Tuesday, 18 April 2017

वादी ही नहीं अवंतिपुर के मंदिरों के खंडहर भी देखें कश्मीर में

डॉ. अरूण जैन
कश्मीर वादी सिर्फ अपनी खूबसूरती या डल झील के लिए ही जानी जाती है, ऐसा सोचना गलत है क्योंकि खूबसूरती के अतिरिक्त 'धरती के स्वर्गÓ पर सैंकड़ों ऐसी वस्तुएं हैं जो अपना एक अलग ही आकर्षण रखती हैं और जिनको देखने के लिए विश्व भर से लोग आते रहते हैं। इन वस्तुओं में युगों पुराने स्मारक तथा कई अन्य महलों व मंदिरों के खंडहर भी शामिल हैं जिनका आकर्षण आज भी उतना ही है जितना पहले कभी था। जम्मू कश्मीर की ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर से करीब 29 किमी की दूरी पर जब राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलते हैं अनंतनाग जिले की ओर तो अवंतिपुर गांव आता है। पहले कभी अवंतिपुरा के नाम से जाना जाता था यह कस्बा जो आज अवंतिपुर कहलाता है और दरिया जेहलम के किनारे बसा हुआ है। अगर इतिहास के झरोखे में झांकें तो मालूम पड़ता है कि अवंतिपुर की स्थापना महाराजा अवंतिवर्मा ने की थी जिन्होंने सन् 854 से लेकर 883 तक राज किया था कश्मीर पर। अवंतिपुर वैसे भी कश्मीर की प्राचीन राजधानियों में से एक गिनी जाती है लेकिन यह सबसे प्रसिद्ध राजधानी मानी जाती रही है। इस कस्बे के दो मुख्य आकर्षण, जो आज भी माने जाते हैं, बड़े-बड़े मंदिरों के खंडहर हैं जिन्हें कभी इनके संस्थापक ने सुशोभित किया था। अनंतनाग की ओर बढ़ते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग पर बाएं हाथ पर जो प्रथम खंडहर दिखते हैं वे शिवा-अवंतिस्वर के मंदिर के खंडहर हैं। इस मंदिर की बड़ी-बड़ी दीवारें अवंतिपुर से तीन मील दूर जुरबरोर गांव के बाहर हैं जो बिना आधार के रखी गई हैं तथा अति महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ विशालकाय भी हैं। यह मंदिर जो आज अंग-भंग हो चुका है एक विशाल बरामदे में स्थित था जिसके चारों ओर बड़े-बड़े पत्थरों से दीवार बनाई गई थी और पश्चिमी द्वार की ओर बांसुरी की तरह खम्बे तो थे लेकिन उनमें पीछे की ओर से कोई आला नहीं था। भीतर प्रवेश का रास्ता इसी दीवार के बीच था जिसे एक अन्य दीवार दो भागों में विभक्त करती है। इसकी दीवारों पर किसी प्रकार की कोई कलाकृतियां नहीं उकेरी गई हैं। इसके आले तथा चौखटें पूरी तरह से सादे हैं जिन पर कोई कलाकृति नजर नहीं आती। बरामदे के केंद्र में यह मंदिर स्थित है और जिस चबूतरे पर इस मंदिर की आधारशिला रख कर इसका निर्माण किया गया है वह करीब दस फुट ऊंचा है तथा 58 वर्ग फुट व्यास का है। इस चबूतरे के प्रत्येक कोने में 16 वर्ग फुट के अलग अलग चबूतरे जुड़े हुए हैं जो अपने आप में अलग अलग मंदिर, छोटे-छोटे रूप में, के खंडहर हैं। प्रत्येक तरफ से चबूतरे के ऊपर चढऩे का रास्ता है और ऊपर चढऩे के लिए सीढिय़ों का निर्माण किया गया है। ठीक उसी तरह जिस तरह पंडरेथन के मंदिर हैं। यह सीढिय़ां कोई छोटी-मोटी सीढिय़ां नहीं हैं बल्कि प्रत्येक सीढ़ी की चौड़ाई जहां साढ़े अठाईस फुट के करीब है वहीं इनको बाहरी दीवारों से सहारा दिया गया है। हालांकि अब तो यह मात्र खंडहर रह गया है लेकिन पत्थरों को देख कर यह कहना कठिन होता है कि कभी यहां मंदिर रहा होगा। इस मंदिर के जो चबूतरे हैं वे सिर्फ एक ही स्थान पर यही आभास देते हैं कि वे मंदिर की आधारशिला से जुड़े रहे होंगे जबकि अन्य स्थानों पर इन्हें संयुक्त दीवारों से जोड़ा गया है जो मंदिर के ऊपर से गिर पड़ी होंगी तथा कला का उत्कृष्ट नमूना पेश करती हैं जिन्हें देखने वाला ढंग रह जाता है। दक्षिणी-पूर्वी किनारे पर जो आधारशिला है वहां कला के उत्कृष्ट नमूने के भरपूर दर्शन होते हैं तथा यह नमूने उस काल की कला के बारे में भी जानकारी देते हैं। मंदिर के आधार पर जो एकमात्र बाहरी शोभा आज बची हुई है वह मंदिर की कला का नमूना तो है ही साथ ही में बड़े आकार के खम्भे के मस्तक भी हैं जो समकोण होने के साथ-साथ पूरी तरह से सादगी लिए हुए हैं। जबकि एक खम्बा ऊपर भी टंगा है आज भी। बरामदे के पिछले दो कोनों में कुल चार मंदिर किस्म के स्थान दिखते हैं जिनमे से दो छोटे तथा दो बड़े हैं। बरामदे में इसके अतिरिक्त खंडयुक्त मेहराबों का क्रम भी नजर आता है जो छितराए हुए तो हैं ही साथ ही में कला के उत्कृष्ट नमूने भी माने जाते हैं। और इनमें सबसे बढिय़ा कारीगरी के नमूनों में एक तो दक्षिणी सीढ़ी के सामने पड़ा एक खम्बा है मेहराब युक्त तो दूसरा फूलों से कारीगरी किया हुआ एक अन्य खम्बा जबकि इसके साथ ही एक अन्य खम्बा रखा गया जिसके आधार पर दो मेढ़े आमने-सामने बैठे हुए हैं और एक युवती डमरू पर नाच दिखा रही है जो दो शेरों की आकृति वाले सिंहासन पर बैठाया गया है। बीचोंबीच हाथी की आकृति भी उकेरी गई है। हालांकि यह खंडहर आठवीं सदी के हैं लेकिन आज भी यह उतने ही आकर्षित करते हैं आने-जाने वालों को जितना कभी पहले किया करते थे क्योंकि आतंकवाद ने इन पर तो कोई प्रभाव नहीं डाला मगर आने जाने वालों की संख्यां तो कम हुई ही, इनकी देखभाल भी अब नहीं हो पा रही है जिसके कारण किसी-किसी स्थान पर उगी घास-फूस इनका प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करती है कि आतंकवाद के चलते भू-सर्वेक्षण विभाग इनकी देखभाल कर पाने में अपने आप को सक्षम नहीं पा रहा है।

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