Tuesday, 28 June 2016

संघ मुक्त भारत का आह्वान यानि चुनावी तैयारी का शंखनाद

डॉ. अरूण जैन
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का संघ मुक्त भारत का आह्वान दरअसल 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी का शंखनाद है। नीतीश की इच्छा वैसे तो 2014 में भी प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनने की थी लेकिन तब वह कामयाब नहीं हो पाये या राजनीतिक परिस्थितियों ने उनको इसकी इजाजत नहीं दी थी। नीतीश अब ज्यादा अनुभव और तैयारी के साथ मैदान में हैं। उन्होंने बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू कर ना सिर्फ राज्य में अपना एक अहम चुनावी वादा पूरा किया बल्कि देश में अपनी साफ सुथरी नेता की छवि और मजबूत की। अब इस मुद्दे पर वह जनमत बनाने के लिए देश के दूसरे राज्यों का दौरा शुरू करेंगे।  देश का दौरा एक मुख्यमंत्री के रूप में करने से ज्यादा तवज्जो शायद नहीं मिलती इसलिए वह जनता दल युनाइटेड के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी चुन लिये गये। माना यही जाता रहा है कि भले शरद यादव या उनसे पहले जॉर्ज फर्नांडिस पार्टी अध्यक्ष थे लेकिन सभी अहम फैसले नीतीश की मर्जी से ही होते थे। अब नीतीश ने औपचारिक रूप से पार्टी की कमान संभाल ली है। वह चाहते तो एक व्यक्ति एक पद के सिद्धांत का पालन करते हुए यह पद पार्टी में किसी अन्य को भी दिलवा सकते थे। लेकिन ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि नीतीश और नरेंद्र मोदी के चुनावी रणनीतिकार एक ही हैं। वह प्रशांत किशोर जो लोकसभा चुनावों से पहले नरेंद्र मोदी के साथ थे, बिहार चुनावों से पहले नीतीश के साथ जुड़ गये थे। लोकसभा चुनावों से पहले जब मोदी को भाजपा चुनाव प्रचार समिति का प्रमुख बना कर राज्यों का दौरा कराया गया था तो उन्हें मीडिया ने खासी तवज्जो दी थी और माना यही गया था कि वह ही प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे। अब नीतीश भी जदयू अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के रूप में राज्यों का दौरा कर अपने प्रति क्षेत्रीय दलों को आकर्षित करने और राष्ट्रीय स्तर पर अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास करेंगे। नीतीश ने जदयू अध्यक्ष के तौर पर पार्टी की ताकत बढ़ाने के लिए कुछ क्षेत्रीय दलों को विलय करने का सुझाव भी दिया है। माना जा रहा है कि जल्द ही झारखंड विकास पार्टी (प्रजातांत्रिक), राष्ट्रीय लोक दल तथा एक और दल का जदयू में विलय हो सकता है। झारखंड में नीतीश बाबूलाल मरांडी के साथ आगे बढऩा चाहते हैं जबकि उत्तर प्रदेश में वह अजित सिंह को आगे रखना चाहते हैं। प्रयास तो उनका मुलायम सिंह यादव के साथ आगे बढऩे का था लेकिन जनता परिवार के एकीकरण के प्रयासों को जिस तरह मुलायम सिंह ने धक्का पहुँचाया और बिहार में महागठबंधन के प्रयोग से अलग होकर चुनाव लड़ा उससे अब उनकी राहें जुदा हो चुकी हैं। अजीत सिंह को मनाना भी नीतीश के लिए आसान नहीं होगा क्योंकि उन्होंने अपने लिए पार्टी में अहम पद, राज्यसभा की सीट और अपने बेटे को उत्तर प्रदेश में पार्टी का चेहरा बनाने की शर्त रखी है।  नीतीश ने संघ मुक्त भारत का जो आह्वान किया उसकी सराहना कांग्रेस, राजद सहित कुछ अन्य क्षेत्रीय दलों ने की जरूर लेकिन नीतीश के साथ खड़े नहीं हुए। बहुत से क्षेत्रीय दलों ने तो नीतीश के आह्वान पर प्रतिक्रिया तक नहीं दी क्योंकि उनका अपने राज्यों में मुख्य मुकाबला कांग्रेस के साथ है और वह जानते हैं कि नीतीश फिलहाल कांग्रेस के साथ खड़े हैं। लेकिन नीतीश को यह जान लेना चाहिए कि वह जिस कांग्रेस के सहारे बड़ा सपना देख रहे हैं वह कभी भी क्षेत्रीय दल के नेता का नेतृत्व स्वीकार नहीं करेगी। कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने जब आम चुनावों में नीतीश के साथ चुनाव लडऩे की बात कही तो पार्टी की ओर से साफ कर दिया गया कि यह समय से पहले का सवाल है। संप्रग-1 और संप्रग-2 का प्रयोग यह बताता है कि कांग्रेस क्षेत्रीय दलों को उनकी भागीदारी दे सकती है पर नेतृत्व वही करेगी। नीतीश के रणनीतिकार प्रशांत किशोर कांग्रेस के भी साथ जुड़ गये हैं इसलिए कांग्रेस के लिए नीतीश के अगले कदम को भांपना आसान होगा। नीतीश भी चूँकि राजनीति के पुराने और सफल खिलाड़ी हैं इसलिए उनका यह प्रयास है कि राष्ट्रीय स्तर पर एक मोर्चा खड़ा किया जाये जो वक्त पडऩे पर वैकल्पिक नेतृत्व प्रदान कर सके। नीतीश को हालाँकि अपने मोर्चे में दलों को शामिल कराने के लिए कड़ी मशक्कत करनी होगी। जम्मू-कश्मीर से शुरुआत करें तो वहाँ पीडीपी भाजपा के साथ है जबकि नेशनल कांफ्रेंस जरूरत पडऩे पर कांग्रेस के साथ जाना पसंद करेगी। पंजाब में अकाली दल भाजपा का पुराना साथी है। दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की पार्टी नीतीश के साथ तो है लेकिन केजरीवाल भी खुद को भविष्य में प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार देखते हैं इसलिए वह इस मुद्दे पर नीतीश के साथ होंगे या नहीं यह तो वक्त ही बताएगा। हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल का साथ नीतीश को मिल सकता है लेकिन यह पार्टी इस छोटे से राज्य में दूसरे या तीसरे नंबर पर ही रहती है। उत्तर प्रदेश में रालोद का विलय कराकर और कुछ अन्य छोटे दलों मसलन अपना दल आदि से गठबंधन संभव है। बिहार में पहले ही महागठबंधन बना हुआ है। झारखंड में बाबूलाल मरांडी साथ आ ही रहे हैं। वहाँ जदयू और राजद साथ हैं। झामुमो भी इनके साथ आ सकता है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस ने यदि समर्थन दिया तो बहुत सख्त शर्तें भी रखेगी। ओडिशा में नवीन पटनायक नीतीश के पहले से ही मित्र हैं। महाराष्ट्र में कुछ छोटे दलों का साथ संभव है तो कर्नाटक में जद-सेक्युलर साथ आ सकता है। आंध्र प्रदेश से चंद्रबाबू नायडू का साथ मुश्किल ही मिले लेकिन तेलंगाना से के. चंद्रशेखर राव साथ आ सकते हैं। तमिलनाडु से जिसका भी साथ मिलेगा वही बदले में ज्यादा की चाहत रखेगा। केरल, त्रिपुरा और पूर्वोत्तर राज्यों में जो भी दल साथ आएगा उसका ज्यादा लाभ नीतीश को संभव नहीं है क्योंकि निर्णायक संख्या में सीटें यहाँ नहीं हैं। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, उत्तराखंड, हिमाचल, गुजरात आदि में कोई तीसरी बड़ी शक्ति है नहीं जो नीतीश को कुछ लाभ या साथ मिल सके। नीतीश ने संघ मुक्त भारत की बात तो कह दी है लेकिन वह शायद यह भूल गये कि यह संघ की ही ताकत का कमाल था जो पूरे देश में भाजपा और खासकर नरेंद्र मोदी के पक्ष में लहर पैदा की गयी और प्रत्येक मतदान स्थलों के लिए कार्यकर्ताओं की टोली बनाकर सभी के लिए जिम्मेदारी तय की गई। 

जल्द ही देश में पानी सबसे बड़ी समस्या बनने वाली है


डॉ. अरूण जैन
मैंने एक अमेरिकी नोबेल पुरस्कार विजेता से कहा था कि हमारी असली समस्या जनसंख्या है। उसने इसका खंडन किया और कहा पानी आपकी बड़ी समस्या बनने वाली है। हम लोग आने वाले सालों में भारत के सामने आने वाली तकलीफों पर चर्चा कर रहे थे। काफी लंबी बहस के बाद भी हमारे बीच सहमति नहीं हो पाई। महाराष्ट्र जैसे संपन्न राज्य के लातूर में जो हुआ उसने उस अमेरिकी की चेतावनी दोहरा दी है। घड़ों और बर्तनों को लाइन में रखवाने के लिए धारा 144 लगानी पड़ी और इसने मुझे उस चेतावनी की याद दिला दी। लेकिन उस अमेरिकी ने मुझे एक आशावादी पक्ष भी दिखाया था कि यमुना−गंगा योजना में पानी का समंदर है जो निकाले जाने का इंतजार कर रहा है। मुझे पता नहीं कि यह कितना सच है। अगर ऐसा होता तो सरकार ने इस जमा पानी को नापने के लिए वैज्ञानिक अध्ययन कराया होता। मैंने ऐसी किसी योजना के बारे में अभी तक नहीं सुना है। शायद इस साल महाराष्ट्र सबसे पीडि़त राज्य है। पिछले साल कुछ दूसरे राज्यों की हालत ऐसी ही थी। ज्यादातर राज्य या जहां तक इसका सवाल है, देश की अर्थव्यवस्था मानसून पर काफी निर्भर है। हम आकाश में काले बादल ढूंढ़ते रहना पड़ेगा। पानी हमारे लिए बहुत मायने रखता है− अनाज उगाने और पीने के लिए।  पंजाब−हिमाचल प्रदेश में भाखड़ा बांध ने हरियाणा समेत पूरे क्षेत्र को भारत के अनाज भंडार के रूप में बदल दिया है। भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु भाखड़ा बांध को मंदिर कहते थे। उन्होंने उस समय कहा था कि भारत के परंपरागत मंदिर रहेंगे, लेकिन आर्थिक विकास के लिए हमें नए मंदिरों, जिसका अर्थ था बांध और औद्योगिक परियोजनाएं, का निर्माण करना होगा। यह भाखड़ा बांध पूरे देश को खिला सकता है। लेकिन बड़े बांध बनाना जरूरी नहीं है क्योंकि ये घर−द्वार और चूल्हा−चक्की से उजाड़ दिए लोगों को बसाने की समस्या पैदा करते हैं। छोटे और अलग−अलग जगहों पर बने बांध उतने ही काम के हो सकते हैं, भले ही उनसे बेहतर न हों। नर्मदा बांध की ऊंचाई को लेकर मेधा पाटकर के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन का यही निष्कर्ष था। वह सफल नहीं हो पाईं, हालांकि तत्कालीन सरकार की ओर से तैयार कराई हुई जल संसाधन मंत्री सैफुद्दीन सोज की रिपोर्ट ने कहा था कि बांध से होने वाला फायदा सालों से रहने वाले लोगों को उजाडऩे से होने वाले घाटे के मुकाबले बहुत कम है। लेकिन कई साल बाद बांध बनाया जाने लगा, जब गुजरात ने यह वायदा किया कि उजाड़े गए किसानों और अन्य लोगों की भरपाई के लिए वह जमीन देगी। यह अलग बात है कि राज्य सरकार अपना वायदा पूरा नहीं कर पाई क्योंकि वह उतनी जमीन ढूंढ़ ही नहीं पाई।  भारत में सात बड़ी नदियां गंगा, ब्रह्मपुत्र, सिंधु, नर्मदा, कृष्णा, गोदावरी, कावेरी, और इन नदियों में जल पहुंचाने वाली अनेक छोटी नदियां हैं। इन नदियों के इस्तेमाल ही नहीं, बल्कि उनसे बिजली पैदा करने के लिए नई दिल्ली ने केंद्रीय जल और बिजली आयोग बना रखा है। इसने बहुत हद तक काम भी किया है। लेकिन भारत के कई हिस्सों में इससे ऐसे गंभीर विवाद पैदा हुए हैं जो दशकों से सुलझाए नहीं जा सके हैं।  इस स्थिति ने एक राज्य से दूसरे राज्य के लोगों के बीच दूरी भी बना दी है। उदाहरण के लिए, कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी जल के बंटवारे का मामला सालों से लटका हुआ है। तमिलनाडु को कुछ क्यूसेक (जल की मात्रा मापने का पैमाना) पानी देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद ऐसी हालत है। पास में ही, पंजाब ने राजस्थान को पानी देने से मना कर दिया है। यह सिंधु जल समझौते के समय अपनाई गई नई दिल्ली की दृष्टि के खिलाफ है। उस समय, परियोजना को धन दे रहे विश्व बैंक के सामने भारत ने दलील दी थी कि राजस्थान के बलुआही इलाकों को सींचने के लिए उसे बहुत ज्यादा पानी चाहिए।  यह हास्यास्पद है कि नई दिल्ली की ओर से राजस्थान के पक्ष में फैसला होने के बाद भी पंजाब ने अब उसे पानी देने से मना कर दिया है। विश्व बैंक ने उस समय भारत की यह दलील स्वीकार कर ली थी कि भारत पाकिस्तान को पानी नहीं दे सकता क्योंकि उसे राजस्थान के बालू के टीलों वाली जमीन वापस पाने के लिए पानी की जरूरत है। हमारे पास इसका क्या जबाब है जब राजस्थान को पानी देने के अपने वायदे से पंजाब मुकर जाता है? यह माना जाता है कि राजस्थान पहुंचने वाले पानी से वहां कई अनाज पैदा किए जा सकते हैं, लेकिन पंजाब और हरियाणा के कुछ इलाकों को जो पहले से सिंचित हैं, को पानी नहीं मिलेगा। यही विसंगतियां अन्तर्राज्यीय जल−विवादों के लिए जिम्मेदार हैं। आजादी के सत्तर साल बाद भी इन विवादों को सुलझाया नहीं जा सका है। जब केंद्र और राज्यों, दोनों में कांग्रेस शासन कर रही थी तो समस्या ने इतना भद्दा रूप नहीं लिया था। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास उस समय कुछ लोकसभा सीटें थीं और उसकी कोई ज्यादा गिनती नहीं करता था। आज हालात एकदम अलग हैं। अभी जब संसद में इसका बहुमत है तो वह चाहती है कि इसके शासन वाले राज्यों को ज्यादा फायदा मिले, नियम से, बिना नियम से।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से यह घोषणा जरूर की थी भारत एक है और दूसरी पार्टियों के शासन वाले राज्यों के साथ कोई भेदभाव नहीं किया जायगा। लेकिन जमीन का सच यह नहीं है। कांग्रेस पार्टी भी, जो अब विपक्ष में है, संसद तक को चलने नहीं दे रही है। राज्य सभा कई सत्रों तक स्थगित होती रही जब तक पार्टी ने खुद ही यह महसूस नहीं किया कि सदन में बहस के जरिए वह सरकार से अपने मतभेदों को ज्यादा बेहतर ढंग से सामने ला सकती है।  अभी ऐसा लगता है कि पार्टियों के बीच यह समझ बन गई है कि संसद को चलने दिया जाए। यह उम्मीद करनी चाहिए कि पार्टियां अपने बीच बनी इस आम सहमति पर कायम रहेंगी और पहले की तरह गंभीरता से मुद्दों पर बहस करेंगी। अगर इस भावना के अनुसार काम होता है तो संसद में कोई बाधा नहीं पैदा होगी और चुने हुए प्रतिनिधि, जिन्होंने अपने हंगामे वाले व्यवहार से जनता को हताश कर दिया है, अपना ध्यान देश की बीमारियों पर लगाएंगे। तब कोई भी विवाद सत्र को नहीं रोकेगा चाहे वह जल का हो या और किसी समस्या से संबंधित।

कुछ भी हो काला धन तो अपना रास्ता तलाश ही लेता है


डॉ. अरूण जैन
भारतीयों ने अपना धन विदेश में जमा कर रखा है, यह बात उस समय भी लोगों को मालूम थी जब साठ साल पहले मैंने पत्रकारिता शुरू की थी। पश्चिम जर्मनी ने एक बार हमें धन जमा करने वालों की सूची दी थी। लेकिन इसमें कुछ निकला नहीं क्योंकि इससे जुड़े लोगों को राजनीतिक संरक्षण मिला हुआ था। जब आधिकारिक तौर पर आग्रह किया गया तो काफी गोपनीय स्विस खाते भी सरकार को दिए गए थे। लेकिन इस पर कार्रवाई नहीं हुई क्योंकि एक बार फिर दिखाई दिया कि पैसा जमा करने वाले प्रभावशाली हैं। मुझे याद है कि संसद में हंगामे के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बार राजनीतिक पार्टियों को मिलने वाले धन की जांच कराई थी। इसकी रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई। लेकिन गैर सरकारी तौर पर बताया गया कि वामपंथी दल समेत सभी राजनीतिक पार्टियों के खाते पश्चिम जर्मनी या स्विट्जरलैंड में हैं।  विदेशों में भारतीय व्यापारियों और उद्योगपतियों के निवेश के बारे में अभी आया हुआ खुलासा भी इसी श्रेणी में आता है। इसके लिए निडर पत्रकारों को बधाई देनी चाहिए। इन पत्रकारों से बातचीत में मुझे पता चला कि जानकारी इक_ा करने और कई स्थानों पर जमा पैसों का मिलान करने में छह महीने का समय लगा है। जाहिर है मामले की जांच और जिम्मेदारी तय करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आयकर विभाग, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया और प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों का एक दल बनाया है। फिर भी इससे कुछ ठोस निकल कर नहीं आएगा क्योंकि इस लेन−देन से जुड़े लोगों का राजनीतिक प्रभाव है। संसद इस मामले को हाथ में ले सकता है क्योंकि खुलासे से पूरा राष्ट्र डरा हुआ है। एक बार फिर मामला आरोप−प्रत्यारोप से आगे जाने वाला नहीं है क्योंकि सभी पार्टियां किसी न किसी तरह इससे जुड़ी हैं। पार्टियों को अपनी व्यवस्था ठीक करनी पड़ेगी और यह करने के लिए उन्हें कुछ स्त्रोत रखना होगा। इस समस्या की तकलीफ यह है कि चुनावों के लिए धन की जरूरत है। विधानसभा के चुनावों में दस हजार करोड़ रुपए का खर्च होता है। स्वाभाविक है कि लोकसभा चुनावों के लिए कई और करोड़ रुपयों की जरूरत होगी। यहां तक कि मतदाता को फुसलाने के लिए उसे राजनीतिक पार्टियों को ओर से नगद या सामान दिया जाता है। उदाहरण के लिए, अगले महीने चुनाव में जा रहे तमिलनाडु में अब तक सबसे ज्यादा संख्या में ऐसी गिरफ्तारियां हुई हैं जो चुनाव से पहले के बिना हिसाब−किताब वाले पैसों से संबंधित हैं। राजनीतिक पार्टियों के कोष के बारे में कई संसदीय समितियों ने विचार किया है ताकि खर्च में कमी आए। चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार के दौरान पब्लिसिटी और नजर में आने वाली दूसरी बुराइयों पर पाबंदी लगा दी है। लेकिन कुल मिला कर हालत सुधरने के बदले और भी खराब हुई है। वास्तव में सभी राजनीतिक दल, खासकर सत्ताधारी पार्टी, चुनाव जीतने के लिए हर तरह का तरीका अपनाती हैं। कार्यकर्ताओं के लिए सत्ता का मतलब सिर्फ अधिकार नहीं, पैसा भी हो गया है। इसलिए चुनाव जीतने के लिए कोई भी तरीका बुरा नहीं माना जाता है। जाति का जिस तरह इस्तेमाल होता है वह स्वतंत्र मतदान की हंसी उड़ाने के समान है। संविधान ने इन सारी गड़बडियों पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन फिर भी पार्टियां जातियों और उपजातियों का इस्तेमाल करती हैं क्योंकि पैसों के अलावा मतदाताओं पर सबसे ज्यादा असर इसी का होता है। वित्त मंत्री अरुण जेटली का यह बयान है कि किसी को भी नहीं बख्शा जाएगा। लेकिन उन्हें पता है कि राजनीतिक पार्टियों को चंदा देने वालों के खिलाफ कुछ नहीं किया जा सकता है क्योंकि उन्होंने ही पार्टियों को जीवित रखा हुआ है। कोई राजनीतिक पार्टी उसी हाथ को कैसे काट सकती है जो उन्हें खाना खिलाता है? चुनाव आयोग ने अपनी विभिन्न रिपोर्टों में यह शिकायत की है कि उम्मीदवार तय सीमा से ज्यादा खर्च करते हैं। तय की गई सीमा के अनुसार विधानसभा सीट का एक उम्मीदवार 28 लाख रुपये और लोकसभा सीट का उम्मीदवार 70 लाख रुपए खर्च कर सकता है। लेकिन, उम्मीदवार इससे कई गुणा ज्यादा खर्च करते हैं। राजनीतिक पार्टियों के खर्च पर कोई सीमा नहीं होने के कारण, विधानसभा या लोकसभा के उम्मीदवार को सीमा के भीतर खर्च नहीं करता हुआ पाने पर भी चुनाव आयोग कार्रवाई करने में असमर्थ है। संसद या विधानमंडल के सदस्य चुनाव आयोग को झूठा हिसाब−किताब देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि नियमों का पालन कर वे पूरे चुनाव−क्षेत्र में प्रचार−कार्य पूरा नहीं कर सकते। क्षेत्र के हर हिस्से में पहुँचने के लिए बहुत सी गाडिय़ों और स्वयंसेवकों की जरूरत होती है, फिर भी सभी जगह पहुंचना उन्हें कठिन मालूम होता है। टेलीविजन माध्यम ने चीजें आसान कर दी हैं। लेकिन कोई उम्मीदवार नहीं चाहता कि उसका संदेश विज्ञापन के रूप में जाए। एक तो यह खर्चीला होता है, दूसरा, दर्शक विज्ञापनों के जरिए चुनाव प्रचार पसंद नहीं करता है। अगर प्रधानमंत्री फर्जी चुनाव खर्च को स्वीकार कर सकते हैं तो वह विदेशों में निवेश, जो अनैतिक है, लेकिन गैर−कानूनी नहीं, को अच्छी तरह स्वीकार कर सकते हैं। आखिरकार भारत के ऊंचे कर से बचने का उनका यही तरीका है। देश में ज्यादा टैक्स के कारण व्यापारी और दूसरे लोग अपना पैसा विदेशों में रखना पसंद करते हैं। सरकार ने कई बार माफी की घोषणा की है और इसे व्यापारियों और उद्योगपतियों के लिए आकर्षक बनाया ताकि वह विदेशों में जमा अपनी संपत्ति की घोषणा कर सकें। लेकिन समस्या यह है कि किस तरह उनसे देश में पैसा रखवाया जाए और टैक्स दिलाया जाए। मुझे याद है कि मैं जब 1990 में लंदन में हाई कमिश्नर था तो देश विदेशी मुद्रा के भारी संकट का सामना कर रहा था। मैंने वहां रहने वाले भारतीय मूल के लोगों से व्यक्तिगत अपील की कि देश, जिसे आप भारत माता कहते हैं, को उनकी तत्काल मदद की जरूरत है। लेकिन अपील का कुछ असर नहीं हुआ। वे अच्छा फायदा चाहते थे। जब उन्हें बान्ड आफर किया गया, जो विदेशी मुद्रा में अच्छा फायदा सुनिश्चित करने वाला था, तो वे निवेश के लिए बहुत इच्छुक हो गए। वे चाहते थे कि देश के प्रति प्यार धन में तब्दील किया जाए।
असम-बंगाल चुनाव के बाद भाजपा में बड़ा उलटफेर

दो सीएम बदल सकते हैं 


डॉ. अरूण जैन
असम और बंगाल चुनाव के बाद भाजपा बड़े उलटफेर के मूड में है। इसके संकेत भाजपा ने एक प्रदेश के संगठन मंत्री को बदलकर दे दिये हैं, जिसका आदेश रातोंरात ईमेल द्वारा भेजकर अमित शाह ने सबको चकित कर दिया। गौरतलब है कि अभी असम, बंगाल और केरल में चुनाव चल रहे हैं। इन चुनावों में बंगाल और केरल की तुलना में भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीदें असम से हैं। यदि असम में भाजपा सरकार बना लेती है तो मोदी शाह की जोड़ी विहार की हार से उबरकर ताकतवर बनकर उभरेगी। ऐसे में उन मुख्यमंत्रियों की कुर्सी खतरे में पड़ सकती है जो आये दिन आलाकमान को चुनौती देते रहते हैं। इनमें पहला नाम राजस्थान की मुख्यमंत्री बसुंधरा राजे का आता है जो शुरू से ही मोदी और शाह की आँख की किरकिरी बनी हुई हैं। बसुंधरा को हटाकर आलाकमान वहां ओम माथुर या कोई अन्य अपनी पसंद का चेहरा बिठा सकता है। दूसरे नंबर पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का नाम आता है। कमजोर प्रशासनिक पकड़ और व्यापमं घोटाले के कारण शिवराज की कुर्सी भी जाना तय है। अभी हाल ही में शिवराज की पसंद माने जाने वाले प्रदेश के संगठन मंत्री अरविन्द मेनन को अमित शाह ने रातों रात हटा दिया जो शिवराज को बहुत बड़े झटके के रूप में देखा जा रहा है। शिवराज की जगह प्रदेश के ही किसी बड़े नेता को कमान सौंपी जा सकती है। नरेंद्र सिंह तोमर शिवराज से नजदीकी के कारण पहले ही रेस से बाहर हो चुके है, वहीं कैलाश विजयवर्गीय की छवि भी ईमानदार राजनेता की नहीं है। सुगनी देवी ज़मीन घोटाले और सिंघस्थ घोटाले में नाम आने के कारण कैलाश का नाम भी रेस से बाहर बताया जा रहा है। ऐसे में राज्य की कैबिनेट मंत्री यशोधरा राजे सिंधिया आलाकमान की पसंद हो सकती हैं। अपनी ईमानदार छवि और कड़क प्रशासनिक क्षमता के चलते यशोधरा राजे को मध्यप्रदेश की कमान सौंपी जा सकती है। आलाकमान यशोधरा के जरिये एक तीर से दो निशान साधना चाहता है। एक तो उनकी बहन वसुंधरा राजे को सीएम पद से हटाने के कारण उनकी नाराजगी कुछ हद तक दूर होगी वहीं कांग्रेस भी उनके भतीजे और गुना से सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को अगले चुनाव में मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करने पर विचार कर रही है। ज्योतिरादित्य मध्यप्रदेश के सबसे ज्यादा जनाधार वाले कांग्रेसी नेताओं में सुमार हैं, और कांग्रेस की नैया पार लगाने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में यशोधरा का नाम आगे कर भाजपा कांग्रेस को बैकफुट पर धकेल देगी। जो भी हो लेकिन आने वाले दिन भाजपा की राजनीति में काफी उथल-पुथल भरे रहने वाले हैं।

दम तोड़ती नदियां

डॉ. अरूण जैन
देश में अभी पूरी तरह गरमी शुरू भी नहीं हुई कि नदियों में पानी की कमी दिखने लगी है। हालांकि यह कोई नई बात नहीं है, बीते पंद्रह वर्षों से नदियों में पानी हर साल कम होता जा रहा है। वैज्ञानिक भी इस बात को स्वीकार कर रहे हैं कि नदियों में पानी की मात्रा आगामी पच्चीस वर्षों तक यों ही घटती रही, तो देश में जलक्रांति की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। दरअसल, मौसम चक्र में हो रहे बदलाव के कारण बर्फ और ग्लेशियर से निकलने वाले पानी की मात्रा नदियों में कम हो रही है। वैज्ञानिकों ने एक नए शोध में खुलासा किया है कि गंगा नदी के कानपुर और इलाहाबाद तक पहुंचते-पहुंचते हिमालयी ग्लेशियर और बर्फ के पानी की मात्रा 9 से 4 फीसद तक रह जाती है। भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला अमदाबाद, आइआइटी रुड़की और वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान, देहरादून के वैज्ञानिकों ने संयुक्त रूप से उत्तराखंड के ऋषिकेश में गंगा के पानी की पड़ताल की, तो मालूम हुआ कि बर्फ और ग्लेशियर के पानी का हिस्सा अठारह से दो फीसद रह गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बर्फ और ग्लेशियर के पानी का प्रतिशत शुरू में 54 फीसद से ज्यादा रहा करता था। वैज्ञानिक अब नए सिरे से इजराइल की तर्ज पर मेल्टिंग वाटर का प्रतिशत निकालने के बाद अलग-अलग जलस्रोतों को एक-दूसरे से जोड़ कर पानी की बचत का फार्मूला निकालने में जुटे हैं। वे इस बात से ज्यादा चिंतित हैं कि केंद्र सरकार नदियों को जोडऩे और नदियों की सफाई को लेकर कई तरह की योजना बना रही है, पर इन योजनाओं को अमल में लाने से पहले नदी में जल की मात्रा और प्रवाह कैसे बढ़े, इसका कोई ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा है। बीते पंद्रह सालों में वैज्ञानिकों ने कम से कम चार प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे हैं। इन प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। जबकि नदी में निर्धारित मानकों के मुताबिक पानी की मात्रा बरकरार रखी जाए, तभी नदी जोड़ जैसी योजनाएं पूरी हो पाएंगी। जलवायु परिवर्तन की वजह से माउंट एवरेस्ट का दक्षिणी ग्लेशियर पिछले चार साल में उनतीस फीसद से ज्यादा सिकुड़ चुका है। यह ग्लेशियर ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों का बड़ा स्रोत है। गोमुख में हर साल बर्फबारी घट रही है। हिम और हिमस्खलन अध्ययन प्रतिष्ठान, चंडीगढ़ के वैज्ञानिकों का कहना है कि गोमुख ग्लेशियर के अधिकतम तापमान में 0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो रही है और बर्फबारी में हर साल 37 से 39 सेंटीमीटर की कमी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन के वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन किया है। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि एक दशक के दौरान गोमुख क्षेत्र में अधिकतम तापमान में 0.9 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान में 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी हुई है। गंगा में बांधों के निर्माण से गंगा की धारा काफी पतली हो गई है। गंगा की जलधारा को अविरल बनाए रखने के लिए जरूरी है कि बांध जितना पानी लेते हैं उसका चार फीसद छोड़ते रहें। इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी पालन नहीं किया जा रहा है। असल में नदी पर रिवर फ्रंट बनाने की योजना भी भविष्य के लिए घातक साबित हो सकती है। जिस नदी पर रिवर फ्रंट बनेगा उसका हाइड्रोलिक सिस्टम बिगड़ जाएगा। जो जलचर नदी के कच्चे किनारे पर आते-जाते, अंडे देते हैं वे सब समाप्त हो जाएंगे। नदी अपने आप को रिचार्ज करने के लिए जो पानी कच्चे किनारों से बरसात में लेती है, वह व्यवस्था पूरी तरह से खत्म हो जाएगी। साफ पानी कम मिलेगा। सीवेज का पानी ज्यादा मिलेगा। इतना ही नहीं, आने वाले दिनों में पानी का संकट भी बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर साबरमती को देखा जा सकता है। साबरमती की औसत चौड़ाई 1,253 फुट थी, जो रिवर फ्रंट योजना के बाद अब महज 92 फुट बची है। यह जो कटौती हुई है उस पर रिवर फ्रंट बना है। गोमती हो, हिंडन या फिर यमुना हो, जहां रिवर फ्रंट बनेगा, नदी की चौड़ाई कम करके ही बनेगा। नदी अपने भूजल से ही अपने आप को रिचार्ज करती है। अगर वाकई देश की नदियों पर रिवर फ्रंट बनाना है, तो चीन से सबक लेना चाहिए। चीन के शंघाई में ह्यंगपू रिवर फ्रंट पार्क इसका बेहतरीन उदाहरण है। जहां नदी के किनारे सरिया-सीमेंट के दीवार बिना बनाए प्राकृतिक ढंग से रिवर फ्रंट बनाए गए हैं, ताकि इस व्यवस्था से नदी का पानी भी साफ रहे और उसके पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। नदी समय-समय पर अपने को रिचार्ज भी करती रहे। देश में इस साल सूखे की मार भी किसानों को झेलनी पड़ रही है। खुद टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन ने स्वीकार किया है कि गंगा में पिछले साल के मुकाबले बयालीस क्यूमैक्स पानी कम है। क्योंकि इस साल 5.04 मिमी बारिश हुई है। जबकि बीते साल 54 .05 मिमी बारिश हुई थी। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उत्तराखंड में 968 ग्लेशियरों में से भागीरथी में योगदान देने वाले 238 ग्लेशियर हैं, जिनमें अभी आधे से अधिक बिना बर्फ के हैं। वहीं, जम्मू-कश्मीर के 5,262, हिमाचल के 2,735, सिक्किम के 449 और अरुणाचल के 162 ग्लेशियरों में बर्फ की मात्रा लगातार घट रही है। पहले से ही जहां ग्लेशियरों के पिघलने की दर मात्र 17 मीटर प्रति वर्ष है, वहां इस साल बर्फ नहीं पडऩे से हिमपोषित नदियों के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। गंगा में लगभग चौदह हजार घन मीटर पानी छोड़े जाने की जरूरत है, लेकिन मौजूदा समय में यह केवल नौ हजार घन मीटर है। उज्जैन में चल रहे सिंहस्थ कुंभ के लिए क्षिप्रा नदी में आवश्यक जलप्रवाह और जल उपलब्ध नहीं है। यहां पर सरकार ने नर्मदा-क्षिप्रा सिंहस्थ लिंक परियोजना शुरू की है, जिससे नर्मदा की ओंकारेश्वर सिंचाई परियोजना के सिसलिया तालाब से जल शिप्रा के उद्गम स्थल से छोड़ा जा रहा है। वहां से यह जल क्षिप्रा में प्रवाहित होकर उज्जैन तक पहुंचेगा। हालांकि मध्यप्रदेश में 2006-07 और 2009-10 में 5,186 करोड़ की लागत से जल संरक्षण और संवर्द्धन कार्य करने का दावा सरकार ने किया था। बावजूद इसके सिंहस्थ कुंभ के लिए परियोजना शुरू करनी पड़ी है।

उज्जैन के कुंभ और महाकाल भस्मार्ती के लिए थाईलेंड के भारतवासियों में विशेष आकर्षण


(बैंकाक से डॉ. अरूण जैन)
पूर्वी एशियाई देशों में थाईलेंड का अपना एक आकर्षण है। न केवल भारतीय बल्कि विश्व के अन्य देशों से भी पर्यटक बड़ी संख्या में यहां आते हैं। इसमें कोई दो राय नही कि ‘‘सेक्स वर्कर’’ को उद्योग का दर्जा देकर इस देश ने पूरे विश्व में अपनी अलग पहचान कायम कर ली है और शायद इसी का प्रभाव है कि यहां संबद्ध उद्योग-धंधे बहुत बड़ी संख्या में विकसित हो गए हैं। संभवतः इसी आकर्षण से पर्यटकों की संख्या भी यहां पर अन्य देशों से अधिक है। 
थाईलेंड की कुल जनसंख्या का एक तिहाई हिस्सा भारतीयों का है जो या तो होटल और रेस्टोरेंट व्यवसाय स्थापित कर यहां बस गए हैं अथवा वे यहां पर्यटन और होटल व्यवसाय में कार्य कर रहे हैं। होटल और रेस्टोरेंट व्यवसाय तो यहां अत्याधिक फला-फूला है। मध्यप्रदेश से गए पत्रकारों के एक दल, जिसमें मैं भी शामिल था, ने बैंकाक, पर्यटक एवं मनोरंजन स्थल पटाया और अन्य शहरों में पाया कि यहां रहने वाले भारतीय उज्जैन के सिंहस्थ को कुंभ के नाम से जानते हैं। उनकी शिप्रा नदी स्नान के प्रति भी अगाध श्रद्धा है। पत्रकारों के दल ने पृथक-पृथक समूह चर्चाओं में इन भारतीयों को सिंहस्थ में अगले माह उज्जैन आने का निमंत्रण देते हुए बताया कि इस बार 22 अप्रैल से 21 मई तक उज्जैन में सिंहस्थ महापर्व है। पहली बार मध्यप्रदेश सरकार ने उज्जैन में इस महाआयोजन की तैयारी पर पांच हजार करोड़ रूपए खर्च किए हैं। यह राशि अब तक हुई महापर्वों की तुलना में 20 गुना अधिक है। इस राशि से मुख्य रूप से 14 नए ओवर ब्रिज, फोरलेन सड़कें, रिंग रोड, आठ किलोमीटर लंबाई के नदी घाट बनाए गए हैं। इसके अलावा पहली बार ही पूरे महापर्व को हाईटेक व्यवस्थाओं से सुसज्जित किया गया है। बाहर से आने वाले प्रत्येक श्रद्धालु को पार्किंग स्थल, मेला क्षेत्र, साधुओं के साधना स्थल, घाटों पर जाने वाले मार्ग, आदि की जानकारी एक ही मोबाइल एप पर उपलब्ध हो जाएगी। भीड़ नियंत्रण की सर्वाधिक बेहतर व्यवस्थाएं की गई हैं, जिसमें न भटकने का खतरा है, न बच्चों को गुम होने का। थाईलेंड के कई भारतीयों ने अगले माह कुंभ में उज्जैन आने की इच्छा व्यक्त की। मैने उन्हे बताया कि दिल्ली से इन्दौर की सीधी वायु सेवा उपलब्ध है। रेल मार्ग पर भी उज्जैन, दिल्ली से सीधा जुड़ा हुवा है। वायु सेवा से इन्दौर पहुंचने पर वहां से अच्छी पब्लिक ट्रांसपोर्ट उपलब्ध होगी, जो मात्र 40-45 मिनिट में उज्जैन पहुंचा देगी। सरकार और समाजसेवी संगठनों ने भी सिंहस्थ (कुंभ) में आने वालों की हर मदद के साधन जुटाएं हैं। होटल व्यवसाय में लगे पंजाबी, पर्यटन-रेस्टोरेंट व्यवसाय में कार्यरत बिहार, उत्तरप्रदेश के रहवासियों ने पत्रकारों के दल को आश्वस्त किया कि वे अवश्य आएंगे।
महाकाल मंदिर और उसमें होने वाली भस्मार्ती को लेकर भी थाईलेंड भारतीय बहुत उत्सुक हैं। सभी का कहना है कि महाकाल को प्रतिदिन ताजा चिता की भस्म से लेप किया जाता है। वे उसे प्रत्यक्ष देखना चाहते हैं। केवल चर्चा से ही वे रोमांचित हो जाते हैं। मैने उन्हें कहा कि वे आसानी से भस्मार्ती दर्शन कर सकेंगे।

Friday, 15 April 2016

अफ्रीका का सौंदर्य सिमटा विक्टोरिया प्रपात में 
डॉ. अरूण जैन
आकर्षक उद्यानों वाले पठार, ऊंची-ऊंची पर्वत श्रेणियां, रोमांचक वन्य जीवन, समुद्र जैसी विशाल झीलें और मनमोहक जलप्रपात, यह सब कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जिनकी वजह से बार−बार अफ्रीका जाने को मन करता है। अफ्रीका की प्राकृतिक खूबसूरती में जो चीज सबसे अधिक हैरान करती है वह है भव्य विक्टोरिया जलप्रपात। इस जलप्रपात को कुदरत का खूबसूरत अजूबा ही कहा जा सकता है। ऐसा अनुमान है कि प्रति मिनट जैंबेजी नदी का लगभग 55 लाख घन मीटर पानी घाटी में नीचे गिरता रहता है और इस घाटी के सामने के छोर से, जोकि नदी के तट जितना ही ऊंचा है, का आनंद आप ले सकते हैं। इस प्रपात को एक किनारे से दूसरे किनारे तक देखने के लिए आपको कार द्वारा या फिर पैदल पुल पार करके जिम्बाब्वे की सीमा में प्रवेश करना होगा। यह पुल जलप्रपात से 700 मीटर दक्षिण में स्थित है और इस पर खड़े होकर आप इसका पूरा नजारा देख सकते हैं। विक्टोरिया जलप्रपात के आसपास लोग हजारों साल से रहते आ रहे हैं, लेकिन बाहरी दुनिया को प्रकृति के इस आश्चर्य से परिचित कराने का श्रेय एक स्काटिश मिशनरी डेविड लिविंग्सटन को जाता है। 1855 में एक छोटी सी नाव में बैठ कर वह यहां पहुंचा था। उसी ने उस समय की परंपरा के अनुसार इंग्लैंड की महारानी के नाम पर इसे विक्टोरिया जलप्रपात नाम दिया और उसके नाम पर इस शहर का नाम पड़ा लिविंग्सटन। इस जलप्रपात का सबसे पुराना नाम शोंगवे था, जो इस क्षेत्र में बसे टोकलेया लोगों ने इसे दिया था। उसके बाद एंडेबेले लोग यहां आकर बसे और उन्होंने इसे बदल कर अमांजा थुंकुआयो कर दिया, जिसका अर्थ हुआ, धुएं में बदलता हुआ पानी। अंत में मकालोलो लोगों ने इसे एक नया नाम दिया मोस औ तुन्या, यानि गरजता हुआ धुआं। स्थानीय लोगों में आज भी यही नाम प्रचलित है। पिछले लगभग साढ़े पांच लाख वर्षों के दौरान यह जलप्रपात अपना स्थान बदलता रहा है। इस प्रक्रिया के दौरान नदी अब तक सात घाटियां पीछे छोड़ कर अपने वर्तमान स्थान पर पहुंची है। यहां आपको पानी तथा कीचड़ में अपने स्थूल शरीर को छिपाने का प्रयास करते हिप्पो भी देखने को मिल जाएंगे। आसपास के वनों में आपको एक डाल से दूसरी डाल पर कूदते बंदर भी नजर आएंगे साथ ही अनेक प्रकार के पक्षियों का कलरव भी आपका मन मोह लेगा। यहां का विक्टोरिया राष्ट्रीय उद्यान हाथी, अफ्रीकी भैंस, शेर तथा अन्य वन्य पशुओं से भरा पड़ा है। नदी में बड़े−बड़े खतरनाक मगरमच्छ भी हैं इसलिए इसमें नहाना सुरक्षित नहीं है। यहां सूर्योदय तथा सूर्यास्त देखने का सबसे अच्छा समय अक्टूबर से दिसंबर के बीच ही होता है, उस समय नदी में पानी भी ज्यादा नहीं होता और आकाश भी साफ होता है। आधुनिक पर्यटकों के मनोरंजन के लिए यहां पैराशूटिंग और जैंबेजी पुल से बंजी जंपिंग जैसे रोमांचक खेलों की व्यवस्था है। मछली पकडऩे के शौकीनों के लिए कुछ विशेष नौकाएं भी यहां उपलब्ध हैं जो नदी के अंदर ले जाकर आपके इस शौक को पूरा करती हैं। विक्टोरिया जलप्रपात को देखने के बाद आप यह अवश्य ही महसूस करेंगे कि प्रकृति का इससे अधिक रोमांचक, नाटकीय, भव्य तथा विलक्षण रूप शायद ही कहीं अन्यत्र देखने को मिले।