Thursday, 14 April 2016

यह लड़का देश को नई दिशा प्रदान करेगा


डॉ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश के सबसे कामयाब मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर उनसे जुड़ीं रोचक बातें    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 5 मार्च को अपना 57वां जन्मदिन मना रहे हैं. 5 मार्च, 1959 को सीहोर जिले के जैत गांव में जन्मे शिवराज मुख्यमंत्री रहने के पहले पांच बार विदिशा संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने जा चुके हैं. सीएम शिवराज के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में भाजपा की पहली सरकार है, जो इतने लंबे समय तक सत्ता में रही है. शिवराज के लिए राजमाता विजयाराजे सिंधिया का आशीर्वाद अहम माना जाता है. इसी से जुड़ा है रोचक किस्सा वर्ष 1988 में जब शिवराज पहली बार युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के शासन और जुल्मों के विरोध में एक मशाल जुलूस का आयोजन किया गया.          उन्होंने राजमाता सिंधिया से आग्रह कर इस जुलूस के नेतृत्व करने की बात कही, लेकिन तब प्रदेश में भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व के सामे दो बड़ी चुनौतियां सामने आ गईं कि क्या राजमाता सिंधिया, नाना जी देशमुख और कुशाभाऊ ठाकरे जैसे दिग्गज कद के नेताओं के हिसाब से समर्थन जुट पाएगा. उस बात को चैलेंज मानकर शिवराज ने ग्रामीण क्षेत्रों से 40000 किसानों के आने की बात कहकर पूरे पार्टी नेतृत्व को सहमा दिया, परंतु जब 7 अक्टूबर 1988 को भोपाल में जुलूस निकला तब भोपाल आने वाली सारी सड़कें ट्रैक्टर, ट्रक, जीप और बैलगाडिय़ों से अटी पड़ी थीं. लोगों की संख्या 40000 से कहीं ज्यादा थी और दो दिन तक मशाल जुलुस में आए ग्रामीणों का भोपाल से लौटना बदस्तूर जारी रहा. शिवराज के इसी नेतृत्व से खुश होकर 7 अक्टूबर 1988 के दिन ही राजमाता सिंधिया ने शिवराज के सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया और ऐलान किया कि यह लड़का राजनीति में बहुत आगे जाकर देश को नई दिशा प्रदान करेगा. प्रदेश के मुखिया बनने का सफर शिवराज ने छात्र राजनीति से शुरू किया था. उस दौरान देश में इन्दिरा और कांग्रेस के विरुद्ध एक बड़ी लहर देखी जा रही थी, 1975 में देश में लगे आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले शिवराज कदाचित सबसे कम उम्र के स्वयंसेवक रहे होंगे. पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुंदरलाल पटवा को शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक गुरू माना जाता है. जिनसे हर मौके पर वे आशीर्वाद लेने जाते हैं. साल 2003 के चुनावों में उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. पार्टी से इस्तीफे के बाद बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन 2005 में तत्कालीन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान को उसी साल 29 नवंबर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. एक बार फिर तेहरवीं विधानसभा के लिए चौहान को 10 दिसंबर 2008 को भाजपा के 143 सदस्यीय विधायक दल ने सर्वसम्मति से नेता चुना.           शिवराज को 2008 में दूसरी बार भोपाल के जंबूरी मैदान में एक भव्य शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. इसके बाद 2013 में तीसरी बार शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी.          अब शिवराज के मुख्यमंत्रित्व काल का 11वां साल चल रहा है. अब वे प्रदेश के पहले ऐसे व्यक्ति बन गए हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री के दायित्व का निर्वहन किया. इससे पहले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह 10 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.  हालांकि, शिवराज का राजनीतिक जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. मुख्यमंत्रित्व काल की शुरूआत में उन पर डंपर खरीदी के आरोप लगे और पिछले ही दिनों व्यापमं घोटाले ने उनकी मुसीबतें बढ़ा दी थीं. फिलहाल, व्यापमं की सीबीआई जांच चल रही है.

सियाचीन मुद्दे पर सहमति बनाएँ भारत और पाकिस्तान 


डॉ. अरूण जैन
सियाचीन में पिछले दिनों कुछ और भारतीय सैनिकों की मौत हुई है। यह अनावश्यक मौत भारत और पाकिस्तान, दोनों का ध्यान 23,000 फीट की ऊंचाई पर, जहां का तापमान माइनस 41 डिग्री है, सेना तैनात करने की निरर्थकता की ओर खींचता है। दोनों को आपसी बातचीत के जरिए घृणित घटनाओं का समाधान खोजना चाहिए। इसके बजाए, नई दिल्ली ने इसे सैनिकों की शहादत मान लिया है और राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि कर अपना काम पूरा समझ लिया। एक दशक से पहले, हिमस्खलन में पाकिस्तान के 180 सैनिकों की मौत हो गई थी, उस वक्त दोनों देश मसले पर विस्तार से बात कर किसी सहमति पर पहुंच सकते थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसकी पहल की थी। लेकिन, वे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर सके क्योंकि हमारी सेना ने सामरिक रूप से ग्लेशियर के बहुत अहम होने का सवाल उठा दिया था। यह महज हौआ था। मैंने सेना के अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारियों से बात की थी। उन सबों ने सामरिक महत्व की बात को खारिज कर दिया था। सेना के जवान अभी भी ऊंचाई पर तैनात हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ ने इसका फायदा उठाया था। भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिस वक्त बस में सवार होकर लाहौर पहुंचे थे, उस वक्त जनरल मुशर्रफ ने ही सेना और जनजातीय लोगों को ग्लेशियर पर तैनात कर रखा था। मुशर्रफ उस वक्त सेना प्रमुख थे। वे भारत के साथ शांति नहीं चाहते थे। जुल्फीकार अली भुट्टो की तरह उन्होंने भी सोचा था कि भारत को पाकिस्तान पराजित कर सकता है। उन्होंने अपनी इस भूल को महसूस किया और सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि वे ऐसा फिर दुबारा कभी नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें इतिहास से सबक मिल गई है। कारगिल युद्ध की शुरुआत में भारत को काफी नुकसान हुआ लेकिन अपनी उत्कृष्ट सैन्य क्षमता के कारण अंतत: भारत भारी पड़ा। उस वक्त से अब तक स्थिति सामान्य नहीं है। दोनों देशों के बीच दूरी बनाए रखने के लिए आये दिन कोई न कोई घटना घटती रहती है। संभव है, कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो दोनों देशों के बीच शांति नहीं बनना देना चाहतीं। पठानकोट की घटना ताजा उदाहरण है। दोनों देशों के विदेश सचिवों की होने वाली बैठक के कुछ दिन पहले यह घटना घटित हुई। नई दिल्ली और इस्लामाबाद, दोनों ही अब इतना परिपक्व हो चुके हैं कि वे वार्ता भंग नहीं करते। वार्ता का नया कार्यक्रम तय किया गया। फिर भी, सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच अब तक वार्ता शुरू नहीं हुई है और ना ही जल्दी में इसके फिर से शुरू होने की उम्मीद है। हकीकत में, सियाचीन ग्लेशियर अपने आप में विवाद का विषय है। यह उन कारणों में एक है जिसके कारण दोनों देशों के बीच के रिश्ते में खटास बनी हुई है। दुर्भाग्यवश, इस समस्या ने राजनीतिक रंग ले लिया है। सबसे बेहतर समाधन यह है कि ग्लेशियर को स्वामीहीन भूमि, नो मैन्स लैंड, घोषित कर दिया जाए। शिमला शिखर वार्ता में नियंत्रण रेखा को चित्रित किया गया था। यह अब अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा है। शिखर वार्ता में इस सीमा रेखा को ग्लेशियर तक नहीं बढ़ाया जा सकता था, क्योंकि ऐसा करना अव्यावहारिक पाया गया था। इस मसले को छोड़ दिया गया था। अब दोष मढऩे का कोई मतलब नहीं। उस समय से रिश्ते में जो कड़वाहट बढ़ती गई है, उससे दोनों देशों को उबरना होगा। दोनों देश अब भी शिमला शिखर वार्ता में छोड़े गए रिश्ते की डोर को आगे बढ़ाने का काम कर सकते हैं। अगर ग्लेशियर स्वामीहीन भूमि, नो मैन्स लैंड बन जाता है तो दोनों देशों को शिमला समझौते को सही अर्थों में अक्षरश: लागू करना होगा। पिछली बार जब सहमति बनी थी तब पाकिस्तान का रुख बिल्कुल साफ नहीं था। वह कुछ और सोच रहा था, क्योंकि उसने जर्मनी से बड़ी संख्या में स्नो शू मंगाने का आदेश दिया था। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने स्नो शू मंगाये जाने की जानकारी जब नई दिल्ली को दी तो भारत ने ग्लेशियर पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया। पाकिस्तान ने जब ग्लेशियर पर कब्जे के लिए अपनी सेना को भेजा तो वहां भारतीय सैनिकों की मौजूदगी देख वह चकित रह गया। दगाबाजी के भय ने शांति को रोक दिया। फिर भी, एक दूसरे में विश्वास करने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच शायद ही कभी आपसी समझ रही। आंशिक रूप से ऐसी स्थिति इस कारण रही कि दोनों देश विभाजन की गांठ ढोते रहे हैं और फिर इस कारण कि दोनों का एक दूसरे में भरोसा नहीं रहा है। सबसे बढ़कर, भारत में आम धरणा है कि चूंकि पाकिस्तान के मामले में सेना निर्णायक स्थिति में है, इसलिए पाकिस्तान में फिर से जब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक किसी सार्थक रिश्ते को प्रोत्साहित करना संभव नहीं है। हकीकत में, 1958 में जनरल मोहम्मद अयूब खां द्वारा पाकिस्तान की सत्ता संभालने के वक्त से ही भारत ने मान रखा है कि दोनों देशों के बीच स्थिति सामान्य बनाना संभव नहीं है। जनरल अयूब ने साझा रक्षा समझौते की पेशकश भी की थी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया था: किसके खिलाफ साझा रक्षा? सत्तर के दशक और बाद के दिनों के दो अन्य सैन्य शासन के नेताओं− जनरल जिया उल हक एवं जनरल परवेज मुशर्रफ को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया, क्योंकि नई दिल्ली मानती रही कि सैन्य दृष्टि से कही गई उनकी बातें शांति की पहल को कभी कामयाब नहीं होने देगी। हालांकि, परवेज कयानी जिस वक्त सेना प्रमुख थे, उन्होंने दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की वकालत कर भारत की सोच को विचलित किया था। लेकिन मसलों को सुलझाने का रास्ता तलाशने के लिए सिविल एवं सैन्य नेतृत्व के बीच बातचीत का उनका सुझाव पेचीदा था। उन्हें यह जानना चाहिए था कि भारत में निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के हाथों में है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सेना की कोई हिस्सेदारी नहीं है। जनरल कयानी का प्रस्ताव सियाचीन ग्लेशियर तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने आगे की कार्रवाई का भी संकेत दिया था और इस तरह इस धारणा को गलत करार दिया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच शांति का मसला सेना की युद्धकारी सोच का बंधक है। उन्होंने अवसरों की खिड़की खोली थी जिसे दोनों देशों की सरकारों को रिश्ते को सामान्य बनाने के लिए दोनों हाथों से स्वीकार करना चाहिए था। मुझे लगता है कयानी की सुझावों पर पिछले दरवाजे की शक्तियों ने काम किया। हालांकि, नई दिल्ली ने उनके सुझावों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया था, लेकिन मीडिया ने सतर्कता भरी प्रतिक्रिया के साथ उनके सुझावों का स्वागत किया था। उस वक्त सवाल था कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा दोनों देशों की सेना हटाए जाने के सुझाव को पाकिस्तान ने अस्वीकार कर दिया था तो क्या भारत सियाचीन ग्लेशियर से अपनी सेना को हटाएगा। इतिहास ने फिर स्थिति पैदा की है, क्योंकि नवाज शरीफ ही प्रधानमंत्री हैं। उन्हें पहल करनी चाहिए, विशेषकर उस हालत में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काबुल से लौटते वक्त पाकिस्तान जाने की उदारता दिखायी है। राजीव गांधी की पहल पर हुए समझौते को लागू करने के लिए दोनों या तो इस्लामाबाद या नई दिल्ली में वार्ता कर सकते हैं। उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि भारत और पाकिस्तान के बीच स्थिति सामान्य बने बगैर क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता। दुनिया के गरीबों की सबसे बड़ी संख्या इस हिस्से में है और इन्हें इस असहाय स्थिति से बाहर लाने के लिए दोनों नेताओं को टकराव का रास्ता छोडऩा होगा।

पंच केदार: धार्मिक और पर्यटक यात्रा

डॉ. अरूण जैन
पंच केदार का सबसे आखिरी मंदिर है कलपेश्वर मंदिर। यही एक ऐसा पवित्र मंदिर है, जिसके पट पूरे साल खुले रहते हैं। यहां के मंदिर में मुख्य भगवान के रूप में विराजमान शिव की पूजा-अर्चना की जाती है। यहां पहुंचने के लिए घने जंगलों और मैदान से गुजरना पड़ता है। यहां बेहद ही पुराना कलपेश्वर वृक्ष है। कहा जाता है कि इस वृक्ष से जो भी मुराद मांगो वह पूरी होती है। समुद्र तल से 2,134 मीटर की ऊंचाई पर कलपेश्वर चमोली के अरगम जिले में है। हेलांग से 11 किलोमीटर दूर इस जगह पर यहां से ट्रैकिंग कर पहुंचा जा सकता है। दिल्ली से 475 किलोमीटर दूर और दो किलोमीटर की ट्रैकिंग कर यहां पहुंचा जा सकता है। पांडवों को क्षमादान दने से बचने के लिए जब भगवान शिव बैल का रूप धर भूमिगत हो गए थे तो उनके शरीर के कई अंग जमीन के ऊपर ही रह गए थे। कलपेश्वर में भी उनके एक भाग की पूजा होती है। कलपेश्वर में और भी कई जगह घूमा जा सकता है। इसके आसपास कई ऐसी जगह हैं, जो बेहतरीन पर्यटक स्थल है। रुद्रप्रयाग मंदिर- भगवान शिव का पंचकेदार में एक मंदिर यह भी है। यहां भगवान शिव को उनके मोहक चेहरे के रूप में पूजा जाता है। 2286 मीटर की ऊंचाई पर स्थित रुद्रनाथ मंदिर में सग्गार से 21 किलोमीटर की ट्रैकिंग कर यहाँ पहुंचा जा सकता है। वैसे यह गांव कलपेश्वर से बस दस किलोमीटर की दूरी पर है। जोशीमठ- यह बहुत ही छोटा तीर्थस्थल है मगर चमोली जिले का सबसे महत्वपूर्ण स्थल है। यहां पर आदि शंकराचार्य की बनाई चार मुख्य संस्थाएं हैं। साथ ही यह भगवान बद्रीनाथ की प्रतिमाएं भी देखी जा सकती हैं। ठंड के दिनों में तो ये संस्थाएं भगवान का घर बन जाती हैं। चोपता- चोपता को मिनी स्विट्जरलैंड भी कहा जाता है। कलपेश्वर से 23 किलोमीटर दूर यह जगह किसी स्वर्ग से कम नहीं। साल भर यहां पर्यटकों का तांता लगा रहता है। साहसिक खेलों के शौकीनों के लिए यह पसंदीदा जगह है। सर्दियों के दौरान यहां की प्राकृतिक सुंदरता देखने बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। नजदीकी हवाई अड्डा जॉली ग्रांट एयरपोर्ट है जो कलपेश्वर से 267 किलोमीटर की दूरी पर है जबकि नजदीकी रेलवे स्टेशन ऋषिकेश जोशीमठ से 251 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां आने के लिए सड़क यातायात का भी इस्तेमाल किया जा सकता है। कलपेश्वर पूरे साल में कभी भी जाया जा सकता है।

दिन-रात चल रहे निर्माण कार्यों से निखरेगा उज्जैन


डॉ. अरूण जैन
उज्जैन में 22 अप्रैल से 21 मई तक होने वाले सिंहस्थ की तैयारियों में और तेजी आ गयी है। शहर में इन दिनों दिन-रात निर्माण कार्य चल रहे हैं।  यह निर्माण कार्य ऐसे हैं, जो सिंहस्थ के बाद भी उज्जैन नगर में रहेंगे। निर्माण कार्यों में खान नदी डायवर्सन और दत्त अखाड़ा को सुन्दर बनाने जैसे कई कार्य ऐसे हैं, जिनका काम दिन-रात तेजी से पूरा किया जा रहा है। खान नदी डायवर्सन कार्य पूरा होने पर नये स्वच्छ शहर की शुरूआत होगी। क्षिप्रा नदी के किनारे स्थित दत्त अखाड़ा घाट पर इन दिनों लाल पत्थर लगाने का कार्य जारी है। यह कार्य उज्जैन विकास प्राधिकरण कर रहा है।        घाट सौंदर्यीकरण कार्य पर 2 करोड़ 86 लाख की राशि खर्च की जा रही है।  घाट पर सवा लाख वर्ग फीट में धौलपुरी लाल पत्थर लगाया जा रहा है। इस कार्य में सवा सौ से अधिक कारीगर दिन-रात काम कर रहे हैं। खान नदी डायवर्सन का 16.2 किलोमीटर का कार्य पूरा किया जा चुका है। सम्पूर्ण कार्य 18.7 किलोमीटर लम्बे क्षेत्र में होना है। पूरे डायवर्सन कार्य में 7,480 भूमिगत पाइप बिछाने का कार्य किया जायेगा। अब तक 6,200 भूमिगत पाइप बिछाने का कार्य कर लिया है। श्री पंचायती निरंजनी अखाड़ा उज्जैन मेला क्षेत्र में पड़ाव स्थल बडऩगर रोड पर सीमेंट-कांक्रीट सड़क और संत निवास का निर्माण पूरा कर लिया गया है। इस क्षेत्र में बिजली, पीने का पानी, शौचालय निर्माण सहित अन्य निर्माण कार्य भी सर्वोच्च प्राथमिकता से करवाये जा रहे हैं।

मध्यप्रदेश के IAS अपनी संपत्ति उजागर करने को राजी नहीं


डॉ. अरूण जैन
पांच बार प्रॉपटी का ब्यौरा देने की अंतिम तारीख बढऩे के बावजूद आईएएस अपनी संपत्ति उजागर करने को राजी नहीं हैं। जो प्रॉपटी बताते हैं वे भी आधे-अधूरे मन से, क्योंकि ये पुराने दामों पर प्रॉपटी खरीदना तो बताते हैं, पर बाजार मूल्य का कॉलम होने के बावजूद बाजार मूल्य की कीमत नहीं बताते।         अप्रैल-2016 तक की मोहलत मिली है, लेकिन अक्टूबर-2015 की बीती डेडलाइन तक महज 64 अफसरों ने ब्यौरा दिया।  दरअसल, अफसर पत्नी की प्रॉपटी नहीं बताना चाहते।न पब्लिक-डोमेन में प्रॉपटी का ब्यौरा रखने पर राजी हैं। वह भी तब, जबकि जैसा भी हो पर पांच साल से प्रॉपटी का ब्यौरा दे रहे हैं। पिछला ब्यौरा देखे तो 80 फीसदी को उनकी प्रॉपटी कितने की है पता ही नहींं। चुनिंदा आईएएस का प्रॉपटी रिकार्ड देखा, तो कुछ को बाजार कीमत नहीं मालूम। कई ने बाजार कीमत बताई, जबकि कुछ ने एक बार बताई, दूसरे साल हटा दी। इनमें से कई तो ऐसे हैं जिन्होंने 2010 के बाद नई प्रॉपटी खुद नहीं खरीदी। दस्तावेजों पर यकीन करें तो 70 फीसदी आईएएस तो पांच सालों में कोई प्रॉपटी नहीं खरीद पाएं।  पेश है एक रिपोर्ट. ...अंटोनी डिसा, मुख्य सचिव                   पांच साल में प्रॉपटी ज्यों की त्यों रही। महज 2014 में पत्नी के नाम ब्रांदा-मुंबई में फ्लैट बढ़ा।           लिखा कि पत्नी की माता ने गिफ्ट किया। 2010 में जब प्रॉपटी का ब्यौरा दिया तो खुद व परिवार के नाम करीब 81 लाख की आठ प्रॉपटी बताई। तीन भोपाल और पांच गोवा में। यह करोड़ों की होगी, लेकिन मुख्य सचिव को कीमत नहीं मालूम।               2014 के ब्यौरे में लिखा कि कीमत बाजार मूल्य के हिसाब से। 29 जनवरी 2016 को पेश 2015 का ब्यौरा ज्यों का त्यों ही है। खास यह है कि जनवरी 2014 में डिसा ने लिखकर दिया कि पणजी और गोवा में अप्रैल-2014 में संपत्ति खरीदी। एसआर मोहंती, एसीएस 2010 में छह प्रॉपटी भोपाल, इंदौर व उड़ीसा में बताई। 2012 में एक प्रॉपटी बढ़ी। पत्नी के नाम जिस प्रापॅटी का मूल्य 2010 में 40 लाख बताया था 2014 में भी उसे उतना ही बताया। ऐसे ही खुद के नाम प्रॉपटी की कीमत भी समान बताई। जनवरी-15,16 में ब्यौरा समान। बीपी सिंह, पीएस आईएएस एसोसिएशन के अध्यक्ष सिंह ने उप्र में दो प्रॉपटी बताई। कीमत न 2010 में पता थी न 2014 में। 2012 में भोपाल और इंदौर में पत्नी इंदु के नाम आवासीय प्लाट लेना बताया। 2013 व 2014 में जब ब्यौरा दिया तो पत्नी के नाम प्रॉपटी हटा दी। 2015 और 2016 का ब्यौरा सार्वजनिक नहीं किया है। राधेश्याम जुलानिया, एसीएस 2010 में चार प्रॉपटी भोपाल और एक नोएडा में बताई। फिर 2011 में इंदौर में बच्चों के नाम प्रॉपटी खरीदी। हर साल बाजार कीमत बढऩा भी बताया। 2010 में 1.8 करोड़ की प्रॉपटी बताई। 2014 में कीमत 3.14 करोड़ बताई। जनवरी-2015 और 2016 में ब्यौरा समान है। प्रवीर कृष्ण, पीएस 2010 से 2014 तक पांच साल में संयुक्त नाम पर एक ही प्रॉपटी हरियाणा में फ्लैट बताया। इससे सालाना 4.20 लाख रुपए सालाना की कमाई भी बताई। वर्ष-2010 के ब्यौरे में बाजार मूल्य 1 करोड़ छह लाख बताया। उसके बाद के सालों में बाजार मूल्य का कॉलम खाली छोड़ दिया। कोई नई प्रॉपटी नहीं बताई। इकबाल सिंह बैस,पीएस पांच साल में बस तीन प्रॉपटी है, जो पंजाब-भोपाल में हैं। दो प्रॉपटी खुद व पत्नी के नाम बताई। 2010 में फरीदाबाद व चंडीगढ़ में 4 करोड़ 8.5 लाख की संयुक्त प्रॉपटी बताई थी।           आखिरी बार वर्ष-2011 में 50 लाख का भोपाल में मकान खरीदना बताया था। फिर नई प्रॉपटी नहीं खरीदी। 2010 में 1.80 करोड़ और 2014 में 3.64 करोड़ की प्रॉपटी बताई। 2014 और 2016 का ब्यौरा समान ही है। पंकज अग्रवाल, आयुक्त 2010 से 2016 तक केवल एक मकान भोपाल में बताया। 2010 में बाजार मूल्य 26 लाख बताया जो इस बार के ब्यौरे में बढ़कर 80 लाख हो गया। इससे सालाना 1.44 लाख रुपए की कमाई है। इसके अलावा संपत्ति की कोई डिटेल नहीं दी गई है। मनोज श्रीवास्तव, पीएस 2010 में चार प्रॉपटी भोपाल में बताई। दो की कीमत 29 लाख और बाकी दो की पता नहीं। 2014 में जब ब्यौरा दिया तो चार प्रॉपटी थी, पर किसी की कीमत पता नहीं। एक प्रॉपटी खुद, एक पत्नी और बाकी दो बच्चों के नाम। पत्नी के नाम प्रॉपटी भी माताजी की बताई। नया ब्यौरा अभी सार्वजनिक नहीं किया। मोहम्मद सुलेमान, पीएस  किसी प्रॉपटी की कीमत नहीं पता। 2010 में उप्र, हरियाणा व भोपाल में प्रॉपर्टी बताई। उप्र-भोपाल की प्रॉपर्टी पत्नी के साथ संयुक्त बताई। भोपाल में 13 लाख का प्लाट बताया। 2012 में खुद के नाम की गोरेगांव-हरियाणा की प्रॉपटी ब्यौरे से हटी। फिर 2014 में नोएडा में एक प्रॉपटी बताई। जनवरी-15 और जनवरी-16 में ब्यौरा समान है। अशोक वर्णवाल,पीएस 2010 में केवल झारखंड में एक मकान बताया था। फिर 2011 में भोपाल में एक और 2014 में एक और प्रापर्टी भोपाल में बताई। कुल तीन प्रापर्टी 2014 में बताई। जो इस बार भी ज्यों की त्यों है। अरुणा शर्मा, एसीएस अरुणा की प्रापर्टी पांच साल में उल्टे कम हो गई है। 2010 में करीब एक करोड़ 22 लाख रुपए की छह प्रॉपटी भोपाल, इंदौर, हरियाणा, नोएडा में बताई। 2011 में पति-बच्चे के नाम 1.90 करोड़ की नई प्रॉपटी बताई। 2012 में दो और 2013 में एक प्रॉपटी को ब्यौरे से हटाया। नया ब्यौरा अभी दिया नहीं। राजेश राजौरा,पीएस  2010 से 2014 तक ज्यों की त्यों प्रॉपटी रही। 2010 के भोपाल में एक प्रॉपटी 22.40 लाख में 2006 में खरीदना बताई थी। बाजार कीमत न तो 2010 में पता थी और न 2014 में पता रही। नया ब्यौरा अभी तक सार्वजनिक नहीं।

एक हिल स्टेशन है मोरी कभी गए हैं आप ? 


डॉ. अरूण जैन
दिल्ली से 410 किलोमीटर की दूरी पर भीड़भाड़ से दूर हिल स्टेशन है- मोरी। उत्तर-पश्चिम गढ़वाल क्षेत्र स्थित मोरी उत्तरकाशी जिले के बेहतरीन हिल स्टेशनों में से एक है। मोरी हिल अपने आप में खूबूसरती के लिए मशहूर है। यहां की सुंदरता और मनोहारी दृश्य इस हिल स्टेशन का बढ़ा देते हैं। यहां का शांत वातावरण, स्वच्छ हवा और मौसम इसे बेहतरीन हिल स्टेशनों में से एक बनाते हैं। पेड़ों से लदे पहाड़। हरे-भरे धान के खेत, कल-कल बहती टान्स नदी, बेहतरीन वॉटरफॉल, झीलें और देवदार के पेड़ मोरी को और भी मनोहारी बनाते हैं। एशिया का सबसे लंबा देवदार का जंगल मोरी में ही है। मोरी न सिर्फ प्राकृतिक संपदा का धन है बल्कि प्राचीन मंदिरों और बेहतरीन वास्तुशिल्प से भी समृद्ध है। समुद्रतल से 1150 मीटर ऊपर टॉन्स नदी के किनारे है मोरी। यहां बहने वाली टॉन्स यमुना की सहायक नदियों में से एक है। टॉन्स घाटी के लोग यह दावा करते हैं कि वे पांडवों और कौरवों के पूर्वज थे। वे आज भी उन दिनों की संस्कृति, बहु विवाह को मानते हैं। यहां के टॉन्स नदी में रिवर राफ्टिंग का आनंद लिया जा सकता है। यहां पर कैम्पिंग भी की जा सकती है। इसके लिए यहां सारा सामान उपलब्ध कराया जाता है। इसके अलावा हाइकिंग, ट्रेकिंग, नेचर वॉक का आनंद किया जा सकता है। चिडिय़ों की चहचहाहट, वनस्पति और जीव-जंतु पर्यटकों को चौका देते हैं। रॉक क्लांइबिंग भी मोरी के मशहूर खेलों में शामिल है। मोरी में देखने लायक बहुत कुछ है जैसे- इच्छारी बांध- यह बांध मोरी के मुख्य आकर्षण में से एक है। यह बांध टॉन्स नदी पर बना है। किवदंती के अनुसार ऐसा माना जाता है कि यह नदी राक्षसी सूर्पनखा के आंसुओं से उत्पन्न हुई थी। दुर्योधन मंदिर- यह मंदिर पांडवों का बनाया है। लकडिय़ों से बना मंदिर बेहतरीन कलाकृति का उदाहरण है। यह मंदिर कौरवों के सबसे बड़े भाई दुर्योधन को समर्पित है। लुनागढ़ क्रीक- यह एक खूबसूरत पैलेस में से एक है। मोरी से 30 मिनट पैदल का रास्ता तय कर इस पैलेस तक पहुंचा जा सकता है। इसमें छोटा सा तालाब और वाटरफॉल भी देखा जा सकता है। यह एशिया के सबसे बड़े देवदार के जंगलों से घिरा है। इसमें बच्चों और बड़ों दोनों के लिए प्रकृति से जुड़े विभिन्न एडवेंचर हैं। नेटवार- मोरी से ग्यारह किलोमीटर दूर आयाताकार लकड़ी का बना एक मंदिर दुर्योधन के मित्र कर्ण को समर्पित है। जैखोल- मोरी से 20 किलोमीटर की दूरी पर टॉन्स घाटी के ऊपर है जैखोल गांव। यह छोटा सा गांव देवदार जंगलों के बीच है। मोरी जाने के लिए मसूरी से बस या टैक्सी ली जा सकती है। मसूरी से मोरी सिर्फ 139 किलोमीटर है। नजदीकी हवाई अड्डा जॉली ग्रांट देहरादून है, जो 170 किलोमीटर दूर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन देहरादून है जो 178 किलोमीटर की दूरी पर है। यहां जाने का सबसे अच्छा समय अप्रैल से जून तक है। ठंड में यहां का तापमान दो डिग्री तक हो जाता है।

अब लाड़लियों को लक्ष्मी के बजाय प्रमाण-पत्र


डॉ. अरूण जैन
प्रदेश की भारतीय जनता पार्टी के मुखिया के शासन की सबसे बड़ी उपलब्धि राज्य सरकार द्वारा लाड़ली लक्ष्मी योजना के अन्तर्गत पोस्ट आफिस की एनएससी दी जाती थी अब उसकी जगह केवल एक प्रमाण पत्र दिया जाएगा, यही नहीं अभी तक जिन लाड़लियों को यह एनएससी प्रदान की गई है वह वापस मंगाई जा रही है और उसकी वजह एनससी जारी की जा रही है कुल मिलाकर राज्य सरकार ने जो लाड़ली लक्ष्मी के नाम पर अपने हितैषी होने का ढिंढोरा पीट रखा था अब वह राज्य के खजाने की कंगाली के हालत को देखते हुए अब उसमें बदलाव कर दिया गया। इससे प्रदेश की लाड़लियों को भविष्य में यह गारंटी नहीं है कि अब उनको 18 वर्ष की उम्र पूरी करने पर इस योजना के अन्तर्गत मिलने वाला एक लाख 38 हजार के लगभग मिलने वाली राशि मिल ही जाएगी, क्योंकि भविष्य किसी को देखकर नहीं आता यदि यह सरकार भविष्य में रही या नहीं इसके लोकतंत्र में कोई गारंटी नहीं है, भगवान न करे कि लोकतंत्र का एक दिन का राजा इस सरकार को पलट दे और प्रदेश में कोई दूसरी सरकार आ जाए और वह इस योजना को एक झटके में बंद करने की सोच ले तो अभी तक मिली लाड़ली लक्ष्मी योजना के अंतर्गत प्रदेश की उन लाड़लियों को एक नया पैसा भी नहीं मिलने की संभावनाएं भी प्रबल हैं, क्योंकि आज राज्य की जो आर्थिक स्थिति है हो सकता है कि वह कल भी नहीं सुधरे और राज्य कंगाली के दौर में हो तो फिर यह राशि जिन लाड़लियों को यह सरकार एनससी की बजाय खाली प्रमाण पत्र दे रही है, उसकी राशि मिलेगी कि नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है, अभी तक राज्य सरकार द्वारा लाड़ली लक्ष्मी योजना के तहत हुए नये बदलाव में अब विभाग लाड़लियों को प्रमाण पत्र जारी करेगा सारी जानकारी आनलाइन दर्ज की जाएगी प्रमाण पत्र जारी होने के बाद छठवीं कक्षा से लाड़लियों को राशि मिलनी शुरू हो जाएगी छठवीं में प्रवेश लेने के साथ ही लाड़ली के खाते में दो हजार रुपये जमा कर दिये जायेंगे इसी तरह नौवीं कक्षा में पहुंचने के बाद चार हजार रुपये जमा कर दिये जायेंगे 11वीं और 12वीं में छ:-छ: हजार रुपये दिये जायेंगे इसके बाद 18 साल की उम्र पूरी करने के बाद यदि उसका विवाह 21 साल तक नहीं होता तो उसे शासन की तरफ से एक लाख 18 हजार रुपये मिलेंगे। इसके साथ ही यह शर्त भी है कि लड़की की उम्र 21 साल होनी चाहिए और वह कम से कम हाईस्कूल की परीक्षा में उत्तीर्ण होना चाहिए, मध्यप्रदेश की वर्तमान कानून व्यवस्था को देखते हुए जिसके चलते राज्य में प्रतिदिन नाबालिगों के साथ बलात्कार की घटनाएं घट रही हैं उनसे चिंतित हर लाड़ली का परिजन रहता है और वह ऐसे माहौल में अपनी बच्ची को कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों में तो 21 साल तक शादी न करने के पक्ष में नहीं रहता है जैसा कि वर्तमान में प्रदेश का माहौल है हर लाड़ली का पालक अपनी बच्ची के हाथ जल्दी से जल्दी पीले करने के पक्ष में रहता है। इस भय के वातावरण के चलते बच्चियों की शादी 21 साल से पहले ही कर दी जाती है। तो वहीं मध्यप्रदेश सरकार की जिस तरह से संविधान में प्रदत्त मूल अधिकारों की कटौती का माहौल बन रहा है जिसके चलते स्वास्थ्य, शिक्षा और पानी की व्यवस्था कराने में यह सरकार पूरी तरह से नाकामयाब साबित हो रही है और यह सब व्यवस्थायें निजी हाथों में सौंपे जाने की तैयारी कर रही है तो वहीं शिक्षा के मामले में भी सरकारी सूत्रों से जो खबरे पिछले दिनों समाचार पत्रों की सुर्खियां रही जिसके अंतर्गत 90 प्रतिशत सरकारी शिक्षण संस्थाएं सरकार बंद करने की ओर कदम बड़ा रही है, यदि यही स्थिति रही तो ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक शाला की तो बात छोडि़ए हाई स्कूल और हायर सेकेण्डरी स्कूल तक सरकारी खुले नजर नहीं आएंगे और इनका स्थान ले लेंगी निजी शिक्षण संस्थाएं। जैसी की सरकार की योजना है कि यदि यह योजना कार्य रूप में परिणित हो गई तो प्रदेश के लाखों लड़लियां शिक्षा से वंचित हो जाएंगी और प्रदेश में जिस तरह का भय का वातावरण नजर आ रहा है उसके चलते कोई भी पालक अपनी बच्ची को कम से कम ग्रामीण क्षेत्रों में लम्बी दूरी तय करके पढ़ाने के पक्ष में नहीं रहेगा। इस स्कीम के लागू होते ही अब लाड़लियां भी पढ़ाई से वंचित हो जाएंगी तो ऐसे में सरकार की इस योजना के अन्तर्गत जो नियम निर्धारित किये गये उसके अनुसार वह 9वीं और 11वीं तक अध्ययन जारी रख  पाएगी या नहीं यह भी संभावनाएं नजर आ रही हैं, कुल मिलाकर सरकार की इस योजना के चलते प्रदेश की लाड़लियों को अब सरकार द्वारा दी जानेवाली लक्ष्मी मिलने पर भी कई सवाल खड़े हो रहे हैं। वैसे इस योजना से यह साफ जाहिर होता है कि सरकार की लाड़ली लक्ष्मी योजना खटाई में जाती नजर आ रही है। पता नहीं इसके बाद और कितनी योजनाओं पर सरकार परिवर्तन करके उन्हें धीरे-धीरे बंद करने की तैयारी करेगी जिसको लेकर आज वह वाहवाही लूटने में लगे हैं।