Wednesday, 23 May 2018

सरकार की जवाबदेही जनता के प्रति है लोकसेवकों के प्रति नहीं

अरूण जैन
वैसे तो भारत एक लोकतांत्रिक देश है। अगर परिभाषा की बात की जाए तो यहाँ जनता के द्वारा जनता के लिए और जनता का ही शासन है लेकिन राजस्थान सरकार के एक ताजा अध्यादेश ने लोकतंत्र की इस परिभाषा की धज्जियां उड़ाने की एक असफल कोशिश की। हालांकी जिस प्रकार विधानसभा में बहुमत होने के बावजूद वसुन्धरा सरकार इस अध्यादेश को कानून बनाने में कामयाब नहीं हो सकी, दर्शाता है कि भारत में लोकतंत्र की जड़ें वाकई में बहुत गहरी हैं जो कि एक शुभ संकेत है। लोकतंत्र की इस जीत के लिए न सिर्फ विपक्ष की भूमिका प्रशंसनीय है जिसने सदन में अपेक्षा के अनुरूप काम किया बल्कि हर वो शख्स हर वो संस्था भी बधाई की पात्र है जिसने इसके विरोध में आवाज उठाई और लोकतंत्र के जागरूक प्रहरी का काम किया। राजस्थान सरकार के इस अध्यादेश के द्वारा यह सुनिश्चित किया गया था कि बिना सरकार की अनुमति के किसी भी लोकसेवक के विरुद्ध मुकदमा दायर नहीं किया जा सकेगा साथ ही मीडिया में भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना करने वाले सरकारी कर्मचारियों के नामों का खुलासा करना भी एक दण्डनीय अपराध माना जाएगा। जहाँ अब तक गजेटेड अफसर को ही लोक सेवक माना गया था अब सरकार की ओर से लोक सेवा के दायरे में पंच सरपंच से लेकर विधायक तक को शामिल कर लिया गया है।  इस तरह के आदेश से जहाँ एक तरफ सरकार की ओर से लोक सेवकों (चाहे वो ईमानदार हों या भ्रष्ट) को अभयदान देकर उनके मनोबल को ऊँचा करने का प्रयास किया गया वहीं दूसरी तरफ देश के आम आदमी के मूलभूत अधिकारों और प्रेस की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने का भी प्रयत्न किया गया। भाजपा की सरकार द्वारा इस प्रकार के फैसले ने न सिर्फ विपक्ष को एक ठोस मुद्दा उपलब्ध करा दिया है बल्कि देश की जनता के सामने भी वो स्वयं ही कठघड़े में खड़ी हो गई है। आखिर लोकतंत्र में लोकहित को ताक पर रखकर लोकसेवकों के हितों की रक्षा करने वाले ऐसे कानून का क्या औचित्य है। इस तुगलगी फरमान के बाद राहुल गाँधी ने ट्वीट किया कि हम 2017 में जी रहे हैं 1817 में नहीं। आखिर एक आदमी जब सरकारी दफ्तरों और पुलिस थानों से परेशान हो जाता है तो उसे न्यायालय से ही इंसाफ की एकमात्र आस रहती है लेकिन इस तरह के तानाशाही कानून से तो उसकी यह उम्मीद भी धूमिल हो जाती। इससे भी अधिक खेदजनक विषय यह रहा कि जिस पार्टी की एक राज्य सरकार ने इस प्रकार के अध्यादेश को लागू करने की कोशिश की उस पार्टी की केन्द्रीय सरकार द्वारा इस प्रकार के विधेयक का विरोध करने के बजाय उसका बचाव किया गया। केंद्र सरकार की ओर से केन्द्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और उनके राज्य मंत्री पीपी चौधरी का कहना था कि इस विधेयक का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों का बचाव, नीतिगत निष्क्रियता से बचना और दुर्भावनापूर्ण शिकायतों पर रोक लगाना है। इन शिकायतों की वजह से अधिकारी कर्तव्यों के निर्वहन में परेशानी महसूस कर रहे थे। राजस्थान सरकार द्वारा एक अध्ययन की ओर से बताया गया कि लोकसेवकों के विरुद्ध दायर मामलों में से 73त्न से अधिक झूठे प्रकरणों के होते हैं।  जब देश के प्रधानमंत्री अपने हर भाषण में भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेन्स की बात करते हों, प्रेस की आजादी के सम्मान की बातें करते हों, देश में पारदर्शिता के पक्षधर हों, जवाबदेही के हिमायती हों, और अपनी सरकार को आम आदमी की सरकार कहते हों, तो उन्हीं की सरकार द्वारा ऐसे बेतुके अध्यादेश का समर्थन करना देश के जहन में अपने आप में काफी सवाल खड़े करता है। सत्ता तो शुरू से ही ताकतवर के हाथों का खिलौना रही है शायद इसीलिए आम आदमी को कभी भी सत्ता से नहीं बल्कि न्यायपालिका से न्याय की आस अवश्य रही है। लेकिन जब न्यायपालिका के ही हाथ बाँध दिए जाएं तो?अगर सरकार की नीयत साफ है और वो ईमानदार अफसरों को बचाना चाहती है तो क्यों नहीं वो ऐसा कानून लाती कि सरकार का कोई भी सेवक अगर ईमानदारी से अपने कर्तव्य का निर्वाह नहीं करता है तो उसके खिलाफ बिना डरे शिकायत करें त्वरित कार्यवाही होगी क्योंकि सरकार देश के नागरिकों के प्रति जवाबदेह हैं लोकसेवकों के प्रति नहीं। लोकसेवक अपने नाम के अनुरूप जनता के सेवक बनके काम करने के लिए ही हैं।  लेकिन अगर शिकायत झूठी पाई गई तो शिकायत कर्ता के खिलाफ इस प्रकार कठोर से कठोर कानूनी प्रक्रिया के तहत ऐक्शन लिया जाएगा कि भविष्य में कोई भी किसी लोकसेवक के खिलाफ झूठी शिकायत दर्ज करने की हिम्मत नहीं कर पायेगा। इस प्रकार न सिर्फ झूठी शिकायतों पर अंकुश लगेगा और असली दोषी को सजा मिलेगी बल्कि पूरा इंसाफ भी होगा। इस देश में न्याय की जीत तभी होगी जब हमारी न्याय प्रणाली का मूल यह होगा कि क़ानून की ही आड़ में देश का कोई भी गुनहगार गुनाह करके छूटने न पाए और कोई भी पीडि़त न्याय से वंचित न रहे।

अंजू महेंन्द्रू ने डिप्रेशन को कभी अपने पास फटकने तक नहीं दिया

अरूण जैन
अभिनेत्री अंजू जो करती हैं वो डंके की चोट पर करती हैं। उनका कहना है कि लाख दुखों के बाद भी वह कभी कमजोर नहीं पड़ीं और उन्हें कभी डिप्रेशन नहीं हुआ। पेश है अंजू से हुई बातचीत के कुछ अंश । आपने जीवन में काफी उतार-चढ़ाव देखे हैं। फिर चाहे वे प्यार को लेकर हों या शादी को लेकर। लोग एक-एक करके आपका साथ छोड़ते गए। आपने कैसा महसूस किया?मैंने हमेशा से खुद को ऐसा बनाया कि बाहर लोगों को मेरी परेशानी का आभास न हो। मैंने खुद को जरूरत से ज्यादा मजबूत बनाया है। आज से तीन साल पहले दिवाली के दिन मेरी मां इस दुनिया को अलविदा कह गई और फिर भी मैं नॉर्मल रही। मैंने हमेशा खुद को डिप्रेशन से कोसों दूर रखा क्योंकि मैं जानती हूं कि ए​क बार यदि आप इसमें गए तो बाहर निकलना मुश्किल हो जाएगा। इंडस्ट्री के कई ऐसे लोग हैं, जो मेरे दोस्त हैं और वे डिप्रेशन का शिकार हुए हैं लेकिन उन्हें भी मैंने मजबूत रहने की सलाह दी और मैं हमेशा उनके साथ खड़ी रही हूं। इन दिनों आप 'रिश्तों का चक्रव्यूहÓ में दादी की भूमिका में हैं। क्या आप पर्दे पर दादी का किरदार निभाने के लिए तैयार थीं ?मैंने हमेशा से टीवी को बॉलीवुड से ज्यादा प्यार किया है, इसलिए जब भी टीवी पर काम करने की बात आती है तो मैं तैयार हो जाती हूं। फिर यह शो तो था ही इतना अच्छा कि न कहने का सवाल ही नहीं था। मेरा मानना है कि आपका किरदार दादी का हो या फिर हीरोइन का हो, बस अच्छा होना चाहिए और इसमें तो आपने मेरा किरदार देखा ही होगा, इसलिए मैंने इसे करने के लिए फौरन हां कर दी। अक्सर बॉलीवुड में काम करने वाले कलाकारों को टीवी पर काम करने पर दिक्कत होती है क्योंकि  यहां पर 11 से 12 घंटे तक काम करना पड़ता है तो क्या आपको कभी कोई परेशानी नहीं हुई? जैसा कि मैंने पहले भी आपको कहा कि मुझे बॉलीवुड में काम करना पसंद नहीं है। अब मैं जो भी फिल्में करती हूं, वो आपसी रिश्तों के कारण कर लेती हूं। मुझे टीवी में काम करना पसंद है क्योंकि यहां लोग एक ​परिवार की तरह काम करते हैं। साथ खाना खाते हैं और साथ एक-दूसरे के सुख-दुख बांटते हैं लेकिन बॉलीवुड में सभी एक-दूसरे से बड़ा बनने की जदोजहद में लगे रहते हैं। खासकर यदि आप 'रिश्तों का चक्रव्यूहÓ की बात करें तो यहां पर हमने ऐसा माहौल बनाया है कि कोई बाहर का बंदा भी घर जैसा महसूस करता है। यहां तक कि जानवर भी यहां पर आर्टिस्ट के कमरो में सोए रहते हैं। 

शिवराज सिंह को सताने लगा हार का डर

अरूण जैन
भाजपा के स्टार प्रचारक और सबसे सफल मुख्यमंत्रियों में से एक शिवराज सिंह चौहान एक बार फिर घबराहट का शिकार हो गए हैं। इस बार उन्हे 2019 के विधानसभा चुनाव में संभावित हार का डर सता रहा है या फिर शायद इस बात का कि 19 के चुनाव का चेहरा वो होंगे भी या नहीं। भोपाल में इन दिनों संघ की बैठक चल रही है और सीएम का एक बयान सामने आया है। उन्होंने कहा मैं रहूं या न रहूं, ऐसी व्यवस्था करके जाऊंगा कि बेटियों की पढ़ाई नहीं रुकेगी। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने ड्रीम प्रोजेक्ट लाड़ली लक्ष्मी योजना के 11 साल पूरे होने पर आयोजित एक कार्यक्रम में बोल रहे थे। अक्सर आत्मविश्वास और खुद को चिरस्थाई मुख्यमंत्री मानते हुए धपाधप घोषणाएं करने वाले सीएम शिवराज सिंह ने अपने स्वभाव के विपरीत बयान दिया। बोले - मैं रहूं या न रहूं, ऐसी व्यवस्था करके जाऊंगा कि बेटियों की पढ़ाई नहीं रुकेगी, इसके लिए कानून बनाकर जाऊंगा। इसमें घबराहट कैसी इस तरह के बयान सीएम शिवराज सिंह के मुख से सामान्यत: सुनाई नहीं देते। यह विशेष इसलिए भी हो जाता है कि इन दिनों भोपाल में आरएसएस की बैठक चल रही है। कुछ दिनों पहले अमित शाह भोपाल आए थे। शिवराज सिंह के चेहरे का रंग उस दिन भी उड़ा हुआ था और अब जबकि आरएसएस की बैठक चल रही है तब भी वो असंयमित हो रहे हैं। उनका चेहरा साफ बता रहा है कि उनके दिमाग का एक हिस्सा किसी उधेड़बुन में है। बता दें कि एक गोपनीय रिपोर्ट यह भी आई है कि यदि भाजपा 19 के चुनाव में चेहरा बदल दे या फिर बिना चेहरे के चुनाव लड़े तो कांग्रेस को फिर से 70 पर समेटा जा सकता है। अब जबकि कांग्रेस की ओर से ज्योतिरादित्य सिंधिया लगभग तय हो गए हैं तो श्रीमंत को हराने का आनंद संघ हर हाल में उठाना चाहता है, फिर चाहे इसके लिए मामा को फार्महाउस पर ही क्यों ना भेजना पड़े। व्यापमं के समय भी हुआ था ऐसा ही तनाव व्यापमं घोटाले के समय भी शिवराज सिंह चौहान ऐसे ही तनाव में दिखाई दे रहे थे। उन दिनों तो कई लोगों ने यह मान भी लिया था कि शिवराज सिंह चौहान इस्तीफा देकर चले जाएंगे। हालात विकट थे और सहयोगी कम होते चल रहे थे। तनाव इस कदर बढ़ा कि शिवराज सिंह कुछ नई बीमारियों से भी घिर गए लेकिन चैत का सपूत इतनी आसानी से हार कहां मानने वाला था। एन मौके पर शिवराज सिंह ने बाजी पलटी और अब व्यापमं के भूत से उन्हे क्या किसी को भी डर नहीं लगता। 

शादी के सवाल से अनकंफर्टेबल हो जाते हैं प्रभास

अरूण जैन
बाहुबली बनकर पूरी दुनिया में धूम मचाने वाले साउथ एक्टर प्रभास इन दिनों अपनी अपकमिंग फिल्म साहो के लिए हिंदी सीखने में बिजी हैं। हाल ही में हमने उनसे एक खास बातचीत की जिसमें उन्होंने अपनी शादी, फिल्मी करियर और साहो की को-स्टार श्रद्धा कपूर के बारे में कुछ दिलचस्प बाते बताईं। यहां पढ़े इस बातचीत के कुछ खास किस्से। मैं इसके बारे में कुछ नहीं कहना चाहता। मैं बहुत ही शर्मीला इंसान हूं और अपनी पर्सनल जिंदगी को कभी भी पब्लिक नहीं करना चाहता। मुझसे कई लोग मेरे अफेयर और शादी को लेकर सवाल करते हैं, लेकिन मैं चाहता हूं कि आप लोग मेरे इस फैसले का सम्मान करें, क्योंकि प्यार और शादी जैसे सवालों से मैं असहज हो जाता हूं। मैं एक ऐसे घर से हूं जहां पर कुछ चीजों को पर्सनल रखा जाता है और मैं भी अपनी इन चीजों को पर्सनल रखना चाहता हूं। वैसे भी जब शादी होगी तो किसी से छिपी नहीं रहेगी इतना तो मुझे पता है। आप लोग कैसे भी करके पता लगा ही लेंगे कि प्रभास की शादी हो रही है। आप श्रद्धा कपूर के साथ साहो कर रहे हैं। सुना है श्रद्धा आपको हिंदी भी सिखा रही हैं, क्या ये सच है? हां मैं साहो कर रहा हूं और हमने उस पर काम करना भी शुरू कर दिया है। श्रद्धा से ज्यादा हिंदी सीखने के लिए मुझे मेरे राइटर कहते हैं और मुझे भी लगता है कि अब बिना हिंदी सीखे मेरा काम नहीं चलने वाला है। वैसे मैं आपको बता दूं कि हिंदी के छोटे-छोटे शब्द को मैं समझ जाता हूं और कुछ तो लिख भी लेता हूं। बस आपकी तरह बोल नहीं पाता। मैं जब भी श्रद्धा से मिलता हूं तो लगभग कोशिश करता हूं कि वह हिंदी बोले हालांकि मुझे बुरा न लगे इसलिए वह इंग्लिश बोलती हैं, लेकिन मैं उनसे कहता हूं कि आप हिंदी में मुझसे बात करिए। हां बिल्कुल, बल्कि टीवी को तो लोग सबसे ज्यादा देखते हैं और खासकर सोनी मैक्स पर आने वाली फिल्में तो लोगों को पसंद आती हैं।  रोमांस2-2 पहली बार श्रद्धा के साथ होगा रोमांस सुना है कि आप श्रद्धा को कुछ एक्शन सीन भी सिखा रहे हैं। तो क्या साहो में भी बाहुबली की तरह एक्शन सीन देखने को मिलेंगे? हां साहो भी एक एक्शन फिल्म है, लेकिन अभी श्रद्धा के एक्शन सीन पर हमारी बात नहीं हुई है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में वह कुछ एक्शन सीन करें । उनकी फिल्म बागी में मैंने उन्हें एक्शन करते हुए देखा है तो मुझे उम्मीद है कि उन्हें मुझसे एक्शन सीखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। बाहुबली फिल्म के बाद सारी दुनिया आपको बाहुबली समझती है। क्या आपको भी लगता है कि आप सच के बाहुबली हो गए हैं?नहीं बिल्कुल भी नहीं, मैं सिर्फ फिल्म में बाहुबली था और अब प्रभास हूं। मुझे कभी भी नहीं लगता है कि मैं बाहुबली हूं, क्योंकि मैं जानता हूं वह मेरा एक किरदार था जो अब खत्म हो चुका है। बाहुबली के साथ आपने 5 साल बिताए। तो क्या आज जब उन दिनों को याद करते हैं तो क्या याद आता है? सबसे ज्यादा याद तो मुझे राजमौली आते हैं, क्योंकि फिल्म का सफर भले ही 5 साल का हो लेकिन इस फिल्म के लिए हमने 5 साल से भी ज्यादा समय दिया है। इसके हर एक सीन को जिया है और अब जब फिल्म का प्रीमियर सोनी मैक्स पर हो रहा है तो ऐसे मैं आपके फिल्म के बीच में कई ऐसी चीजें सुनने को मिलेंगी जो आपको हैरान कर देंगी। आपको पता चलेगा कि कैसे हमने एक सीन के शूट करने के लिए 4 से 5 महीने लगाए हैं।

राजा वीरभद्र को फ्री हैंड देने को मजबूर हो गये थे राहुल गांधी

डाॅ. अरूण जैन
हिमाचल में बगावत की मार झेल रही कांग्रेस को आखिरकार राजा की जिद्द के आगे झुकना ही पड़ा है। अगर कहा जाये कि राजहठ के आगे कांग्रेस ने सरेंडर कर दिया है तो भी अतिशयोक्ति नहीं होगी। यह इस तथ्य के बावजूद है कि प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू राहुल गांधी के खासमखास हैं। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह तो सुक्खू को प्रदेश अध्यक्ष पद की कुर्सी से हटाने की मांग पर अड़े थे लेकिन बीच बचाव का रास्ता निकाल लिया गया है। पार्टी के अंदरखाने से छनकर आ रही खबरों पर यकीन करें तो कांग्रेस ने मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह को फ्रीहैंड दे दिया है। इसका मतलब यह कि वे जैसे चाहें पार्टी को व सरकार को चलाएं, उनके किसी भी निर्णय पर पार्टी कोई सवाल नहीं उठाएगी। विधानसभा चुनाव में टिकट देने से लेकर तमाम फैसले उन्हीं की मर्जी से होंगे। इसी के साथ यह भी साफ कर दिया गया है कि राज्य में अगर कांग्रेस दोबारा जीतकर आती है तो मुख्यमंत्री भी वीरभद्र सिंह ही बनेंगे।  इसे बीजेपी के हाथों एक के बाद एक राज्य गंवाती जा रही कांग्रेस की मजबूरी ही कही जाएगी। कांग्रेस से भी अधिक राहुल गांधी की क्योंकि सुक्खू कांग्रेस उपाध्यक्ष के कृपापात्र रहे हैं। इसके अलावा इसे भी नहीं भूलना चाहिए कि राहुल गांधी की आलोचना के जुर्म में कई वरिष्ठ कांग्रेसजनों को बाहर का रास्ता दिखाया जा चुका है। लेकिन शीर्ष नेतृत्व पर तल्ख टिप्पणी करने के बावजूद अगर वीरभद्र सिंह की शर्तें मानने पर कांग्रेस व राहुल गांधी सहमत हुए हैं तो इसमें छिपी उनकी सियासी मजबूरियों को साफ महसूस किया जा सकता है। वैसे कांग्रेस पार्टी यह दलील देकर खुद को तुष्ट कर सकती है कि इस सरेंडर के बावजूद प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू को बलि का बकरा नहीं बनने दिया गया है। वीरभद्र सिंह के लाख चाहने के बावजूद उन्हें नहीं हटाया गया। हालांकि यह अर्द्धसत्य ही है क्योंकि कांग्रेस ने उनके सारे अधिकार मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के यहां गिरवी रख दिये हैं। अब देखना है कि दोबारा सूबे की सत्ता में आने की जद्दोजहद में जुटी कांग्रेस को इससे संजीवनी मिलती है या इसके साइड इफेक्ट उसकी संभावनाओं पर पलीता लगाते हैं। सूत्रों की मानें तो राजा वीरभद्र सिंह के सामने कांग्रेस के इस सरेंडर से सुक्खू समर्थकों में घोर बेचैनी है क्योंकि सुक्खू के नेतृत्व में संगठन की हालत पहले से बहुत बेहतर हुई है। हालांकि कांग्रेस नेतृत्व के इस फैसले के खिलाफ खुलकर बोलने की हिम्मत कोई नहीं कर रहा है।  गौरतलब है कि इस पर्वतीय राज्य में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं लेकिन यहां सत्ताधारी कांग्रेस सत्ताविरोधी लहर के अलावा आपसी बगावत से भी जूझ रही है। गुटबाजी चरम पर है। हद तो यह कि यह गुटबाजी निचले स्तर के बजाय राज्य के शीर्ष नेतृत्व स्तर पर है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष सुखविंदर सिंह सुक्खू के बीच जारी नाक की लड़ाई कांग्रेस की संभावनाओं को और अधिक धूमिल कर रही थी। यहां तक कि राज्य के मुख्यमंत्री व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के बीच जारी रस्साकसी की जद में आलाकमान भी आ गया था।  वीरभद्र सिंह ने सुक्खू को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाने को नाक की लड़ाई बना लिया था और हाईकमान को अल्टीमेटम दे दिया था कि अगर सुक्खू पद पर बने रहे तो वे चुनाव से अलग हो जाएंगे। अपनी मांगें न माने जाने से वे और अधिक उग्र हो गये थे। यही कारण है कि अभी हाल ही में उन्होंने कांग्रेस हाईकमान पर तीखा हमला बोलते हुए कहा था कि पार्टी अपनी पूर्व की नीतियों से श्अलग दिशा की ओर बढ़ रही हैश् और श्मनमाफिक तरीके से चयनश् करने का तरीका इसकी अच्छी संस्कृति का खात्मा कर देगा। वीरभद्र ने कहा था कि पार्टी नेतृत्व के सोचने और कामकाज के तरीके में बदलाव लाने की जरूरत है क्योंकि कांग्रेस कोई श्कारोबारियों की पार्टीश् नहीं है बल्कि यह उन लोगों से संबंधित है जिन्होंने देश की श्आजादीश् के लिये अपना जीवन कुर्बान किया। साथ ही वह श्अपमानित नहीं होते रहेंगेश् और किसी के श्मातहतश् चुनाव में नहीं जाएंगे। किसी से उनका तात्पर्य प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष से था। जाहिर है वीरभद्र को फ्री हैंड देकर कांग्रेस राहत की सांस ले रही है लेकिन डर है कि कहीं यह उसकी खुशफहमी न साबित हो जाए।

कॉमेडी के चक्कर में पसीने छूट जाते हैं ; अक्षय कुमार

डाॅ. अरूण जैन
बॉलीवुड को एक से बढ़कर एक कॉमेडी से भरी सुपरहिट फिल्में देने वाले अक्षय कुमार का कहना है कि उनके लिए कॉमेडी करना आसान नही बल्कि सबसे मुश्किल काम है। पेश है अक्षय कुमार से नीलम कोठारी की बातचीत के अंश। साल में आपकी पांच फिल्मों में तीन फिल्में कॉमेडी की होती हैं तो क्या आपको कॉमेडी करना ज्यादा आसान लगता है?नहीं आसान तो नहीं है। कॉमेडी करना मुझे इसलिए पसंद है, क्योंकि मैं जानता हूं कि हंसी से बढ़कर कोई दवाई नहीं। एक मुस्कराहट बड़े से बड़े दर्द को खत्म कर देती है और वैसे भी आज की दुनिया में हमारे पास दुखी होने के बहाने ज्यादा हैं, ऐसे में यदि आप अपनी कॉमेडी से किसी को हंसा पाएं तो इससे अच्छा क्या होगा। लेकिन मैं बता दूं कि जितना आसान पर्दे पर रोना होता है उतना ही मुश्किल कॉमेडी करना होता है। कई बार तो इतनी बार टेक देने पड़ते हैं कि हीरो और डायरेक्टर दोनों के पसीने छूट जाते हैं। अब अगर मैं तुम्हें बोंलू कि कोई ऐसी बात बोलो जिससे मैं हंस दूं तो क्या तुम बोल सकती हो, लेकिन मैं गांरटी देता हूं कि यदि मैं बोलूं कि मुझे रुला कर दिखाओ तो कैसे भी करके तुम मुझे रुला तो दोगी ही, फिर चाहे कुछ उल्टा—सीधा ही बोल दो। इसलिए बेटा कॉमेडी जितनी आसान दिखती है उतनी होती नहीं है। आप अब द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज में दिखने वाले हैं। यह एक कॉमेडी शो है, ऐसे में फिल्मों और छोटे पर्दे पर की जाने वाली कॉमेडी को किस तरह देखते हैं आप? फिल्मों में हमें पता होता है कि कितने घंटे के लिए करना है, लेकिन शो को आपको आगे खींचना पड़ता है। ऐसे में कई बार कॉमेडी की क्वालिटी खराब हो जाती है और लोग दूसरों की मजाक बनाकर कॉमेडी करने लगते हैं। कई बार वह कॉमेडी पर्सनल भी हो जाती है इसलिए इस बार मैंने कोशिश की है कि हम द ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेंज में ऐसा कुछ नहीं करेंगे जिससे किसी को बुरा लगे। क्या आपने स्क्रिप्ट राइटर को कोई खास निर्देश दिए हैं जिससे वह ध्यान रखें कि किसी पर पर्सनल कमेंट न हो ?अरे मैं कौन होता हूं निर्देश देने वाला। राइटर की बदौलत तो हमारी दुकान चल रही है लेकिन मुझे ऐसा कुछ भी बोलने की कोई जरूरत ही नहीं है, क्योंकि शो का फार्मेट ही ऐसा बना है कि हम खुद की मजाक बनाएंगे दूसरों की नहीं। वैसे भी मेरे हिसाब से कॉमेडियन वही है जो अपनी मजाक बनाए जैसे कि चार्ली चैपलिन। वह अपनी मजाक बनाते थे। हीरोइन उनके गाल पर चांटा मारती थी, लोग उन्हें गिराते थे। तो असली कॉमेडियन वही है जो खुइ के साथ प्रयोग करे न कि दूसरों के साथ। एक तरफ आप हैं जो कभी किसी के लिए कुछ नहीं कहते, वहीं आपकी पत्नी ट्विंकल खन्ना खन्ना अपनी आर्टिकल और टवीट के सहारे काफी कुछ कहती हैं। क्या कभी आपको लगता है कि उन्हें इतना खुलकर नहीं कहना चाहिए?नहीं मुझे ऐसा नहीं लगता। हर किसी का अपना सोचना है और मुझे नहीं लगता कि कभी भी ट्विंकल ने कोई ऐसी बात बोली है जो उन्हें नहीं बोलनी चाहिए। वह हर सही बात के साथ रहती हैं और जहां तक रही मेरी बात तो मुझे लगता है कि मेरी अपनी जिंदगी है और मुझे उसी पर फोकस करना चाहिए। आपकी बेटी नितारा के साथ हाल ही में आपका एक वीडियो काफी वायरल हुआ जिसमें आप उनके कहने पर एक्ट कर रहे थे। तो क्या खाली वक्त में आप नितारा के साथ ऐसे ही समय बिताते हैं? हां , वैसे भी मुझे नितारा के साथ समय कम मिलता है। जब भी मैं बाहर रहता हूं तो सबसे ज्यादा मुझे उसी की याद आती है। आउटडोर शूट पर मैं सबसे ज्यादा बात नितारा से ही करता हूं। आरव अब बड़ा हो गया है, उसका ज्यादा वक्त पढ़ाई और दोस्तों में चला जाता है। इसलिए घर आकर सबसे पहले मैं उससे मिलना चाहता हूं और उसी को खोजता हूं। वह भी सबसे ज्यादा मेरे साथ रहना पसंद करती है। हालांकि बोलने के मामले और आदतों के मामले में वह टीना पर गई है, लेकिन जब बात खेलने और मस्ती की आती है तो डैडी से बेहतर उसके लिए कोई नहीं है। देते हैं।

सत्ता गये तीन साल हुए, भ्रष्टाचार के आरोप कांग्रेस का पीछा नहीं छोड़ रहे

डाॅ. अरूण जैन
भ्रष्टाचार का भूत कांग्रेस का पीछा छोडऩे का नाम ही नहीं ले रहा। विगत तीन वर्षों से केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ खड़ा होने की कोशिश कर रही कांग्रेस को एक के बाद एक भ्रष्टाचार के तगड़े झटके लग रहे हैं। कांग्रेस लाख चाह कर भी अपनी पूर्व की छवि से भ्रष्टाचार के दागों को हटा नहीं पा रही है, बल्कि इस फेहरिस्त में नित नए नाम जुड़ते जा रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री जयंती नटराजन के खिलाफ केंद्रीय जांच ब्यूरो ने भ्रष्टाचार का मामला दर्ज किया है। ब्यूरो ने नटराजन के कई ठिकानों पर छापे मारे। इससे कांग्रेस फिर से आरोपों के कटघरे में हैं। ऐसी हालत में केंद्र सरकार के खिलाफ हमलावर होने की मुद्रा के बजाए कांग्रेस रक्षात्मक स्थिति में है। कांग्रेस आलाकमान से लेकर वरिष्ठ नेताओं को समझ में ही नहीं आ रहा है कि पहले सुप्रीम कोर्ट और अब केंद्र की भाजपा सरकार के उठाए भ्रष्टाचार के मुद्दों पर जवाबी हमला कैसे करें। भ्रष्टाचार के एक मामले की गूंज शांत भी नहीं होती है कि दूसरा सामने आ जाता है। भाजपा ने लोकसभा चुनाव के दौरान नटराजन के भ्रष्टाचार का मामला उठाया था। उस वक्त प्रचार की कमान संभाल रहे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जयंती टैक्स का जिक्र कई बार किया था। केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्री रहते हुए जयंती पर कई परियोजनाओं का अनापत्ति प्रमाण पत्र देने में कुंडली मार कर बैठे रहने के आरोप लगे थे। केंद्र की भाजपा सरकार की भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई से कांग्रेस चकरघिन्नी बनी हुई है। कांग्रेस शासन में हुए कोलगेट, राष्ट्रमंडल खेल और टूजी स्पेक्ट्रम घोटालों की जांच के बाद भाजपा सरकार का मानो मौका मिल गया। नेशनल हेराल्ड मामला हो या आय से अधिक सम्पत्ति का, सबमें कांग्रेस घिरी हुई है।  नेशनल हेराल्ड मामले में सोनिया गांधी और राहुल गांधी उलझे हुए हैं। इससे पहले हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह और अब पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदम्बरम के पुत्र कार्तिक के व्यवसायिक ठिकानों पर आयकर और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई का कांग्रेस पहले ही सामना करना रही है। कार्तिक के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट ने भी कोई राहत देने इंकार कर दिया। सोनिया के दामाद रॉबर्ट वाड्रा और हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा भी फंसे हुए हैं। कांग्रेस की कर्नाटक सरकार के मंत्री डीके शिवकुमार के 64 स्थानों पर छापों में करोड़ों के कालेधन का खुलासा हुआ। गौरतलब है कि शिवकुमार ने गुजरात के राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस विधायकों को होर्स ट्रेडिंग से बचाने के लिए कर्नाटक में ठहराने का इंतजाम किया था। इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ बड़े मामलों का धमाका केंद्र सरकार ऐन चुनावी वक्त पर करे। इससे विपक्षी एकजुटता को तो झटका लगेगा ही प्रमुख विपक्ष कांग्रेस के लिए जवाब देना भारी पड़ जाएगा।  दशकों तक सत्ता में रही कांग्रेस को यह गलतफहमी हो गई कि उसके नेता कानून को ठेंगा दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं। कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यदि गलती से केंद्र में कभी भाजपा सरकार आई भी, तब भी वे अपने काले कारनामों से अभेद्य रहेंगे। इससे पहले केंद्र में रही अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार को लेकर ऐसी सख्ती नहीं दिखाई जैसी की अब मोदी सरकार दिखा रही है। इसी से कांग्रेस की गलतफहमी और बढ़ गई कि राजनीतिक दल एक−दूसरे के खिलाफ सीधे कार्रवाई करने से बचते हैं। हालांकि भाजपा की तरफ से शुरू से दलील यही दी जाती रही है कि राजनीतिक रंजिशवश कार्रवाई नहीं की जा रही है। कानून अपना काम कर रहा है। दरअसल कांग्रेस चुनाव से पहले भाजपा के रथ पर सवार नरेन्द्र मोदी के दृढ़ इरादों को भांप नहीं पाई। इसी गलतफहमी से सत्ता से साफ होने के बाद भी कांग्रेस की लगातार फजीहत हो रही है।  ऐसा भी नहीं है कि भ्रष्टाचार से भाजपा और उसके सहयोगी राजनीतिक दल सौ फीसदी मुक्त हों। शिवसेना हो या अकाली दल या फिर भाजपा शासित कई राज्य, भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे। किन्तु सत्ता में रहते हुए जितनी अंधेरगर्दी कांग्रेस ने मचाई, उसकी तुलना में भाजपा और उसके सहयोगियों पर लगे आरोप कांग्रेसी भ्रष्टाचार के दलदल में खिले कमल पर छींटे मात्र ही रहे। भाजपा चूंकि केंद्र में काबिज ही कांग्रेस के विरूद्ध भ्रष्टाचार का बिगुल फूंक कर हुई थी, इसलिए उसके खिलाफ पूरी तरह कमर कसे हुए है। आश्चर्यजनक बात तो यह है कि केंद्र में भाजपा सरकार के तीन वर्षों में और उससे पहले सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर की गई भ्रष्टाचार विरोधी कार्रवाई पर कांग्रेस सफाई देती ही नजर आई। कांग्रेस ने सत्ता गंवा कर भी होश नहीं संभाला। अपने घर की सफाई के बजाए सारा जोर इसी बात पर लगाया कि भ्रष्टाचार पर हुई कार्रवाई को कैसे गलत ठहराया जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की तरफ से राष्ट्रमंडल, टूजी स्पेक्ट्रम और कोलगेट घोटाले में दिए जांच के आदेश और उनमें कई नेता−अफसरों की गिरफ्तारी से कांग्रेस की कलई खुल गई। देश में 132 सालों से बरगद की तरह जड़ें जमाए कांग्रेस यह भूल गई कि कुछ खराब टहनियों को काटने से पेड़ का कुछ नहीं बिगड़ेगा, बल्कि पूरे पेड़ को सडऩे से बचाया जा सकेगा। इससे जनमानस में उसकी पारदर्शिता बढ़ेगी और भ्रष्टाचार के खिलाफ ढुलमुल रवैया अपनाने के इरादों पर संदेह दूर हो जाएगा। इसके विपरीत कांग्रेस ने प्रारंभ से ही अपने नेताओं पर कार्रवाई का बचाव ही किया। कांग्रेस जनमानस से सहानुभूति बटोरने के लिए केंद्र की भाजपा सरकार पर बदले की भावना से कार्रवाई करने के प्रत्यारोप लगाती रही। लगता यही है कांग्रेस को कानून पर भरोसा नहीं रहा। यदि एकबारगी यह मान भी लिया जाए तो सत्तारुढ़ दल बैरभाव से कार्रवाई कर भी रहा है तो न्याय के दरवाजे बंद नहीं हुए हैं। कांग्रेस अदालत के जरिए बाइज्जत बरी होने का दावा कर सकती है। जांच एजेंसियों के खिलाफ मानहानि का मुकदमा कर सकती है। कांग्रेस को अपने पाक साफ होने पर यदि इतना ही यकीन है तो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं को तब तक पार्टी से बाहर किए जाना चाहिए था, जब तक कि वे अदालत से बरी नहीं हो जाते। कांग्रेस यह भूल गई कि इतना विशालकाय संगठन चंद आरोपी नेताओं से नहीं चल रहा। इनकी कीमत समूची कांग्रेस को भुगतनी पड़ रही है। आरोपियों की पैरवी करने के बजाए बाहर का रास्ता दिखाने से कांग्रेस रास्ते पर आ जाती। कांग्रेस जब तक अपनी गंभीर गलतियों को लेकर प्रायश्चित नहीं करेगी, तब तक फिर से मुख्यधारा में लौटने के मार्ग में भ्रष्टाचार के आरोप आड़े आते रहेंगे।