Tuesday, 15 August 2017

उत्तर प्रदेश में छुट्टियों की छुट्टी करने का फैसला ऐतिहासिक

डॉ. अरूण जैन
देश के सबसे बड़े व राजनीति के लिहाज से विशेष दर्जा रखने वाले राज्य उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने गत दिनों पूरे देश को एक सार्थक बहस का मुद्दा दे दिया। महापुरुषों के नाम पर होने वाली छुट्टियों को निरर्थक बताते हुए उन्होंने सुझाव दिया उनकी जयंती या पुण्यतिथि पर विद्यालयों में घंटे−दो घंटे का आयोजन कर छात्रों को उन विभूतियों के व्यक्तित्व और कृतित्व से अवगत कराना कहीं बेहतर होगा। योगी जी ने डॉ. आंबेडकर की जयंती के एक आयोजन में उक्त बात कहकर बर्र के छत्ते में पत्थर मारने का जो दुस्साहस किया उसकी पूरे देश में सकारात्मक प्रतिक्रिया देखी गई। सोशल मीडिया सहित टीवी चैनलों ने भी देश भर में होने वाली छुट्टियों का चि_ा पेश कर ये उजागर किया कि सरकारी दफ्तर और शिक्षण संस्थाओं में अवकाश संस्कृति के चलते न तो पूरा काम हो पाता है और न ही अध्यापन।  उत्तर प्रदेश से छुट्टियों को लेकर जो जानकारी सामने आई उसके मुताबिक वहां महापुरुषों के नाम पर 42 छुट्टियां हर वर्ष होती हैं। 52 रविवार के साथ दूसरे और तीसरे शनिवार की छुट्टी के 24 दिन और हो जाते हैं। फिर सरकारी कर्मचारी को मिलने वाली तमाम छुट्टियां भी तकरीबन 50 दिन तो होती ही हैं। कुल मिलाकर सालभर में आधे से ज्यादा समय वहां के सरकारी कर्मचारी छुट्टी मनाते हैं जिसका असर सीधा कामकाज पर पड़ता है और जनता हलकान होती है। इसी तरह शिक्षण संस्थाओं में भी कुल मिलाकर आधे दिन भी पढ़ाई हो जाए तो बड़ी बात है। जो जानकारी आई है उसमें उ.प्र. की पिछली सरकारों ने विभिन्न जातियों की प्रसिद्ध हस्तियों की याद में इसलिए छुट्टी रखवाई जिससे सजातीय मतदाता संतुष्ट हों। मसलन कर्पूरी ठाकुर नाई जाति के थे और रहने वाले बिहार के। फिर भी उ.प्र. में उनके नाम पर अवकाश होता है। आचार्य नरेन्द्र देव, भगवान परशुराम, निषादराज और ऐसे ही अन्य अवकाश जातिगत समीकरणों को ध्यान रखते हुए दे दिये गये। अन्य राज्य इस मामले में हालांकि उ.प्र. से पीछे हैं परन्तु महापुरुषों के नाम पर छुट्टी दिये जाने का चलन सभी जगह है।  उत्तर प्रदेश की पूर्व समाजवादी पार्टी ने जातीय राजनीति साधने के लिये छुट्टियों का दांव खूब खेला। समाजवादी महापुरुषों के जन्मदिन पर छुट्टियों का ऐलान करके सपा समाजवादी राजनीति के साथ−साथ जातियों की राजनीति भी साधती रही। सबसे पहले सरकार ने किसान नेता चौधरी चरण सिंह के जन्मदिन पर छुट्टी की घोषणा की। इससे जाट राजनीति में कुछ फायदा होने की उम्मीद थी। फिर सपा सरकार ने 24 जनवरी को बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत कर्पूरी ठाकुर के जन्मदिन पर छुट्टी कर दी और 17 अप्रैल को पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर के जन्मदिन पर सरकारी अवकाश की घोषणा हुई। अति पिछड़ा और राजपूत वोट साधने की राजनीति के तहत यह छुट्टियां की गयीं। असल में समाजवादी पार्टी की सरकार पिछड़ा, अति पिछड़ा, मुस्लिम, जाट और राजपूत वोट का समीकरण बनाना चाहती थी। वो अलग बात है कि सपा की सारी जुगत और जातियों की राजनीति भाजपा की आंधी में उड़ गयी।  देशभर में औसतन सरकारी कर्मचारियों को वर्ष के 365 दिनों में से सरकारी कार्यालयों में 5 दिवसीय कार्य सप्ताह होता है। इसका तात्पर्य है कि साल में 104 सप्ताहांत छुट्टियां होती हैं। इसके अलावा 3 राष्ट्रीय अवकाश, 14 राजपत्रित अवकाश और 2 प्रतिबंधित अवकाश सरकारी कर्मचारियों को मिलते हैं। प्रतिबंधित अवकाश छोटे धार्मिक समूहों की सुविधा के लिए दिए गए थे किंतु अब ये सभी के लिए 2 अतिरिक्त छुट्टियां बन गए हैं।  इसके अलावा सरकारी कर्मचारियों को 12 दिन का आकस्मिक अवकाश, 20 दिन का अर्द्ध वेतन अवकाश, 30 दिन का अर्जित अवकाश और 56 दिन का चिकित्सा अवकाश मिलता है। कुल मिलाकर साल में इन्हें 249 छुट्टियां मिलती हैं और केवल 116 दिन वे कार्य करते हैं। महिलाओं को 6 माह का मातृत्व अवकाश और 2 वर्ष का चाइल्ड केयर अवकाश भी मिलता है। सरकारी बाबू इतने से ही खुश नहीं होते हैं। सामान्य कार्य दिवस 8 घंटे का होता है जिसमें 1 घंटे का भोजनावकाश भी होता है, किंतु सरकारी कर्मचारी के कार्यालय में घुसते ही उसका चाय का समय शुरू हो जाता है और यह दिन भर चलता रहता है। फिर भी उसके लिए ओवर टाइम की कोई कमी नहीं है।  हमारे संसद सदस्य राष्ट्रीय और राजपत्रित अवकाशों के अलावा 36 दिन के प्रतिबंधित अवकाश के हकदार भी हैं। किंतु वे इतने से भी संतुष्ट नहीं हैं, वे बीच−बीच में संसद सत्र की भी छुट्टी करवा देते हैं। होली और रामनवमी को भी ऐसा ही होता है। हमारे जनसेवकों ने स्वयं को सप्ताह में दो दिन की छुट्टी का हकदार बना दिया है, चाहे इससे करदाताओं का करोड़ों रुपया बर्बाद क्यों न हो जाए। न्यायपालिका में लाखों मामले लम्बित हैं, फिर भी उच्चतम न्यायालय साल में 193 दिन, उच्च न्यायालय 210 दिन और निचली अदालतें 245 दिन कार्य करती हैं। अमरीकी उच्चतम न्यायालय में सालाना छुट्टियां नहीं होती हैं जबकि वहां के उच्चतम न्यायालय में केवल 9 न्यायाधीश हैं, फिर भी वह सभी मामलों का निपटान कर देता है, जबकि हमारे यहां 27 न्यायाधीश हैं और मामले कई दशकों से लंबित पड़े हुए हैं। हम नहीं चाहते कि हमारे न्यायाधीशों को छुट्टियां न मिलें, किंतु यदि वे कम छुट्टियां करें और अधिक न्याय दें तो इससे लोगों को न्याय मिलने में सहायता मिलेगी। खुशी की बात यह है कि मुख्य न्यायमूर्मि जेएस खेहर ने घोषणा की है कि इस वर्ष ग्रीष्मावकाश के दौरान 3 पीठें कार्य करेंगी। 

दिल्ली में निगम चुनाव आप हारी तो विधानसभा का मध्यावधि चुनाव संभव

डॉ. अरूण जैन
दिल्ली में मध्यावधि चुनाव की संभावना! क्या दिल्ली में विधानसभा चुनाव समय से पहले भी हो सकते हैं? निगम चुनावों में अगर आप का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा तो उसमें तोडफ़ोड़ की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। माना जा रहा है कि आप के कई विधायक टूट सकते है। इसके अलावा आप के 21 विधायकों के खिलाफ चुनाव आयोग में लाभ के पद का मामला लंबित है। अगर इनकी सदस्यता ख़त्म हो गयी तो जाहिर मध्यावधि चुनाव संभव है। माना जा रहा है कि 21 विधायकों पर जल्द ही फैसला होना है। हृड्डस्रद्बद्व स्. ्रद्मद्धह्लद्गह्म् : अगर केजरीवाल जब एमसीडी का चुनाव हारते हैं तो दोष ईवीएम मशीन पे ही मढ़ा जाएगा ना!! वैसे केजरीवाल भी यही चाहते हैं ताकि जनता के बीच अपनी बुरी तरह घटी साख को ईवीएम में छुपा लें। बेहतर हो कि एमसीडी चुनाव देर से ही सही, पर पर्ची वाली ईवीएम से हो या फिर बैलट से। ताकि हारने वाली पार्टी या व्यक्ति कोई बहाना ना बना सके। ये ईवीएम में गड़बड़ी की बात हर राजनीतिक पार्टी को सूट कर रही है। हार गए तो ईवीएम मैनेज्ड थी जी। और जीत गए तो उंगली से विक्ट्री का निशान बना देंगे। बहुत मोटी चमड़ी है इनकी।

नीतीश ने मोदी को अपना नेता मान लिया


डॉ. अरूण जैन
लालू परिवार से पिंड छुड़ाकर  भाजपा के समर्थन से सत्ता में वापस आ जाना यह जानने के लिए काफी है कि यूं ही नीतीश कुमार को बिहार की राजनीति का चाणक्य नहीं कहा जाता। वह छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं। अपने पत्ते बेहद सोच समझकर चलने वाले नीतीश कुमार के बारे में लालू प्रसाद का कहना है कि उनका दांत मुंह में नहीं आंत में है। अंतिम समय तक कोई यह भांप नहीं सका कि आखिरकार नीतीश के मन में चल क्या रहा है। लालू परिवार पर सीबीआई के छापे व एफआईआर दर्ज होने के बाद से ही नीतीश ने दूरी बनानी शुरू कर दी थी, हालांकि उनकी अगली चाल क्या होगी इसकी भनक किसी को भी नहीं लगी। 66 वर्षीय नीतीश कुमार ने राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण राज्य के मुख्यमंत्री पद से बुधवार शाम को इस्तीफा दिया और तीन घंटे से भी कम समय में भाजपा ने उन्हें समर्थन देकर फिर बिहार की गद्दी सौंपने का रास्ता साफ कर दिया। उस दिन घटनाक्रम इतनी तेजी से बदला कि बड़े बड़े राजनीतिक पंडित भी भौंचक्के रह गये। लालू के पुत्रमोह ने जहां 80 विधायकों वाली राजद को सत्ता से बाहर कर दिया वहीं मूकदर्शक बनकर तमाशा देखने वाली कांग्रेस भी महागठबंधन से पूर्व के दौर में पहुंच गई। सोशल मीडिया पर कांग्रेस की यह कहकर खिल्ली उड़ाई जा रही है कि तलाक राजद व जदयू का हुआ लेकिन विधवा कांग्रेस हो गई। बहरहाल, नीतीश कुमार के इस दांव से जहां राजद व कांग्रेस बौखलाई हुई है वहीं भाजपा की बांछें खिल गई हैं। भाजपा की खुशी का कारण यह नहीं है कि उसके कुछ विधायक मंत्री बन गये। उसकी प्रसन्नता की असली वजह यह है कि साल 2019 के आम चुनाव में विपक्ष के पास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चुनौती दे सकने लायक अब कोई मजबूत चेहरा नहीं बचा है। माना जा रहा था कि नीतीश कुमार को आगे कर विपक्ष आम चुनाव में मोदी को चुनौती देने की मंशा पाले हुए था लेकिन अब नीतीश कुमार के भाजपा की छतरी तले अपना भविष्य सुरक्षित कर लेने से विपक्ष का मंसूबा ध्वस्त हो गया है।   एक वक्त नरेंद्र मोदी की परछाई से भी दूर भागने वाले नीतीश कुमार ने बिहार की सियासत को 180 डिग्री घुमा दिया है। इससे न केवल नीतीश कुमार छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री बने हैं बल्कि पीएम मोदी के कांग्रेसमुक्त भारत के सपने को कुछ और आसान बना दिया है। अब देश के 18 राज्यों में भाजपा व उसके सहयोगियों की सरकार है। यानी पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक देश की 67 प्रतिशत जनता पर भाजपा या उसके सहयोगियों का शासन है। अगर गहराई से देखें तो इस सियासी बदलाव में असली जीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुई है। नरेंद्र मोदी ही वह शख्स थे जिन्हें भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित किये जाने के बाद नीतीश कुमार ने एनडीए से अपना 17 साल पुराना रिश्ता एक झटके में खत्म कर लिया था। मोदी व नीतीश के बीच की खाई कई बार मीडिया की सुर्खियां बनती रही हैं। लेकिन अब वह सब पुराने दिनों की बात हो गई है।  अब नीतीश कुमार को नरेंद्र मोदी की छतरी तले बिहार का शासन चलाने में कोई भी आपत्ति नहीं है। उन्होंने नरेंद्र मोदी को अपना नेता मान लिया है। मोदी भी तो यही चाहते थे। बिहार में विजय रथ के थम जाने की कसक भी इसी के साथ खत्म हो गई है। नीतीश कुमार ने भी उनका नेतृत्व स्वीकार कर लिया है। इसकी पृष्ठभूमि जैसा कि विरोधी दल कह रहे हैं बहुत पहले से ही तैयार हो रही थी। इसकी बानगी राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार के नाम पर विचार करने के लिए आयोजित सोनिया गांधी के भोज से दूरी व उसके 24 घंटे बाद ही प्रधानमंत्री मोदी की डिनर पार्टी में शामिल होने के रूप में देखा जा सकता है।  दोनों नेताओं के रिश्तों के बीच जमी बर्फ उसके बहुत पहले पिघलनी शुरू हो गई थी। इसकी पहल खुद नीतीश कुमार की ओर से ही की गई थी। नोटबंदी के दौरान जहां पूरा विपक्ष दाना पानी लेकर मोदी पर चढ़ दौड़ा था वहीं नीतीश कुमार ने न केवल इसका समर्थन किया बल्कि बेनामी संपत्ति के खिलाफ भी कार्रवाई करने की मांग कर दी। इसी तरह उन्होंने सर्जिकल स्ट्राइक की भी खुले मन से सराहना की। प्रधानमंत्री मोदी ने भी नीतीश को निराश नहीं किया। पटना में आयोजित प्रकाश पर्व के दौरान नीतीश कुमार की शराबबंदी की जमकर सराहना की। धीरे धीरे दुश्मनी दोस्ती में बदली और परिणाम तब दिखा जब राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर रामनाथ कोविंद का नाम घोषित किये जाने के बाद नीतीश ने ऐलान कर दिया कि उनकी पार्टी एनडीए उम्मीदवार को वोट देगी। बहरहाल, एक बात तो तय है कि बिहार के इस राजनीतिक उलटफेर का 2019 के लोकसभा चुनाव पर गहरा असर पड़ेगा।

आंकड़े खुद कह रहे हैं- देश के अच्छे दिन आ रहे हैं


डॉ. अरूण जैन
आजादी के 70 साल बीत रहे हैं। देश ने अनेक सरकारों को देखा है। आम जनता को सभी केन्द्रीय सरकारों के खट्टे-मीठे अनुभव प्राप्त हुए हैं। एक समय था जब विपक्ष सोच भी नहीं सकता था कि वह राष्ट्रीय स्तर पर सत्तासीन हो सकेगा, लेकिन लंबे समय तक विपक्ष में रहने वाली पार्टी को जनता−जनार्दन ने अधिकांश राज्यों सहित केंद्र में भी व्यापक जनसमर्थन दिया है। प्रतिकूलता में धैर्य और साहस की आवश्यकता होती है और अनुकूलता में मर्यादा और विनम्रता की आवश्यकता होती है। 16 मई और 26 मई 2014 यह तिथि भारतीय राजनीति के इतिहास में दर्ज हो चुकी है। भारतीय राजनीति और भारत की सरकार को स्थायित्व देने का सुनहरा समय प्रारंभ हुआ। समय किसी का सहोदर नहीं होता है। वह तो आता है और चला जाता है। आज जब हम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के तीन वर्षों के कार्यों और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के कार्यों का अवलोकन करते हैं तो लगता है कि मोदी सरकार आध्यात्मिक समाज के भगवान श्रीराम की मर्यादाओं से बंधकर जनहितार्थ कार्य करने में लगे हुए हैं और वहीं राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह भगवान श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर नयी राजनीति से दल का विस्तार करते हुए परिणाम तक ले जाने में जुटे हुए हैं।  वर्षों से भाजपा पर अगड़ों और अमीरों की पार्टी होने का ग्रहण लगता रहा। मोदी सरकार और भाजपा संगठन ने पिछले तीन वर्षों में इस मिथक को तोड़ते हुए हर गरीब के घर−घर में यह बात पहुंचाने का सफलतम प्रयास किया है कि मोदी सरकार और भाजपा संगठन गरीबों की पार्टी है और समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने वाली पार्टी है। गरीबी हटाओ जैसे नारे आजादी के बाद कांग्रेस देती रही, लेकिन गरीबी हटी नहीं। भाजपा ने न नारा दिया, न वादा किया। प्रधानमंत्री ने संसद की चौखट पर माथा टेकते हुए पहला वाक्य कहा कि यह सरकार गरीबों की सरकार है। और अपने पहले वाक्य को अभी तक जमीन पर साकार करने के लिए मोदी सरकार का हर फैसला साकार होता दिख रहा है।  भारतीय समाज को पहली बार यह अहसास हो रहा है कि निर्वाचित सरकार हमारी है। सरकार की सफलता पहले पायदान पर उस समय समझ में आती है कि जब समाज यह कहने लगे कि जो हम सोच रहे हैं वही सरकार कर रही है। देश भ्रष्टाचार से त्रस्त था। घोटालों की गूंज से संसद गूंजती रहती थी। आम आदमी का जीवन भ्रष्टाचार के कारण त्रस्त हो गया था। तीन साल में कालेधन पर रोक, भ्रष्टाचार से मुक्ति और बेनामी संपत्ति पर अलीगढ़ का ताला लगाने का जो सफलतम प्रयास मोदी सरकार ने किया है वह हर जुबां पर है। कालेधन से मुक्ति के लिए विमुद्रीकरण का ऐतिहासिक फैसला किया गया। विमुद्रीकरण की परीक्षा में नरेन्द्र मोदी जहां शत-प्रतिशत सफल हुए हैं, वहीं गरीबों ने अपनी आवाज से सरकार के साथ आवाज मिलाकर दो-टूक लोकतांत्रिक फैसला दिया कि विमुद्रीकरण पर मोदी सरकार के साथ हैं। इतना कठोर निर्णय! गरीब से गरीब को कठिनाई हुई, लेकिन सबके मन में एक खुशी थी कि कालाधन और भ्रष्टाचार रोकने का इससे बड़ा कोई उपाय नहीं है। विपक्षी पूछते हैं कि सरकार ने क्या किया? मैं उनको कहना चाहता हूं कि तीन साल में 49 करोड़ लोगों से अधिक को सीधा लाभ पहुंचाने और उनके सिर्फ बैंक खाते ही नहीं, बल्कि तकदीर के खाते खोलने का काम किया है। कुछ आंकड़े− जनधन−योजना के तहत 27.97 करोड़ खाते खोले गए। इन खातों में इन गरीबों ने स्वयं 63.835 करोड़ रुपए जमा किए। अब इन खातों में सरकारी योजनाओं की राशि जाने लगी। 13 करोड़ गरीबों को विभिन्न सामाजिक सुरक्षा में शामिल किया गया। स्टार्टअप एवं स्टैण्डअप योजना के तहत मुद्रा योजना के माध्यम से 6.6 करोड़ लोगों ने ऋण लिये और व्यापार शुरू किया। उज्ज्वला योजना के तहत समाज के अंतिम व्यक्ति जैसे 2 करोड़ लोगों को नि:शुल्क रसोई गैस कनेक्शन दिए गए। यह उज्ज्वला यही नहीं थमेगी, आने वाले वर्षों में 5 करोड़ लोगों के घर में धुआं बंद करेगी। क्या किया तीन साल में, विपक्षी पूछते हैं? राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बाद स्वच्छ भारत को अगर किसी ने जनांदोलन बनाया तो वह नरेन्द्र मोदी की सरकार ने किया है। स्वच्छता, समाज को स्वस्थता की ओर ले जा रही है। स्वच्छ भारत का अभिप्राय है स्वस्थ भारत। सामान्य सी बात लगती है, लेकिन उजाला एलईडी योजना, जिसके पीछे बिजली बचाओ अभियान है, इसके तहत 11 करोड़ 8 लाख एलईडी बल्ब वितरित किए गए। प्रधानमंत्री आवास योजना को सफल करने के लिए बैंक के ब्याज दरों में कमी और 2022 तक 5 करोड़ आवासहीन लोगों के सपने को साकार करने की दिशा में जो कदम उठाया जा रहा है वह ऐतिहासिक कहा जाएगा। 12 हजार करोड़ की प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के माध्यम से करोड़ों हाथों को हुनर देने का काम किया जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा किसानों के लिए अनेक कार्य किए जा रहे हैं। भारत कृषि प्रधान देश है। हमारी अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है। किसान यदि सुरक्षित नहीं तो भारत सुरक्षित नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों की सुरक्षा के लिए फसल बीमा राशि दुगुनी कर दी और किसानों के लिए प्रीमियम राशि को अब तक के दुगुने स्तर पर लाया गया। अब तक देश के 3 करोड़ 86 लाख किसानों ने इस योजना के तहत अपने को सुरक्षित किया है। इतना ही नहीं, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, जिसके तहत हर खेत को पानी के लिए पिछले दो वर्षों से 12.7 लाख हेक्टेयर से ज्यादा भूमि पर सूक्ष्म सिंचाई की व्यवस्था की गई है। किसान की आय दुगुनी करने के लिए जबर्दस्त योजना बनाई गई है। अच्छे दिन आएंगे ये नारा नहीं है। अच्छे दिन आ रहे हैं। 31 मार्च 2014 को उपभोक्ता महंगाई दर 9.46 प्रतिशत थी जो 31 मार्च 2017 को तीन साल के अंदर घटकर 3.81 प्रतिशत हो गई है। ये आंकड़े भारत के हैं, भाजपा के नहीं। 31 मार्च 2014 को जीडीपी जो 6.7 प्रतिशत थी वह 31 मार्च 2017 को 7.10 प्रतिशत हो गई। 31 मार्च 2014 को औद्योगिक उत्पादन दर नकारात्मक 0.10 प्रतिशत थी जो 31 मार्च 2017 को 3 साल के अंदर बढ़कर 5.2 प्रतिशत हो गई है। सड़कों की बात करें तो एक लाख 20 हजार किलोमीटर सड़कों का निर्माण कोई सामान्य बात नहीं है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत 2016-17 में 48,000 किमी सड़क निर्माण हुआ और हर रोज 133 किमी सड़क का निर्माण किया जा रहा है। 2013−14 में रोजाना 69 किमी सड़क का ही निर्माण होता था। इतना ही नहीं प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण से निम्न और मध्यम वर्ग के शोषण का खात्मा हुआ। मोदी सरकार के 19 मंत्रालयों और विभागों की 92 योजनाओं में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण लागू होने से 49,560 करोड़ की बचत हुई। संघीय व्यवस्था को मजबूत किया गया। एक राष्ट्र−एक कर (जीएसटी) को लागू कर और जीएसटी के लिए नेशनल काउंसिल बनाकर निर्णय लेने का जो फोरम बनाया गया वह संघीय व्यवस्था को मजबूत करता है। मोदी सरकार का सपना है कि हर व्यक्ति को छत मिले। यूपीए सरकार के 10 साल के कार्यकाल से ज्यादा घर मोदी सरकार में मिले हैं और 17,73,533 किफायती घरों के निर्माण को स्वीकृति दी गई है। महिला सशक्तिकरण को लेकर सरकार ने अनेक कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री मुद्रा योजना से मिले लाभों में 79 प्रतिशत महिलाएं हैं। सुकन्या समृद्धि योजना से 1 करोड़ खाते खोले गए और कुल 11,000 करोड़ रुपए जमा किए गए। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ कार्यक्रम अत्यंत सफल कार्यक्रम साबित हो रहा है। मोदी सरकार ने गरीब की रसोई को धुआं मुक्त कर दिया है और अब तक 2 करोड़ 20 लाख गरीब परिवार की माताएं-बहनें इसका लाभ ले रही हैं। मोदी सरकार की प्राथमिकता है युवाओं का विकास और प्रोत्साहन। स्टार्टअप्स अभियान के माध्यम से युवाओं को वित्तीय सहायता दी जा रही है, जिससे युवा अब केवल नौकरी नहीं मांग रहा है अपितु व्यवसाय कर वह रोजगार सृजन में भी जुट रहा है। सरकारी नौकरियों में भर्ती की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाया गया है तथा 34 लाख से अधिक गैर-राजपत्रित पदों पर भर्ती के लिए साक्षात्कार की बाध्यता को समाप्त किया गया है। मोदी सरकार की अभिनव योजना मेक इन इंडिया कार्यक्रम को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। भारत ने उत्पादों की गुणवत्ता के मामले में चीन को सात स्थान पीछे धकेल दिया है। मोदी सरकार सुरक्षा बलों के सशक्तिकरण के लिए प्रतिबद्ध है। रिटार्यड सैनिकों के हित में सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए चार दशकों से लंबित वन रैंक, वन पेंशन की मांग को पूरा किया। बांग्लादेश के साथ लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को मोदी सरकार ने सुलझाया। मेक इन इंडिया के तहत भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन रहा है। भारतीय सेना ने पीओके में आतंकवादियों को उसके घर में घुसकर मारा और सर्जिकल स्ट्राइक से विश्व में देश की साख बढ़ी। इससे पहले म्यांमार में भी आतंकवादियों के खिलाफ ऑपरेशन चलाया। विधि के क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन किए गए। 1100 से ज्यादा अप्रचलित कानूनों को निरस्त किया गया और ऐसे ही 400 अन्य कानूनों को निरस्त किए जाने की कार्रवाई की जा रही है। वहीं, राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देकर ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। मोदी सरकार में संविधान, सीमा और सेना का गौरव बढ़ा है। दुनिया भर में भारत की साख और धाक बढ़ी है। प्रधानमंत्री के विदेश प्रवास से भारतवंशियों के बीच उत्साह जगा है। कैबिनेट के निर्णय और आंकड़ों पर जाएं तो शब्द और पन्ने कम पड़ जाएंगे। दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी आज भारतीय जनता पार्टी है। 17 राज्यों में एनडीए की सरकार है। इन राज्यों में 61 प्रतिशत आबादी रहती है, अर्थात् देश की दो तिहाई आबादी की सेवा एनडीए सरकार कर रही है। कांग्रेस शासित राज्य की आबादी मात्र 9 प्रतिशत रह गई। कांग्रेस की केवल 6 राज्यों में सरकार है। इन राज्यों में केवल 8.6 प्रतिशत आबादी रहती है। भाजपा के 283 लोकसभा सांसद हैं। राज्य सभा में 56 सांसद हैं। एनडीए के 339 लोकसभा सांसद हैं और राज्यसभा में 74 सांसद हैं। 10 सदस्यों के साथ शुरू हुई भाजपा 12 करोड़ सदस्यों के साथ आज विश्व की सबसे बड़ी पार्टी है। पूरे देश में भाजपा के 1,398 विधायक हैं। अजजा और अजा के सर्वाधिक सांसद भाजपा के हैं। सर्वाधिक महिला सांसद भाजपा की हैं। सर्वाधिक महापौर भाजपा के हैं। सर्वाधिक जिला पंचायत और पार्षद भाजपा के हैं। सर्वाधिक गांव के सरपंच भाजपा के हैं। आने वाले दिनों में एनडीए राष्ट्र की पसंद का राष्ट्रपति चुनने वाला है। विश्व के नामवर नेताओं में एक श्रेष्ठ नाम आता है नरेन्द्र मोदी का। अंग्रेजी में ग्लोबल और हिंदी में वैश्विक नेता का स्थान बनाने में उन्होंने उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की। संगठन और सत्ता के समन्वय का इतिहास रचा जा रहा है। अनुकूलता के इस वर्चस्वशाली माहौल में देश की निगाहें भाजपा की ओर टिकी हुई हैं। कांग्रेस युग की समाप्ति का दौर चल रहा है। भाजपा युग के आगमन का दौर प्रारंभ हो चुका है। इस अनुकूल माहौल में हम सबका दायित्व बढ़ गया है। देश में अधिकारों की बजाय देश के लिए कर्तव्य करने का भाव पैदा हुआ है। तीन साल में भारतीय राजनीति ने अपनी खोई हुई साख को लौटाने की दिशा में एक नहीं, अनेक कदम उठाए हैं। मई 2014 के पहले रोज भ्रष्टाचार की चर्चा सदन में और सड़क पर होती थी, पर गत 3 वर्षों में न देश में, न संसद में, न सड़क पर मोदी सरकार में भ्रष्टाचार का आरोप न लगना यह दर्शाता है कि भारत भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट्र की श्रेणी की ओर अग्रसर हो रहा है। देश न प्रधानमंत्री का है, न भाजपा का। देश भारत के सवा सौ करोड़ आबादी का है और उसकी सेवा का जो सुनहरा मौका मिला है, उस दिशा में भाजपा और भाजपा सरकार का कदम सदैव उठते रहना चाहिए।

लालबत्ती के आतंक से मुक्ति की नई सुबह


डॉ. अरूण जैन
देश में वीवीआईपी कल्चर को खत्म करने के लिए नरेंद्र मोदी कैबिनेट ने ऐतिहासिक निर्णय लिया है। इस फैसले के बाद शान समझी जाने वाली लालबत्ती वाहनों पर लगाने का अधिकार किसी के पास नहीं होगा। इस निर्णय से राजनीति की एक बड़ी विसंगति को न केवल दूर किया जा सकेगा, बल्कि ईमानदारी एवं प्रभावी तरीके से यह निर्णय लागू किया गया तो समाज में व्याप्त लालबत्ती संस्कृति के आतंक से भी जनता को राहत मिलेगी। क्योंकि न केवल कीमती कारों में बल्कि लालबत्ती लगी गाडिय़ों में धौंस जमाते तथाकथित छुटभैये नेता जिस तरह से कहर बनकर जनता को दोयम दर्जा का मानते रहे हैं, उससे मुक्ति मिलेगी और इससे राजनीति में अहंकार, कदाचार एवं रौब−दाब की विडम्बनाओं एवं दुर्बलताओं से मुक्ति का रास्ता साफ होगा। इससे साफ-सुथरी एवं मूल्यों पर आधारित राजनीति को बल मिलेगा। नये भारत में इस तरह के अनुशासित, अहंकारमुक्त, स्वयं को सर्वोपरि मानने की मानसिकता से मुक्त जनप्रतिनिधियों की प्रतिष्ठा अनिवार्य है। अंग्रेजों द्वारा अपनी अलग पहचान बनाये रखने की गरज से ऐसी व्यवस्था लागू की गई थी जिसका आंखें मूंदकर हम स्वतन्त्र भारत में पालन किये जा रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय ने लगातार लालबत्ती संस्कृति पर अंकुश लगाने की जरूरत बताई थी मगर राजनीतिक दल इसे दरकिनार किये जा रहे थे। लाल बत्ती एवं वीआइपी संस्कृति ने जनतांत्रिक और समतावादी मूल्यों को ताक पर ही रख दिया था। हर व्यवस्था में कुछ शीर्ष पदों पर आसीन व्यक्तियों को विशिष्ट अधिकार हासिल होते हैं, इसी के अनुरूप उन्हें विशेष सुविधाएं भी मिली होती हैं, ऐसा होना कोई गलत भी नहीं है। लेकिन गलत तो तब होने लगा जब मंत्रियों और नेताओं का सुरक्षा संबंधी तामझाम बढऩे लगा और लाल बत्ती लगी गाडिय़ों का दायरा भी। बहुत सारे मामलों में सत्ता में होने का फायदा उठा कर नियमों में बदलाव करके गाड़ी पर लाल बत्ती लगाने की छूट बढ़ाई गई। जाहिर है, यह सत्ता के दुरुपयोग का ही एक उदाहरण था। यह भी हुआ कि बहुत सारे वैसे लोग भी लाल बत्ती लगी गाड़ी लेकर घूमने लगे जो इसके लिए कतई अधिकृत नहीं थे। कई तो फर्जी तरीके से लालबत्ती लगाकर गैरकानूनी काम एवं प्रभाव जमाने लगे। जिस अधिकारी या व्यक्ति को लालबत्ती की सुविधा मिली थी, उनके पारिवारजन एवं मित्र आदि इस रौब या वीआईपी होने का दुरुपयोग करने लगे। आम जनता से हटकर एक खास मनोवृत्ति और वीवीआइपी संस्कृति को प्रतिबिंबित करने का जरिया बन गई यह लालबत्ती। अपने रुतबे का प्रदर्शन और सत्ता के गलियारे में पहुंच होने का दिखावा इस तरह सत्ता का अहं अनेक विडम्बनापूर्ण स्थितियों का कारण बनती रही। अपने को अत्यंत विशिष्ट और आम लोगों से ऊपर मानने का दंभ एक ऐसा दंश या नासूर बन गया जो तानाशाही का रूप लेने लगा। जनता को अधिक से अधिक सुविधा एवं अधिकार देने की मूल बात कहीं पृष्ठभूमि में चली गयी और राजनेता कई बार अपने लिये अधिक सुविधाओं एवं अधिकारों से लैस होते गये। राजनीति की इस बड़ी विसंगति एवं गलतफहमी को दूर करने का रास्ता खुला है जो लोकतंत्र के लिये एक नयी सुबह है। क्योंकि राजनीति एवं राजनेताओं में लोगों के विश्वास को कायम करने के लिये इस तरह के कदम जरूरी है। सत्ता का रौब, स्वार्थ सिद्धि और नफा नुकसान का गणित हर वीआईपी पर छाया हुआ है। सोच का मापदण्ड मूल्यों से हटकर निजी हितों पर ठहरता रहा है। यही कारण है राष्ट्रीयता एवं राष्ट्रीय चरित्र निर्माण की बात उठना ही बन्द हो गयी। जिस नैतिकता, सरलता, सादगी, प्रामाणिकता और सत्य आचरण पर हमारी संस्कृति जीती रही, सामाजिक व्यवस्था बनी रही, जीवन व्यवहार चलता रहा वे आज लुप्त हो गये हैं। उस वस्त्र को जो राष्ट्रीय जीवन को ढके हुए था आज हमने उसे तार-तार कर खूंटी पर टांग दिया था। मानो वह हमारे पुरखों की चीज थी, जो अब इतिहास की चीज हो गई। लेकिन अब बदलाव आ रहा है तो संभावनाएं भी उजागर हो रही हैं। लेकिन इस सकारात्मक बदलाव की ओर बढ़ते हुए समाज के कुछ खास तबकों को भी स्वयं को बदलना होगा। राजनेताओं की भांति हमारे देश में पत्रकार, वकील आदि ऐसे वर्ग हैं जो स्वयं को वीआईपी से कम नहीं समझते। ऐसे लोग भी अपनी कारों पर भले ही लालबत्ती न रखते हों, लेकिन प्रेस एवं एडवोकेट बड़े-बड़े शब्दों में लिखवाते हैं और पुलिस हो या आम जनता, उनको दबाने या रौब गांठने की पूरी कोशिश करते हैं। इन लोगों के लिये भी कुछ नियम बनने चाहिए। कई लोग सत्ता एवं सम्पन्नता के एक स्तर तक पहुंचते ही दुर्व्यवहार करने लगते हैं और वहीं से शुरू होता है प्रदर्शन का ज़हर और आतंक। समाज में जितना नुकसान परस्पर स्पर्धा से नहीं होता उतना प्रदर्शन से होता है। प्रदर्शन करने वाले के और जिनके लिए किया जाता है दोनों के मन में जो भाव उत्पन्न होते हैं वे निश्चित ही सौहार्द्रता एवं समता से हमें बहुत दूर ले जाते हैं। अतिभाव और हीन भाव पैदा करते हैं और बीज बो दिये जाते हैं शोषण, कदाचार और सामाजिक अन्याय के। अब यदि आजादी के बाद से चली आ रही लाल बत्ती एवं वीआईवी संस्कृति की इन विसंगतियों एवं विषमताओं को दूर करने की ठानी है तो जनता को शकुन तो मिलेगा ही।  यह फैसला प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर लिया गया है जिन्होंने पिछले दिनों ही भारत यात्रा पर आयीं बंगलादेश की प्रधानमन्त्री शेख हसीना वाजेद का दिल्ली हवाई अड्डे पर बिना किसी तामझाम के पहुंच कर स्वागत किया था। आदर्श सदैव ऊपर से आते हैं। लेकिन शीर्ष पर अब तक इनका अभाव छाया हुआ था, वहां मूल्य बन ही नहीं रहे थे, लेकिन अब शीर्ष पर मूल्य बन रहे हैं और उसी का यह सन्देश जनता के बीच गया है कि प्रधानमन्त्री की गाड़ी भी बिना लालबत्ती के दिल्ली की सड़कों पर यातायात के नियमों का पालन करते हुए निकल सकता है। अत: राज्यों के मुख्यमन्त्रियों को फिर डर किस बात का हो सकता है? लेकिन असली मुद्दा राजनीति में सेवा, सादगी एवं समर्पण के लिये आने वाले लोगों का नहीं बल्कि ऐसे अति विशिष्ट बने व्यक्तियों का है जो राजनीति में आते ही प्रदर्शन, अहंकार एवं रौब गांठने के लिये हैं, ऐसे ही लोग जोड़−तोड़ करके लालबत्ती की गाडिय़ां लेते थे और फिर समाज, प्रशासन व पुलिस में अपना अनुचित प्रभाव जमाते थे। ऐसे लोग तो सड़कों पर आतंक एवं अराजकता का माहौल तक बनाने से बाज नहीं आते थे। इसकी आड़ में असामाजिक तत्व भी ऐसे कारनामे कर जाते थे जिनसे कानून-व्यवस्था की रखवाले पुलिस तक को बाद में दांतों के नीचे अंगुली दबानी पड़ती थी। हूटर बजाते हुए लालबत्ती लगी गाडिय़ां सारे नियम−कानून तोड़ कर आम जनता में दहशत फैलाने का काम करती थीं। जो लोग वास्तव में विशिष्ट व्यक्ति हैं उन्हें लाल बत्ती की जरूरत थी ही नहीं क्योंकि उनका रुतबा किसी प्रकार के दिखावे की मांग नहीं करता है। जैसे ही प्रधानमंत्रीजी ने लालबत्ती संस्कृति पर अंकुश की बात कही, अनेक नेताओं ने अपने हाथों से अपनी कारों की लालबत्ती हटाते हुए फोटो खिचवाएं। इस तरह की कार्रवाई से कहा गया कि वे आम जनता को वीआईपी मानने की तैयारी में दिख रहे हैं, लालबत्ती हो, या अखबार में फोटो छपना, टीवी पर आना हो या स्वयं को किसी मसीहा की तरह दर्शाना हो− यह मानसिकता बदलना इतना आसान नहीं है। मन्दिरों में हो या अन्य जलसों में राजनेता सभी व्यवस्थाओं को ताक पर रखकर लम्बी−लम्बी लाइनों में लगी जनता को ठेंगा दिखाते हुए सबसे आगे पहुंच जाते हैं। क्या नेता हर मौके पर धीरज के साथ अपनी बारी आने का इंतजार कर सकेंगे? बहुत मुश्किल है राजनेताओं को सादगी, संयम, सरलता एवं अहं मुक्ति का पाठ पढ़ाना और उसे उनके जीवन में ढालना। हालत यह है कि जिस दिन लालबत्ती हटाने का फैसला टीवी की सुर्खियों में था, उसी दिन यह खबर भी चल रही थी कि बीजेपी के एक विधायक ने एक टोल बूथ पर खुद को तुरंत आगे न निकलने देने से नाराज होकर एक टोलकर्मी को थप्पड़ मार दिया। कोई टोलकर्मी को तो कोई एयरपोर्ट अधिकारी को थप्पड़ मारकर ही अपने आपको शंहशाह समझ रहा है, इन हालातों में कैसे लालबत्ती एवं वीआईपी की मानसिकता से इन राजनेताओं को मुक्ति दिलाई जा सकती है? यह शोचनीय है। अत्यंत शोचनीय है। खतरे की स्थिति तक शोचनीय है कि आज तथाकथित नेतृत्व दोहरे चरित्र वाला, दोहरे मापदण्ड वाला होता जा रहा है। उसने कई मुखौटे एकत्रित कर रखे हैं और अपनी सुविधा के मुताबिक बदल लेता है। यह भयानक है। उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने ऐसे अनेक साहसिक निर्णय लिये एवं कठोर कदम उठाये हैं और अब केंद्र सरकार ने आगे बढ़कर मोटर वीइकल्स ऐक्ट के नियम 108 (1) और 108 (2) में बदलाव करके लाल बत्ती वाली गाडिय़ों को ट्रैफिक नियमों से छूट देने की व्यवस्था ही खत्म कर दी। लेकिन मोदी एवं योगी से आगे की बात सोचनी होगी। देश में सही फैसलों की अनुगूंज होना शुभ है, लेकिन इनको क्रियान्वित करना भी ज्यादा जरूरी है। वीआईपी कल्चर खत्म करने के नफा−नुकसान का गणित उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना महत्वपूर्ण यह है कि इससे आम लोगों के मन से खास लोगों का खौफ कुछ कम जरूर होगा। एक समतामूलक समाज की संरचना निर्मित करने की दिशा में हम आगे बढ़ेंगे।

एटमी हथियारों से मुक्ति का सपना

डॉ. अरूण जैन
हाल ही में नाभिकीय हथियारों को प्रतिबंधित करने के लिए बाध्यकारी समझौते के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र महासभा के तत्त्वावधान में आयोजित बहुपक्षीय वार्ता जून-जुलाई 2017 तक समझौते का प्रारूप विकसित कर लेने की उम्मीदों के साथ समाप्त हो गई। यह वार्ता संयुक्त राष्ट्र महासभा की प्रथम समिति, जो कि नि:शस्त्रीकरण तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े विषयों को देखती है, के द्वारा पिछले वर्ष अक्तूबर माह में 123-38 के भारी बहुमत से स्वीकृत प्रस्ताव-एल 41 की अगली कड़ी थी। दिसंबर 2016 में महासभा ने भी यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। प्रस्ताव का मुख्य बिंदु यह था कि मार्च 2017 तथा जून-जुलाई 2017 में होने वाली वार्ता में नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध लगाने के लिए एक बाध्यकारी समझौते के निर्माण पर चर्चा की जाएगी, ताकि आगे चलकर इन हथियारों की पूर्णत: समाप्ति का मार्ग प्रशस्त हो सके। जहां भारत, पाकिस्तान, चीन सहित कुल सोलह देशों ने इस प्रस्ताव पर मतदान में भाग नहीं लिया, वहीं प्रस्ताव का समर्थन करने वाले देशों में उत्तर कोरिया भी था। इस पांच दिवसीय वार्ता में सौ से भी अधिक देशों ने भाग लिया और यह संदेश दिया कि आज विश्व के अधिकतर देश नाभिकीय हथियारों से मुक्ति चाहते हैं। पर विडंबना यह है कि वर्तमान में नाभिकीय हथियार निर्माण में सक्षम नौ देशों- एन-5 देशों (नाभिकीय अप्रसार संधि द्वारा नाभिकीय शक्ति संपन्न घोषित पांच देश- संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन) तथा भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया व इजराइल (इजराइल ने अभी तक कोई नाभिकीय परीक्षण नहीं किया है, पर यह माना जाता है कि उसके पास भी नाभिकीय हथियार हैं) में से किसी भी देश ने इस तरह के किसी बाध्यकारी समझौते का स्पष्ट रूप से समर्थन नहीं किया है। हालांकि पिछले वर्ष उत्तर कोरिया ने एल-41 प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था, मगर नाभिकीय नि:शस्त्रीकरण के संबंध में उसकी गंभीरता संदिग्ध है। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका की प्रतिनिधि निक्की हेली ने तो यहां तक कह दिया कि इस प्रकार के समझौते से उत्तर कोरिया जैसे देशों को लाभ मिलेगा और अमेरिका जैसे देशों की स्थिति इससे कमजोर होगी, जिनकी शांति व सुरक्षा के लिए ये हथियार आवश्यक हैं। यहां तक कि नाभिकीय हथियारों का एकमात्र भुक्तभोगी जापान भी यह कह कर समझौते का विरोध कर रहा है कि अमेरिका के नाभिकीय हथियार उसे सुरक्षा प्रदान करते हैं। अमेरिका का कहना है कि एटमी हथियार उसे अवरोधक क्षमता प्रदान करते हैं और इसलिए किसी भी बड़े आक्रमण या नाभिकीय हमले से बचने के लिए इनका होना आवश्यक है। भारत भी अपने आदर्शवाद को तिलांजलि देते हुए यह स्वीकार कर चुका है कि परमाणु हथियार आज की वास्तविकता हैं और इन पर प्रतिबंध का कोई भी प्रयास अमेरिका व रूस जैसे देशों की सहमति के बिना सफल नहीं हो सकता। इसी क्रम में भारत का नाभिकीय सिद्धांत एक न्यूनतम विश्वसनीय अवरोधक स्तर तक नाभिकीय हथियारों के निर्माण का उल्लेख करता है। शीतयुद्ध के दौरान अति प्रचलित हुआ नाभिकीय हथियारों का अवरोधक सिद्धांत इस मान्यता पर आधारित है कि यदि किसी देश के पास नाभिकीय हथियार और पर्याप्त प्रत्युत्तर (सेकंड स्ट्राइक) क्षमता विद्यमान हो, तो पारस्परिक सुनिश्चित विध्वंस की संभावना उसके दुश्मन देश को उस पर नाभिकीय आक्रमण करने से रोकेगी। शीतयुद्ध काल में सोवियत संघ तथा अमेरिका के बीच कोई प्रत्यक्ष युद्ध न होना इसी सिद्धांत की सफलता के उदाहरण के रूप में प्रचारित किया जाता है तथा यह सिद्धांत आज भी नाभिकीय हथियारों को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने का एक प्रमुख तर्क है। वस्तुत; अवरोधक सिद्धांत की आड़ में नाभिकीय हथियार निर्माण क्षमता वाले देश न केवल अपने नाभिकीय हथियारों को बनाए रखते हैं, बल्कि इन हथियारों को समाप्त करने के किसी भी प्रयास को विफल कर देते हैं, जबकि 1968 में हस्ताक्षरित नाभिकीय अप्रसार संधि सभी एन-5 देशों से यह अपेक्षा करती है कि वे नाभिकीय हथियारों की यथाशीघ्र समाप्ति के लिए वार्ता करेंगे। इसके बावजूद आज तक नाभिकीय हथियारों की पूर्णत: समाप्ति के लिए एन-5 की तरफ से कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया है और नि:शस्त्रीकरण की जगह परमाणु हथियार नियंत्रण को प्राथमिकता दी गई है। अमेरिका तथा पूर्व सोवियत संघ के बीच हुई सामरिक अस्त्र परिसीमन संधि (साल्ट), सामरिक अस्त्र न्यूनीकरण संधि (स्टार्ट) जैसी संधियां वस्तुत: अस्त्र नियंत्रण की दिशा में उठाए गए कदम थे। इसके फलस्वरूप हालांकि एन-5 देशों में नाभिकीय हथियारों के भंडार में कुछ कमी अवश्य आई, पर भारत, पाकिस्तान, उत्तर कोरिया जैसे देशों में नाभिकीय हथियारों का प्रसार नहीं रोका जा सका। नाभिकीय हथियारों के इस प्रसार का ही परिणाम है कि आज जहां एक ओर भारत- पाकिस्तान के बीच नाभिकीय हथियारों व प्रक्षेपास्त्रों के निर्माण की होड़ ने दक्षिण एशिया क्षेत्र को 'न्यूक्लियर फ्लैशपॉइंटÓ के रूप में स्थापित किया है, वहीं दूसरी ओर 2003 में नाभिकीय अप्रसार संधि से बाहर आने के बाद उत्तर कोरिया नाभिकीय परीक्षण करता रहा है, जिससे न केवल कोरियाई प्रायद्वीप बल्कि जापान की सुरक्षा पर भी निरंतर खतरा बना हुआ है। इतना ही नहीं, एटमी हथियारों की मौजूदगी ने एटमी आतंकवाद जैसे खतरे की आशंका भी उत्पन्न कर दी है। इस सब के बावजूद अमेरिका और अन्य नाभिकीय शक्ति संपन्न देश अवरोधक-सिद्धांत का बखान करते रहते हैं, जबकि तमाम शोध दर्शाते हैं कि नाभिकीय हथियार हमेशा अवरोधक का कार्य नहीं करते। अवरोधक सिद्धांत के विरोध में कहा जाता है कि यह सिद्धांत किसी देश की सुरक्षा के लिए गारंटी नहीं माना जा सकता। वार्ड एच. विल्सन ने अपनी पुस्तक 'फाइव मिथ्स अबाउट न्यूक्लियर वेपंसÓ में यह दर्शाया है कि इतिहास में कई ऐसे भी उदाहरण रहे हैं, जब नाभिकीय हथियारों की मौजूदगी के बावजूद किसी देश पर आक्रमण हुए हैं या उसे अपने प्रतिद्वंद्वी देश से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ा है। विएतनाम युद्ध में नाभिकीय शक्ति संपन्न अमेरिका को विएतनाम से न केवल कड़ी चुनौती मिली, बल्कि इस युद्ध में अमेरिका की रणनीतिक हार भी हुई। इसी प्रकार 1973 के योम किप्पुर युद्ध में इजराइल के पास नाभिकीय हथियारों की मौजूदगी की संभावना के बावजूद अरब देश उस पर आक्रमण करने से नहीं घबराए। इसके अलावा, तमाम शोध दर्शाते हैं कि नाभिकीय हथियारों के निर्माण के बाद भारत-पाकिस्तान सीमा पर होने वाली हिंसक घटनाओं में पहले की तुलना में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। अत: केवल नाभिकीय हथियारों का निर्माण कर लेना किसी देश को बाहरी आक्रमण या प्रतिद्वंद्वी की हिंसक गतिविधियों से नहीं बचा सकता। जाहिर है, न केवल नाभिकीय हथियार निर्माण सक्षम देशों बल्कि समस्त विश्व की सुरक्षा सुनिश्चित करने का बेहतर विकल्प यह होगा कि विश्व में नि; शस्त्रीकरण आंदोलन को बढ़ावा दिया जाए और नाभिकीय हथियारों को प्रतिबंधित करते हुए उनके पूर्णत: उन्मूलन का प्रयास किया जाए। वस्तुत: नाभिकीय हथियार मुक्त विश्व में ही शांति और स्थायित्व की स्थापना की जा सकती है। और इसीलिए, नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध के लिए होने वाली कोई भी वार्ता- चाहे नाभिकीय हथियार रखने वाले देश उसका हिस्सा बनें या न बने- एक नैतिक बल रखती है। आशा की जानी चाहिए कि जब जून-जुलाई 2017 में वार्ता का अगला दौर आयोजित हो, तब वैश्विक शांति के उद्देश्य को सर्वोपरि मानते हुए सभी देश नाभिकीय हथियारों पर प्रतिबंध के लिए आपसी सहमति बना सकें।