Thursday, 14 April 2016

सिंहस्थ के बाद शीत युद्ध में उबाल


डॉ. अरूण जैन
सिंहस्थ को लेकर किवदंतियों का दौर इन दिनों अब चर्चाओं में दिखाई देने लगा है तो वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिन्होंने गैर कांग्रेसी सरकार के मुखिया होने के नाते लम्बे समय तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का जो मिथक तोड़ा है अब भले ही इस मिथक को लेकर तमाम तरह की वाहवाही लूटी जा रही हो यही नहीं सिंहस्थ और उससे जुड़ी किवदंतियों ने भी अब जोर पकड़ लिया है, हालांकि साधु-संतों द्वारा शिवराज को इनसे कुछ राहत दिलाने के उद्देश्य से यह घोषणा भले ही की जा रही हो कि वह सिंहस्थ के बाद प्रदेश की राजनीति में पडऩे वाले असर के मिथक को तोड़कर भी एक इतिहास बनायेंगे लेकिन ऐसा राजनैतिक पर्यवेक्षकों को नजर नहीं आ रहा है और वह यह कहते नजर आ रहे हैं कि भले ही साधु-संत शिवराज को यह तसल्ली दे रहे हों कि सिंहस्थ के बाद वह पद पर काबिज रहेंगे लेकिन मोदी और शिवराज के बीच चल रहे शीत युद्ध को देखकर तो ऐसा नहीं लगता है कि सिंहस्थ को लेकर जो किवदंतियां चर्चित हैं वह बदलती नजर आएंगी, भाजपा से जुड़े सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जो 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा के कुछ नेताओं ने मोदी के स्थान पर उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की जो आस जगाई थी अब वह धीरे-धीरे लौ पकडऩे लगी है है हालांकि राजनीतिक फलक पर नरेन्द्र मोदी के द्वारा उन भाजपाई नेताओं को तो धीरे-धीरे हाशिये पर पहुंचा दिया इसके बाद भी शिवराज सिंह की वह इच्छा इन दिनों प्रबल होती दिखाई देने लगी है भाजपा से जुड़े सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि मोदी शिवराज के बीच सबकुछ सामान्य है लेकिन वह यह भी कहते नहीं थकते कि स्थितियां इस समय भिन्न दिखाई दे रही हैं और नरेन्द्र मोदी ने राज्य की तमाम केन्द्रीय योजनाओं पर राज्य में अपने स्तर पर मानिटरिंग कराने की योजना बनाकर शिवराज सरकार में चल रहे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का प्रयास किया है तो वहीं शिवराज सिंह भी पिछले कुछ दिनों से तमाम अनुष्ठानों और टोटकों के साथ-साथ ज्योतिषियों की राय पर नये-नये टोटके और अनुष्ठानों को अंजाम देने में लगे हुए हैं उससे यह लगता है कि मोदी और शिवराज के बीच चल रहा शीतयुद्ध सिंहस्थ के बाद उसमें कुछ उबाल आएगी और इसकी भनक इन दिनों भाजपा की राजनीति में देखी जा रही है, भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार शिवराज सिंह मोदी के खिलाफ कब शह और मात का खेल खेलेंगे इसके लिये वह उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में हैं। क्योंकि वह अपने उन राजनैतिक आकाओं की सलाह पर सबकुछ नीति अनुसार करने में लगे हुए हैं, सूत्रों का तो यह भी दावा है कि मोदी मंत्रीमण्डल में भले ही सारे सदस्य टीम के मुखिया के होते हैं लेकिन उसमें भी शिवराज सिंह के करीब 14 से अधिक मंत्री मौजूद हैं जो समय आने पर कब क्या कर जाएं यह कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन धीरे-धीरे मुख्यमंत्री अपनी राजनीति बिसात अब मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में बिछाने की तैयारी में लगे हुए हैं। 
यूपी में प्रशांत किशोर के सहारे मंजिल पाने का प्रयास 
डॉ. अरूण जैन
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर से खड़ा होना चाहती है। इसके लिये 2017 के विधानसभा चुनाव से बेहतर मौका और क्या हो सकता है। वैसे यह पहला प्रयास नहीं है और आखिरी भी नहीं होगा। करीब दो दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है। परम्परागत रूप से किसी भी चुनाव से पूर्व कांग्रेसी वापसी का ढिंढोरा पीटने लगते हैं। यह और बात है कि जब नतीजे आते हैं तो कांग्रेस जीत तो दूर तीसरे/चौथे स्थान पर दिखाई देती है। हर हार के बाद कुछ समय के लिये कांग्रेसी खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं और दिन बीतने के साथ चादर खिसकती जाती है। जब कांग्रेसियों के पास कोई विजन नहीं होता है तो जनता को बार−बार नेहरू−गांधी परिवार की कुर्बानी की याद दिलाकर भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जाता है। एक समय था उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास जनाधार वाले तमाम नेताओं की लम्बी−चौड़ी फौज हुआ करती थी। नारायण दत्त तिवारी, वीर बहादुर सिंह, लोकपति त्रिपाठी, वासुदेव सिंह, बलदेव सिंह आर्य, सईद्दुल हसन, नरेन्द्र सिंह, राजा अजीत प्रताप सिंह, स्वरूप कुमारी बख्शी, अरूण कुमार सिंह मुन्ना, महावीर प्रसाद, सिब्ते रजी, प्रवीण कुमार शर्मा, सुनील शास्त्री, हुकुम सिंह (अब दोनों भाजपा में), शिव बालक पासी, जफर अली नकवी, दीपक कुमार, मानपाल सिंह, सुखदा मिश्रा जैसे तमाम नेताओं की अपने−अपने इलाकों में तूती बोला करती थी। एक तो इन ताकतवर नेताओं की फौज और उस पर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे नेताओं की सरपरस्ती ने कांग्रेस को कई दशकों तक यूपी में कमजोर नहीं होने दिया, लेकिन इंदिरा और राजीव गांधी की मौत के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ तितर−बितर हो गया। न तो कांग्रेस की डूबती नैया को सोनिया गांधी उबार पाईं न ही राहुल गांधी की कोशिशें कामयाब हुईं। नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री साबित हुए जो 1989 तक सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे थे। कांग्रेस में ताकतवर नेताओं की कमी सबको खलती रही, लेकिन इस दौरान कोई नई लीडरशिप नहीं उभरी। चंद नाम जरूर सामने थे, लेकिन यह सर्वमान्य नहीं थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, संजय सिंह, आदित्य जैन, सलमान खुर्शीद, पूर्व नौकरशाह से नेता बने पीएल पुनिया, समाजवादी पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, फिल्म अभिनेता से नेता बने राज ब्बर किस किस का नाम गिनाया जाये, कोई भी कांग्रेस को मझधार से नहीं उभार पाया। बात यहीं आकर खत्म नहीं हुई थी, जिस कांग्रेस का सिक्का पूरे देश में चलता था, उस कांग्रेस के दिग्गज नेताओं सोनिया−राहुल गांधी तक को अपनी जीत पक्की करने के लिये समाजवादी पार्टी से वॉकओवर लेना पड़ जाता था। अमेठी और रायबरेली में सोनिया−राहुल की जीत पक्की करने के लिये समाजवादी पार्टी अपना प्रत्याशी नहीं उतारती तो उपकार स्वरूप कांग्रेस नेतृत्व कन्नौज और मैनपुरी में अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा करती ताकि मुलायम सिंह परिवार के सदस्य आसानी से अपनी जीत सुनिश्चित कर सकें। यूपी की तरह ही बिहार में भी कांग्रेस और राहुल गांधी नीतिश कुमार और लालू यादव के पिछल्लूग नजर आये। बात ज्यादा पीछे न जाकर 2007 और 2012 के विधान सभा चुनाव, 2009 एवं 2014 के लोकसभा चुनाव के अलावा बीते लगभग चार वर्षों में हुए विधान सभा के उप−चुनाव की कि जाये तो कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नहीं दिखी। उक्त चुनावों और उसमें कांग्रेस की पतली हालत की चर्चा इसलिये हो रही है क्योंकि इन सभी चुनावों में कांग्रेस ने अपने युवराज राहुल गांधी को आगे करके जीत के बड़े−बड़े दावे किये थे। जीत का स्वाद चखने के लिये राहुल गांधी ने दलितों के यहां जाकर कई दिन गुजारे। उनकी झोपड़ी में बैठकर खाना खाया। मच्छरों के बीच चरपाई पर सोये। जिस तरह राहुल ने दलितों को लुभाने के लिये अभियान चलाया था, उसी प्रकार मुसलानों को रिझाने के लिये भी उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। मुजफ्फरनगर दंगे हों या फिर दादरी कांड अथवा साम्प्रदायिक हिंसा का और कोई मामला राहुल स्वयं ऐसे मौकों पर गये और एक वर्ग विशेष के साथ एक पक्ष बनकर खड़े रहे। इसके बाद भी हाल ही में सम्पन्न हुए यूपी के पंचायत चुनावों में रायबरेली को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस का खाता नहीं खुला। सबसे करारी हार राहुल के अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी में हुई है। इस हार की ठीकरा राहुल गांधी और उनके खास लोगों के सिर पर फूटने से बचाने के लिए टीम राहुल व उनके करीबी लोगों ने यह बहाना बनाना आरम्भ कर दिया है कि पंचायत चुनाव चूंकि सिम्बल पर नहीं लड़े गए थे, इसलिए हार की जिम्मेदारी राहुल गांधी पर डालना नाइंसाफी होगी। हालांकि पार्टी में कई लोग इस तर्क से सहमत नहीं थे। कई जिलों में बेकार उम्मीदवारों के चयन के लिए सीधे तौर पर राहुल के करीबी लोगों पर अंगुलियां उठाई जा रही हैं। कांग्रेस के एक नेता ने कई जिलों की एक सूची बताई जहां पंचायत चुनाव अध्यक्षों की उम्मीदवारी तय करते समय उन जिलों के कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं से चर्चा करना तक जरुरी नहीं समझा गया था। टीम राहुल के करीबी लोग कांग्रेस की हार के बचाव में विगत दो दशकों का आंकड़ा देते हुए यह भी तर्क गढ़ रहे हैं कि यूपी में जिसकी सरकार रहती है, उसी पार्टी के लोग ही पंचायत चुनावों में जीतते रहे हैं। कांग्रेस को लगातार पराजय मिल रही है, लेकिन आज भी यूपी में गांधी परिवार की उपस्थिति अमेठी, रायबरेली, इलाहाबाद और थोड़ी−बहुत सुखा प्रभावित बुंदेलखंड आदि इलाकों तक सीमित है। कांग्रेस के पास कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जिसे मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा सके। निर्मल खत्री, मधुसूदन मिस्त्री के सहारे संगठन अगर आगे बढ़ सकता तो कब का बढ़ गया होता। कांग्रेस में सर्वमान्य नेता का अभाव है तो सीएम के नाम पर जब चर्चा होती है तो कांग्रेसियों की सुई प्रियंका वाड्रा के नाम पर अटक जाती है। ऐसी हालत में कांग्रेस 2017 में कैसे वापसी कर सकती है। इसका जवाब लोग राहुल से पूछ रहे थे तो राहुल गांधी किसी परिपक्व नेता की तरह जवाब देने की बजाय प्रशांत किशोर की शरण में चले गये। पहले मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में और हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव में जदयू−राजद−कांग्रेस गठबंधन की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर राहुल की मर्जी के अनुसार अब यूपी चुनावों में कांग्रेस की कमान संभालेंगे। हाल ही में नई दिल्ली में यूपी चुनावों को लेकर कांग्रेस की बैठक में जब प्रशांत किशोर दिखाई दिये तो सियासी प्याले में उफान आ गया। बाद में पता चला कि प्रशांत किशोर के कंधों पर राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी डाली है। पिछले करीब तीन दशकों से कांग्रेसी यूपी में सत्ता का स्वाद चखना तो दूर दो अंकों से आगे नहीं बढ़ पाये लेकिन प्रशांत किशोर का साथ मिलते ही कांग्रेसी 2017 के चुनाव में भाजपा, सपा और बसपा को चारों खाने चित कर देने का दावा करने लगे हैं।

पहाड़ों की रानी मसूरी के नजारों की बात ही और है 

डॉ. अरूण जैन
पर्यटन स्थल मसूरी अन्य हिल स्टेशनों से भिन्न है क्योंकि यहां एक ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े भव्य हिमालय प्रहरी की तरह खड़ा है तो दूसरी ओर मैदानों में शीतलता का संचार करती हुई गंगा मंथर गति से बह रही है। मसूरी समुद्र तल से लगभग 6,500 फुट ऊंचाई पर स्थित है। पहाड़ों की रानी मसूरी के नजारों में जरूर कुछ बात है तभी तो यहां हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक आते हैं खासकर हनीमून मनाने जाने वाले लोगों के लिए तो यह पसंदीदा जगह है। गनहिल मसूरी की दूसरे नंबर की सर्वाधिक ऊंची चोटी है। पुराने दिनों में समय का पता लगाने के लिए दोपहर को ठीक बारह बजे इस पहाड़ी पर रखी तोप दागी जाती थी। कुछ समय के बाद तोप हटा ली गई, तब से इसका नाम गनहिल पड़ गया। रोपवे से गनहिल पहुंचने का मजा सचमुच रोमांचक है। गनहिल में जहां एक ओर विशाल हिमालय की दूर दूर तक फैली सफेद झिलमिलाती चोटियां दिखाई पड़ती हैं वहीं दूसरी ओर दून घाटी की बिखरी पड़ी अद्भुत सुंदरता का नजारा देखने को मिलता है। कैमल्स बैक रोड़ भी देखने योग्य जगह है। यह सड़क घुड़सवारी व सैर करने के लिए बहुत अच्छी है। कैमल्स बैक का यह रास्ता कुलरी स्थित रिंक हाल से शुरू होकर लाइब्रेरी बाजार पर खत्म होता है। इस रास्ते पर पहाड़ी का आकार कुछ कुछ ऊंट की पीठ की भांति दिखाई देता है। इसलिए इस सड़क का नाम कैमल्स रोड़ पड़ गया। यहां की खास बात यह है कि पूरे रास्ते में जगह जगह पर थकान मिटाने तथा प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने के लिए हवा घर बने हुए हैं। लंढोर बाजार मसूरी के सर्वप्रथम निर्मित मुलिंगार भवन से शुरू होकर लंढोर के घंटाघर पर खत्म होता है। एक मील लंबा यह बाजार पुराने समय की शान लिए हुए है। इस बाजार में कहीं तो आयातित सामान की दुकानें दिखाई देती हैं तो कहीं विशुद्ध भारतीय सभ्यता की गाथा कहती साधारण दुकानें हैं। आप लाल टिब्बा भी देखने जा सकते हैं। यह मसूरी की सर्वाधिक ऊंची चोटी है। आप यहां से दूरबीन की मदद से गंगोत्तरी, बदरीनाथ, केदारनाथ, नंदा देवी और श्रीकांता की चोटियों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। मसूरी से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर चकराता रोड़ पर स्थित कैंपटी फाल मसूरी का एक और सुंदर स्थल है। पर्वतों में से फूट कर निकलता हुआ यह झरना पांच अलग−अलग धाराओं में चालीस फुट ऊंचाई से गिरता हुआ दिखाई पड़ता है। आप नौकायान करना चाहें तो लेकमिस्ट देखने जा सकते हैं। इस स्थान को आधुनिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। मसूरी का म्यूनिसिपल गार्डन भी देखने योग्य है। यह गार्डन आजादी से पहले बोटोनिकल गार्डन कहलाता था। आजकल इसे कंपनी गार्डन भी कहा जाता है। कंपनी गार्डन में मुस्कुराते फूलों के अलावा एक छोटी सी कृत्रिम झील भी बनाई गई है। यहां पर निकट में ही एक छोटा सा तिब्बती बाजार भी है। इन सब स्थानों के अलावा आप मसूरी झील और भट्टा फाल तथा क्लाउड ऐंड भी देख सकते हैं। मसूरी के निकटवर्ती स्थलों की बात की जाए तो यमुना ब्रिज और नाग टिब्बा सहित धनोल्टी का नाम लिया जा सकता है। मसूरी तक जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून है। देहरादून दिल्ली, हावड़ा, लखनऊ, वाराणसी, मुंबई, अमृतसर और इलाहाबाद आदि से रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। देहरादून से मसूरी तक जाने के लिए टैक्सियां भी आसानी से मिल जाती हैं। यदि आप गर्मी से राहत पाने के लिए मसूरी जाना चाहते हैं तो अप्रैल से जून के बीच मसूरी जाएं। जुलाई से सितंबर तक यहां बरसात का आनंद लिया जा सकता है। यदि वहां घूमने−फिरने जाना चाहते हैं तो इसके लिए उत्तम समय अक्टूबर से दिसम्बर के बीच का है। यहां जनवरी से फरवरी के बीच में हिमपात होता है।
मेला क्षेत्र में 5 लाख 20 हजार वर्गफीट में, 52 स्थानों पर नेटवर्क कम्पनियों के टॉवर होंगे

डॉ. अरूण जैन
सिंहस्थ में अपनो से सम्पर्क का सबसे महत्वपूर्ण साधन मोबाईल होगा। मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग को देखते हुए मेला प्रशासन ने मोबाइल नेटवर्क कम्पनियों के साथ मिलकर एक बड़ी योजना बनाई है। इस योजना में ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि सिंहस्थ के दौरान एक ही समय पर एक साथ दो लाख कॉल किये जा सकेंगे। सिंहस्थ के दौरान मोबाइल नेटवर्क और टॉकिंग कैपेसिटी तकनीक पर नेटवर्क कम्पनी द्वारा जोर दिया गया। मोबाइल नेटवर्क कम्पनियों को पूरे मेला क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर 52 प्लॉट आवंटित किये हैं। इरलॉग टैक्नोलॉजी के उपयोग से हो सकेंगे सतत् दो लाख कॉल सिंहस्थ के दौरान मोबाईल से सम्पर्क करने में किसी प्रकार की समस्या न हो इसलिए मोबाईल नेटवर्क कम्पनियां कुंभ मेलों में पहली बार इरलॉग टेक्नोलॉजी का उपयोग करेगी।  इस तकनीक के उपयोग से 8म8म8 कन्फीगरेशन की सहायता से वॉइस, एसएमएस और इंटरनेट डाटा के लिए नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है।  इरलॉग टेक्नोलॉजी दूरसंचार सिस्टम में नेटवर्क ट्रॉफिक घनत्व की ईकाई है, जो किसी विशेष माध्यम (स्पेसिफिक चैनल) के लिए एक घंटे में 3600 सेकैंड के बराबर होती है।  पूरे मेला क्षेत्र में 5 लाख 20 हजार वर्ग फीट में लगेंगे टॉवर सिंहस्थ के दौरान नेटवर्क और टॉकिंग व कनेक्टिंग कैपिसीटी के लिए विभिन्न कंपनियाँ अपने-अपने टॉवर लगाएगी।  विभिन्न कंपनियों को टॉवर लगाने के लिए मेला कार्यालय द्वारा 52 प्लॉट आवंटित किए गये हैं।  इसके अलावा मोबाइल नेटवर्क प्रदान करने वाली कंपनियाँ आपस में टॉवर शेयरिंग करने के लिए भी सहमत हैं। एक प्लॉट 10 हजार वर्गफीट का है। मेला क्षेत्र में विभिन्न कंपनिंयों के मेला अवधि में 77 अतिरिक्त टॉवर लगाये जाएंगे।  52 टॉवर स्वयं कंपनियाँ अपने-अपने स्थानों पर लगाएगी।  जबकि 25 टॉवर शेयर किये जाएंगे। 9 टॉवर रिलायंस, 24 टावर आइडिया, 27 टॉवर एयरटेल, 17 टॉवर वोडाफोन द्वारा लगाए जायेंगे।  रिलायंस और वोडाफोन कंपनियाँ किसी अन्य के साथ टॉवर शेयर नहीं करेगी।  जबकि आइडिया 14 और एयरटेल 11 आपस में शेयर करेगी। दत्तअखाड़ा झोन में बीएसएनएल का मिनी एक्सचेंज होगाभारत संचार निगम लिमिटेड दत्त अखाड़ा झोन में एक मिनी एक्सचेंज आफिस बनाएगी।  

राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी

डॉ. अरूण जैन
भारत में काला धन कितना है इसके बारे में अलग-अलग अनुमान हैं। जो उजागर हो न हो, उसके बारे में ठीक-ठीक आंकड़ा हो भी कैसे सकता है। पर सारे अनुमान यही बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था में काले धन का अनुपात बहुत व्यापक हो चुका है; कुछ अर्थशास्त्रियों का यहां तक कहना है कि इसने लगभग एक समांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया है। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। पर कोई भी सरकार काले धन को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं रही है। यह अलग बात है कि भाजपा ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भी काले धन को बड़ा मुद््दा बनाया था और पिछले लोकसभा चुनाव में भी। मई 2014 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने यहां तक वादा किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो सौ दिनों के भीतर विदेशों में रखा-छुपा काला धन लाया जाएगा और हर गरीब भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रुपए जमा किए जाएंगे। पर इस वादे की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद पार्टी अध्यक्ष ने बाद में इसे एक चुनावी जुमला करार दिया। बहरहाल, जो कदम उठाए जा सके हैं उनमें से एक है, काले धन की पड़ताल के लिए एसआईटी यानी विशेष जांच दल का गठन। एसआईटी मोदी सरकार आने के बाद भले गठित हुई हो, इसका श्रेय असल में सर्वोच्च न्यायालय को जाता है, जिसने इसके लिए एक समय-सीमा तय कर रखी थी। दूसरा कदम उठाया गया कि बाहर जमा काले धन की वापसी के लिए पिछले साल सरकार ने कुछ रियायतें देने का फैसला किया था। अब देश में काला धन रखने वालों को चेताते हुए सरकार ने अनुपालन खिड़की की घोषणा की है। यह खिड़की एक जून को खुलेगी। इसके तहत काले धन की घोषणा करने पर उस पर तीस फीसद की दर से कर और पंद्रह फीसद अधिभार तथा जुर्माना अदा करना होगा। ऐसा करने वाले मुकदमे से बच सकेंगे। इस खिड़की के बंद होने के बाद जुर्माना बढ़ कर साठ फीसद हो जाएगा और तीस फीसद का कर अदा करना होगा। पिछले दो साल में सरकार के अभियान से बीस हजार करोड़ रुपए का काला धन बाहर निकाला गया है, जो कि खास कामयाबी नहीं कही जा सकती। विदेशों में जमा काले धन की बाबत अनुपालन खिड़की के तहत सिर्फ चार हजार एक सौ सैंतालीस करोड़ रुपए की बेहिसाबी संपत्ति की घोषणा की गई। दोनों के आशानुरूप परिणाम न मिलने से यह सवाल उठ सकता है कि क्या नया कदम कारगर साबित होगा? दरअसल, काले धन के खिलाफ कोई भी मुहिम तभी प्रभावकारी हो सकती है जब उसका जोर काले धन के स्रोतों को बंद करने तथा इसके प्रवाह और प्रक्रिया पर रोक लगाने पर हो। एक समय रिश्वतखोरी और कर-चोरी ही काले धन का प्रमुख जरिया थे। पर अब काले धन के ढेरों तरीके हैं। शेयर बाजार में पहचान छिपा कर निवेश करने, फर्जी कंपनियां बनाने, हवाला के जरिए हेराफेरी से लेकर 'मारीशस रूटÓ से किए जाने वाले तथाकथित निवेश तक तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं। आय कर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय से लेकर सीबीआई तक, सब विभागों और एजेंसियों को इन तिकड़मों के बारे में पता है। फिर कसर कहां रह जाती है? क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही है?

यह लड़का देश को नई दिशा प्रदान करेगा


डॉ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश के सबसे कामयाब मुख्यमंत्री के जन्मदिन पर उनसे जुड़ीं रोचक बातें    मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान 5 मार्च को अपना 57वां जन्मदिन मना रहे हैं. 5 मार्च, 1959 को सीहोर जिले के जैत गांव में जन्मे शिवराज मुख्यमंत्री रहने के पहले पांच बार विदिशा संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने जा चुके हैं. सीएम शिवराज के नेतृत्व में मध्यप्रदेश में भाजपा की पहली सरकार है, जो इतने लंबे समय तक सत्ता में रही है. शिवराज के लिए राजमाता विजयाराजे सिंधिया का आशीर्वाद अहम माना जाता है. इसी से जुड़ा है रोचक किस्सा वर्ष 1988 में जब शिवराज पहली बार युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बने तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार के शासन और जुल्मों के विरोध में एक मशाल जुलूस का आयोजन किया गया.          उन्होंने राजमाता सिंधिया से आग्रह कर इस जुलूस के नेतृत्व करने की बात कही, लेकिन तब प्रदेश में भाजपा के तत्कालीन नेतृत्व के सामे दो बड़ी चुनौतियां सामने आ गईं कि क्या राजमाता सिंधिया, नाना जी देशमुख और कुशाभाऊ ठाकरे जैसे दिग्गज कद के नेताओं के हिसाब से समर्थन जुट पाएगा. उस बात को चैलेंज मानकर शिवराज ने ग्रामीण क्षेत्रों से 40000 किसानों के आने की बात कहकर पूरे पार्टी नेतृत्व को सहमा दिया, परंतु जब 7 अक्टूबर 1988 को भोपाल में जुलूस निकला तब भोपाल आने वाली सारी सड़कें ट्रैक्टर, ट्रक, जीप और बैलगाडिय़ों से अटी पड़ी थीं. लोगों की संख्या 40000 से कहीं ज्यादा थी और दो दिन तक मशाल जुलुस में आए ग्रामीणों का भोपाल से लौटना बदस्तूर जारी रहा. शिवराज के इसी नेतृत्व से खुश होकर 7 अक्टूबर 1988 के दिन ही राजमाता सिंधिया ने शिवराज के सिर पर हाथ रख आशीर्वाद दिया और ऐलान किया कि यह लड़का राजनीति में बहुत आगे जाकर देश को नई दिशा प्रदान करेगा. प्रदेश के मुखिया बनने का सफर शिवराज ने छात्र राजनीति से शुरू किया था. उस दौरान देश में इन्दिरा और कांग्रेस के विरुद्ध एक बड़ी लहर देखी जा रही थी, 1975 में देश में लगे आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले शिवराज कदाचित सबसे कम उम्र के स्वयंसेवक रहे होंगे. पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता सुंदरलाल पटवा को शिवराज सिंह चौहान का राजनीतिक गुरू माना जाता है. जिनसे हर मौके पर वे आशीर्वाद लेने जाते हैं. साल 2003 के चुनावों में उमा भारती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं. पार्टी से इस्तीफे के बाद बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन 2005 में तत्कालीन भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान को उसी साल 29 नवंबर मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. एक बार फिर तेहरवीं विधानसभा के लिए चौहान को 10 दिसंबर 2008 को भाजपा के 143 सदस्यीय विधायक दल ने सर्वसम्मति से नेता चुना.           शिवराज को 2008 में दूसरी बार भोपाल के जंबूरी मैदान में एक भव्य शपथ ग्रहण समारोह में मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई गई. इसके बाद 2013 में तीसरी बार शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी.          अब शिवराज के मुख्यमंत्रित्व काल का 11वां साल चल रहा है. अब वे प्रदेश के पहले ऐसे व्यक्ति बन गए हैं, जिन्होंने सबसे ज्यादा समय तक मुख्यमंत्री के दायित्व का निर्वहन किया. इससे पहले कांग्रेस के दिग्विजय सिंह 10 साल तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे.  हालांकि, शिवराज का राजनीतिक जीवन काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा. मुख्यमंत्रित्व काल की शुरूआत में उन पर डंपर खरीदी के आरोप लगे और पिछले ही दिनों व्यापमं घोटाले ने उनकी मुसीबतें बढ़ा दी थीं. फिलहाल, व्यापमं की सीबीआई जांच चल रही है.

सियाचीन मुद्दे पर सहमति बनाएँ भारत और पाकिस्तान 


डॉ. अरूण जैन
सियाचीन में पिछले दिनों कुछ और भारतीय सैनिकों की मौत हुई है। यह अनावश्यक मौत भारत और पाकिस्तान, दोनों का ध्यान 23,000 फीट की ऊंचाई पर, जहां का तापमान माइनस 41 डिग्री है, सेना तैनात करने की निरर्थकता की ओर खींचता है। दोनों को आपसी बातचीत के जरिए घृणित घटनाओं का समाधान खोजना चाहिए। इसके बजाए, नई दिल्ली ने इसे सैनिकों की शहादत मान लिया है और राजकीय सम्मान के साथ उनकी अंत्येष्टि कर अपना काम पूरा समझ लिया। एक दशक से पहले, हिमस्खलन में पाकिस्तान के 180 सैनिकों की मौत हो गई थी, उस वक्त दोनों देश मसले पर विस्तार से बात कर किसी सहमति पर पहुंच सकते थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने इसकी पहल की थी। लेकिन, वे समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर सके क्योंकि हमारी सेना ने सामरिक रूप से ग्लेशियर के बहुत अहम होने का सवाल उठा दिया था। यह महज हौआ था। मैंने सेना के अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारियों से बात की थी। उन सबों ने सामरिक महत्व की बात को खारिज कर दिया था। सेना के जवान अभी भी ऊंचाई पर तैनात हैं। जनरल परवेज मुशर्रफ ने इसका फायदा उठाया था। भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी जिस वक्त बस में सवार होकर लाहौर पहुंचे थे, उस वक्त जनरल मुशर्रफ ने ही सेना और जनजातीय लोगों को ग्लेशियर पर तैनात कर रखा था। मुशर्रफ उस वक्त सेना प्रमुख थे। वे भारत के साथ शांति नहीं चाहते थे। जुल्फीकार अली भुट्टो की तरह उन्होंने भी सोचा था कि भारत को पाकिस्तान पराजित कर सकता है। उन्होंने अपनी इस भूल को महसूस किया और सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि वे ऐसा फिर दुबारा कभी नहीं करेंगे क्योंकि उन्हें इतिहास से सबक मिल गई है। कारगिल युद्ध की शुरुआत में भारत को काफी नुकसान हुआ लेकिन अपनी उत्कृष्ट सैन्य क्षमता के कारण अंतत: भारत भारी पड़ा। उस वक्त से अब तक स्थिति सामान्य नहीं है। दोनों देशों के बीच दूरी बनाए रखने के लिए आये दिन कोई न कोई घटना घटती रहती है। संभव है, कुछ ऐसी ताकतें हैं, जो दोनों देशों के बीच शांति नहीं बनना देना चाहतीं। पठानकोट की घटना ताजा उदाहरण है। दोनों देशों के विदेश सचिवों की होने वाली बैठक के कुछ दिन पहले यह घटना घटित हुई। नई दिल्ली और इस्लामाबाद, दोनों ही अब इतना परिपक्व हो चुके हैं कि वे वार्ता भंग नहीं करते। वार्ता का नया कार्यक्रम तय किया गया। फिर भी, सच्चाई यह है कि दोनों देशों के बीच अब तक वार्ता शुरू नहीं हुई है और ना ही जल्दी में इसके फिर से शुरू होने की उम्मीद है। हकीकत में, सियाचीन ग्लेशियर अपने आप में विवाद का विषय है। यह उन कारणों में एक है जिसके कारण दोनों देशों के बीच के रिश्ते में खटास बनी हुई है। दुर्भाग्यवश, इस समस्या ने राजनीतिक रंग ले लिया है। सबसे बेहतर समाधन यह है कि ग्लेशियर को स्वामीहीन भूमि, नो मैन्स लैंड, घोषित कर दिया जाए। शिमला शिखर वार्ता में नियंत्रण रेखा को चित्रित किया गया था। यह अब अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा है। शिखर वार्ता में इस सीमा रेखा को ग्लेशियर तक नहीं बढ़ाया जा सकता था, क्योंकि ऐसा करना अव्यावहारिक पाया गया था। इस मसले को छोड़ दिया गया था। अब दोष मढऩे का कोई मतलब नहीं। उस समय से रिश्ते में जो कड़वाहट बढ़ती गई है, उससे दोनों देशों को उबरना होगा। दोनों देश अब भी शिमला शिखर वार्ता में छोड़े गए रिश्ते की डोर को आगे बढ़ाने का काम कर सकते हैं। अगर ग्लेशियर स्वामीहीन भूमि, नो मैन्स लैंड बन जाता है तो दोनों देशों को शिमला समझौते को सही अर्थों में अक्षरश: लागू करना होगा। पिछली बार जब सहमति बनी थी तब पाकिस्तान का रुख बिल्कुल साफ नहीं था। वह कुछ और सोच रहा था, क्योंकि उसने जर्मनी से बड़ी संख्या में स्नो शू मंगाने का आदेश दिया था। भारतीय खुफिया एजेंसियों ने स्नो शू मंगाये जाने की जानकारी जब नई दिल्ली को दी तो भारत ने ग्लेशियर पर अपने सैनिकों को तैनात कर दिया। पाकिस्तान ने जब ग्लेशियर पर कब्जे के लिए अपनी सेना को भेजा तो वहां भारतीय सैनिकों की मौजूदगी देख वह चकित रह गया। दगाबाजी के भय ने शांति को रोक दिया। फिर भी, एक दूसरे में विश्वास करने के सिवा कोई और विकल्प नहीं है। भारत और पाकिस्तान के बीच शायद ही कभी आपसी समझ रही। आंशिक रूप से ऐसी स्थिति इस कारण रही कि दोनों देश विभाजन की गांठ ढोते रहे हैं और फिर इस कारण कि दोनों का एक दूसरे में भरोसा नहीं रहा है। सबसे बढ़कर, भारत में आम धरणा है कि चूंकि पाकिस्तान के मामले में सेना निर्णायक स्थिति में है, इसलिए पाकिस्तान में फिर से जब तक लोकतांत्रिक व्यवस्था नहीं हो जाती तब तक किसी सार्थक रिश्ते को प्रोत्साहित करना संभव नहीं है। हकीकत में, 1958 में जनरल मोहम्मद अयूब खां द्वारा पाकिस्तान की सत्ता संभालने के वक्त से ही भारत ने मान रखा है कि दोनों देशों के बीच स्थिति सामान्य बनाना संभव नहीं है। जनरल अयूब ने साझा रक्षा समझौते की पेशकश भी की थी। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने यह कहते हुए इसे खारिज कर दिया था: किसके खिलाफ साझा रक्षा? सत्तर के दशक और बाद के दिनों के दो अन्य सैन्य शासन के नेताओं− जनरल जिया उल हक एवं जनरल परवेज मुशर्रफ को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया, क्योंकि नई दिल्ली मानती रही कि सैन्य दृष्टि से कही गई उनकी बातें शांति की पहल को कभी कामयाब नहीं होने देगी। हालांकि, परवेज कयानी जिस वक्त सेना प्रमुख थे, उन्होंने दोनों देशों के बीच शांतिपूर्ण सह अस्तित्व की वकालत कर भारत की सोच को विचलित किया था। लेकिन मसलों को सुलझाने का रास्ता तलाशने के लिए सिविल एवं सैन्य नेतृत्व के बीच बातचीत का उनका सुझाव पेचीदा था। उन्हें यह जानना चाहिए था कि भारत में निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के हाथों में है और निर्णय लेने की प्रक्रिया में सेना की कोई हिस्सेदारी नहीं है। जनरल कयानी का प्रस्ताव सियाचीन ग्लेशियर तक ही सीमित नहीं था। उन्होंने आगे की कार्रवाई का भी संकेत दिया था और इस तरह इस धारणा को गलत करार दिया था कि भारत और पाकिस्तान के बीच शांति का मसला सेना की युद्धकारी सोच का बंधक है। उन्होंने अवसरों की खिड़की खोली थी जिसे दोनों देशों की सरकारों को रिश्ते को सामान्य बनाने के लिए दोनों हाथों से स्वीकार करना चाहिए था। मुझे लगता है कयानी की सुझावों पर पिछले दरवाजे की शक्तियों ने काम किया। हालांकि, नई दिल्ली ने उनके सुझावों पर कोई आधिकारिक बयान नहीं दिया था, लेकिन मीडिया ने सतर्कता भरी प्रतिक्रिया के साथ उनके सुझावों का स्वागत किया था। उस वक्त सवाल था कि जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ द्वारा दोनों देशों की सेना हटाए जाने के सुझाव को पाकिस्तान ने अस्वीकार कर दिया था तो क्या भारत सियाचीन ग्लेशियर से अपनी सेना को हटाएगा। इतिहास ने फिर स्थिति पैदा की है, क्योंकि नवाज शरीफ ही प्रधानमंत्री हैं। उन्हें पहल करनी चाहिए, विशेषकर उस हालत में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काबुल से लौटते वक्त पाकिस्तान जाने की उदारता दिखायी है। राजीव गांधी की पहल पर हुए समझौते को लागू करने के लिए दोनों या तो इस्लामाबाद या नई दिल्ली में वार्ता कर सकते हैं। उन्हें यह बात समझनी चाहिए कि भारत और पाकिस्तान के बीच स्थिति सामान्य बने बगैर क्षेत्र का विकास नहीं हो सकता। दुनिया के गरीबों की सबसे बड़ी संख्या इस हिस्से में है और इन्हें इस असहाय स्थिति से बाहर लाने के लिए दोनों नेताओं को टकराव का रास्ता छोडऩा होगा।