Tuesday, 18 April 2017

बांग्ला देश का बड़ा नुकसान कर रही हैं शेख हसीना


डॉ. अरूण जैन
यह समझ में आने लायक नहीं है कि जब बांग्ला देश आजादी के जश्न में लगा है तो हिंदुओं के मंदिर और उनकी संपत्ति को तहस-नहस क्यों किया जा रहा है। 45 साल पहले भारत, जहां की बहसुंख्यक आबादी हिंदु है, ने पूर्व पाकिस्तान के लोगों को सेना के बोलबाले वाले पश्चिमी पाकिस्तान के हाथों से आजादी छीनने में मदद की। दो हजार से ज्यादा भारतीय सैनिकों और अफसरों ने इस्लामाबाद के खिलाफ लड़ाई में जान दी। खास बात यह है कि शेख हसीना उन शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं जिन्होंने जनआंदोलन खड़ा किया और इस क्षेत्र को मुक्त कराया। धार्मिक ताकतों के खिलाफ लडऩे की उनकी पहचान पर संदेह नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह अलग बात है कि उन्होंने कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों के खिलाफ लडऩे में किया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की शिकायत है कि हसीना की नाराजगी उनके खिलाफ है क्योंकि वही एकमात्र विकल्प है। उनकी शिकायत है कि शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग उन्हें खत्म करने के लिए हर चाल चल रही है। यहां तक कि यह अफवाह भी फैला दी गई है कि वे भारत−विरोधी हैं ताकि खालिदा जिया की छवि खराब कर दी जाए। मुझे शेख मुजीबुर रहमान के साथ ढाका में हुई मुलाकात याद है जो आज बांग्लादेश कहे जाने वाले क्षेत्र की मुक्ति के तत्काल बाद हुई थी। मैंने उनसे शिकायत की थी कि बहुत ज्यादा भारत विरोधी भावना है। मैं ढाका प्रेस क्लब गया था और पत्रकारों को यह मजाक करते पाया कि हिलसा मछली कोलकाता के होटलों में मिलती है, लेकिन बांग्लादेश में नहीं। नई दिल्ली और कोलकाता की तीखी आलोचना की कि गई कि वे बांग्लादेश की मुक्ति का फायदा उठा रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, जिन्होंने भरतीय सेना का नेतृत्व किया था, का खास जिक्र किया गया कि उन्होंने पूर्व पाकिस्तान के साथ व्यापार करने वाले अमीर पश्चिमी पाकिस्तानियों को लूटा। शेख मुजीबुर रहमान ने मुझे कहा कि बंगाली एक गिलास पानी देने देने वाले का एहसान भी नहीं भूलता। आपके देश वालों ने क्षेत्र को मुक्त कराने के लिए मुक्ति वाहिनी की मदद की और अपनी जान दी है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में सेकलुरिज्म की गहरी जड़ें हैं और इसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन हैरत की बात है कि बांग्लादेश की सेकुलर पहचान पर आज सवाल खड़े हो रहे हैं। जम्मातए इस्लामिया, जो एक समय जनरल एचएम एरशाद के सैनिक शासन के समय सरकार का हिस्सा थी, शासन करने के इस्लामिक तरीके को लेकप्रिय बनाने की भरपूर कोशिश कर रही है और दुनिया के एक इस्लामिक राज्य के साथ नजदीकी संबंध बनाना चाहती है। सौभाग्य से, बांग्ला देश में इसे व्यावहारिक रूप से कोई समर्थन नहीं है।  लेकिन शेख हसीना की बदनामी के कारण बांग्लादेशी न केवल भारत विरोधी बल्कि नरम रूप में इस्लामिक भी दिखाई देते हैं। वह मुख्य विपक्षी नेता खालिदा जिया के समर्थकों को मिटाने में व्यस्त हैं। इस लड़ाई में बेगम जिया के साथ के सेकुलर लोगों को भी सांप्रदायिक बताया जा रहा है और उन्हें खदेड़ा जा रहा है। अब शेख हसीना की चिंता जड़ जमाने की और सत्ता नहीं छोडऩे की है। विरोधी दल खुल कर कह रहे हैं कि वे शायद उन्हें हटा पाने में सफल नहीं होंगी क्योंकि वह कभी निष्पक्ष चुनाव नहीं होने देंगी। वह पहले से ही खानदानी शासन की चर्चा करने लगी हैं और अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे के साथ सरकार के सभी मामलों को लेकर मशविरा कर रही हैं। इसी सोच के अनुसार, प्रधानमंत्री विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थानों में महत्वपूर्ण जगहों पर अपने समर्थकों की नियुक्त किर रही हैं, इसके बावजूद कि उनके पास योग्यता और डिग्री नहीं है। इस प्रक्रिया में, वह योग्यता पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रही हैं। लेकिन उन्हें इसकी कोई फिक्र नहीं है क्योंकि उन्हें भरोसा है कि सेकुलरिजम के नाम पर वह अपने किसी भी समर्थक को ऊंचे पद पर बिठा सकती हैं। एक कानून बनाने पर विचार हो रहा है जिसमें उनके पिता या उनके शासन को चुनौती देने वाले को राष्ट्रद्रोही समझा जाएगा। निस्संदेह, लोकतांत्रिक परंपरा को देखने का यह अजीब तरीका है। लेकिन एक बार यह कानून बन जाता है तो बांग्लादेश में कोई भी आश्चर्य जनक बात हो सकती है। आने वाले दिनों में, विरोधी पार्टियां जो आज उनका खास निशाना हैं, की कोई आवाज नहीं उठेगी। माहौल ज्यादा निरंकुश और तानाशाही वाला हो जाएगा। और बहुत कम लोग रह जाएंगे जो सरकार से सवाल कर पाएंगे।  अपने सभी कामों में, शेख हसीना देश का कल्याण भूल चुकी हैं। जब वह अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, बांग्लादेश इस समस्या का सामना कर रहा है कि आर्थिक विकास के जरिए लोगों को लाभ दिलाने में सरकार कितनी सफल हो रही है। दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री अपनी उपलब्धि इसी में गिनती हैं कि उन्होंने अपने पक्के समर्थकों को कितने पद दिए हैं।

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