Wednesday, 23 May 2018

सोनिया ने दूसरा विकल्प सोचा भी नहीं, सीधे राहुल को कुर्सी थमा दी

अरूण जैन
इसमें अचरज की कोई बात नहीं। यह सभी को मालूम था कि कांग्रेस बुरी तरह नेहरू−गांधी परिवार पर निर्भर है। राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष पद पर पहुंचना उम्मीद के मुताबिक ही था। लेकिन कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने इस घटना को एक अलग आयाम दे दिया है। उन्होंने राहुल गांधी के विरासत संभालने की तुलना मुगल खानदान से की है। उन्होंने कहा कि राजा का बेटा ही राजा बनता था। पार्टी की घोषणा कुछ भी हो, यह खानदान के शो के अलावा कुछ नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहराल नेहरू ने अपनी बेटी को इस पद के लिए तैयार किया था। कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में उस समय के कांग्रेस अध्यक्ष यूएन ढेबर ने इंदिरा गांधी के नाम का प्रस्ताव किया तो गृह मंत्री जीबी पंत ने कहा कि उसे परेशान नहीं करना चिहिए क्योंकि उसका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है। नेहरू ने उनकी टिप्पणी पर आपत्ति जताई और कहा कि इंदिरा का स्वास्थ्य उनसे और पंत से बेहतर है। उसके बाद इंदिरा को कांग्रेस का अध्यक्ष चुन लिया गया। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने दूसरे विकल्प की चर्चा भी नहीं की। अपने बेटे राहुल गांधी को सीधे कुर्सी पर बिठा दिया। एक अफवाह थी कि वह अपनी बेटी प्रियंका गांधी को मनोनीत करेंगी क्योंकि राहुल गांधी चल नहीं पा रहे हैं। लेकिन भारतीयों की तरह इटली वाले भी बेटी के मुकाबले बेटे को उत्तराधिकार देना पसंद करते हैं। राहुल गांधी की तरक्की को सही बताने के लिए कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा कि यह एक नए युग की शुरूआत है। वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने कहा कि जमीनी कांग्रेस कार्यकर्ता चाहते थे कि यह पदोन्नति हो। आमतौर पर जमीनी कार्यकर्ताओं की यही भावना थी, उन्होंने कहा। लेकिन दिग्विजय सिंह के चेहरे पर मायूसी साफ दिखाई दे रही थी। वास्तव में, अब पार्टी 10 जनपथ से उसी तरह चलाई जाएगी जिस तरह नेहरू और इंदिरा गांधी के समय तीन मूर्ति या सफदरजंग रोड़ से चलाई जाती थी। वैसे भी, जब मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री पद पर बिठाया  गया तो सोनिया गांधी ही शासन कर रही थीं। संसद के सेंट्रल हाल में हुए उस नाटक का मैं गवाह हूं जिसमें पार्टी सदस्य रोए थे कि सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहिए। लेकिन वह खामोश रहीं क्योंकि उनके दिमाग में उनका बेटा था। और, वह प्रधानमंत्री बन जातीं तो यह एक पहले से तय नाटक दिखाई देता। मनमोहन सिंह ने भी कई बार कहा कि राहुल गांधी जब भी तैयार हों उनके लिए कुर्सी खाली करना खुशी की बात होगी और, यही कि वह कुर्सी राहुल के लिए तैयार रखे हैं। हालांकि कुछ समय से यह बात आ रही थी, खासकर सोनिया गांधी के स्वास्थ्य ठीक नहीं रहने पर, कि राहुल गांधी का पार्टी-नेतृत्व संभालना तय है। राहुल गांधी ने पहले से ही सेकुलरिज्म का अपना घोषणा−पत्र बना रखा है। भारतीय जनता पार्टी लोगों के सामने भले ही हिंदुत्व को अपना न बताए, लेकिन यह साफ है कि 2019 का चुनाव वह सिर्फ हिंदुत्व के नारे पर लड़ेगी। प्रधानमंत्री इसे नहीं छिपाते कि वह नागपुर के आरएसएस मुख्यालय की यात्रा करते हैं और मोहन भागवत जैसे नेताओं का मार्गदर्शन लेते हैं। सब का साथ, सबका विकास उनका महज एक नारा ही साबित हुआ। यह देखा जा सकता है कि कामकाज की उनकी योजना में मुसलमान की कहीं भी गिनती नहीं है। यह दुख की बात है कि उन लोगों ने खुद ही अपने को पीछे खींच लिया है। उत्तर प्रदेश विधान सभा में भारी जीत इस बात का सबूत है कि भारतीय जनता पार्टी ने किस तरह सत्ता हासिल की है। यह साफ है कि पार्टी चाहती थी कि लोग जानें कि वह किसी भी तरह मुसलिम मतदाताओं पर निर्भर नहीं है। इस महीने चुनाव में जा रहे गुजरात में फिर यही चिन्हित होने वाला है और मोदी यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जो गुजरात जीतेगा वह अगले आम चुनाव में भारत जीतेगा। गुजरात का उनका तूफानी चुनाव अभियान यह सवाल उठा रहा है कि मोदी गुजरात विधानसभा चुनावों में ज्यादा ही दांव लगा रहे हैं। शायद यह राज्य में भाजपा के खिलाफ लडऩे के लिए परिवर्तन चाहने वाले युवाओं और पाटीदारों के कांग्रेस के साथ आने के कारण हुआ हो।  अभी का जो रिकार्ड है उसमें किसी भी दृष्टि से राहुल गांधी प्रभावी नहीं रहे हैं। उन्होंने कई चुनाव लड़े जिसमें उत्तर प्रदेश का चुनाव शामिल है, जहां उन्होंने अखिलेश यादव के साथ गठबंधन किया था। लेकिन इससे कोई मदद नहीं मिली। कांग्रेस बुरी तरह हार गई और उसे सिर्फ चौथा स्थान मिला। अभी उन्हें गुजरात चुनावों में अपनी लोकप्रियता साबित करनी है। अगर वह विफल होते हैं तो लोग जान जाएंगे कि वह अपने बूते पर नहीं जीत सकते।  यह अचरज की बात है कि राहुल गांधी परिवारवाद का बचाव कर रहे हैं। पंजाब, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश का उदाहरण देकर वह कह रहे थे कि हर पार्टी इस पर निर्भर है। लेकिन वह यह भूल जाते हैं कि इन सभी राज्यों में ये पार्टियां वैकल्पिक रूप से सत्ता में आती रही हैं। क्या राहुल या, यूं कहिए, कांग्रेस, केंद्र में सरकार बनाने के लिए बहुमत पा सकती है? उन्हें बहुत मेहनत करनी पड़ेगी अगर वह कांग्रेस को सत्ता में देखना चाहते हैं। लेकिन अभी के समय में वह सत्ता को अपनी ओर खींचने की ताकत रखने वाले दिखाई नहीं पड़ते। लेकिन परिदृश्य बदल सकता है। हमने इंदिरा गांधी जिसे गूंगी गुडिय़ा कहा जाता था, को प्रधानमंत्री बनते और बहुत ही कम समय में पूरे विपक्ष का सामना करते देखा है। यहां तक कि उनका बेटा, जिसे राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने थोप दिया था, को लोगों ने स्वीकार कर लिया। कोई कारण नहीं है कि राहुल गांधी को स्वीकार नहीं किया जाए। लेकिन यह इसी पर निर्भर करेगा कि वह पार्टी को साथ ले चलने और चुनाव जीतने में इसकी मदद करते हैं। अभी के समय में यह कठिन मालूम होता है क्योंकि सेकुलरिज्म अब पीछे चला गया है। पूरे देश में एक नरम हिंदुत्व फैल चुका है। यह अफसोस की बात है कि जिस देश ने विविधता के मुद्दे पर स्वतंत्रता आंदोलन की लड़ाई लड़ी, वह आजादी के मूल्यों पर चलने में असमर्थ हो गया।

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