Wednesday, 23 May 2018

गुजरात चुनाव मोदी की नहीं गुजरात के लोगों की परीक्षा है

अरूण जैन
कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज में नायक अवश्य बन सकता है लेकिन वह नेता तभी बनता है जब उसकी राजनैतिक महत्वाकांक्षा को राजनैतिक सौदेबाजी का समर्थन मिलता है। गुजरात जैसे राज्य के विधानसभा चुनाव इस समय देश भर के लिए सबसे चर्चित और हॉट मुद्दा बने हुए हैं। कहा तो यहाँ तक जा रहा है कि इस बार के गुजरात चुनाव मोदी की अग्नि परीक्षा हैं। लेकिन राहुल गाँधी राज्य में जिस प्रकार, जिग्नेश मेवानी, अल्पेश ठाकुर और हार्दिक पटेल के साथ मिलकर विकास को पागल करार देते हुए जाति आधारित राजनीति करने में लगे हैं उससे  यह कहना गलत नहीं होगा कि असली परीक्षा मोदी की नहीं गुजरात के लोगों की है। आखिर इन जैसे लोगों को नेता कौन बनाता है, राजनैतिक दल या फिर जनता? देश पहले भी ऐसे ही जन आन्दोलनों से लालू और केजरीवाल जैसे नेताओं का निर्माण देख चुका है। इसलिए परीक्षा तो  हर एक गुजराती की है कि वो अपना होने वाला नेता किसे चुनता है विकास के सहारे भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए वोट मांगने वाले को या फिर जाति के आधार पर गुजराती समाज को बाँट कर किसी जिग्नेश, हार्दिक या फिर अल्पेश नाम की बैसाखियों के सहारे वोट मांगने वाले को। परीक्षा गुजरात के उस व्यापारी वर्ग की है कि वो अपना वोट किसे देता है उसे जो पूरे देश में अन्तर्राज्यीय व्यापार और टैक्सेशन की प्रक्रिया को सुगम तथा सरल बनाने की कोशिश और सुधार करते हुए अपने काम के आधार पर वोट मांग रहा है या फिर उसे जिसने अभी तक देश में तो क्या अपने संसदीय क्षेत्र तक में इतने सालों तक कोई काम नहीं किया लेकिन अपने राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी द्वारा किए गए कामों में कमियाँ निकालते हुए समर्थन मांग रहे हैं। परीक्षा तो उस पाटीदार समाज की भी है जिसका एक गौरवशाली अतीत रहा है, जो शुरू से ही मेहनत कश रहा है, जिसने देश को सरदार वल्लभ भाई पटेल, शिक्षा के क्षेत्र में अभूतपूर्व क्रांति लाने वाले माननीय केशवभाई पटेल, लगातार 31 घंटों तक ड्रम बजाकर विश्व रिकॉर्ड बनाने वाली एक 23 वर्षीय युवती सृष्टि पाटीदार और विश्व के मानचित्र पर देश का नाम ऊँचा करने वाली ऐसी ही अनेक विभूतियाँ देकर देश की प्रगति में अपना योगदान दिया है। लेकिन आज वो किसका साथ चुनते हैं, उसका जो उन्हें स्वावलंबी बनाकर आगे लेकर जाना चाहता है या फिर उसका जो उन्हें पिछड़ी जातियों में शामिल करने और आरक्षण के नाम पर एक हिंसक आन्दोलन का आगाज करते हुए कहता है  यह एक सामाजिक आंदोलन है जिसका राजनीति से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन पहले ही चुनावों में पाटीदार समाज के अपने फॉलोवर्स को वोट बैंक से अधिक कुछ नहीं समझते हुए कांग्रेस से हाथ मिलाकर "अपने राजनैतिक कैरियर की शुरुआत करके अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने की कोशिश में लग जाता है। परीक्षा तो गुजरात की जनता की यह भी है कि वह राहुल से इस प्रश्न का जवाब मांगें, कि कांग्रेस के पास ऐसा कौन सा जादुई फार्मूला है जिससे कुछ समय पहले तक अलग अलग विचारधाराओं का नेतृत्व करने वाले हार्दिक, अल्पेश और जिग्नेश तीनों को वो अपने साथ मिलाने की क्षमता रखती है? क्योंकि जहाँ एक तरफ हार्दिक का मुद्दा ओबीसी कोटे में आरक्षण का है वहीं दूसरी तरफ अल्पेश ओबीसी कोटे में किसी दूसरी जाति को आरक्षण देने के खिलाफ हैं। जबकि जिग्नेश दलित उत्पीडऩ रोकने के लिए जिस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं वो उन्हीं जातियों के विरुद्ध है जिनका नेतृत्व हार्दिक और अल्पेश कर रहे हैं। यह तो समय ही बताएगा कि गुजरात का वोटर अपनी इस परीक्षा में कितना विजयी होता है और राजनैतिक स्वार्थों से उपजी इस एकता के पीछे का सच समझ पाता है कि नहीं। क्योंकि आज पूरे देश में जब हर जगह पारदर्शिता का माहौल बन रहा है तो देश को राजनीति में पारदर्शिता का आज भी इंतजार है। आखिर राहुल गांधी और हार्दिक पटेल की बैठकों में इतनी गोपनीयता क्यों बरती गई कि सीसीटीवी फुटेज सामने आने के बावजूद हार्दिक इन मुलाकातों से इनकार करते रहे? जिस गठबन्धन के आधार पर राहुल गुजरात की जनता से वोट मांगने निकले हैं, उस गुजरात की परीक्षा है कि वोट देने से पहले हर गुजराती इस गठबंधन का आधार क्या है इस प्रश्न का उत्तर राहुल से जरूर पूछे।  कांग्रेस के लिए यह बेहतर होता कि जिस प्रकार मोदी गुजरात के लोगों से बुलेट ट्रेन, सरदार सरोवर डैम, आईआईटी के नए कैम्पस, रो रो फेरी सर्विस जैसे कामों के आधार पर वोट मांग रहे हैं वह भी अपने द्वारा किए गए कार्यों के आधार पर वोट माँगती लेकिन उसके पास तो जीएसटी और नोटबंदी की कमियों को गिनाने के अलावा कोई भी न तो मुद्दा है और न ही कोई भविष्य की योजना। अपनी इस कमी को जातियों और आरक्षण के पीछे छिपाने की रणनीति अपना कर राहुल और कांग्रेस दोनों ही गुजरात को कहीं बिहार समझने की भूल तो नहीं कर रहे? जहाँ बिहार को नेताओं के स्वार्थ ने जातिगत राजनीति से कभी भी उठने नहीं दिया, वहाँ गुजरात के लोगों को मोदी ने 2001 से लगातार जातियों को परे कर विकास के मुद्दे पर एक रखा। रही बात एंटी इन्कमबेन्सी फैक्टर की, तो यह फैक्टर वहीं काम करता है जहाँ लोगों के पास विकल्प उपलब्ध हो लेकिन आज गुजरात तो क्या पूरे देश में मोदी का कोई विकल्प नहीं है क्योंकि किसी समय देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी रही कांग्रेस के राहुल गांधी तो 'अपने जवाबों के सवालÓ में ही उलझे हैं। और शायद गुजरात की जनता भी इस बात को जानती है कि असली परीक्षा उनकी ही है क्योंकि आने वाले समय में उनके द्वारा दिया गया जवाब केवल गुजरात ही नहीं बल्कि 2019 में देश का भविष्य तय करने में भी निर्णायक सिद्ध होंगे।

काम तो बहुत किया पर इस बार आसान नहीं शिवराज की राह

अरूण जैन
2018 में मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों का समय जैसे जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे वैसे प्रदेश में राजनैतिक हलचल भी तेज होती जा रही है। वैसे तो प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी बीते 14 सालों से सत्ता में है लेकिन शिवराज शासन की अगर बात की जाए तो विगत 12 वर्षों से प्रदेश की बागडोर उनके हाथों में है। इन बारह सालों में शिवराज सिंह सरकार के नाम कई उपलब्धियाँ रहीं तो कुछ दाग भी उसके दामन पर लगे। अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो उनकी सबसे बड़ी सफलता मप्र के माथे से बीमारू राज्य का तमगा हटाना रहा। बिजली उत्पादन के क्षेत्र में आज मप्र सरप्लस स्टेट में शामिल है, यहाँ 15500 मेगावाट बिजली की उपलब्धता है जबकि मांग सामान्यत: 6000 मेगावाट और रबी सीजन में अधिकतम 10000 मेगावाट रहती है। अटल ज्योति योजना के अन्तर्गत 24 घंटे बिजली देना एक महत्वपूर्ण कदम रहा। हालांकि बिजली आपूर्ति के इन्फ्रास्टकचर का विकास हुआ है लेकिन देश के बाकी राज्यों के मुकाबले यह सबसे अधिक बिजली टैरिफ वाले राज्यों में शामिल है।  पर्यटन क्षेत्र 'हिन्दुस्तान का दिल देखोÓ  सड़कों की अगर बात की जाए तो गाँवों तक पहुँच आसान हो गई है।  पर्यटन के क्षेत्र में 'हिन्दुस्तान का दिल देखोÓ ऐड कैम्पेन से मप्र ने देश में उत्कृष्ट स्थान हासिल किया, इसके लिए 2008 में यूएस द्वारा मप्र को पर्यटन के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ राज्य घोषित किया गया और वर्ष 2015 में छह राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते।  कृषि क्षेत्र लगातार चार बार कृषि कर्मण अवार्ड जीतने वाला देश का पहला राज्य बना, 108 एम्बुलेंस, जननी योजना, लाडली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, शिवराज सरकार की वो उपलब्धियाँ हैं जिन पर बेशक सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है।  निवेश क्षेत्र यह सत्य है कि विभिन्न क्षेत्रों में आशातीत निवेश नहीं हुआ है लेकिन यह भी नहीं है कि निवेश हुआ ही नहीं है। निवेश क्षेत्र– आईटी, औटॉमोबाईल, रक्षा, इनर्जी, फार्मास्यूटिकल, टैक्सटाईल, पर्यटन में सिंगल विंडो के माध्यम से तीव्रगति से एक महीने के अंदर सरकारी प्रक्रिया पूरी की जा रही है। औद्योगिक लैंड बैंक की व्यवस्था भी सिर्फ मध्य प्रदेश में ही है।  मोर्चों पर चूक कई मोर्चों पर मुख्यमंत्री से चूक भी हुई वरना 2015 में भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले रतलाम और झाबुआ लोकसभा सीट उप चुनाव के लिए बतौर सीएम रहते हुए दर्जन भर सभाएँ, 15 मंत्रियों, 16 सांसदों, 60 विधायकों के साथ चुनाव प्रचार एवं 1500 करोड़ की घोषणाओं के बावजूद शिवराज की झोली में हार क्यों आई? देवास में जीत का अन्तर भी चेहरे पर खुशी लाने वाला नहीं माथे पर बल लाने वाला रहा। हालात की अगर समीक्षा की जाए तो भले ही सरकार अपनी उपलब्धियों को आज अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापनों से राज्य में तरक्की का श्रेय ले रही हो लेकिन धरातल पर शिवराज सरकार की लोकप्रियता में निश्चित ही कमी आई है। आत्मघाती मुद्दे- व्यापमं, किसान आंदोलन और ह्त्यायें व्यापमं घोटाला भ्रष्टाचार की सारे हदें पार कर गया क्योंकि सैंकड़ों छात्रों और गवाहों की मौत का कलंक दामन से मिट नहीं सकता है, इतना ही नहीं किसान आंदोलन में किसानों पर गोली चलाना एक बहुत ही गलत कदम रहा। दरअसल यह सरकार के अति-आत्मविश्वास एवं प्रशासन तंत्र द्वारा गलत फीडबैक का नतीजा रहा। स्वयं को किसान का बेटा कहने वाले शिवराज के 13 वर्षों के शासन में, खुद मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में जारी आंकड़ों के अनुसार 15129 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि राज्य में चार सालों में कृषि विकास दर 20त्न बढ़ी है तो दूसरी तरफ उसके पास इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है कि प्रदेश का किसान असंतुष्ट क्यों है ? कभी प्याज तो कभी टमाटर सड़क पर फेंकने के लिए मजबूर क्यों है किसान ? कैग की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषि की खेती के सामान खरीदी में प्रदेश में 261 करोड़ रुपए की धांधली हुई है। स्वास्थ्य सेवाओं की बात की जाए तो उनमें भी गिरावट आई है। शिशु-मृत्यु दर और कुपोषण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में ढेर सारे इंजीनियरिंग कॉलेज खोले जाने के बावजूद उनमें से न तो अच्छे इंजीनियर निकल रहे हैं न ही इन कालेजों से निकलने वाले युवाओं को नौकरी मिल पा रही है जिसके कारण बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है। प्रदेश में अवैध खनन ने भी सरकार की साख ही नहीं राज्य के राजस्व पर भी गहरा वार किया है। अगर सरकार की नाकामयाबियों के कारणों को टटोला जाए तो बात प्रदेश की नौकरशाही पर आकर रुक जाती है। आरएसएस की बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय तक ने नौकरशाही के हावी होने का मुद्दा उठाया था। प्रदेश की बेलगाम और भ्रष्टाचार में डूबी ब्यूरोक्रेसी के कारण प्रदेश में न तो गुड गवर्नेंस हो पा रही है न ही सरकार द्वारा घोषित योजनाओं का क्रियान्वयन हो पा रहा है। आंतरिक कलह से भी चौहान के रास्ते में कांटे तो देखना दिलचस्प होगा कि जिस भाजपा सरकार को प्रदेश की जनता ने लगातार तीन बार सिर आँखों पर बैठाया वो शिवराज के प्रशासन और नौकरशाहों पर उनकी ढीली होती पकड़ के कारण विपक्ष में बैठने का आदेश सुनाएगी या फिर काँग्रेस की आपसी फूट एवं किसी और बेहतर विकल्प के अभाव में भाजपा को एक मौका और देगी।

बिना मेकअप के नजर आईं करीना कपूर

अरूण जैन
बॉलीवुड की हॉट मॉम करीना कपूर बहुत जल्द फिल्मों में कमबैक करने जा रही हैं। फिल्म वीरे दी वेडिंग से करीना फिर से पर्दे पर लोगों को एंटरटेन करती नजर आएंगी। पिछले कई महीनों से फिल्म की शूटिंग रूकी हुई थी, लेकिन अब करीना फॉर्म में आ गई हैं और फिल्म की शूटिंग के सिलसिले में दिल्ली में हैं। करीना फिल्म को लेकर काफी एक्साइटेड हैं, जो कि आप वायरल हो रही इस वीडियो को देखकर खुद ही समझ जाएंगे। इस वीडियो में करीना बिना मेकअप के दिख रही हैं। फिल्म वीरे दी वेडिंग की प्रोड्यूसर रिया कपूर भी इस वीडियो में नजर आ रही हैं। रिया कपूर ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर यह वीडियो अपलोड किया है, जिसमें वह मेकअप रूम में हैं और साथ ही मेकअप आर्टिस्ट उनका मेकअप कर रहे हैं। वीडियो में करीना खुद बोल रही हैं कि वह फिल्म को लेकर काफी एक्साइटिड हैं। करीना जितनी खूबसूरत स्क्रीन पर दिखती हैं उससे कहीं ज्यादा वह इस वीडियो में लग रही हैं। बता दें फिल्म की ज्यादातर शूटिंग दिल्ली में ही हो रही है। इसके बाद की शूटिंग के लिए टीम बैंकाक जाएगी। कुछ दिनों पहले खबरें आ रही थी कि फिल्म में छोटे नवाब तैमूर अली खान का भी छोटा-सा रोल है, लेकिन अब इन खबरों को गलत बताया जा रहा है। बता दें कि फिल्म की शूटिंग के लिए करीना अकेली दिल्ली नहीं आई थी, बल्कि उनके साथ छोटे नवाब तैमूर भी थे। 

डोकलाम विवाद के कूटनीतिक हल से मोदी का वैश्विक कद बढ़ा

अरूण जैन

भूटान के दावे वाले डोकलाम में भारत और चीन की सेनाओं के बीच जारी तनातनी जिस तरह खत्म हुई वह भारतीय कूटनीति की एक बड़ी कामयाबी है। इससे न केवल भारत का अंतरराष्ट्रीय कद बढ़ेगा, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि एक साहसी लेकिन अहिंसक नेता के रूप में सामने आयेगी। उन्होंने अपने निर्णयों से यह सिद्ध किया है कि वे भारतीय हितों की रक्षा के लिए किसी भी चुनौती का सामना करने में सक्षम हैं। वे दोस्ती, विश्व शांति एवं सह-अस्तित्व भावना को लेकर ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भाग लेने चीन जा रहे हैं, निश्चित ही व्यापारिक हितों के साथ-साथ राजनैतिक संबंधों में प्रगाढ़ता आयेगी। डोकलाम में भारत व चीन की सेनाओं के बीच बढ़ते तनाव को शांत करने में सफलता मिलने का अर्थ है कि युद्ध की आशंकाओं पर विराम लगना। इस स्थिति का बनना दोनों ही राष्ट्रों के लिये शुभ एवं श्रेयस्कर है। डोकलाम विवाद की छाया जहां चीन के लिए हर लिहाज से नुकसानदेह थी, वहीं भारत भी बिना वजह युद्ध नहीं चाहता। जो भी हो, इस फैसले से दोनों मुल्कों की जनता को राहत मिली है। दो परमाणु शक्ति संपन्न ताकतवर पड़ोसियों के बीच इस तरह तनाव बने रहना खुद में एक असाधारण और अति-संवेदनशील मामला था। यह दुनिया की एक बड़ी आबादी को हर समय विनाश की संभावनाओं पर कायम रखने जैसा था। ऐसे युद्ध का होना विजेता एवं विजित दोनों ही राष्ट्रों को सदियों तक पीछे धकेल देता, इससे भौतिक हानि के अतिरिक्त मानवता के अपाहिज और विकलांग होने का भी बड़ा कारण बनता।  डोकलाम में शांति का उजाला हुआ है, अभय का वातावरण, शुभ की कामना और मंगल का फैलाव कर दोनों ही देशों को विकास के समुचित अवसर और साधन की संभावना दी है। मनुष्य के भयभीत मन को युद्ध की विभीषिका से मुक्ति दी है। स्वयं अभय बनकर विश्व को निर्भय बनाया है। निश्चय ही यह किसी एक देश या दूसरे देश की जीत नहीं बल्कि समूची मानव-जाति की जीत हुई है। लगभग तीन महीने से चला आ रहा गतिरोध समाप्त हो गया है। इस अवधि में चीन ने न केवल भारत बल्कि विश्व को तनाव और त्रास का वातावरण दिया, अनिश्चय और असमंजस की विकट स्थिति दी। यह समय की नजाकत को देखते हुए जरूरी था और इस जरूरत को महसूस करते हुए दोनों देश डोकलाम से अपनी-अपनी सेनाएं हटाने के लिए तैयार हो गए हैं।  अब तक चीन कह रहा था कि भारत डोकलाम से पहले अपनी सेना हटा ले, उसके बाद ही कोई बातचीत होगी। भारत का कहना था कि दोनों देश एक साथ अपनी सेना वापस बुलाएं, उसके बाद वार्ता संभव है। चीन ने आखिरकार भारत की यह बात मान ली है। मामला तब शुरू हुआ जब भारत ने डोकलाम में चीन की सड़क बनाने की कोशिश का विरोध किया। जबकि चीन सड़क बनाने की जिद पर अड़ा हुआ था और कह रहा था कि उसे अपनी सीमा में निर्माण कार्य करने से कोई नहीं रोक सकता, जबकि भूटान का कहना था कि डोकलाम पठार उसके नियंत्रण में है और कानूनी तौर पर उसी का कब्जा है, जबकि चीन दावा कर रहा था कि यह उस चुम्बी घाटी का हिस्सा है जो उसके कब्जे में है। इसके साथ ही चीन यह भी स्वीकार कर रहा था कि डोकलाम विवाद को सुलझाने के लिए उसके और भूटान के बीच वार्ता तंत्र स्थापित है इसके बावजूद उसने अपनी सेना को बुलडोजरों के साथ डोकलाम पठार पर निर्माण कार्य करने के आदेश दे दिये थे।  भारत और भूटान के बीच 1949 से चली आ रही विशेष संधि के तहत उसकी राष्ट्रीय सीमाओं की रक्षा की जिम्मेदारी भारतीय सेनाओं की ही बनती है जिसको लेकर भूटान ने भारत से गुहार लगाई और भारत ने अपने दायित्व का निर्वाह करते हुए अपनी सेनाओं को इलाके की निगरानी में लगा दिया। इसके साथ ही भारत ने चीन को चेताया कि डोकलाम में सड़क बनाने से उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा को भी भारी खतरा पैदा हो सकता है, क्योंकि प. बंगाल के दार्जिलिंग से उत्तर-पूर्वी राज्यों को जोडऩे वाली संकरी सड़क चीन द्वारा बनाई जा रही सड़क से कुछ ही किमी दूरी पर रह जाएगी। इस आपत्ति पर चीन भड़क गया, उसने चीनी मीडिया के माध्यम से भारत को युद्ध की धमकी तक दी। लेकिन भारत ने अपना धैर्य नहीं खोया, संयम रखा और इस समस्या का कूटनीतिक हल तलाशना जारी रखा। सच यही है कि भारत जो चाहता था उसे मानने के लिए चीन राजी होना पड़ा। यह चीन का अहंकार एवं अंधापन ही है कि वह पहले दिन से ही ऐसे व्यवहार कर रहा था जैसे भारत उसके समक्ष कुछ भी नहीं। यथार्थ यह है कि अंधकार प्रकाश की ओर चलता है, पर अंधापन मृत्यु-विनाश की ओर। लेकिन भारत ने अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य का अहसास करा दिया।  वैसे भी अगले महीने चीन में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ब्रिक्स देश जिनमें भारत, रूस, ब्राजील, चीन, दक्षिण अफ्रीका संगठन की शीर्ष बैठक में हिस्सा लेने चीन जा रहे हैं। इस संगठन में ये केवल पांच देश ही हैं और इनके आपसी सहयोग से दुनिया में समानान्तर शक्तिशाली ध्रुव तैयार हो सकता है। ये पांचों ही देश विश्व की तेजी से विकास करती अर्थव्यवस्था वाले देश हैं। इन पांचों में से दो देशों की बीच यदि विवादों का स्तर सैनिक समाधान की हद तक पहुंचता है तो इस संगठन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़ा किया जा सकता है। इस दृष्टि से भी चीन का डोकलाम से सेना हटाने या उसकी तैनाती में संशोधन का  स्वीकार करने को बाध्य होना पड़ा। कूटनीतिक रूप से कमजोर पाले में होने की वजह से भी उसे इस तरह समझौते के लिये विवश होना पड़ा। चीन पर भारत के साथ शान्तिपूर्ण संबंध बनाये रखने की ऐतिहासिक जिम्मेदारी भी है, क्योंकि 1962 में जब उसने अपनी सेनाएं हमारे असम के तेजपुर तक में भेज दी थीं तब भी अंतर्राष्ट्रीय दबाव में पीछे हटना पड़ा था। कूटनीतिक मोर्चे पर यह कोई छोटी घटना नहीं थी बावजूद इसके कि भारत युद्ध में बुरी तरह हार गया था।  चीन का यह अहंकार ही है कि वह भारत को बार-बार कमजोर समझने की भूल करता है। बुरा आदमी और बुरा हो जाता है जब वह साधु बनने का स्वांग रचता है। चीन ऐसा ही महसूस कराता रहा है। यह उसका अहंकार ही है कि शांति की बात करते हुए अशांति की दिशा में बढ़ता है। चीन को मजबूरन यह फैसला लेना पड़ा क्योंकि मौजूदा हालात उसके पक्ष में नहीं हैं। वह एक साथ कई मोर्चों पर उलझा हुआ है। दक्षिणी चीन सागर को लेकर अमेरिका से उसका तनाव बहुत बढ़ गया है। ऐसे में भारत से तनाव जारी रखना उसके लिए घाटे का सौदा हो सकता था। उसके व्यापारिक और निवेश हित भारत के साथ काफी गहरे हो चुके हैं। इस मोर्चे पर होने वाला कोई भी नुकसान चीनी अर्थव्यवस्था के लिए समस्या पैदा कर सकता था। सबसे बुनियादी वजह यह है कि एक से एक विनाशकारी हथियारों की मौजूदगी के कारण युद्ध अव्यावहारिक हो गए हैं, भले सामरिक रणनीति का खेल चलता रहता हो। दूसरे, चीन को धीरे-धीरे लगने लगा था कि दबाव बनाने की रणनीति और डराने-धमकाने की भाषा नहीं चलेगी। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसके खिलाफ है और अमेरिका समेत तमाम देश डोकलाम गतिरोध दूर होने का इंतजार कर रहे हैं। भारत और चीन आज हजारों मजबूत धागों से एक-दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। दोनों के बीच का सीमा विवाद भी ऐसा नहीं है कि रोजमर्रा का जीवन उससे प्रभावित होता हो या उस पर दोनों देशों का बहुत कुछ दांव पर लगा हो। यह ऐसा मसला है जिस पर शांति और सौहार्द के माहौल में बात होती रह सकती है। सामरिक दृष्टि से चाक-चौबंद रहने का हक भारत और चीन दोनों को है, लेकिन जिम्मेदार राष्ट्र होने के नाते दोनों के ऊपर क्षेत्र में अमन-चैन बनाए रखने की जवाबदेही भी है। भारत ने चीन पर जो कूटनीतिक जीत हासिल की उसका संदेश उसकी चौधराहट से परेशान उसके पड़ोसी देशों के साथ-साथ समूची विश्व बिरादरी को भी जाएगा। चीन ने जिस तरह अपना चेहरा बचाते हुए अपने कदम पीछे खींचे उसका एक मनोवैज्ञानिक लाभ यह भी होगा कि भारत की आम जनता युद्ध की कड़वी यादों को भूल कर आत्मविश्वास से लैस होगी। इस सबके बावजूद चीन से सतर्क रहने में ही समझदारी है। क्योंकि जब तक चीन के अहंकार का विसर्जन नहीं होता तब तक युद्ध की संभावनाएं मैदानों में, समुद्रों में, आकाश में भले ही बन्द हो जायें, दिमागों में बन्द नहीं होती। इसलिये आवश्यकता इस बात की भी है कि कि जंग अब विश्व में नहीं, हथियारों में लगे। मंगल कामना है कि अब मनुष्य यंत्र के बल पर नहीं, भावना, विकास और प्रेम के बल पर जीए और जीते।

जॉइन्ट फैमिली क्या होती है, हमारे साथ रहकर देखें ; संजय कपूर

अरूण जैन
एक ओर जहां सभी छोटे परिवार खुशहाल परिवार की बात करते हैं। वहीं, संजय कपूर कहते हैं कि उनका पूरा कपूर परिवार आज भी जॉइन्ट फैमिली में रहता है और उससे अच्छा कुछ नहीं होता। पेश है उनसे हुई बातचीत के कुछ खास अंश। इस फेस्टिव सीजन में आप अपने शो इश्क गुनाह का प्रमोशन कर रहे हैं। ऐसे में दिवाली की तैयारी कैसे हो रही है?हां, इस दिवाली मैं और मेरी पूरी टीम इश्क गुनाह का प्रमोशन कर रहे हैं लेकिन आपको इस बार भी हमारे घर की दिवाली वैसे ही दिखेगी जैसे कि हमेशा होती है। जॉइन्ट परिवार के साथ यही तो मजा है कि अगर आप व्यस्त भी हों तो बाकी घर के लोग आपके हिस्से का काम कर लेते हैं। हमारे घर का उसूल है कि हम हमेशा दिवाली अपनी मां के घर पर मनाते हैं और इस बार भी वहीं करेंगे। हम सभी भाई और बच्चे वहां पर मिलते हैं और खुलकर एंजॉय करते हैं। अगर आपको जॉइन्ट फैमिली देखनी है, कैसी होती है तो एक बार हमारे घर में आकर देखें। सभी के साथ लगता है कि ये पल कभी खत्म ही न हों। आप सालों बाद इश्क गुनाह से फिर टीवी पर वापसी कर रहे हैं। क्या इस शो को करने की कोई खास वजह है? जब मेरे पास शो का ऑफर आया तो मुझे यह काफी दिलचस्प लगा। एक कलाकार के तौर पर भले ही टीवी हो या फिर कोई फिल्म आपको बस कहानी और आपका किरदार पसंद आना चाहिए। मुझे भी कहानी और अपने कैरेक्टर से प्यार हो गया। इस शो में मेरे अलावा कई जाने-माने कलाकार काम कर रहे हैं, जिनमें निकी वालिया और स्मृति हैं। यह टीवी के बाकी धारावाहिकों से अलग है और दर्शकों को भी इस शो में हमारा काम पसंद आएगा। हमारे इस शो को फिल्ममेकर विक्रम भट्ट प्रोड्यूस कर रहे हैं। कपूर परिवार में हमेशा लोग एक-दूसरे के काम को सपोर्ट करते हैं तो आपके शो को लेकर परिवार में क्या प्रतिक्रिया है? अभी तक तो सभी ने अच्छी प्रतिक्रिया दी है। हर कोई मेरे किरदार को लेकर काफी उत्साहित है। हम सभी अपना काम करते हैं, फिर चाहे वह अनिल हो या फिर कोई भी। हम एक-दूसरे की पूरी मदद करते हैं और दुआ करते हैं कि हमारा हर काम सफल हो। मेरे लिए भी सभी की यही मनोकामना है। इन दिनों शाहरुख से लेकर सलमान और अक्षय भी टीवी पर काम कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि अब ट्रेंड बदल रहा है? मुझे ऐसा लगता है कि मीडिया को अब दिखने लगा है कि बड़े स्टार भी टीवी पर काम कर रहे है, जबकि बॉलीवुड के महानायक अमिताभ तो कई सालों से टीवी शो होस्ट कर रहे हैं। सलमान भी कई सालों से शो कर रहे हैं। वैसे भी एक कलाकार को प्लेटफॉर्म से कहीं ज्यादा इस बात की चिंता होती है कि वह क्या काम कर रहा है।

तीन बड़े अखबार लाखों-करोड़ों की स्कीम चलाकर पेपर बेचने की होड़ में जुटे

अरूण जैन
अखबारों की गिरती साख ने अखबारों तथा पत्रकारों को किस हद तक पहुंचा दिया है इसकी बानगी है अखबारों में पाठकों के लिए चलाई जा रही लाखों की स्कीम। खुद के नंबर वन होने का दावा करने वाले तीन प्रमुख अखबारों से जनहित के मुद्दे नदारद हैं। इससे प्रमुख बड़े अखबार लगातार जनता का विश्वास खोते जा रहे हैं। लोगों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए तीनों ही अखबारों में लाखों-करोड़ों की योजनाएं चलाकर अखबार बेचने की होड़ मची हुई है। सबसे पहले दैनिक जागरण ने स्कीम लांच की तथा पाठकों को कूपन चिपकाकर लकी ड्रा में षामिल होने का निमंत्रण दिया। दैनिक जागरण ने अपनी स्कीम लांच करने में षहरों में ढोल नगाड़ों के साथ रैली तक निकाली। इस कार्य में जागरण के प्रसार सहित संपादकीय व विज्ञापन के प्रतिनिधियों को बाजार में झोंका गया। अमर उजाला तथा हिंदुस्तान अखबार ने भी पाठकों के लिए स्कीम चलाकर अखबार बेचने का नायाब तरीका खोजा है। दरअसल यह मीडिया तथा अखबारों के गिरावट का दौर है। कारपोरेट का दबाव अखबारों तथा इलेंक्ट्रानिक मीडिया पर साफ दिख रहा है। जनहित के मुद्दे जब मीडिया से गायब होंगे तो लोगों की दिलचस्पी बढ़ाने के लिए इसी तरह की योजनाओं को बाजार में झोंकना पड़ेगा। दरअसल अखबार एक प्रोडक्ट हो गया है तथा पाठक महज एक ग्राहक बनकर रह गया है। जिसे अखबार के मालिकान अपना प्रोडक्ट बेच रहे हैं। इस बेरहम बाजार में पाठक को कंटेंट से आकर्शित करने अथवा जोड़े रखने की बजाय लाखों करोड़ों की योजनाओं से लुभाया जा रहा है। इन आकर्षक योजनाओं के बीच पाठक की हालत यह है कि वह कंटेंट की तुलना करने की बजाय तीनों अखबारों की योजनाओं की आपस में तुलना करते हुए बड़े ईनाम का इंतजार कर रहा है।

अच्छा तो इसलिए वत्सल सेठ को छोड़कर भाग जाती हैं लड़कियां

अरूण जैन
फिल्मों और टीवी में काम कर चुके वत्सल सेठ भले ही पर्दे पर दिलफेंक किरदार निभाते हों लेकिन असल जिंदगी में लड़कियों के सामने उनकी जुबान तक नहीं खुलती और इसी वजह से लड़कियां उन्हें छोड़कर भाग जाती हैं। पेश है वत्सल से की गई बातचीत के कुछ अंश। अब आप 'हासिलÓ में लीड भूमिका निभाने वाले हैं। शो के प्रोमो को देख लग रहा है कि इसमें भी आप पिछले शो की तरह विरोधी की भूमिका में हैं?नही, हासिल में ऐसा कुछ भी नहीं है। इसमें मैं एक ऐसे लड़के का किरदार निभा रहा हूं, जो बिना सोचे-समझे कुछ भी कर देता है। भले ही उससे किसी को कुछ भी नुकसान क्यों न हो। अममून लोग कोई काम करने से पहले सोचते हैं लेकिन वह करने के बाद सोचता है और फिर उसके बाद उसके पास पछताने के अलावा और कुछ नहीं बचता। पिछले दिनों आपके और इशिता के अफेयर के बारे में सुनने को मिल रहा था। इसमें कितनी सच्चाई है ?इसमें कुछ भी सच्चाई नहीं है। वह मेरे शो में मेरी को-स्टार थीं और अपनी को-स्टार के साथ बातचीत करने में मुझे नहीं लगता कि कोई बुराई है।जहां तक अफेयर की बात है तो सभी जानते हैं कि पर्दे पर मैं जितना दिलफेंक हूं लेकिन रियल लाइफ में उतना ही बोरिंग हूं। कोई भी लड़की एक या दो दिन से ज्यादा मेरे साथ टिकती ही नहीं है क्योंकि मैं लवर की तरह उससे बात नहीं कर सकता। रियल लाइफ में लड़कियों के सामने मैं कुछ बोल ही नहीं पाता हूं। यहां तक कि जब कोई लड़की मुझे अच्छी भी लगती है तो भी मैं उसे कभी बोल नहीं पाता और यदि किसी तरह बोल भी लिया तो अगले एक हफ्ते में वह मुझे छोड़कर भाग जाती है। इन दिनों टीवी पर बिग बॉस छाया हुआ है और सलमान खान आपके काफी करीबी भी हैं। क्या कभी सलमान ने आपको बिग बॉस में जाने की सलाह दी है?हां, वैसे मुझे बोलना तो नहीं चाहिए लेकिन कई बार सलमान भाई ने मुझे बिग बॉस में जाने के लिए कहा है लेकिन जैसा कि मैंने आपको बताया कि मैं बहुत ही बोरिंग इंसान हूं। फिर वहां पर जाकर मैं क्या करूंगा। वहां से भी लोग मुझे एक हफ्ते या दो हफ्ते में बाहर कर देंगे। ऐसे जाने का कोई मतलब नहीं है। मुझे लगता है कि मैं बिग बॉस जैसे शो के लिए नहीं बना हूं क्योंकि मैं रियल लाइफ और रील लाइफ दोनों में बहुत ही अलग हूं। मैं चाहकर भी दूसरों के जैसा नहीं बन सकता। 'हासिलÓ में आपके साथ जायेद खान भी हैं। उनके साथ आपका कैसा तालमेल है?जायेद का इस शो में होना हमारे लिए काफी फायदे की बात है क्योंकि उनके फैंस उन्हें काफी पसंद करते हैं। हम दोनों सेट पर खूब बात करते थे और आउटडोर शूट होने के कारण हम दोनों को एक-दूसरे को जानने का और भी वक्त मिल गया। जायेद एक अच्छे इंसान हैं और उतने ही अच्छे कलाकार भी हैं।