्म भूमि आंदोलन से जुड़े रहे साक्षी महाराज ने एटा स्थित अपने आश्रम में फिर कहा कि अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण बीजेपी के एजेंडे में है और हम 2019 के लोकसभा चुनाव में मंदिर बनाने के बाद ही जायेंगे। उन्नाव के बीजेपी सांसद साक्षी महाराज ने आज एटा में अपने आश्रम में एक बार फिर अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण को अगले लोक सभा चुनाव से पूर्व करवाने की बात कही। उन्होंने कहा कि अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मुद्दा 2014 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के घोषणा पत्र में भी था और उसी के तहत हम 2019 के लोक सभा चुनावों में राम मंदिर के निर्माण के बाद ही जायेंगे। साक्षी महाराज ने कहा कि छोटा ही सही, 1992 में ही कारसेवकों ने अयोध्या में राम मंदिर बना दिया था। उससे पहले अनवरत रूप से कार सेवा पुरम में पत्थर तराशे जा रहे थे। साक्षी ने कहा कि अयोध्या में मंदिर तीन तरह से ही बन सकता है। एक तो न्यायलय से, दूसरा सहमति से और तीसरा सोमनाथ की तरह से लोकसभा में प्रस्ताव पारित करके। उन्होंने कहा कि मध्य   प्रदेश के 6 लाख से अधिक मुसलमानों ने राष्ट्रपति को लिखित में दिया है कि अयोध्या में राम मंदिर बनना चाहिए। उन्होंने कहा कि राम हम सबके पुरखा हैं और पुरखों का सम्मान करना सबका कर्तव्य हैं। उन्होंने कहा कि जब हमने राम मंदिर आंदोलन शुरू किया था तो सभी पार्टियों से समर्थन माँगा था। उसमे केवल बीजेपी ने ही हमारा साथ दिया। 2014 के घोषणा पत्र में भी बीजेपी ने राम मंदिर बनाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की थी। आगरा में हुई बीफ पार्टी, जे एन यू मामले और हैदराबाद मामले में उन्होंने कहा कि लगता है कि पूरे इस्लाम को और मुसलमानों को बदनाम करने की भी साजिश है। उन्होंने कहा कि इन सारी गतिविधियों में दो षणयंत्र हैं- एक मोदी सरकार को फेल करने का, विवाद में डालने का और दूसरा हिन्दू मुसलमान को बांटने के लिए पूरे मुस्लिम समुदाय को बदनाम करने का। लेकिन अच्छी बात है कि इस्लाम के धर्माचार्य समझदार हैं और वे खुद ही ऐसी बातों का खंडन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि आगरा में हुई बीफ पार्टी की मजिस्ट्रेटी जांच में प्रथम दृष्ट्या प्रमाण नहीं मिले हैं परन्तु फिर भी वे मानव संसाधन विकास मंत्री और प्रदेश के राज्यपाल से इस पूरे मामले की जांच की मांग करेंगे। 

Thursday, 14 April 2016

गणतंत्र के हालात पर निर्ममता से नजर डाल लेना जरूरी 

डॉ. अरूण जैन
भारतीय गणतंत्र के 66 साल पूरे करने के साथ ही देश में नवउदारवादी सुधारों के भी 25 बरस पूरे हो गए हैं। इस मौके पर गणतंत्र के हालात पर जरा निर्ममता से नजर डाल लेना जरूरी है। 26 जनवरी, 1950 को जो गणतांत्रिक संविधान स्वीकार किया गया था, उसमें प्रतिष्ठापित मार्गदर्शक सिद्धांत शासन को यह निर्देश देते हैं कि एक ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं में सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय समाया हो सुनिश्चित करके जनता के कल्याण को आगे बढ़ाएं। शासन इसका प्रयत्न करे कि आय की असमानताओं को कम से कम किया जाए...। इस संविधान के अपनाए जाने के बाद गुजरे साढ़े छह दशकों में शासन ने इन मार्गदर्शक सिद्धांतों को त्याग ही दिया है। नवउदारवादी व्यवस्था के अपनाए जाने के बाद से तो असमानताओं को न्यूनतम किए जाने की बजाय पोसा और बढ़ाया जा रहा है। सबसे धनी एक फीसदी भारतीयों के हाथों में इस समय देश की संपदा के 53 फीसदी हिस्से का स्वामित्व है। दूसरी ओर, दुनिया के तमाम गरीबों का पांचवां हिस्सा भारत में ही रहता है। साल 2015 में देश भर में किसानों की आत्महत्याओं में चौंकाने वाली तेजी आई है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडि़शा व अन्य राज्यों में हजारों किसानों ने आत्महत्या की है। अकेले महाराष्ट्र में 3,228 किसानों की आत्महत्याएं दर्ज हुई हैं, जो वास्तविकता को कम करके दिखाने वाला आंकड़ा है। कृषि संकट के चलते ग्रामीण गरीबों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। भारतीय गणतंत्र जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संघीय व्यवस्था के हमारे बुनियादी सिद्धांतों पर खड़ा है, हालांकि इनकी अपनी अंतर्निहित सीमाएं भी हैं। उदारीकरण और निजीकरण के बाद गुजरी चौथाई सदी में इन चारों का ही अवमूल्यन हुआ है और उनकी हालत खस्ता नजर आ रही है। आज सत्तातंत्र पर जिन ताकतों का कब्जा है, वे भारतीय राज्य की जितनी भी धर्मनिरपेक्ष अंतर्वस्तु थी, उसे कमजोर करने की कोशिशों में लगी हुई हैं। जनतंत्र का मूलाधार है, धर्म, लिंग या जाति के विभाजन से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के अधिकारों की समानता। इसे सिर्फ धर्मनिरपेक्ष राज्य ही सुनिश्चित कर सकता है। हमारे संविधान की एक खासियत यह है कि इसमें सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए सकारात्मक कदमों का प्रावधान किया गया है। यह सामाजिक न्याय की ऐसी परिकल्पना है, जो असमानतापूर्ण जाति व्यवस्था को सुधारवादी तरीके से मिटाना चाहती है। संविधान के स्वीकार किए जाने के साढ़े छह दशक बाद भी हमारे समाज में जातिवादी उत्पीडऩ के विभिन्न रूपों का बोलबाला है, और इनमें छुआछूत की बुराई भी शामिल है। कई लोग इस सिलसिले में हिंदू शास्त्रों की दुहाई देते हैं। भारतीय शासन की सबसे बड़ी विफलता, समाज के सबसे उत्पीडि़त तबके, यानी दलितों को न्याय दिलाने में उसकी विफलता है। पिछले कुछ समय में यह उत्पीडऩ और बढ़ा है। फरीदाबाद में दो दलित बच्चों का जिंदा जलाया जाना और रोहित वेमुला का दुखद अंत, जिसे हैदराबाद विश्वविद्यालय में आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया, इस जातिवादी कट्टरता के ही दो उदाहरण हैं। गणतंत्र दिवस से चंद रोज पहले ही उडुपी के पेजावर मठ में एक बहुत बड़े धार्मिक समारोह का आयोजन किया गया था। यहां पर कृष्ण मंदिर में आज भी पंक्ति भेद (ब्राह्मणों तथा अन्य जातियों को भोजन के लिए अलग-अलग पांत में बैठाने) और मडे स्नानम (ब्राह्मणों के आशीर्वाद की आशा से लोगों के उनकी झूठी पत्तलों पर लोटने) जैसे रिवाज चल रहे हैं, जो दलितों तथा निचली जातियों के साथ खुल्लमखुल्ला भेदभाव करते हैं। इस आयोजन में केंद्रीय मंत्रियों, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और कर्नाटक के पूर्व-मुख्यमंत्रियों व कई पूर्व-मंत्रियों ने भी हिस्सा लिया था। लेकिन, उनमें से किसी ने भी इस जातिवादी भेदभाव के बारे में एक शब्द तक नहीं कहा। अब तो शासन बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जगत में धार्मिकता को संरक्षण और बढ़ावा देने में जुटा नजर आता है, जबकि देश का संविधान उसे यह जिम्मेदारी सौंपता है कि वह वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद, जिज्ञासा व सुधार की भावना विकसित करे। लेकिन इन दिनों इसकी उलटी बातें ही हो रही हैं। सीमित ही सही, मगर हमारे संघीय संविधान में जो भी संघात्मक सिद्धांत मौजूद हैं, उनको भी लगातार कमजोर किया गया और नवउदारवादी निजाम में यह गिरावट और बढ़ गई है। संसाधनों और पूंजी के लिए बाजार ने राज्यों को आपस में होड़ कर रही सत्ताओं में बदलकर रख दिया है। शक्तियों से वंचित और साधनों की कमी के मारे राज्यों को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया गया है, जहां वे या तो विशेष दर्जा पाने के लिए केंद्र के आगे याचक बने रहते हैं या फिर एक आईआईएम या एक आईआईटी के रूप में केंद्र की कृपा हासिल करने के लिए हाथ फैलाते रहते हैं। योजना आयोग के खात्मे और राष्ट्रीय विकास परिषद के अंत ने राज्यों को और भी ज्यादा केंद्र के रहमोकरम पर निर्भर बना दिया है। नवउदारवादी राजनीति संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही है। पूंजीवादी पार्टियों में धन-बल का और पूंजीपति-राजनीतिज्ञ गठजोड़ का बोलबाला है। यह इसकी गारंटी देता है कि चाहे कोई भी सत्ता में आए और चाहे सरकार बदल जाए, नीतियां ज्यों की त्यों बनी रहेंगी। इस तरह, विकल्पों का चुनाव करने में जनता को शक्तिहीन बनाया जा रहा है। भीमराव अंबेडकर ने राजनीतिक समता और सामाजिक-आर्थिक बराबरी का नाता टूटने की जो चेतावनी दी थी, वह सच हो रही है। जनतंत्र को कमजोर किया जाना विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। मजदूर यूनियन और संगठन बनाने के अधिकार को, जो कि संविधान से मिला एक मौलिक अधिकार है, कतरा जा रहा है। शासन की मिलीभगत से मजदूरों को यूनियन बनाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) आदि के नाम पर इसे वैधता प्रदान की जा रही है। संविधान में निवारक नजरबंदी के प्रावधान का जो छिद्र है, उसका अंधाधुंध इस्तेमाल करके ऐसे दमनकारी कानून बनाए जा रहे हैं, जो निजी आजादी को सीमित करते हैं। मौजूदा निजाम तो असहमति की आवाजों और अल्पसंख्यकों के विरोध को ही राष्ट्रविरोधी करार दे देता है, इसलिए बेरोक-टोक राजद्रोह के कानून का सहारा लिया जा रहा है। नवउदारवाद और राज्य-प्रायोजित सांप्रदायिकता का योग तानाशाही का रास्ता तैयार कर रहा है। गणतंत्र को सांविधानिक तानाशाही बनाकर रख दिए जाने का खतरा पैदा हो रहा है।

कश्मीरियों के लिए देवदूत बन कर आती रही है सेना 


डॉ. अरूण जैन
अगर आम कश्मीरियों के शब्दों पर जाएं तो सेना के जवान उनके लिए देवदूत से कम नहीं हैं। रही बात आतंकवाद समर्थकों की, तो उनके लिए तो आम कश्मीरी जनता भी दुश्मन है। आखिर आम जनता दुश्मन क्यों न हो, क्योंकि आतंकवाद समर्थकों की मुखबिरी करने में अब कश्मीरी सबसे आगे हैं जिस कारण आतंकवाद को एक हद तक सुरक्षा बल खत्म करने में कामयाब रहे हैं। कश्मीरियों के दिलों में अभी भी सितम्बर 2014 की भीषण बाढ़ के जख्म हरे हैं। अक्तूबर 2005 में आए सदी के सबसे भयंकर भूकंप के निशान उनके सीनों पर हैं। कई बार आए बर्फीले सुनामी से हुई तबाही के निशां देख-देख कर वे आज भी फूट-फूट कर रो देते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें अगर उनके लिए कोई देवदूत बन कर आया था तो वे थे भारतीय सेना के जवान। ज्यादा दूर की बात छोडि़ए, दो दिन पहले ही खराब हुए मौसम में 73 कश्मीरियों को मौत के मुंह से बचाने कन्हैया कुमार नहीं आया था बल्कि सेना के वे जवान आए थे जिन्हें अपने सैंकड़ों साथी कश्मीर में 26 सालों से चल रहे आतंकवाद की बलि बेदी पर कुर्बान कर देने पड़े हैं। यह सच है कि कश्मीर में सैनिकों की कुर्बानियों का आंकड़ा सेना के लिए भी चिंता का कारण है। पर इसके बावजूद सेना ने कश्मीरियों की मदद से अपने हाथ पीछे नहीं खींचे। वर्ष 2014 के सितम्बर महीने में जब कश्मीर में सदी की भीषणतम बाढ़ आई तो सेना की बादामी बाग छावनी भी पूरी तरह से पानी में डूब गई। उनके हथियार और गोला-बारूद भी पानी में चला गया। ऐसे हालात के बावजूद सेना के जवानों ने दिन-रात जाग कर भूखे प्यासे रह कर एक लाख से अधिक कश्मीरियों को सुरक्षित बाहर निकाला था। ऐसी ही हालत 8 अक्तूबर 2005 को भी थे। सौ सालों के बाद पहली बार भीषण भूकंप ने कश्मीर को झकझोर कर रख दिया था। आम नागरिक ही नहीं बल्कि सेना को भी भारी क्षति उठानी पड़ी थी। एलओसी से सटे इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान सेना को हुआ था। बीसियों जवान मारे गए थे। लेकिन सैनिकों ने इस पर दुख या विलाप करने की बजाए नागरिकों को बचाने के कार्य को प्राथमिकता दी थी। यही नहीं सप्लाई लाइन बंद हो जाने के बाद सेना ने नागरिकों के लिए रहने और खाने-पीने की व्यवस्था की थी। ऐसे ही हिचकोले करीब तीन बार बर्फीले सुनामी ने कश्मीर को दिए थे। सेना के बंकर, पोस्टें, इत्यादि बर्फ के नीचे दफन हो गए। पर कश्मीरियों की मदद करने का जज्बा दफन नहीं हो पाया। तभी तो अनंतनाग के वाल्टेंगुनार में सेना के जवानों ने अपनी जान पर खेल कर हजारों कश्मीरियों को बचाया था। तब कश्मीरियों ने सेना के जवानों के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया था: 'मसीहाÓ। यह लेखा-जोखा कुछ बड़ी घटनाओं का था जब सेना के वे जवान कश्मीरियों के लिए देवदूत बन कर आए थे जिन पर कन्हैया कुमार जैसा छुटभैया नेता कश्मीरी महिलाओं से बलात्कार का घिनौना आरोप मढ़ रहे हैं, जबकि आए दिन ऐसी कई घटनाएं जम्मू कश्मीर में होती रहती हैं जब कश्मीरियों के लिए सैनिक 'मसीहाÓ बन कर सामने आते हैं। सिर्फ प्राकृतिक घटनाएं ही नहीं, आतंकवाद के दौरान पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों के जुल्मों के शिकार कश्मीरियों के लिए भी सेना मसीहा बन कर ही हमेशा सामने आई है। उसने कभी भेदभाव नहीं किया। तभी तो मरीयम बेगम आज भी सेना के जवानों को दुआएं देती हैं जिसके नाक और कान आतंकियों ने मुखबिर होने के आरोप में काट दिए थे और सेना ने उसे नए नाक और कान दिलवाए थे। इन सबके बीच करगिल की चोटियों पर 1999 के युद्ध में वीर गाथाएं लिखने वाले सैनिकों की दास्तानों को कैसे भुलाया जा सकता है जब उन्होंने विश्व का सबसे खतरनाक और कठिन युद्ध लड़ कर फतह पाई थी और दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन हिमखंड पर तैनात जवानों के जज्बे और हिम्मत को शायद कन्हैया कुमार भी सलामी देने पर मजबूर होगा जो शून्य से 50 डिग्री के नीचे के तापमान में दुश्मन से हमारी रक्षा के लिए खड़े हैं ताकि हिन्दुस्तान में रहने वाले सुख और चैन की नींद सो सकें।