Thursday, 14 April 2016

गणतंत्र के हालात पर निर्ममता से नजर डाल लेना जरूरी 

डॉ. अरूण जैन
भारतीय गणतंत्र के 66 साल पूरे करने के साथ ही देश में नवउदारवादी सुधारों के भी 25 बरस पूरे हो गए हैं। इस मौके पर गणतंत्र के हालात पर जरा निर्ममता से नजर डाल लेना जरूरी है। 26 जनवरी, 1950 को जो गणतांत्रिक संविधान स्वीकार किया गया था, उसमें प्रतिष्ठापित मार्गदर्शक सिद्धांत शासन को यह निर्देश देते हैं कि एक ऐसी समाज व्यवस्था, जिसमें राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं में सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय समाया हो सुनिश्चित करके जनता के कल्याण को आगे बढ़ाएं। शासन इसका प्रयत्न करे कि आय की असमानताओं को कम से कम किया जाए...। इस संविधान के अपनाए जाने के बाद गुजरे साढ़े छह दशकों में शासन ने इन मार्गदर्शक सिद्धांतों को त्याग ही दिया है। नवउदारवादी व्यवस्था के अपनाए जाने के बाद से तो असमानताओं को न्यूनतम किए जाने की बजाय पोसा और बढ़ाया जा रहा है। सबसे धनी एक फीसदी भारतीयों के हाथों में इस समय देश की संपदा के 53 फीसदी हिस्से का स्वामित्व है। दूसरी ओर, दुनिया के तमाम गरीबों का पांचवां हिस्सा भारत में ही रहता है। साल 2015 में देश भर में किसानों की आत्महत्याओं में चौंकाने वाली तेजी आई है। कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडि़शा व अन्य राज्यों में हजारों किसानों ने आत्महत्या की है। अकेले महाराष्ट्र में 3,228 किसानों की आत्महत्याएं दर्ज हुई हैं, जो वास्तविकता को कम करके दिखाने वाला आंकड़ा है। कृषि संकट के चलते ग्रामीण गरीबों की तादाद बढ़ती ही जा रही है। भारतीय गणतंत्र जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, सामाजिक न्याय और संघीय व्यवस्था के हमारे बुनियादी सिद्धांतों पर खड़ा है, हालांकि इनकी अपनी अंतर्निहित सीमाएं भी हैं। उदारीकरण और निजीकरण के बाद गुजरी चौथाई सदी में इन चारों का ही अवमूल्यन हुआ है और उनकी हालत खस्ता नजर आ रही है। आज सत्तातंत्र पर जिन ताकतों का कब्जा है, वे भारतीय राज्य की जितनी भी धर्मनिरपेक्ष अंतर्वस्तु थी, उसे कमजोर करने की कोशिशों में लगी हुई हैं। जनतंत्र का मूलाधार है, धर्म, लिंग या जाति के विभाजन से ऊपर उठकर सभी नागरिकों के अधिकारों की समानता। इसे सिर्फ धर्मनिरपेक्ष राज्य ही सुनिश्चित कर सकता है। हमारे संविधान की एक खासियत यह है कि इसमें सामाजिक भेदभाव और छुआछूत जैसी बुराइयों को दूर करने के लिए सकारात्मक कदमों का प्रावधान किया गया है। यह सामाजिक न्याय की ऐसी परिकल्पना है, जो असमानतापूर्ण जाति व्यवस्था को सुधारवादी तरीके से मिटाना चाहती है। संविधान के स्वीकार किए जाने के साढ़े छह दशक बाद भी हमारे समाज में जातिवादी उत्पीडऩ के विभिन्न रूपों का बोलबाला है, और इनमें छुआछूत की बुराई भी शामिल है। कई लोग इस सिलसिले में हिंदू शास्त्रों की दुहाई देते हैं। भारतीय शासन की सबसे बड़ी विफलता, समाज के सबसे उत्पीडि़त तबके, यानी दलितों को न्याय दिलाने में उसकी विफलता है। पिछले कुछ समय में यह उत्पीडऩ और बढ़ा है। फरीदाबाद में दो दलित बच्चों का जिंदा जलाया जाना और रोहित वेमुला का दुखद अंत, जिसे हैदराबाद विश्वविद्यालय में आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया, इस जातिवादी कट्टरता के ही दो उदाहरण हैं। गणतंत्र दिवस से चंद रोज पहले ही उडुपी के पेजावर मठ में एक बहुत बड़े धार्मिक समारोह का आयोजन किया गया था। यहां पर कृष्ण मंदिर में आज भी पंक्ति भेद (ब्राह्मणों तथा अन्य जातियों को भोजन के लिए अलग-अलग पांत में बैठाने) और मडे स्नानम (ब्राह्मणों के आशीर्वाद की आशा से लोगों के उनकी झूठी पत्तलों पर लोटने) जैसे रिवाज चल रहे हैं, जो दलितों तथा निचली जातियों के साथ खुल्लमखुल्ला भेदभाव करते हैं। इस आयोजन में केंद्रीय मंत्रियों, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और कर्नाटक के पूर्व-मुख्यमंत्रियों व कई पूर्व-मंत्रियों ने भी हिस्सा लिया था। लेकिन, उनमें से किसी ने भी इस जातिवादी भेदभाव के बारे में एक शब्द तक नहीं कहा। अब तो शासन बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जगत में धार्मिकता को संरक्षण और बढ़ावा देने में जुटा नजर आता है, जबकि देश का संविधान उसे यह जिम्मेदारी सौंपता है कि वह वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद, जिज्ञासा व सुधार की भावना विकसित करे। लेकिन इन दिनों इसकी उलटी बातें ही हो रही हैं। सीमित ही सही, मगर हमारे संघीय संविधान में जो भी संघात्मक सिद्धांत मौजूद हैं, उनको भी लगातार कमजोर किया गया और नवउदारवादी निजाम में यह गिरावट और बढ़ गई है। संसाधनों और पूंजी के लिए बाजार ने राज्यों को आपस में होड़ कर रही सत्ताओं में बदलकर रख दिया है। शक्तियों से वंचित और साधनों की कमी के मारे राज्यों को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया गया है, जहां वे या तो विशेष दर्जा पाने के लिए केंद्र के आगे याचक बने रहते हैं या फिर एक आईआईएम या एक आईआईटी के रूप में केंद्र की कृपा हासिल करने के लिए हाथ फैलाते रहते हैं। योजना आयोग के खात्मे और राष्ट्रीय विकास परिषद के अंत ने राज्यों को और भी ज्यादा केंद्र के रहमोकरम पर निर्भर बना दिया है। नवउदारवादी राजनीति संसदीय जनतांत्रिक व्यवस्था को भीतर से खोखला कर रही है। पूंजीवादी पार्टियों में धन-बल का और पूंजीपति-राजनीतिज्ञ गठजोड़ का बोलबाला है। यह इसकी गारंटी देता है कि चाहे कोई भी सत्ता में आए और चाहे सरकार बदल जाए, नीतियां ज्यों की त्यों बनी रहेंगी। इस तरह, विकल्पों का चुनाव करने में जनता को शक्तिहीन बनाया जा रहा है। भीमराव अंबेडकर ने राजनीतिक समता और सामाजिक-आर्थिक बराबरी का नाता टूटने की जो चेतावनी दी थी, वह सच हो रही है। जनतंत्र को कमजोर किया जाना विभिन्न रूपों में अभिव्यक्त हो रहा है। मजदूर यूनियन और संगठन बनाने के अधिकार को, जो कि संविधान से मिला एक मौलिक अधिकार है, कतरा जा रहा है। शासन की मिलीभगत से मजदूरों को यूनियन बनाने के अधिकार से वंचित किया जा रहा है और विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) आदि के नाम पर इसे वैधता प्रदान की जा रही है। संविधान में निवारक नजरबंदी के प्रावधान का जो छिद्र है, उसका अंधाधुंध इस्तेमाल करके ऐसे दमनकारी कानून बनाए जा रहे हैं, जो निजी आजादी को सीमित करते हैं। मौजूदा निजाम तो असहमति की आवाजों और अल्पसंख्यकों के विरोध को ही राष्ट्रविरोधी करार दे देता है, इसलिए बेरोक-टोक राजद्रोह के कानून का सहारा लिया जा रहा है। नवउदारवाद और राज्य-प्रायोजित सांप्रदायिकता का योग तानाशाही का रास्ता तैयार कर रहा है। गणतंत्र को सांविधानिक तानाशाही बनाकर रख दिए जाने का खतरा पैदा हो रहा है।

कश्मीरियों के लिए देवदूत बन कर आती रही है सेना 


डॉ. अरूण जैन
अगर आम कश्मीरियों के शब्दों पर जाएं तो सेना के जवान उनके लिए देवदूत से कम नहीं हैं। रही बात आतंकवाद समर्थकों की, तो उनके लिए तो आम कश्मीरी जनता भी दुश्मन है। आखिर आम जनता दुश्मन क्यों न हो, क्योंकि आतंकवाद समर्थकों की मुखबिरी करने में अब कश्मीरी सबसे आगे हैं जिस कारण आतंकवाद को एक हद तक सुरक्षा बल खत्म करने में कामयाब रहे हैं। कश्मीरियों के दिलों में अभी भी सितम्बर 2014 की भीषण बाढ़ के जख्म हरे हैं। अक्तूबर 2005 में आए सदी के सबसे भयंकर भूकंप के निशान उनके सीनों पर हैं। कई बार आए बर्फीले सुनामी से हुई तबाही के निशां देख-देख कर वे आज भी फूट-फूट कर रो देते हैं। ऐसे कई उदाहरण हैं जिसमें अगर उनके लिए कोई देवदूत बन कर आया था तो वे थे भारतीय सेना के जवान। ज्यादा दूर की बात छोडि़ए, दो दिन पहले ही खराब हुए मौसम में 73 कश्मीरियों को मौत के मुंह से बचाने कन्हैया कुमार नहीं आया था बल्कि सेना के वे जवान आए थे जिन्हें अपने सैंकड़ों साथी कश्मीर में 26 सालों से चल रहे आतंकवाद की बलि बेदी पर कुर्बान कर देने पड़े हैं। यह सच है कि कश्मीर में सैनिकों की कुर्बानियों का आंकड़ा सेना के लिए भी चिंता का कारण है। पर इसके बावजूद सेना ने कश्मीरियों की मदद से अपने हाथ पीछे नहीं खींचे। वर्ष 2014 के सितम्बर महीने में जब कश्मीर में सदी की भीषणतम बाढ़ आई तो सेना की बादामी बाग छावनी भी पूरी तरह से पानी में डूब गई। उनके हथियार और गोला-बारूद भी पानी में चला गया। ऐसे हालात के बावजूद सेना के जवानों ने दिन-रात जाग कर भूखे प्यासे रह कर एक लाख से अधिक कश्मीरियों को सुरक्षित बाहर निकाला था। ऐसी ही हालत 8 अक्तूबर 2005 को भी थे। सौ सालों के बाद पहली बार भीषण भूकंप ने कश्मीर को झकझोर कर रख दिया था। आम नागरिक ही नहीं बल्कि सेना को भी भारी क्षति उठानी पड़ी थी। एलओसी से सटे इलाकों में सबसे ज्यादा नुकसान सेना को हुआ था। बीसियों जवान मारे गए थे। लेकिन सैनिकों ने इस पर दुख या विलाप करने की बजाए नागरिकों को बचाने के कार्य को प्राथमिकता दी थी। यही नहीं सप्लाई लाइन बंद हो जाने के बाद सेना ने नागरिकों के लिए रहने और खाने-पीने की व्यवस्था की थी। ऐसे ही हिचकोले करीब तीन बार बर्फीले सुनामी ने कश्मीर को दिए थे। सेना के बंकर, पोस्टें, इत्यादि बर्फ के नीचे दफन हो गए। पर कश्मीरियों की मदद करने का जज्बा दफन नहीं हो पाया। तभी तो अनंतनाग के वाल्टेंगुनार में सेना के जवानों ने अपनी जान पर खेल कर हजारों कश्मीरियों को बचाया था। तब कश्मीरियों ने सेना के जवानों के लिए एक शब्द का इस्तेमाल किया था: 'मसीहाÓ। यह लेखा-जोखा कुछ बड़ी घटनाओं का था जब सेना के वे जवान कश्मीरियों के लिए देवदूत बन कर आए थे जिन पर कन्हैया कुमार जैसा छुटभैया नेता कश्मीरी महिलाओं से बलात्कार का घिनौना आरोप मढ़ रहे हैं, जबकि आए दिन ऐसी कई घटनाएं जम्मू कश्मीर में होती रहती हैं जब कश्मीरियों के लिए सैनिक 'मसीहाÓ बन कर सामने आते हैं। सिर्फ प्राकृतिक घटनाएं ही नहीं, आतंकवाद के दौरान पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों के जुल्मों के शिकार कश्मीरियों के लिए भी सेना मसीहा बन कर ही हमेशा सामने आई है। उसने कभी भेदभाव नहीं किया। तभी तो मरीयम बेगम आज भी सेना के जवानों को दुआएं देती हैं जिसके नाक और कान आतंकियों ने मुखबिर होने के आरोप में काट दिए थे और सेना ने उसे नए नाक और कान दिलवाए थे। इन सबके बीच करगिल की चोटियों पर 1999 के युद्ध में वीर गाथाएं लिखने वाले सैनिकों की दास्तानों को कैसे भुलाया जा सकता है जब उन्होंने विश्व का सबसे खतरनाक और कठिन युद्ध लड़ कर फतह पाई थी और दुनिया के सबसे ऊंचे युद्धस्थल सियाचिन हिमखंड पर तैनात जवानों के जज्बे और हिम्मत को शायद कन्हैया कुमार भी सलामी देने पर मजबूर होगा जो शून्य से 50 डिग्री के नीचे के तापमान में दुश्मन से हमारी रक्षा के लिए खड़े हैं ताकि हिन्दुस्तान में रहने वाले सुख और चैन की नींद सो सकें।

सिंहस्थ के बाद शीत युद्ध में उबाल


डॉ. अरूण जैन
सिंहस्थ को लेकर किवदंतियों का दौर इन दिनों अब चर्चाओं में दिखाई देने लगा है तो वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जिन्होंने गैर कांग्रेसी सरकार के मुखिया होने के नाते लम्बे समय तक प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने का जो मिथक तोड़ा है अब भले ही इस मिथक को लेकर तमाम तरह की वाहवाही लूटी जा रही हो यही नहीं सिंहस्थ और उससे जुड़ी किवदंतियों ने भी अब जोर पकड़ लिया है, हालांकि साधु-संतों द्वारा शिवराज को इनसे कुछ राहत दिलाने के उद्देश्य से यह घोषणा भले ही की जा रही हो कि वह सिंहस्थ के बाद प्रदेश की राजनीति में पडऩे वाले असर के मिथक को तोड़कर भी एक इतिहास बनायेंगे लेकिन ऐसा राजनैतिक पर्यवेक्षकों को नजर नहीं आ रहा है और वह यह कहते नजर आ रहे हैं कि भले ही साधु-संत शिवराज को यह तसल्ली दे रहे हों कि सिंहस्थ के बाद वह पद पर काबिज रहेंगे लेकिन मोदी और शिवराज के बीच चल रहे शीत युद्ध को देखकर तो ऐसा नहीं लगता है कि सिंहस्थ को लेकर जो किवदंतियां चर्चित हैं वह बदलती नजर आएंगी, भाजपा से जुड़े सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को जो 2014 के लोकसभा चुनाव के पूर्व भाजपा के कुछ नेताओं ने मोदी के स्थान पर उन्हें प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की जो आस जगाई थी अब वह धीरे-धीरे लौ पकडऩे लगी है है हालांकि राजनीतिक फलक पर नरेन्द्र मोदी के द्वारा उन भाजपाई नेताओं को तो धीरे-धीरे हाशिये पर पहुंचा दिया इसके बाद भी शिवराज सिंह की वह इच्छा इन दिनों प्रबल होती दिखाई देने लगी है भाजपा से जुड़े सूत्रों का तो यहां तक दावा है कि मोदी शिवराज के बीच सबकुछ सामान्य है लेकिन वह यह भी कहते नहीं थकते कि स्थितियां इस समय भिन्न दिखाई दे रही हैं और नरेन्द्र मोदी ने राज्य की तमाम केन्द्रीय योजनाओं पर राज्य में अपने स्तर पर मानिटरिंग कराने की योजना बनाकर शिवराज सरकार में चल रहे भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने का प्रयास किया है तो वहीं शिवराज सिंह भी पिछले कुछ दिनों से तमाम अनुष्ठानों और टोटकों के साथ-साथ ज्योतिषियों की राय पर नये-नये टोटके और अनुष्ठानों को अंजाम देने में लगे हुए हैं उससे यह लगता है कि मोदी और शिवराज के बीच चल रहा शीतयुद्ध सिंहस्थ के बाद उसमें कुछ उबाल आएगी और इसकी भनक इन दिनों भाजपा की राजनीति में देखी जा रही है, भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार शिवराज सिंह मोदी के खिलाफ कब शह और मात का खेल खेलेंगे इसके लिये वह उपयुक्त समय की प्रतीक्षा में हैं। क्योंकि वह अपने उन राजनैतिक आकाओं की सलाह पर सबकुछ नीति अनुसार करने में लगे हुए हैं, सूत्रों का तो यह भी दावा है कि मोदी मंत्रीमण्डल में भले ही सारे सदस्य टीम के मुखिया के होते हैं लेकिन उसमें भी शिवराज सिंह के करीब 14 से अधिक मंत्री मौजूद हैं जो समय आने पर कब क्या कर जाएं यह कुछ कहा नहीं जा सकता है। लेकिन धीरे-धीरे मुख्यमंत्री अपनी राजनीति बिसात अब मध्यप्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश में बिछाने की तैयारी में लगे हुए हैं। 
यूपी में प्रशांत किशोर के सहारे मंजिल पाने का प्रयास 
डॉ. अरूण जैन
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस फिर से खड़ा होना चाहती है। इसके लिये 2017 के विधानसभा चुनाव से बेहतर मौका और क्या हो सकता है। वैसे यह पहला प्रयास नहीं है और आखिरी भी नहीं होगा। करीब दो दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है। परम्परागत रूप से किसी भी चुनाव से पूर्व कांग्रेसी वापसी का ढिंढोरा पीटने लगते हैं। यह और बात है कि जब नतीजे आते हैं तो कांग्रेस जीत तो दूर तीसरे/चौथे स्थान पर दिखाई देती है। हर हार के बाद कुछ समय के लिये कांग्रेसी खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं और दिन बीतने के साथ चादर खिसकती जाती है। जब कांग्रेसियों के पास कोई विजन नहीं होता है तो जनता को बार−बार नेहरू−गांधी परिवार की कुर्बानी की याद दिलाकर भावनात्मक रूप से अपने पक्ष में करने का प्रयास किया जाता है। एक समय था उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास जनाधार वाले तमाम नेताओं की लम्बी−चौड़ी फौज हुआ करती थी। नारायण दत्त तिवारी, वीर बहादुर सिंह, लोकपति त्रिपाठी, वासुदेव सिंह, बलदेव सिंह आर्य, सईद्दुल हसन, नरेन्द्र सिंह, राजा अजीत प्रताप सिंह, स्वरूप कुमारी बख्शी, अरूण कुमार सिंह मुन्ना, महावीर प्रसाद, सिब्ते रजी, प्रवीण कुमार शर्मा, सुनील शास्त्री, हुकुम सिंह (अब दोनों भाजपा में), शिव बालक पासी, जफर अली नकवी, दीपक कुमार, मानपाल सिंह, सुखदा मिश्रा जैसे तमाम नेताओं की अपने−अपने इलाकों में तूती बोला करती थी। एक तो इन ताकतवर नेताओं की फौज और उस पर इंदिरा गांधी, राजीव गांधी जैसे नेताओं की सरपरस्ती ने कांग्रेस को कई दशकों तक यूपी में कमजोर नहीं होने दिया, लेकिन इंदिरा और राजीव गांधी की मौत के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस में सब कुछ तितर−बितर हो गया। न तो कांग्रेस की डूबती नैया को सोनिया गांधी उबार पाईं न ही राहुल गांधी की कोशिशें कामयाब हुईं। नारायण दत्त तिवारी कांग्रेस के आखिरी मुख्यमंत्री साबित हुए जो 1989 तक सीएम की कुर्सी पर विराजमान रहे थे। कांग्रेस में ताकतवर नेताओं की कमी सबको खलती रही, लेकिन इस दौरान कोई नई लीडरशिप नहीं उभरी। चंद नाम जरूर सामने थे, लेकिन यह सर्वमान्य नहीं थे। पूर्व केन्द्रीय मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल, उत्तर प्रदेश कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष डॉ. रीता बहुगुणा जोशी, प्रमोद तिवारी, संजय सिंह, आदित्य जैन, सलमान खुर्शीद, पूर्व नौकरशाह से नेता बने पीएल पुनिया, समाजवादी पार्टी छोड़कर कांग्रेस का दामन थामने वाले बेनी प्रसाद वर्मा, फिल्म अभिनेता से नेता बने राज ब्बर किस किस का नाम गिनाया जाये, कोई भी कांग्रेस को मझधार से नहीं उभार पाया। बात यहीं आकर खत्म नहीं हुई थी, जिस कांग्रेस का सिक्का पूरे देश में चलता था, उस कांग्रेस के दिग्गज नेताओं सोनिया−राहुल गांधी तक को अपनी जीत पक्की करने के लिये समाजवादी पार्टी से वॉकओवर लेना पड़ जाता था। अमेठी और रायबरेली में सोनिया−राहुल की जीत पक्की करने के लिये समाजवादी पार्टी अपना प्रत्याशी नहीं उतारती तो उपकार स्वरूप कांग्रेस नेतृत्व कन्नौज और मैनपुरी में अपना प्रत्याशी नहीं खड़ा करती ताकि मुलायम सिंह परिवार के सदस्य आसानी से अपनी जीत सुनिश्चित कर सकें। यूपी की तरह ही बिहार में भी कांग्रेस और राहुल गांधी नीतिश कुमार और लालू यादव के पिछल्लूग नजर आये। बात ज्यादा पीछे न जाकर 2007 और 2012 के विधान सभा चुनाव, 2009 एवं 2014 के लोकसभा चुनाव के अलावा बीते लगभग चार वर्षों में हुए विधान सभा के उप−चुनाव की कि जाये तो कांग्रेस कहीं भी मुकाबले में नहीं दिखी। उक्त चुनावों और उसमें कांग्रेस की पतली हालत की चर्चा इसलिये हो रही है क्योंकि इन सभी चुनावों में कांग्रेस ने अपने युवराज राहुल गांधी को आगे करके जीत के बड़े−बड़े दावे किये थे। जीत का स्वाद चखने के लिये राहुल गांधी ने दलितों के यहां जाकर कई दिन गुजारे। उनकी झोपड़ी में बैठकर खाना खाया। मच्छरों के बीच चरपाई पर सोये। जिस तरह राहुल ने दलितों को लुभाने के लिये अभियान चलाया था, उसी प्रकार मुसलानों को रिझाने के लिये भी उन्होंने कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। मुजफ्फरनगर दंगे हों या फिर दादरी कांड अथवा साम्प्रदायिक हिंसा का और कोई मामला राहुल स्वयं ऐसे मौकों पर गये और एक वर्ग विशेष के साथ एक पक्ष बनकर खड़े रहे। इसके बाद भी हाल ही में सम्पन्न हुए यूपी के पंचायत चुनावों में रायबरेली को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस का खाता नहीं खुला। सबसे करारी हार राहुल के अपने लोकसभा क्षेत्र अमेठी में हुई है। इस हार की ठीकरा राहुल गांधी और उनके खास लोगों के सिर पर फूटने से बचाने के लिए टीम राहुल व उनके करीबी लोगों ने यह बहाना बनाना आरम्भ कर दिया है कि पंचायत चुनाव चूंकि सिम्बल पर नहीं लड़े गए थे, इसलिए हार की जिम्मेदारी राहुल गांधी पर डालना नाइंसाफी होगी। हालांकि पार्टी में कई लोग इस तर्क से सहमत नहीं थे। कई जिलों में बेकार उम्मीदवारों के चयन के लिए सीधे तौर पर राहुल के करीबी लोगों पर अंगुलियां उठाई जा रही हैं। कांग्रेस के एक नेता ने कई जिलों की एक सूची बताई जहां पंचायत चुनाव अध्यक्षों की उम्मीदवारी तय करते समय उन जिलों के कांग्रेस कार्यकर्त्ताओं से चर्चा करना तक जरुरी नहीं समझा गया था। टीम राहुल के करीबी लोग कांग्रेस की हार के बचाव में विगत दो दशकों का आंकड़ा देते हुए यह भी तर्क गढ़ रहे हैं कि यूपी में जिसकी सरकार रहती है, उसी पार्टी के लोग ही पंचायत चुनावों में जीतते रहे हैं। कांग्रेस को लगातार पराजय मिल रही है, लेकिन आज भी यूपी में गांधी परिवार की उपस्थिति अमेठी, रायबरेली, इलाहाबाद और थोड़ी−बहुत सुखा प्रभावित बुंदेलखंड आदि इलाकों तक सीमित है। कांग्रेस के पास कोई ऐसा कद्दावर नेता नहीं है जिसे मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा सके। निर्मल खत्री, मधुसूदन मिस्त्री के सहारे संगठन अगर आगे बढ़ सकता तो कब का बढ़ गया होता। कांग्रेस में सर्वमान्य नेता का अभाव है तो सीएम के नाम पर जब चर्चा होती है तो कांग्रेसियों की सुई प्रियंका वाड्रा के नाम पर अटक जाती है। ऐसी हालत में कांग्रेस 2017 में कैसे वापसी कर सकती है। इसका जवाब लोग राहुल से पूछ रहे थे तो राहुल गांधी किसी परिपक्व नेता की तरह जवाब देने की बजाय प्रशांत किशोर की शरण में चले गये। पहले मोदी को प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचाने में और हाल ही में संपन्न हुए बिहार चुनाव में जदयू−राजद−कांग्रेस गठबंधन की जीत में अहम भूमिका निभाने वाले राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर राहुल की मर्जी के अनुसार अब यूपी चुनावों में कांग्रेस की कमान संभालेंगे। हाल ही में नई दिल्ली में यूपी चुनावों को लेकर कांग्रेस की बैठक में जब प्रशांत किशोर दिखाई दिये तो सियासी प्याले में उफान आ गया। बाद में पता चला कि प्रशांत किशोर के कंधों पर राहुल गांधी ने उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की जिम्मेदारी डाली है। पिछले करीब तीन दशकों से कांग्रेसी यूपी में सत्ता का स्वाद चखना तो दूर दो अंकों से आगे नहीं बढ़ पाये लेकिन प्रशांत किशोर का साथ मिलते ही कांग्रेसी 2017 के चुनाव में भाजपा, सपा और बसपा को चारों खाने चित कर देने का दावा करने लगे हैं।

पहाड़ों की रानी मसूरी के नजारों की बात ही और है 

डॉ. अरूण जैन
पर्यटन स्थल मसूरी अन्य हिल स्टेशनों से भिन्न है क्योंकि यहां एक ओर बर्फ की सफेद चादर ओढ़े भव्य हिमालय प्रहरी की तरह खड़ा है तो दूसरी ओर मैदानों में शीतलता का संचार करती हुई गंगा मंथर गति से बह रही है। मसूरी समुद्र तल से लगभग 6,500 फुट ऊंचाई पर स्थित है। पहाड़ों की रानी मसूरी के नजारों में जरूर कुछ बात है तभी तो यहां हर साल लाखों की संख्या में पर्यटक आते हैं खासकर हनीमून मनाने जाने वाले लोगों के लिए तो यह पसंदीदा जगह है। गनहिल मसूरी की दूसरे नंबर की सर्वाधिक ऊंची चोटी है। पुराने दिनों में समय का पता लगाने के लिए दोपहर को ठीक बारह बजे इस पहाड़ी पर रखी तोप दागी जाती थी। कुछ समय के बाद तोप हटा ली गई, तब से इसका नाम गनहिल पड़ गया। रोपवे से गनहिल पहुंचने का मजा सचमुच रोमांचक है। गनहिल में जहां एक ओर विशाल हिमालय की दूर दूर तक फैली सफेद झिलमिलाती चोटियां दिखाई पड़ती हैं वहीं दूसरी ओर दून घाटी की बिखरी पड़ी अद्भुत सुंदरता का नजारा देखने को मिलता है। कैमल्स बैक रोड़ भी देखने योग्य जगह है। यह सड़क घुड़सवारी व सैर करने के लिए बहुत अच्छी है। कैमल्स बैक का यह रास्ता कुलरी स्थित रिंक हाल से शुरू होकर लाइब्रेरी बाजार पर खत्म होता है। इस रास्ते पर पहाड़ी का आकार कुछ कुछ ऊंट की पीठ की भांति दिखाई देता है। इसलिए इस सड़क का नाम कैमल्स रोड़ पड़ गया। यहां की खास बात यह है कि पूरे रास्ते में जगह जगह पर थकान मिटाने तथा प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेने के लिए हवा घर बने हुए हैं। लंढोर बाजार मसूरी के सर्वप्रथम निर्मित मुलिंगार भवन से शुरू होकर लंढोर के घंटाघर पर खत्म होता है। एक मील लंबा यह बाजार पुराने समय की शान लिए हुए है। इस बाजार में कहीं तो आयातित सामान की दुकानें दिखाई देती हैं तो कहीं विशुद्ध भारतीय सभ्यता की गाथा कहती साधारण दुकानें हैं। आप लाल टिब्बा भी देखने जा सकते हैं। यह मसूरी की सर्वाधिक ऊंची चोटी है। आप यहां से दूरबीन की मदद से गंगोत्तरी, बदरीनाथ, केदारनाथ, नंदा देवी और श्रीकांता की चोटियों का विहंगम दृश्य देख सकते हैं। मसूरी से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर चकराता रोड़ पर स्थित कैंपटी फाल मसूरी का एक और सुंदर स्थल है। पर्वतों में से फूट कर निकलता हुआ यह झरना पांच अलग−अलग धाराओं में चालीस फुट ऊंचाई से गिरता हुआ दिखाई पड़ता है। आप नौकायान करना चाहें तो लेकमिस्ट देखने जा सकते हैं। इस स्थान को आधुनिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। मसूरी का म्यूनिसिपल गार्डन भी देखने योग्य है। यह गार्डन आजादी से पहले बोटोनिकल गार्डन कहलाता था। आजकल इसे कंपनी गार्डन भी कहा जाता है। कंपनी गार्डन में मुस्कुराते फूलों के अलावा एक छोटी सी कृत्रिम झील भी बनाई गई है। यहां पर निकट में ही एक छोटा सा तिब्बती बाजार भी है। इन सब स्थानों के अलावा आप मसूरी झील और भट्टा फाल तथा क्लाउड ऐंड भी देख सकते हैं। मसूरी के निकटवर्ती स्थलों की बात की जाए तो यमुना ब्रिज और नाग टिब्बा सहित धनोल्टी का नाम लिया जा सकता है। मसूरी तक जाने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून है। देहरादून दिल्ली, हावड़ा, लखनऊ, वाराणसी, मुंबई, अमृतसर और इलाहाबाद आदि से रेल मार्ग से जुड़ा हुआ है। देहरादून से मसूरी तक जाने के लिए टैक्सियां भी आसानी से मिल जाती हैं। यदि आप गर्मी से राहत पाने के लिए मसूरी जाना चाहते हैं तो अप्रैल से जून के बीच मसूरी जाएं। जुलाई से सितंबर तक यहां बरसात का आनंद लिया जा सकता है। यदि वहां घूमने−फिरने जाना चाहते हैं तो इसके लिए उत्तम समय अक्टूबर से दिसम्बर के बीच का है। यहां जनवरी से फरवरी के बीच में हिमपात होता है।
मेला क्षेत्र में 5 लाख 20 हजार वर्गफीट में, 52 स्थानों पर नेटवर्क कम्पनियों के टॉवर होंगे

डॉ. अरूण जैन
सिंहस्थ में अपनो से सम्पर्क का सबसे महत्वपूर्ण साधन मोबाईल होगा। मोबाइल फोन के बढ़ते उपयोग को देखते हुए मेला प्रशासन ने मोबाइल नेटवर्क कम्पनियों के साथ मिलकर एक बड़ी योजना बनाई है। इस योजना में ऐसी व्यवस्था की जा रही है कि सिंहस्थ के दौरान एक ही समय पर एक साथ दो लाख कॉल किये जा सकेंगे। सिंहस्थ के दौरान मोबाइल नेटवर्क और टॉकिंग कैपेसिटी तकनीक पर नेटवर्क कम्पनी द्वारा जोर दिया गया। मोबाइल नेटवर्क कम्पनियों को पूरे मेला क्षेत्र में विभिन्न स्थानों पर 52 प्लॉट आवंटित किये हैं। इरलॉग टैक्नोलॉजी के उपयोग से हो सकेंगे सतत् दो लाख कॉल सिंहस्थ के दौरान मोबाईल से सम्पर्क करने में किसी प्रकार की समस्या न हो इसलिए मोबाईल नेटवर्क कम्पनियां कुंभ मेलों में पहली बार इरलॉग टेक्नोलॉजी का उपयोग करेगी।  इस तकनीक के उपयोग से 8म8म8 कन्फीगरेशन की सहायता से वॉइस, एसएमएस और इंटरनेट डाटा के लिए नेटवर्क का इस्तेमाल किया जाता है।  इरलॉग टेक्नोलॉजी दूरसंचार सिस्टम में नेटवर्क ट्रॉफिक घनत्व की ईकाई है, जो किसी विशेष माध्यम (स्पेसिफिक चैनल) के लिए एक घंटे में 3600 सेकैंड के बराबर होती है।  पूरे मेला क्षेत्र में 5 लाख 20 हजार वर्ग फीट में लगेंगे टॉवर सिंहस्थ के दौरान नेटवर्क और टॉकिंग व कनेक्टिंग कैपिसीटी के लिए विभिन्न कंपनियाँ अपने-अपने टॉवर लगाएगी।  विभिन्न कंपनियों को टॉवर लगाने के लिए मेला कार्यालय द्वारा 52 प्लॉट आवंटित किए गये हैं।  इसके अलावा मोबाइल नेटवर्क प्रदान करने वाली कंपनियाँ आपस में टॉवर शेयरिंग करने के लिए भी सहमत हैं। एक प्लॉट 10 हजार वर्गफीट का है। मेला क्षेत्र में विभिन्न कंपनिंयों के मेला अवधि में 77 अतिरिक्त टॉवर लगाये जाएंगे।  52 टॉवर स्वयं कंपनियाँ अपने-अपने स्थानों पर लगाएगी।  जबकि 25 टॉवर शेयर किये जाएंगे। 9 टॉवर रिलायंस, 24 टावर आइडिया, 27 टॉवर एयरटेल, 17 टॉवर वोडाफोन द्वारा लगाए जायेंगे।  रिलायंस और वोडाफोन कंपनियाँ किसी अन्य के साथ टॉवर शेयर नहीं करेगी।  जबकि आइडिया 14 और एयरटेल 11 आपस में शेयर करेगी। दत्तअखाड़ा झोन में बीएसएनएल का मिनी एक्सचेंज होगाभारत संचार निगम लिमिटेड दत्त अखाड़ा झोन में एक मिनी एक्सचेंज आफिस बनाएगी।  

राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी

डॉ. अरूण जैन
भारत में काला धन कितना है इसके बारे में अलग-अलग अनुमान हैं। जो उजागर हो न हो, उसके बारे में ठीक-ठीक आंकड़ा हो भी कैसे सकता है। पर सारे अनुमान यही बताते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था में काले धन का अनुपात बहुत व्यापक हो चुका है; कुछ अर्थशास्त्रियों का यहां तक कहना है कि इसने लगभग एक समांतर अर्थव्यवस्था का रूप ले लिया है। यह बहुत ही चिंताजनक स्थिति है। पर कोई भी सरकार काले धन को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं रही है। यह अलग बात है कि भाजपा ने वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव में भी काले धन को बड़ा मुद््दा बनाया था और पिछले लोकसभा चुनाव में भी। मई 2014 के लोकसभा चुनाव में तो पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने यहां तक वादा किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो सौ दिनों के भीतर विदेशों में रखा-छुपा काला धन लाया जाएगा और हर गरीब भारतीय के खाते में पंद्रह लाख रुपए जमा किए जाएंगे। पर इस वादे की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि खुद पार्टी अध्यक्ष ने बाद में इसे एक चुनावी जुमला करार दिया। बहरहाल, जो कदम उठाए जा सके हैं उनमें से एक है, काले धन की पड़ताल के लिए एसआईटी यानी विशेष जांच दल का गठन। एसआईटी मोदी सरकार आने के बाद भले गठित हुई हो, इसका श्रेय असल में सर्वोच्च न्यायालय को जाता है, जिसने इसके लिए एक समय-सीमा तय कर रखी थी। दूसरा कदम उठाया गया कि बाहर जमा काले धन की वापसी के लिए पिछले साल सरकार ने कुछ रियायतें देने का फैसला किया था। अब देश में काला धन रखने वालों को चेताते हुए सरकार ने अनुपालन खिड़की की घोषणा की है। यह खिड़की एक जून को खुलेगी। इसके तहत काले धन की घोषणा करने पर उस पर तीस फीसद की दर से कर और पंद्रह फीसद अधिभार तथा जुर्माना अदा करना होगा। ऐसा करने वाले मुकदमे से बच सकेंगे। इस खिड़की के बंद होने के बाद जुर्माना बढ़ कर साठ फीसद हो जाएगा और तीस फीसद का कर अदा करना होगा। पिछले दो साल में सरकार के अभियान से बीस हजार करोड़ रुपए का काला धन बाहर निकाला गया है, जो कि खास कामयाबी नहीं कही जा सकती। विदेशों में जमा काले धन की बाबत अनुपालन खिड़की के तहत सिर्फ चार हजार एक सौ सैंतालीस करोड़ रुपए की बेहिसाबी संपत्ति की घोषणा की गई। दोनों के आशानुरूप परिणाम न मिलने से यह सवाल उठ सकता है कि क्या नया कदम कारगर साबित होगा? दरअसल, काले धन के खिलाफ कोई भी मुहिम तभी प्रभावकारी हो सकती है जब उसका जोर काले धन के स्रोतों को बंद करने तथा इसके प्रवाह और प्रक्रिया पर रोक लगाने पर हो। एक समय रिश्वतखोरी और कर-चोरी ही काले धन का प्रमुख जरिया थे। पर अब काले धन के ढेरों तरीके हैं। शेयर बाजार में पहचान छिपा कर निवेश करने, फर्जी कंपनियां बनाने, हवाला के जरिए हेराफेरी से लेकर 'मारीशस रूटÓ से किए जाने वाले तथाकथित निवेश तक तमाम हथकंडे अपनाए जाते हैं। आय कर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय से लेकर सीबीआई तक, सब विभागों और एजेंसियों को इन तिकड़मों के बारे में पता है। फिर कसर कहां रह जाती है? क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही है?