Friday, 15 April 2016

विश्व बाजार में हम कहां
डॉ. अरूण जैन
सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद विश्व बाजार में हमारा निर्यात लगातार घटता जा रहा है। वैश्विक औद्योगिक क्रांति के पहले विश्व व्यापार में भारत का योगदान पच्चीस फीसद था। यह ब्रिटिश शासन में गिर कर तेरह फीसद हो गया। आजादी के बाद यह तीन फीसद था और आज यह एक फीसद के आसपास है। अगर चालू वित्तवर्ष में निर्यात में गिरावट जारी रही तो लगातार दूसरे साल गिरावट होगी। आमतौर पर यह माना जाता है कि देश की मुद्रा की कीमत कम हो तो निर्यात में उससे मदद मिलती है। विडंबना यह है कि एक तरफ रुपए का रिकार्ड अवमूल्यन भी हुआ है और दूसरी तरफ निर्यात बढऩे के बजाय लुढ़कता गया है। वैश्विक मंदी के कारण विश्व व्यापार की चुनौतियां बढ़ी हैं। अलबत्ताजूट के सामानों, मसालों, हस्तशिल्प, चाय, फलों व सब्जियों के निर्यात में वृद्धि दर अच्छी रही है। यह ठीक है कि दुनिया का कोई भी देश आज वैश्वीकरण से अलग-थलग नहीं रह सकता। भारत भी वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक भाग बन गया है। पर किसी भी प्रकार के आर्थिक सुधार लागू किए जाने पर, जिसमें व्यापारिक सुधार भी शामिल है, कुछ लोगों को उससे लाभ होगा तो कुछ को हानि। पर इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि कोई ऐसा हल नहीं हो सकता जिसमें सुधारों से फायदा हो। आर्थिक उदारीकरण के लगभग पच्चीस साल के सफर में भारत ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। आज हमारा देश दुनिया की तेजी से उभरती हुई आर्थिक शक्तियों में गिना जाता है। एक नए मध्य वर्ग का उदय हुआ है। लेकिन महंगाई और बेरोजगारी भी बढ़ी है। अत: यह सवाल भी उठा है कि क्या हमें अपनी नीतियों का फिर से मूल्यांकन करना चाहिए। लगातार आठ फीसद की विकास दर हासिल करने के बाद अब इसमें गिरावट का सिलसिला शुरू हो गया है। गरीबी और अमीरी की खाई बढ़ी है। सामाजिक असंतुलन के कारण नक्सली हिंसा का विस्तार हुआ है। काले धन की भी तेजी से वृद्धि हुई है। आर्थिक सुधार की नीतियों से कॉरपोरेट घराने और मालामाल हुए हैं। लेकिन अब औद्योगिक उत्पादन में गिरावट हो रही है और हमारा विदेश व्यापार का घाटा लगातार बढ़ता जा रहा है। मांग में कमी से औद्योगिक उत्पादन गिर रहा है। सरकार ने कई नए कार्यक्रम शुरू किए हैं, पर अभी उनके नतीजे नही आए हैं। वास्तव में आर्थिक सुधार और विश्व व्यापार संगठन के समझौतों से उत्पन्न चुनौतियों के संदर्भ में यह आवश्यक हो गया है कि हम सारा ध्यान प्रतिस्पर्धा के मंत्र पर केंद्रित करें। इस प्रतिस्पर्धा में ऐसे कुछ सुरक्षात्मक कदम हमें जरूर उठाने चाहिए ताकि उनसे इस प्रतिस्पर्धा में हमारा अस्तित्व भी कायम रह सके और राष्ट्र का विकास भी हो। इसके लिए राष्ट्रीय लक्ष्य विशुद्ध लाभ का निर्धारित करें और क्षतिपूर्ति के कुछ ऐसे तरीके अपनाएं ताकि जिन लोगों को नुकसान हुआ हो, उन लोगों को क्षति की आवश्यक पूर्ति हो। घरेलू आर्थिक सुधार व बहुपक्षीय बातचीत उस सीमा तक जारी रखना चाहिए जहां तक राष्ट्रीय शुद्ध लाभ के सकारात्मक होने की स्थिति हो। आर्थिक सुधारों के लिए अधिकांश जनता का समर्थन कायम रखने की खातिरउन लोगों की क्षति की पूर्ति करने का हमें ध्यान रखना होगा जिन्हें उक्त सुधारों के कारण नुकसान हुआ है। उक्त क्षतिपूर्ति के लिए कुछ तरीके निकालने पड़ेंगे, जैसे पुन: प्रशिक्षण, शीघ्रता से दूसरे काम दिलवाने की सुनिश्चितता, नया व्यापार करने के लिए वित्तीय सहायता आदि। उद्योगों को अपने ढांचे व कार्यप्रणाली में भारी और मूलभूत परिवर्तन करने होंगे। अपने उत्पाद में गुणात्मक वृद्धि, विक्रय की गतिविधि में कार्यकुशलता, ऊर्जा प्रबंध और बाजार पहुंच के बीच ठहरने के लिए लागत कम करने आदि की आवश्यकता होगी। विकास दर में बढ़ोतरी के साथ-साथ महंगाई को काबू में रखने के लिए ठोस और दीर्घकालिक प्रयासों की जरूरत है। हमारी व्यापारिक नीति का अन्य नीतियों के साथ तालमेल होना निहायत जरूरी है, क्योंकि व्यापार एक ऐसा शक्तिशाली घटक है जो यदि अच्छी तरह से प्रबंधित किया जाए, तो उससे कई वर्गों व क्षेत्रों को लाभ हो सकता है। जरूरत इस बात की है कि विभिन्न घटकों जैसे सरकार, बाजार और अन्य संस्थाओं के बीच सही तथा उचित संतुलन हो और जिसमें किसी भी सहभागी घटक के हितों की अनदेखी न हो अर्थात वह सभी सहभागी घटकों के हितों में हो। पर इसके लिए पहले प्रणाली के सभी अंगों की खोजपूर्ण व्याख्या करनी पड़ेगी और प्रणालीगत कमजोरियों व अपर्याप्तताओं को पहचान कर उन्हें दुरुस्त करना पड़ेगा तथा शासन के आधार स्तंभों को पारदर्शी और न्यायोचित बनाना होगा। सुशासन के जरिए ही हम अपने उत्पाद को बेहतर बना कर दुनिया के बाजार का लाभ उठा सकते हैं। उदारीकरण के बारे में विवाद का एक बड़ा विषय है- उदारीकरण के नकारात्मक प्रभावों का प्रतिकार करने की सरकार की क्षमता। भारत जैसा देश मूलत: नौकरशाही के भरोसे चलता है। ऐसी नौकरशाही जिसमें अधिकांशत; स्वार्थपरक नौकरशाह हैं। ऐसी स्थिति में ऐसा नहीं लगता कि यह नौकरशाही भारत की अर्थव्यवस्था को विश्व की निरंतर बदलती हुई अर्थव्यवस्था के अनुरूप कोई आकार, बिना सरकार की भागीदारी के दे सकती हो। अत: आवश्यकता इस बात की है कि सरकार शासन करने की अपनी शैली को इस सीमा तक बदले कि निजी और सार्वजनिक क्षेत्रों के बीच में कुछ ऐसी ऊर्जा व गति आए जिससे यह सुनिश्चित हो जाए कि बाजारी प्रक्रियाएं भ्रमित नहीं होंगी और दोनों क्षेत्र मोटे रूप में अपने सामाजिक दायित्व का निरंतर निर्वहन करते रहेंगे। पहले उदारीकरण में सरकारी भूमिका प्रमुख रहती थी और निजी क्षेत्र उसमें मात्र पूरक का काम करता था, पर अब शायद स्थिति विपरीत हो चुकी है। मसलन, मूलभूत सुविधाओं के क्षेत्र में सरकारी भूमिका अपरिहार्य है और निजी क्षेत्र सड़कों और पुल आदि बनाने में बहुत अधिक निवेश करने से हमेशा कतराएगा, क्योंकि इन सार्वजनिक संपत्तियों का सीधे मूल्य निर्धारण नहीं हो सकता है। कुछ लोगों की सोच यह है कि सरकार यदि असफल होती है तो बाजार निश्चित रूप से सफल होगा और इसके विपरीत यदि सरकार सफल होती है तो बाजार असफल होगा। यह धारणा रखना गलत है। आज तक किसी भी राष्ट्र की अर्थव्यवस्था ने इस प्रकार के तार्किक संबंध की अनुभूति नहीं की है। दरअसल, सरकार को तो अपनी अर्थव्यवस्था में निजी निवेश की प्रक्रिया का रास्ता सहज व सुविधाजनक कर देना चाहिए और इस प्रकार एक उत्पादककी भूमिका निभाने के बजाय एक नियंत्रक की भूमिका निभानी चाहिए। पिछले अनुभवों के आधार पर और भविष्य में सुधार और पहल किए जाने के संकेतों को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भूमंडलीकरण से गरीबों के जीवन-स्तर में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है। पर केवल इस कारण से भूमंडलीकरण की प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न लगाना विवेकपूर्ण व उचित नहीं होगा, क्योंकि भूमंडलीकरण के नतीजों के सकारात्मक होने के लिए एक शर्त बहुत जरूरी होगी कि देश उपलब्ध अवसरों का पूरा-पूरा फायदा उठाए और उचित सुरक्षात्मक उपाय काम में लेते हुए नियंत्रणों या प्रतिबंधों से तालमेल रख कर कार्य करे। किसी भी देश के विकास के प्रभाव का वास्तविक मापदंड आम आदमी की मूलभूत आवश्यकताओं को उपलब्ध करवाना है। पर हमारे यहां इसके लिए कोई विशिष्ट रणनीति नहीं अपनाई गई है। इसका संभावित कारण यह है कि हमारा उदारीकरण प्रतिक्रियात्मक उदारीकरण है, न कि क्रियात्मक और सुनियोजित उदारीकरण। अत; आवश्यकता इस बात की है कि भूमंडलीकरण व सुधारों के प्रति जो हमारा वर्तमान में रुख है वह बदले और ये सुधार हमारी आवश्यकताओं और हितों के अनुरूप हमारी अपनी शर्तों पर ही हों। उदारीकरण को हम कृषि आधारित और जनाधार से प्रेरित उदारीकरण बनाएं, न कि मात्र कंपनी और व्यापार आधारित उदारीकरण। यह भी सही है कि भूमंडलीकरण के लिए अक्सर यह कहा जाता है कि वह अमीर और गरीब के बीच की खाई को और बढ़ाता है। पर इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस तरह की गरीबी की बात कर रहे हैं। जहां तक भारत का प्रश्न है उसकी प्राथमिकता गरीबी का उन्मूलन है। वह गरीबी जो मौत से भी बदतर है। इसलिए यदि भारत कोशिश करे तो भूमंडलीकरण के जरिए इस गरीबी से पीछा छुड़ा सकता है। पर इस समय जैसी स्थिति है उससे नहीं लगता कि वर्तमान सरकारी शैली व प्रणाली के रहते भारत भूमंडलीकरण का पूरा लाभ उठा सकता है। भूमंडलीकरण का पूरा लाभ उठाने के लिए भारत को प्रशासन के स्तर पर सुधार लाने होंगे। सरकारी संरक्षण कम करने होंगे तथा भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में और अधिक भागीदारी निभाने के साथ-साथ सरकार यदि उचित वातावरण व समुचित मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराएगी तो ही भूमंडलीकरण की प्रक्रिया में लाभ अर्जित होंगे, जैसे उसे कम कीमत पर सही मात्रा में सही गुणात्मकता की बिजली उपलब्ध करानी होगी। मूलभूत सुविधाएं मसलन संचार माध्यम, सड़कें, परिवहन, बंदरगाह आदि उपलब्ध कराना पड़ेगा। श्रम बाजार को लचीला बनाना पड़ेगा ताकि बिना शोषण उचित मूल्य पर समुचित व सही प्रकार के कामगार उपलब्ध हो सकें, नौकरशाही के तंत्र को कसना पड़ेगा, उनका नजरिया बदलना पडेÞगा व उन्हें अनुशासित करना पड़ेगा। उनको यह सिखाना पड़ेगा कि वे लोक सेवक हैं और जनहित के प्रति उनका सीधा उत्तरदायित्व है। भ्रष्टाचार के इस वातावरण में भ्रष्ट अधिकारी भूमण्डलीकरण की प्रक्रिया में बाधक सिद्ध होते हैं। अत; भ्रष्ट अधिकारियों से सतर्क रहने के लिए सरकार को प्रभावी प्रणाली निर्मित करनी पड़ेगी। पूरी प्रशासनिक व्यवस्था पारदर्शी, न्यायोचित और जवाबदेह बनाई जानी चाहिए।
मोदी सरकार का नया मंत्र- मेरा गाँव मेरा देश 

डॉ. अरूण जैन
वित्त वर्ष 2016-17 के लिए पेश किया गया आम बजट जहाँ ग्रामीण अर्थव्यवस्था में एक नई क्रांति लाने का प्रयास है वहीं शहरी गरीबों का भी ध्यान रख सरकार ने विपक्ष के सूट बूट की सरकार होने के आरोपों को कमतर करने का प्रयास किया है। बजट में अमीरों से थोड़ा और लेकर गरीब हाथों में देने का प्रस्ताव किया गया है। सरकार ने कृषि कल्याण टैक्स लगाकर अपनी किसान विरोधी छवि खत्म करने का भी प्रयास किया है क्योंकि पिछले वर्ष भूमि अधिग्रहण विधेयक को लेकर सरकार की जो किसान विरोधी छवि बनी थी उसका बड़ा राजनीतिक खामियाजा सत्तारुढ़ दल को भुगतना पड़ा था। पिछले बजट से यदि इस बजट की तुलना करें तो इस बार कोई भी नहीं कह सकता कि यह पूंजीपतियों के लिए या अमीरों को ध्यान में रख कर बनाया गया बजट है। वित्त मंत्री ने सर्वाधिक जोर राजस्व अर्जित करने और उसका आवंटन बुनियादी ढांचा के विकास पर ज्यादा से ज्यादा करने पर दिया है। आम बजट ने साफ संकेत दे दिया है कि सत्तारुढ़ पार्टी ने हालिया चुनावी हारों को गंभीरता से लिया है। पिछले बजट में स्मार्ट सिटी पर जोर देने वाली सरकार ने इस बार गांवों और किसानों पर ज्यादा ध्यान दिया। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने वर्तमान माहौल में जो बजट बनाया है उसे पूरी तरह संतुलित कहा जा सकता है। हालांकि मध्यम वर्ग और उद्योग जगत को बजट से जो उम्मीदें थीं वह सभी पूरी नहीं हो पायी हैं लेकिन सरकार ने विकास के इंजन को तेजी से आगे बढ़ाने पर निश्चित रूप से ध्यान दिया है। बजट प्रस्तावों को देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि वित्त मंत्री अंत्योदय मंत्र को लेकर आगे बढ़े हैं और समाज के निचले तबके की ज्यादा परवाह की है। अभी तक इस तबके की याद चुनावों के समय ही राजनीतिक दलों को आती रही है। अच्छा है कि मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल के दूसरे वर्ष में ही इस वर्ग की सुध ले ली। हालांकि सरकार सभी बजट प्रस्तावों को कितना अमल में ला पाती है यह अभी देखने वाली बात होगी। वित्त मंत्री ने रॉबिनहुड की तर्ज पर अमीरों से धन लेकर गरीबों में बांटने की जो योजना बनाई है उस पर अमल सही तरह से होते दिखना भी चाहिए। वित्त मंत्री ने करदाताओं के पैसों के सही इस्तेमाल पर भी जोर दिया है देखना होगा कि सरकार इसमें कितना कामयाब होती है। दरअसल सरकार समझ चुकी है कि जब तक कृषि और ग्रामीण क्षेत्र का भला नहीं होगा देश के लिए अच्छे दिन नहीं आएँगे। इसलिए कभी मनरेगा के प्रभाव पर सवाल उठाने वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने वित्त वर्ष 2016-17 में इस योजना के लिए आवंटन 3,800 करोड़ रुपये बढ़ाने का प्रस्ताव किया है। यदि पूरी राशि खर्च हो जाती है तो यह मनरेगा में अब तक सबसे बड़ा बजट खर्च होगा। साथ ही वित्त मंत्री ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के दीर्घ कालिक लक्ष्य के साथ कृषि क्षेत्र के लिए करीब 36,000 करोड़ रुपए के आवंटन की घोषणा की है। सरकार ने उर्वरक सब्सिडी भी अब सीधे किसानों के बैंक खातों में पहुंचाने की पहल की घोषणा की है। खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में सौ फीसदी प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की इजाजत से भी किसानों को लाभ होगा। अगले वित्त वर्ष के लिए कृषि ऋण का लक्ष्य बढ़ाकर नौ लाख करोड़ रुपए करने का प्रस्ताव भी किया गया है। कृषि ऋण पर ब्याज छूट के लिए 15,000 करोड़ रुपए का आवंटन और नयी फसल बीमा योजना के लिए 5,500 करोड़ रुपए तथा दलहन उत्पादन को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए 500 करोड़ रुपए का आवंटन कर सरकार ने साफ किया है कि उसकी किसानों पर ज्यादा ध्यान देने की योजना है लेकिन यहाँ कुछ सवाल भी उठते हैं जैसे कि यदि 2022 तक किसानों की आय दोगुना करने का लक्ष्य है तो अब भी निम्न आय में जी रहा किसान क्या 2022 तक भी निम्न आय वाला ही बना रहेगा? 2022 तक तो महंगाई और भी बढ़ चुकी होगी ऐसे में किसान का भला मात्र दोगुनी आय से कैसे होगा? सरकार ने किसानों को ऋण सुलभ कराने का इंतजाम तो कर दिया है लेकिन उसे ऋण से बाहर आने का मौका मिलता तो ज्यादा अच्छा होता। शहरी मध्यम वर्ग को जरूर इस बजट से कुछ निराशा हुई होगी लेकिन सरकार का उसके बारे में यह मानना है कि यह वर्ग सबसिडी नहीं सुविधाएँ चाहता है और जोर इसी बात पर है कि उसे सभी जरूरी सुविधाएँ मुहैया करायी जाएं। हालांकि सरकार ने इस वर्ग को कुछ राहत प्रदान की है। पहली बार मकान खरीदने वालों को 35 लाख रुपये तक के कर्ज पर 50,000 रुपये सालाना अतिरिक्त ब्याज छूट देने की घोषणा की गयी है। इस योजना में शर्त यह है कि मकान का मूल्य 50 लाख रुपये से अधिक नहीं होना चाहिए। इसके अलावा छोटे करदाताओं को राहत देते हुए बजट में 5,00,000 रुपये तक सालाना आय वालों के लिये धारा 87 (ए) के तहत कर छूट सीमा 2,000 रुपये से बढ़ाकर 5,000 रुपये करने का प्रस्ताव किया गया है। इस श्रेणी में दो करोड़ करदाता हैं जिन्हें कर देनदारी में 3,000 रुपये की राहत मिलेगी। जिनके पास अपना मकान नहीं है और उन्हें नियोक्ताओं से आवास भत्ता नहीं मिलता है उन्हें 60,000 रुपये का छूट मिलेगी जो फिलहाल 24,000 रुपये है। एक करोड़ रुपये से अधिक के व्यक्तिगत आयकर पर 12 प्रतिशत अधिभार को बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर साफ संकेत दिया गया है कि आने वाले समय में उच्च वर्ग को और त्याग करने के लिए तैयार रहना होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक अर्थव्यवस्था जिस गंभीर संकट से गुजर रही है उसमें भारत का प्रदर्शन कमोबेश ठीकठाक रहा है। सरकार की मानें तो पिछली सरकार के अंतिम तीन वर्षों में विकास दर घटकर 6.3 प्रतिशत रह गई थी जबकि सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर अब बढ़कर 7.6 प्रतिशत हो गई है। पिछली सरकार के अंतिम तीन वर्षों के दौरान उपभोक्ता मूल्य सूचकांक संबंधी मुद्रास्फीति 9.4 प्रतिशत के स्तर पर थी जो कम होकर 5.4 प्रतिशत पर आ गई है। किसी भी वित्त मंत्री की सफलता असफलता राजकोषीय घाटे को कम करने और राजस्व लक्ष्य अर्जित करने पर भी टिकी होती है। इस मोर्चे पर देखें तो राजकोषीय घाटा चालू वित्त वर्ष में 3.9 प्रतिशत अनुमानित है जिसे अगले वित्त वर्ष में कम कर 3.5 प्रतिशत पर लाया जाएगा। अगले वित्त वर्ष में कुल सरकारी खर्च 19.78 लाख करोड़ रुपये होगा। इसमें 5.50 लाख करोड़ रुपये योजना व्यय तथा अन्य 14.28 लाख करोड़ रुपये गैर-योजना व्यय में खर्च होंगे। चालू वित्त वर्ष में राजस्व घाटा बेहतर रहने का अनुमान है और यह जीडीपी का 2.5 प्रतिशत रह सकता है जबकि बजटीय लक्ष्य 2.8 प्रतिशत था। सरकार ने कृषि और ग्रामीण क्षेत्र के साथ-साथ शहरी क्षेत्र का भी ध्यान रखा है तथा कस्बों को शहरों में परिवर्तित करने की ओर भी ध्यान दिया है। बजट में आर्थिक वृद्धि की गति तेज करने के लिये बुनियादी ढांचे क्षेत्र पर काफी जोर दिया गया है। रेलवे और सड़क परियोजनाओं सहित विभिन्न ढांचागत योजनाओं के लिये 2.21 लाख करोड़ रुपए आवंटित किये गये हैं। बुनियादी ढांचे के लिए एक नयी क्रेडिट रेटिंग प्रणाली विकसित करने का भी प्रस्ताव किया गया है। सरकार ने गरीब परिवारों की महिला सदस्यों के नाम रसोई गैस कनेक्शन मुहैया कराने और इसमें दो साल के भीतर पांच करोड़ बीपीएल परिवारों को शामिल करने की महत्वाकांक्षी योजना भी बनाई है। इसके अलावा गरीबों का ध्यान रखते हुए देश में सभी जिला अस्पतालों में डायलिसिस सेवाएँ और कम कीमत पर जेनेरिक दवा उपलब्ध कराने के लिए देश भर में 3,000 जन औषधि स्टोर खोलने की भी घोषणा की है। इसके अलावा सभी परिवारों को बीमा के दायरे में लाने की योजना भी पेश की गयी है। शहरों में बढ़ते प्रदूषण और यातायात की स्थिति पर गौर करते हुए गाडिय़ों पर उपकर लगा दिया गया है तथा बीडी को छोड़ सभी तंबाकू उत्पादों पर उत्पाद शुल्क बढ़ा दिया गया है। चांदी को छोड़ सभी आभूषणों पर शुल्क बढ़ा दिया गया है। सरकार ने लगभग 26 सौ करोड़ रुपए का नया टैक्स जुटाने का भी लक्ष्य रखा है जिसे अर्जित कर पाना असंभव नहीं तो मुश्किल तो है ही। अभी सरकार की आलोचना इस आरोप के साथ हो रही है कि उसने यह 2022 का बजट बना दिया है। वित्त मंत्री ने जीडीपी और महंगाई दर के जो आंकड़े पेश किये हैं उसके आधार पर देखें तो अर्थव्यवस्था का विकास तेज हुआ है, विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा है और महंगाई कम हुई है लेकिन यदि इन आंकड़ों से परे हटकर हकीकत के धरातल पर देखें तो महंगाई ने हर वर्ग को परेशान किया है और अच्छे दिन लाने का वादा अब तक पूरा नहीं हुआ है। बहरहाल, बजट में कुछ प्रमुख खामियाँ रह गयी हैं जैसे कि ग्रामीण महिलाओं के लिए एलपीजी कनेक्शन की व्यवस्था की गयी है लेकिन शहरी महिलाओं के खाते में कुछ नहीं आया है। महिल सुरक्षा पर भी कोई विशेष ध्यान बजट में नहीं दिया गया है। खेलों का बजट जिस तरह नाममात्र के लिए बढ़ाया गया है उससे लगता है क्रिकेट का राज बना रहेगा। किसानों के लिए कर्ज की व्यवस्था कर दी गयी लेकिन कर्ज से निजात दिलाने की ज्यादा कोशिश नहीं की गयी।
सात प्रसिद्ध पुरियों में से एक है श्रीकृष्ण की द्वारका 

डॉ. अरूण जैन
गुजरात के पश्चिमी सागर के तट पर स्थित द्वारका को वैसे तो एक तीर्थ माना जाता है लेकिन अपनी ऐतिहासिकता, कलात्मकता, भवनों और प्रकृति की रमणीयता के कारण यह देश का एक प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भी है। पौराणिक युग में इसे कुशस्थली और द्वारवती नामों से भी जाना जाता था। द्वारका प्राचीन भारत की सात प्रसिद्ध पुरियों में से एक है। यहां उत्कृष्ट वास्तुकला को उजागर करती हुई अनेक इमारतें हैं। आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, नरसी मेहता, मीरा, कबीर, नानक आदि यहां आने वाले प्रसिद्ध सैलानी हैं। द्वारका अपने द्वारकाधीश मंदिर के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। इसे जगत मंदिर भी कहते हैं। पारम्परिक शैली में निर्मित यह मंदिर पांच मंजिला है। भूतल से लेकर शिखर तक मंदिर के हर भाग को बखूबी तराशा गया है। यहां भगवान श्रीकृष्ण का जन्मदिवस बड़े ही धूमधाम और उत्साह के साथ मनाया जाता है। देशभर में चार स्थानों पर आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित किए गए मठों में से एक शारदा पीठ भी यहां है। शारदा पीठ शैक्षिक सोसाइटी, आर्ट्स कालेज और संस्कृत अकादमी का संचालन करती है यहां संस्कृत और इंडोलाजी में शोध की सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। विश्व प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक ज्योतिर्लिंग द्वारका में है, जिसे नागेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। भक्तजनों के लिए यह ज्योतिर्लिंग कितना महत्व रखता है इसका आभास यहां होने वाली भीड़ को देखकर लगाया जा सकता है। द्वारका नगर से करीब 35 किलोमीटर दूर स्थित बेट द्वारका को बेट शंखोद्धार भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण यहीं अपने परिवार के साथ रहते थे। बेट द्वारका के लिए द्वारका से ओखा तक लगभग 30 किलोमीटर की दूरी रेल या बस से तय की जा सकती है। उसके बाद करीब 5 किलोमीटर की समुद्री यात्रा बोट द्वारा तय की जा सकती है। पर्यटकों के लिए यह एक रोमांचक अनुभव रहता है। बेट द्वारका में बना भगवान श्रीकृष्ण का मंदिर एक पुराना घर मात्र है लेकिन इसकी मान्यता बहुत है। द्वारका के अन्य दर्शनीय स्थलों में रूक्मिणी मंदिर, लक्ष्मी मंदिर, मीरा बाई मंदिर, नरसी मेहता मंदिर आदि प्रमुख हैं। द्वारका वीरमगाम से ओखा जाने वाली मीटरगेज रेलवे लाइन पर स्थित है। राजकोट, जामनगर और अहमदाबाद से यहां के लिए रेल सुविधाएं आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। स्टेट हाइवे द्वारा द्वारका गुजरात व देश के अन्य भागों से जुड़ा हुआ है। गुजरात राज्य परिवहन निगम की बसें राज्य के विभिन्न भागों से द्वारका जाती हैं। सामान्यत: द्वारका पर्यटन के लिए मध्य सितंबर से मध्य मई तक का मौसम अनुकूल रहता है। यदि आप चाहें तो अहमदाबाद पर्यटन के दौरान द्वारका पर्यटन का कार्यक्रम भी बना सकते हैं।

बुलेट ट्रेन से पहले


डॉ. अरूण जैन
भारत में लगभग एक दशक से चर्चा का विषय बनी बुलेट ट्रेन अर्थात बहुत तीव्र गति से चलने वाली ट्रेन का सपना लगता है अब पूरा होने के करीब है। पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने अपनी जापान यात्रा के दौरान जिस तीव्र गति से चलने वाली ट्रेन को भारत में लाए जाने पर चर्चा छेड़ी थी, पिछले दिनों जापान के प्रधानमंत्री के भारत दौरे के बाद संभवत: वह परियोजना अब आकार लेती दिखाई दे रही है। योजना के अनुसार बुलेट ट्रेन की शुरुआत अमदाबाद व मुंबई जैसे देश के दो पश्चिमी महानगरों के मध्य की जानी है। लगभग पांच सौ किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर उच्च गति वाली रेल परियोजना तैयार करने में लगभग एक लाख करोड़ रुपए की लागत आने की संभावना है। यह धनराशि भी जापान द्वारा ही भारत को कर्ज के रूप में दी जाएगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उच्च गति से चलने वाली यह ट्रेन परियोजना पूरा होने के बाद भारत को उन चंद देशों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी जहां बुलेट ट्रेन संचालित हो रही है। इस समय विश्व के जिन देशों में तीव्र गति की ट्रेन चलाई जा रही है उनमें चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस, इटली, पोलैंड, दक्षिण कोरिया, ताईवान, तुर्की, अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, पुर्तगाल, उजबेकिस्तान, स्वीडन, आस्ट्रिया तथा बेल्जियम आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन देशों में सबसे ताजातरीन परियोजना चीन ने शुरू की है जो इस परियोजना को शुरू करने के साथ ही विश्व में सबसे अधिक दूरी तक की बुलेट ट्रेन रेल लाइन बिछाने वाले देशों में भी शामिल हो गया है। चीन ने अब तक लगभग बीस हजार किलोमीटर तक की रेल लाइन बिछाने में सफलता हासिल की है। आमतौर पर तीव्र गति वाली ये रेलगाडिय़ां दो सौ किलोमीटर प्रति घंटा से लेकर तीन सौ साठ किलोमीटर प्रति घंटा तक की गति से चलाई जाती हैं। गौरतलब है कि बुलेट ट्रेन का संचालन सामान्य रेल व्यवस्था से अलग किस्म का होता है। लिहाजा, इसके लिए रेल लाइन से लेकर रेलवे स्टेशन, नियंत्रण कक्ष, स्टाफ तथा इससे संबंधित सभी तकनीकी व्यवस्थाएं अलग से करनी पड़ती हैं। अर्थात यदि भारत में बहुत तीव्र गति से चलने वाली बुलेट ट्रेन ने अपने पांव पसारे तो इसकी खातिर नई रेल लाइन बिछाने के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त स्टेशन, स्टॉफ से लेकर नियंत्रण केंद्र तक का पूरा ढांचा नए सिरे से तैयार किया जाएगा। जाहिर है, एक लाख करोड़ रुपए जैसी भारी-भरकम रकम जो मुंबई-अमदाबाद जैसे छोटे रूट के लिए निर्धारित की गई है वह इन्हीं बातों के मद्देनजर है। यहां यह सोचना भी गलत नहीं होगा कि इतने भारी-भरकम खर्च के बाद शुरू की जाने वाली इस ट्रेन का किराया भी विमान के किराए से कम तो बिल्कुल नहीं होगा, ज्यादा जरूर हो सकता है। पिछले दिनों जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के भारत के दौरे के बाद जब से इस परियोजना पर सहमति हुई उसी समय से इस परियोजना के पक्ष और विपक्ष में तरह-तरह की चर्चा चल रही है। जहां देश का एक वर्ग बुलेट ट्रेन के भारत में आगमन की संभावनाओं पर संतोष जता रहा है और इसके पक्ष में कई दलीलें पेश कर रहा है, वहीं इस परियोजना को लेकर आलोचना के स्वर भी अत्यंत तार्किक व मुखर हैं। समर्थन में दिया जाने वाला तर्क खासतौर पर भविष्य में र्इंधन की कमी तथा वर्तमान जलवायु संकट से निपटने के उपाय का है। इस परियोजना के आलोचकों के तर्कों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे पहली आलोचना तो इस परियोजना पर आने वाली भारी-भरकम लागत को लेकर है। सवाल यह किया जा रहा है कि एक लाख करोड़ की रकम जापान से उधार लेकर देश में तीव्र गति की रेल चलाया जाना ज्यादा जरूरी है या बुलेट ट्रेन के संचालन से पहले देश की वर्तमान रेल व्यवस्था तथा मौजूदा रेल ढांचे में सुधार जरूरी है? हालांकि भारतीय रेल निरंतर सुधार की प्रक्रिया के दौर से गुजर रही है। पर इसके बावजूद अब भी इससे जुड़ी अनेक ऐसी बुनियादी बातें हैं जो वर्तमान भारतीय रेल व्यवस्था की संपूर्णता पर सवाल खड़ा करती हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय रेल को लेट-लतीफी से निजात नहीं मिल पा रही है। खासतौर पर सर्दियों में कोहरा पडऩे के दिनों में रेलगाडिय़ां घंटों देरी से चलती हैं। यह देरी बारह, चौदह और सोलह घंटे तक खिंच जाती है। निश्चित रूप से कोहरे में सिग्नल नजर आने में दिक्कतें होती हैं, जिसकी वजह से रेलगाडिय़ों की गति कम होने से विलंब होना स्वाभाविक है। पर ऐसे समय जबकि भारत बुलेट ट्रेन को आमंत्रित करने जा रहा हो, सर्वप्रथम वर्तमान रेल व्यवस्था में ऐसी तकनीकी प्रणाली का होना बहुत जरूरी है जो धुंध के बावजूद ड्राइवर को सिग्नल होने या न होने की जानकारी स्वत: दे सके। अन्यथा यदि वर्तमान लाल व हरे सिग्नल को देखने के भरोसे पर ही रेलगाडिय़ां चलती रहीं तो क्या बुलेट ट्रेन का संचालन भी इस दुर्व्यवस्था का शिकार नहीं होगा?दूसरा सबसे बड़ा प्रश्न भारतीय रेल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर है। हमारे यहां लगभग पूरे देश में मात्र राजधानी व शताब्दी जैसी चंद रेलगाडिय़ों को छोड़ कर, प्राय: अन्य सभी एक्सप्रेस व पैसेंजर रेलगाडिय़ों के किसी भी डिब्बे में आसामाजिक तत्त्व, चोर-लुटेरे या अनधिकृत वैंडर, भिखारी प्रवेश कर सकते हैं। यात्री स्वयं उससे बाहर निकलने के लिए इसलिए नहीं कहता कि वह किसी विवाद या झगड़े में पडऩा नहीं चाहता। यदि हम चीन जैसे देशों से बराबरी करते हुए बुलेट ट्रेन की दौड़ में शामिल होना चाह रहे हैं तो हमें चीन की सामान्य रेल व्यवस्था से सबक लेने की भी जरूरत है। चीन में बुलेट ट्रेन अथवा सामान्य ट्रेन तो क्या सामान्य रेलस्टेशन के प्लेटफार्म पर भी कोई व्यक्ति बिना टिकट के प्रवेश नहीं पा सकता। और वहां बिना निजी पहचान पत्र के किसी भी व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जाता। फिर आखिर कोई चोर-लुटेरा ट्रेन के डिब्बे में कैसे प्रवेश कर सकेगा? यही व्यवस्था हमारे देश में भी लागू की जानी चाहिए। लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय रेल इन दुर्व्यवस्थाओं से मुक्ति पाने का रास्ता ढूंढे बिना अत्यंत खर्चीली बुलेट ट्रेन की ओर देख रही है। हमारे देश में कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनसे साबित हो चुका है कि भारतीय रेल में पुलिस की मिलीभगत से यात्रियों को लूटा जाता है। इतना ही नहीं, कई बार पुलिस वाले स्वयं यात्रियों को उनकी तलाशी के बहाने लूट लेते हैं। ऐसे कई मामले जीआरपी में दर्ज भी हैं। देश में कई स्थानों पर जीआरपी, आरपीएफ और टिकट निरीक्षक की मिलीभगत से व्यापारियों द्वारा अपना माल बिना किसी रेलवे भुगतान के मंगाया या ले जाया जाता है। टिकट-निरीक्षक बेटिकट यात्रियों से पैसा लेकर यात्रा करने की छूट दे देते हैं। टिकट निरीक्षक आरक्षण के हकदार आरएसी या वेटिंग के यात्रियों को बर्थ देने के बजाय उन यात्रियों को पहले बर्थ दे देते हैं जो उनकी मु_ी गरम करते हैं। रेलवे स्टेशनों पर भिखारियों के रूप में नशेडिय़ों और नशे का कारोबार करने वालों की भीड़ देखी जा सकती है। इनमें भी चोर व लुटेरे इसी वेश में पनाह लेते हैं। जो पुलिस रेल की सुरक्षा के लिए रेलवे प्लेटफार्म पर तैनात की जाती है वह अपनी नाजायज ढंग से होने वाली कमाई के प्रति इतनी चौकस रहती है कि सुबह चार बजे से ही उन व्यापारियों पर नजर रखने लगती है जो बिना बुकिंग के अपना सामान ट्रेन पर रख कर ले जाना चाहते हैं। पर चौबीस घंटे प्लेटफार्म पर रह कर नशा करने वाले तथा शराब पीकर नग्नावस्था में पड़े रहने वाले व जुर्म को संरक्षण देने वाले भिखारी रूपी लोगों को प्लेटफार्म से भगाने का कष्ट यही पुलिस गवारा नहीं करती। बजाय इसके , कभी उनसे चाय-सिगरेट मंगवाती है तो कभी अपना स्कूटर या मोटरसाइकल साफ करवाती है। देश में प्लेटफार्म की कमी एक और बड़ी समस्या है। उदाहरण के तौर पर, बिहार के दरभंगा जिले का लहेरिया सराय रेलवे स्टेशन प्रारंभ से ही केवल एक प्लेटफार्म पर आश्रित है। जबकि दरभंगा के अधिकतर सरकारी कार्यालयों के जिला मुख्यालय लहेरिया सराय रेलवे स्टेशन के आसपास ही हैं। इसके बावजूद इस स्टेशन पर एक ही प्लेटफार्म है, जबकि अक्सर यहां एक साथ कई रेलगाडिय़ां आती-जाती रहती हैं। यहां प्लेटफार्म नंबर एक के यात्री ही सुरक्षित तरीके से प्लेटफार्म पर चढ़-उतर पाते हैं। दूसरी व तीसरी लाइन पर आने वाली गाडिय़ों और अपने निर्धारित डिब्बे तक पहुंचना यात्रियों के लिए बेहद खतरनाक होता है। इस स्टेशन पर कई बार लाइन नंबर दो व तीन पर पत्थरों पर दौड़ते हुए यात्री दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं। वहां कई लोगों का ट्रेन में चढऩे से रह जाना तो आम बात है। खासतौर पर वृद्धों और महिलाओं को काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। इस प्रकार के देश में सैकड़ों रेलवे स्टेशन हैं जहां यात्रियों की सुविधाओं और उनकी सुरक्षा के लिए प्लेटफार्म नंबर दो-तीन या चार के निर्माण की आवश्यकता है। जाहिर है, पहले इन बुनियादी जरूरतों को पूरा किए जाने की जरूरत है, न कि इन तकाजों और प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करते हुए सीधे बुलेट ट्रेन दौड़ाने का सपना पूरा करने की। 

गंगा सफाई योजना अधर में क्यों


डॉ. अरूण जैन
गंगा की सफाई और अविरलता को लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (एनजीटी) गंभीर है। उसने केंद्र से स्पष्ट कहा है कि बगैर उसकी अनुमति के उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड सरकार को कौड़ी भी मुहैया न कराएं। इतना ही नहीं, एनजीटी ने केंद्रीय जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा पुनर्जीवन मंत्रालय पर भी काफी तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि गंगा की सफाई पर उसके पास सुंदर-सुंदर नारों के सिवाय कुछ भी नहीं है। एनजीटी ने यहां तक कहा है कि गंगा पर सरकार का काम उसके नारों से उलट रहा है। दरअसल, एनजीटी ने उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड की सरकारों को गंगा सफाई को लेकर लापरवाही बरतने और प्रदूषण के स्रोतों को लेकर कोई संतोषजनक उत्तर न देने पर बजट रोकने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय की खिंचाई इन राज्यों पर आवश्यक कार्रवाई नहीं करने की वजह से की है। मंत्रालय की कमान उमा भारती के पास है और वे अकसर उत्तराखंड के हरिद्वार पहुंचती हैं और यहां गंगा में स्नान करती हैं। यहां यह बताना भी उचित होगा कि प्रदूषण की वजह से हरकी पैड़ी में गंगा सबसे ज्यादा मैली है। उमा भारती अकसर कहती हैं कि गंगा प्रदूषण मुक्त होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह ड्रीम प्रोजेक्ट है, वगैरह, वगैरह। लेकिन केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय घोषणाओं के सिवाय अब तक ज्यादा कुछ नहीं कर पाया है। नमामि गंगे परियोजना के तहत जनवरी 2016 से ही गंगा की सफाई तीन चरणों में होनी है जिसमें अल्पकालिक योजना व पांच वर्ष की दीर्घावधि योजना शामिल है। लेकिन फिलहाल सबकुछ ठप पड़ा हुआ है। पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल तक 2,525 किलोमीटर में फैली इस नदी की सफाई की जानी है। इन पांच में झारखंड ही ऐसा राज्य है जहां भाजपा की सरकार है। यों तो केंद्र सरकार अलग-अलग मुद्दों पर समय-समय पर गैर-भाजपा सरकारों की खिंचाई करती रहती है; केंद्र बार-बार टिप्पणी करता है कि ये सरकारें केंद्रीय अनुदान का सही इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। लेकिन विडंबना है कि गंगा की सफाई को लेकर केंद्र ने अब तक प्रत्यक्ष रूप से इन राज्यों के खिलाफ न कोई कार्रवाई की और न ही किसी प्रकार का आरोप मढ़ा है। जबकि सभी जानते हैं कि नमामि गंगे प्रधानमंत्री का ड्रीम प्रोजेक्ट है। एनजीटी ने बजट पर रोक इसलिए लगाई कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों ने प्रदूषण के स्रोत की सटीक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई। ऐसी बात नहीं कि प्रदूषण से जुड़े आंकड़े सरकार के पास नहीं हैं। दरअसल, नौकरशाह लापरवाह हैं। राज्य सरकारों के अलावा कई गैर-सरकारी संगठन हैं जो हर साल गंगा में फैल रहे कचरों का सर्वेक्षण कराते रहते हैं। लेकिन जब तक केंद्र और राज्य सरकारें इसमें विशेष रुचि नहीं लेंगी, तब तक गंगा यों ही मैली रहेगी। गंगा की सफाई के नाम पर वर्ष 1985 से लेकर अब तक बाईस हजार करोड़ रुपए खर्च किए जा चुके हैं, जिसमें गंगा एक्शन प्लान का फंड, जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीकरण मिशन व विश्व बैंक द्वारा दिया गया कर्ज भी शामिल है। इतनी भारी धनराशि लगाए जाने के बावजूद गंगा स्वच्छ क्यों नहीं हो सकी? इसकी जवाबदेही कभी तय क्यों नहीं हुई?उत्तर प्रदेश का वाराणसी शहर जो प्रधानमंत्री मोदी का संसदीय क्षेत्र भी है, यहां वर्ष 1992 में बीओडी यानी बायोलॉजिकल आक्सीजन डिमांड 5 मिलीग्राम प्रति लीटर थी जो वर्ष 2015 में बढ़ कर 8.3 हो गई है। जबकि जिन्स फिकल कोली फार्म की संख्या सौ प्रति मिलीलीटर थी, यह बढ़ कर उनचास सौ हो गई है। केवल बनारस की बात करें तो चौवालीस नालों के जरिये तकरीबन 46 एमएलडी सीवेज और कचरा गंगा नदी में प्रवाहित हो रहा है। इसके अलावा मणिकर्णिका व हरिश्चंद्र घाटों पर एक वर्ष में इकतालीस हजार शव जलाए जाते हैं जिनमें नब्बे टन राख निकलती है और यह राख गंगा नदी में ही प्रवाहित होती है। वाराणसी के अलावा फर्रुखाबाद, कन्नौज, कानपुर व इलाहाबाद में बढ़ते शहरीकरण से पिछले दो दशक में गंदे पानी की मात्रा में बेतहाशा वुद्धि हुई है। उत्तराखंड जहां गोमुख से गंगा का उद््गम माना गया है, इस प्रदेश में विशेष रूप से हरिद्वार में प्रदूषण की स्थिति काफी भयावह है। वर्ष 2015 के सर्वे के मुताबिक 16.87 मिलियन टन सीवर का गंदा पानी गंगा में रोजाना मिल रहा है। केंद्र व राज्य के झगड़ों के बीच तैंतालीस सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) फंसे हुए हैं। यहां एसटीपी बारह क्षेत्रों में स्थापित होने हैं। स्टेट प्रोजेक्ट मैनेजमेंट ग्रुप बावन करोड़ की योजना केंद्र को सौंप चुका है। इस पर केंद्र का स्पष्ट कहना है कि एसटीपी पर होने वाले कुल खर्च का तीन फीसद उत्तराखंड सरकार को वहन करना चाहिए। जबकि उत्तराखंड सरकार को यह मंजूर नहीं है। उसका साफ कहना है कि एसटीपी पर जो खर्च हो वह पूरा का पूरा केंद्र सरकार को वहन करना चाहिए। उत्तराखंड में अर्द्धकुंभ शुरू हो गया है। उत्तराखंड सरकार का दावा है कि अप्रैल 2016 तक कुल एक करोड़ श्रद्धालु हरिद्वार में डुबकी लगाएंगे। ऐसे में मल-मूत्र, फूल व प्लास्टिक सभी तो गंगा में ही जाएंगे। यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि वर्ष 2010 में उत्तराखंड में कुंभ के दौरान हरिद्वार में गंगा के नमूनों की पड़ताल की गई तो प्रति दस मिलीलीटर जल में हानिकारक जीवाणुओं की संख्या छह हजार पाई गई जो स्नान के पानी के लिए सरकार द्वार जारी मानकों से पंद्रह हजार फीसद ज्यादा थी। इस प्रदूषण के कारण ही हैजा, पीलिया, पेचिश व टाइफाइड जैसी जलजनित बीमारियां बढ़ी हैं। वैसे भी देश में आठ फीसद स्वास्थ्य समस्याएं और एक तिहाई मौतें जलजनित बीमारियों के कारण ही होती हैं। ऋषिकेश से इलाहाबाद तक गंगा के आसपास करीब पच्चीस औद्योगिक इकाइयां स्थित हैं जिनमें चीनी, उर्वरक व कागज मिल के अलावा तेलशोधक कारखाने तथा चमड़ा उद्योग प्रमुख हैं। इनसे निकलने वाला कचरा और रसायनयुक्त गंदा पानी गंगा में गिर कर इसके पारिस्थितिकीय तंत्र को भारी नुकसान पहुंचा रहा है। इन कारखानों से निकलने वाले अपशिष्ट में मुख्य रूप से हाइड्रोक्लोरिक एसिड, मरकरी, भारी धातुएं व कीटनाशक जैसे खतरनाक रसायन होते हैं। ये रसायन मनुष्य की कोशिकाओं में जमा होकर बहुत-सी बीमारियां उत्पन्न करते हैं। बिहार और पश्चिम बंगाल में भी गंगा में प्रदूषण, गंगा एक्शन प्लान पर काम होने के बावजूद तेजी के साथ बढ़ा है। संसदीय लोक लेखा समिति ने तो तीखी टिप्पणी करते हुए कहा है कि पटना में गंगाजल तेजाब बन गया है। यहां तीन से ज्यादा नालों का मुंह गंगा में खुलता है। बिहार के पंद्रह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट एक अरसे से खराब हैं। फतुहा से दानापुर तक गंगा के पेट में र्इंट के भ_े लगते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक पांच फीसद गंदा पानी पश्चिम बंगाल में गंगा नदी में ही प्रवाहित होता है। करीब 131 करोड़ लीटर गंदगी रोजाना गंगा में गिरती है। चौंतीस सीवेज प्लांट हैं जिनकी क्षमता 457 एमएलडी है, लेकिन चौदह सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट खराब पड़े हुए हैं। इसलिए महज 214 एमएलडी पानी ही साफ हो पाता है। बोर्ड ने कोलकाता, हावड़ा व सियालदह सहित एक दर्जन शहरों में चौंसठ नए सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट स्थापित करने के सुझाव भी दिए हैं लेकिन वहां तृणमूल कांग्रेस की सरकार गंगा की सफाई को लेकर अब तक खामोश है। झारखंड में भाजपा की सरकार है। यहां पर गंगा केवल साहेबगंज जनपद से होकर गुजरती है। इस प्रदेश में काफी कम काम होने के बावजूद आगामी अप्रैल 2016 से गंगा सफाई अभियान का कार्यक्रम शुरू होने की बात कही जा रही है। इसके लिए छिहत्तर गांव चिह्नित भी किए जा चुके हैं। इन गांवों में शौचालय भी बनने हैं। साढ़े ग्यारह लाख की आबादी वाले इस क्षेत्र में गंगा सफाई अभियान वर्ष 2019 तक चलने की संभावना है। अन्य राज्यों के मुकाबले झारखंड में गंगा सफाई में न ही ज्यादा मेहनत और न ही ज्यादा बजट की जरूरत है। फिर भी अपनी ओर से सरकार कोई भी ठोस पहल नहीं कर रही है। इस सरकार को भी नमामि गंगे के अनुदान का इंतजार है।एनजीटी ने काफी पहले ही यह सुझाव दिया था कि गंगा के किनारे पचास मीटर का बफर जोन बनाया जाए। नदियों को प्रदूषण-मुक्त करने के लिए कई देशों में बफर जोन बनाए गए हैं। बफर जोन बनने के बाद वहां किसी तरह के निर्माण-कार्य की इजाजत नहीं होगी। लेकिन किसी भी सरकार ने एनजीटी के आदेश को गंभीरता से नहीं लिया है। इसके पहले तीन मई 2010 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों को गंगा के आसपास पॉलीथिन को प्रतिबंधित करने का आदेश दिया था, लेकिन दोनों राज्य सरकारों की नींद अब जाकर खुली है और एलान किया गया है कि एक फरवरी 2016 से पॉलीथिन पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। अब केंद्र सरकार प्रमुख गंगा घाटों पर शीघ्र ही प्रदूषण का स्तर प्रदर्शित करने वाले इलेक्ट्रानिक डिस्प्ले बोर्ड लगाने जा रही है। इससे स्नान घाट के जल की गुणवत्ता का ताजातरीन हिसाब पल-पल दिख सकेगा। लेकिन रुड़की विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि डिस्प्ले बोर्ड से ज्यादा जरूरी है गंगा की सफाई। वैज्ञानिक गंगा की सफाई और प्रदूषण-मुक्ति से जुड़े सुझाव दे सकते हैं, लेकिन कार्यक्रमों को क्रियान्वित करने की जिम्मेदारी तो केंद्र व राज्य सरकारों की है। 

मोदी के खिलाफ घृणात्मक अभियान अपने चरम पर 

डॉ. अरूण जैन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ घृणात्मक अभियान अपने चरम पर पहुंच चुका है। दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देश में निर्वाचित प्रधानमंत्री के खिलाफ ऐसा घृणात्मक अभियान कभी नहीं चलाया गया होगा। कहा जा रहा है कि मोदी मुस्लिम विरोधी हैं, मोदी अनुसूचित जाति विरोधी हैं, मोदी पूंजीपतियों के समर्थक हैं, मोदी देश में असहिष्णुता बढ़ाने के दोषी हैं। मतलब यह कि देश में चाहे अराजकता बढ़ाने वाले तत्वों की सक्रियता हो या आर्थिक विकास को प्राकृतिक कारणों के साथ−साथ राजनीतिक असहयोग से बाधित करने का प्रयास, सबके लिए मोदी ही दोषी हैं। नेताजी सुभाष चंद्र बोस से सम्बन्धित दस्तावेज सार्वजनिक करने की मांग को स्वीकार कर मोदी ने राजनीतिक चाल चली है क्योंकि उससे नेहरू का यह पत्र सार्वजनिक हो गया है जिसमें उन्होंने ब्रिटेन के प्रधानमंत्री को सूचित किया था कि नेताजी युद्ध अपराधी हैं। अतीत के कुकृत्यों पर परदा डालने के लिए मोदी विरोधी अभियान हथियार बन गया है और निहित स्वार्थी उसे दोनों हाथों से चला रहे हैं। जो स्वयं किसी कृत्य के लिए दोषी से आरोपित होने के कारण अदालत अथवा जांच एजेंसियों के घेरे में हैं उन सभी को लगता है कि नरेंद्र मोदी के प्रति घृणात्मक प्रचार ही उनके बचाव का एकमात्र उपाय है। आजकल कहीं कुछ भी हो उसके लिए नरेंद्र मोदी को दोषी ठहराकर घृणा पैदा करना मुख्य मुद्दा बन गया है। असोसिएटेट जर्नलस की अपार सम्पत्ति पर कब्जे के प्रयास की अदालती समीक्षा की स्थिति हो या फिर दिल्ली के मुख्यमंत्री ने सचिव के ख्लिाफ आरोपों की सीबीआई की जांच या अरूणाचल में कांग्रेसी विधायकों का मुख्यमंत्री के प्रति विद्रोह या किसी छात्र का क्षुब्ध होकर आत्महत्या करना। सबका ठीकरा मोदी के सिर फोड़ा जा रहा है। इस आरोप को मढऩे के प्रयास में जिस निकृष्ट शब्दावली में अभिव्यक्ति हो रही है, वह अभिव्यक्तिकर्ता की विक्षिप्त मानसिकता का परिचय तो है ही साथ ही इस बात का सबूत भी कि देश को दिशा देने का दावा करने वाले किस मानसिकता से वशीभूत हैं। सत्ता से बाहर होना या बाहर होने का भय उनके भीतर सत्ता में रहने के दौरान किए गए कृत्यों से जेल जाने की नौबत के कारण हमला बचाव का सर्वोत्तम उपाय है की रणनीति अपनाने की प्रेरणा पैदा कर रहा है। यह अभियान अभी और तेज होाग और इसके लिए कुप्रचार के सभी हथकंडे अपनाए जाने वाले हैं। इस युद्ध में भारतीय जनता पार्टी को अपने सहयोगियों की लिप्सा के कारण भी अकेले जूझना पड़ेगा। आश्चर्य यह है कि किसानों और गरीबों के लिए अभूतपूर्व उपायों को अपनाने वाली भाजपा सरकार उनमें पैठ बनाने के लिए मुखरित नहीं है। वह बचाव की मुद्रा में ही है, जो उसके सद्प्रयासों के कारण भी प्रतिकूल के माहौल बनाने वालों को और अधिक हमलावर बना रही है।  नरेंद्र मोदी के खिलाफ घृणात्मक अभियान से दो सवाल खड़े हुए हैं। एक यह कि क्या मोदी सरकार जिसने भ्रष्टाचार से निदान और गुड गवर्नेंस का वादा किया है, उससे पीछे हटकर समझौता करेगी? क्या वह एक के बाद एक भ्रष्टाचार और सार्वजनिक सम्पत्ति की लूट करने वालों के खिलाफ स्वाभाविक रूप से चल रही कानूनी प्रक्रिया को ढील प्रदान करेगी या फिर सभी प्रकार के विरोधों के बावजूद अपने वादे पर कायम रहेगी। दूसरा यह कि क्या जो घृणात्मक अभियान चल रहा है उससे अवाम इतना प्रभावित होगा कि भारतीय जनता पार्टी की बिहार के समान ही आने वाले सभी चुनाव में पराजय होगी। कम से कम कांग्रेस का तो यही आकलन है कि उनके शीर्ष नेताओं और कई मुख्यमंत्रियों के खिलाफ जो वाद अदालत में हैं या जिनकी जांच चल रही है उसके सम्बन्ध में बदले की भावना की कार्यवाही का अभियान चलाकर, उसी प्रकार फिर सत्ता में लौट सकेंगे जैसे 1980 में इंदिरा गांधी लौटी थीं। उनके इस आकलन में दो खामी हैं, एक तो 1980 के समान केंद्र में जनता पार्टी की सरकार नहीं है जो अंतरकलह के कारण भीतर से खोखली हो गई थी और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं के कारण प्रधानमंत्री बनने के लिए कांग्रेस के बिछाये जाल में फंस गई थी। इस समय केंद्र में एक पार्टी की सरकार है जो वैचारिक प्रतिबद्धता से युक्त है, उसके कार्यबाधित हो सकते हैं, लेकिन रूक नहीं सकते। साथ ही सरकार भ्रष्टाचार से न तो समझौता करेगी और न दबाव बर्दाश्त करेगी। नरेंद्र मोदी ने गुजरात में बाह्य और आंतरिक दोनों ओर से प्रबलतम दबावों का सामना करते हुए घृणात्मक अभियान की चरमता के बावजूद जनसमर्थन प्राप्त करने में जो सफलता प्राप्त की उससे यह बात स्पष्ट है। लेकिन सरकार को एक बात पर अवश्य विचार करना होगा कि क्या उसके खिलाफ जो घृणात्मक अभियान है अवाम अपने आप उसके निहितार्थ समझ जायेगा या फिर उसको समझाने के लिए कुछ करना भी चाहिए और यदि कुछ करना चाहिए तो वह क्या?
सरकार के प्रदर्शन को लेकर प्रधानमंत्री भी हुए चिंतित 
डॉ. अरूण जैन
अब तक काफी आशान्वित नजर आते रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के माथे पर भी अब चिंता की लकीरें साफ नजर आने लगी हैं। सरकार की ओर से उठाए जा रहे कदमों और बनायी जा रही योजनाओं से भले वह खुश हों लेकिन उन पर अमल की गति और सरकारी योजनाओं के प्रचार प्रसार की खराब स्थिति प्रधानमंत्री की चिंता का प्रमुख कारण है। प्रधानमंत्री को यह नजर आ रहा है कि देश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की स्थिति में सुधार लाने के प्रयास रंग लाते नहीं दिख रहे हैं जोकि आने वाले चुनावों में भारतीय जनता पार्टी सहित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के लिए नुकसानदायी सिद्ध हो सकता है। प्रधानमंत्री ने मंत्रिमंडल की हालिया बैठक में इन चिंताओं को मंत्रियों के समक्ष रखते हुए अपनी अपेक्षाओं को भी दोहराया और अब हर महीने के अंतिम बुधवार को मंत्रियों के साथ कामकाज की समीक्षा बैठक होना तय कर दिया है। प्रधानमंत्री सिर्फ मंत्रियों के भरोसे ही सब कुछ नहीं छोड़ देना चाहते इसलिए लगातार सभी मंत्रालयों के सचिवों से भी संपर्क बनाए रहते हैं और उनके साथ बैठकें भी करते हैं। मंत्रिमंडल बैठक में मंत्रियों द्वारा अपने कामकाज की प्रेजेन्टेशन से प्रधानमंत्री का संतुष्ट नहीं होना दर्शाता है कि प्रधानमंत्री निचले स्तर तक महसूस की जा रही उन भावनाओं को समझ रहे हैं कि आम आदमी राजग सरकार से धीरे धीरे निराश हो रहा है। दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों तथा विभिन्न उपचुनावों के परिणामों से भी यह बात सिद्ध होती है कि भाजपा की हार का कारण पार्टी की ओर से सिर्फ रणनीतिक खामी नहीं थी बल्कि जनता की केंद्र सरकार से बढ़ रही नाराजगी से भी पार्टी को नुकसान हुआ। प्रधानमंत्री दावा करते हैं कि उनकी सरकार के कार्यकाल में वर्ष 2015 में कोयला, बिजली, यूरिया फर्टिलाइजर और मोटर वाहन का सबसे ज्यादा उत्पादन हुआ है। यही नहीं वर्ष 2015 में गांवों में गरीबों को सबसे ज्यादा कुकिंग गैस कनेक्शन दिये गये, प्रतिदिन के हिसाब से राष्ट्रीय राजमार्ग बनाने का औसत बढ़कर 30 किमी हो गया, मंदी के दौर में भी देश में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 39 प्रतिशत बढ़ गया। डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया-स्टैण्डअप इंडिया जैसी रोजगारपरक पहलें की गयीं। यकीनन यह सभी पहलें सराहनीय हैं लेकिन आम आदमी को तत्काल अपनी झोली में कुछ नजर नहीं आ रहा है। यही नहीं स्टार्टअप इंडिया जैसी पहलों से बड़े शहरों के युवा तो खुश हैं लेकिन किसान को अभी तक अपने लिए भी स्टार्टअप या स्टैण्डअप जैसी सरकारी पहलों का इंतजार है। प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम के जरिये अपनी बात लोगों तक तो पहुंचाई ही साथ ही सुझावों और शिकायतों के तौर पर उन्हें जो पत्र या ईमेल मिलते रहते हैं उसके जरिये उन तक भी यही बात पहुंच रही है कि चमकते भारत और अच्छे दिनों का जो ख्वाब लोकसभा चुनावों में दिखाया गया था वह अभी आम जनता के लिए दूर की कौड़ी बना हुआ है। प्रधानमंत्री मंत्रियों के भरोसे ही सब कुछ नहीं छोड़ देना चाहते इसलिए हाल ही में उन्होंने सभी विभागों के सचिवों की बैठक बुलाई जिसमें मंत्रिमंडल के कुछ वरिष्ठ सदस्य ही मौजूद थे। देर रात तक चली इस बैठक में प्रधानमंत्री ने शासन के विभिन्न क्षेत्रों में बदलाव करने के लिए सचिवों को सुझाव एवं विचार पेश करने को कहा और सचिवों के आठ समूहों का गठन किया। बैठक में सचिवों ने अपने मंत्रालय के कामकाज के बारे में प्रस्तुतिकरण के बारे में सवाल पूछे तथा कई महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए। प्रधानमंत्री ने बैठक में सचिवों को निर्देश दिये कि अयोग्य अधिकारियों या शिकायतों पर कार्रवाई नहीं करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए। प्रधानमंत्री की चिंताओं को वाजिब ठहराता एक हालिया सर्वेक्षण बताता है कि राजग सरकार के कामकाज को एक रायशुमारी में ''औसत से ऊपरÓÓ माना गया है। हालांकि इस रायशुमारी के नतीजों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी रेटिंग के मामले में अपनी सरकार से आगे हैं। एबीपी न्यूज नील्सन द्वारा कराई गई इस रायशुमारी में 46 फीसदी प्रत्युत्तरदाताओं ने सरकार को बहुत अच्छी या अच्छी बताया लेकिन मोदी को 54 फीसदी लोगों ने ''बहुत अच्छा या अच्छाÓÓ बताते हुए ऊंची रेटिंग दी। रायशुमारी के अनुसार, अगर अभी लोकसभा चुनाव कराए जाते हैं तो राजग को 38 फीसदी वोट मिल सकते हैं जिसका मतलब है कि पार्टी को वर्ष 2014 में मिली 339 सीटों की तुलना में 301 सीटें मिलेंगी। ''राष्ट्र का मिजाजÓÓ भांपने के लिए कराए गए इस सर्वेक्षण के अनुसार, 47 फीसदी प्रत्युत्तरदाताओं को लगता है कि मोदी की लोकप्रियता दिन प्रतिदिन घट रही है लेकिन 45 फीसदी प्रत्युत्तरदाताओं को ऐसा नहीं लगता। प्रधानमंत्री अब अपनी सरकार के प्रदर्शन पर ज्यादा ध्यान केंद्रित कर रहे हैं यह बात इस खबर से भी जाहिर होती है जिसमें कहा गया कि इस वर्ष नरेंद्र मोदी विदेश दौरों पर कम और राज्यों के दौरों पर ज्यादा रहेंगे। प्रधानमंत्री इस बात से भी निराश हैं कि उनकी सरकार की योजनाओं के प्रचार पर खर्चा तो खूब हो रहा है लेकिन योजनाओं में निहित जनहित की बात आम लोगों तक नहीं पहुंच पा रही है। हाल ही में सरकार की ओर से किसानों के लिए शुरू की गयी फसल बीमा योजना काफी लाभकारी है लेकिन किसानों के बीच इसका सही प्रचार प्रसार नहीं हो पाया। सरकार अब योजनाओं के प्रचार के लिए क्षेत्रीय मीडिया तक पहुंचने का प्रयास कर रही है। प्रेस सूचना ब्यूरो ने देश का पहला अखिल भारतीय क्षेत्रीय संपादक सम्मेलन एक और जयपुर में बुलाया है। सम्मेलन में 100 से भी ज्यादा संपादकों के हिस्सा लेने की संभावना है। सम्मेलन में केंद्र का पक्ष रखने और संपादकों से जनता के मन की बात जानने के लिए नौ केंद्रीय मंत्री पहुंच रहे हैं। ऐसा ही सम्मेलन देश के पश्चिमी और दक्षिणी भाग में भी आयोजित किया जायेगा। प्रधानमंत्री ने हाल ही में सभी मंत्रियों को निर्देश दिया था कि वह विभिन्न संसदीय क्षेत्रों का दौरा कर बजट के बारे में जनता की राय जानें और सरकार की उपलब्धियां उन्हें बताएं। प्रधानमंत्री ने सरकार की उपलब्धियों को जनता के बीच पहुंचाने के लिए पार्टी संगठन का भी पूरा सहयोग लेने की पहल की है। अमित शाह के दूसरी बार भाजपा अध्यक्ष पद संभालने के सप्ताह भर के अंदर ही दोनों प्रमुख नेताओं ने पार्टी के विभिन्न मोर्चों के पदाधिकारियों के साथ बैठक कर कामकाज की समीक्षा की। बहरहाल, संसद का बजट सत्र निकट है। यदि सरकार जीएसटी सहित अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों पर आगे नहीं बढ़ पाई तो इसे सरकार की राजनीतिक नाकामी के रूप में देखा जा सकता है क्योंकि जनता यह भले जानती है कि राज्यसभा में राजग के पास बहुमत नहीं है लेकिन उसने जो भाजपा को पूर्ण बहुमत दिया था उसका सही राजनीतिक उपयोग अभी तक नहीं हो पाया है। सरकार से अपेक्षा है कि वह विपक्ष से मेलजोल बढ़ाकर विधेयकों की राह में आ रही अड़चनों को दूर करे। कुछ समय पहले खबरें थीं कि प्रधानमंत्री वित्त मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और रेलवे मंत्रालय के कामकाज से नाखुश हैं और इन विभागों के मंत्रियों को बदला जा सकता है लेकिन अभी बजट सत्र के निकट आने को देखते हुए ऐसे किसी फेरबदल की संभावना कम ही है। अरुण जेटली के समक्ष देश की अर्थव्यवस्था को मजबूती प्रदान करने और निवेश आकर्षित करने की कठिन चुनौती है। हालांकि सरकार का कहना है कि राजग शासन में वैश्विक मंदी के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती रही लेकिन भाजपा के ही कुछ किनारे कर दिये गये वरिष्ठ नेताओं का मानना है कि यह सब आंकड़ों का हेरफेर है। जेटली संकेत दे चुके हैं कि इस बार लोकलुभावन बजट नहीं आएगा। देखना होगा कि सरकार विभिन्न राजनीतिक चुनौतियों से किस तरह निबटती है।