Monday, 2 January 2017

अमरीका ने भी माना मोदी का ‘लोहा’

डॉ. अरूण जैन
भारत की संसद में हाल में वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) विधेयक का पारित होना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक बड़ी विधायी उपलब्धि है और इस बात को उनके बड़े आलोचक भी नहीं झुठला सकते हैं। एक प्रमुख विशेषज्ञ ने यह बात कही है।    अनुसंधान संगठन कारनेगी एंडावमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस के मिलान वैष्णव ने विदेश मामलों की पत्रिका में लिखा है, ‘‘मोदी सरकार जो कि इस आलोचना से हैरान थी कि उसने भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वरूप में बदलाव के लिए कुछ खास नहीं किया है, अब उसे एक कानून पारित करने पर सराहना मिल रही है और यह उसकी ऐसी उपलब्धि है जिसे उसके कड़े विरोधी भी आसानी से खारिज नहीं कर सकते हैं।’’   उन्होंने कहा, ‘‘यह उपलब्धि उनकी सरकार के लिए सही समय पर आई है। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार अभियान पहले ही शुरू हो चुका है। उत्तर प्रदेश की जनसंख्या 20 करोड़ के करीब है। उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में चुनावों का समय और उसकी अहमियत को देखते हुए कई इन चुनावों को मोदी सरकार को लेकर मध्यावधि जनमत भी करार दे सकते हैं।’’   विशेषज्ञों का मानना है कि जीएसटी के लागू होने से एक ऐसी साझी कर प्रणाली अमल में आ जाएगी जिससे राज्यों और केन्द्र के स्तर पर अप्रत्यक्ष करों की मौजूदा व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकेगा। केंद्र के स्तर पर लगने वाले उत्पाद शुल्क और राज्य के स्तर पर लगने वाले मूल्य वर्धित कर, प्रवेश कर और विलासिता कर जैसे कई करों को इसमें समाहित कर दिया जाएगा।

गिर सकती है गाज !

डॉ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दस साल की पारी का क्या अंत होने वाला है ? आखिर शिव के राज की ताबूत की आखिरी कील शिवराज का कौन नजदीकी बन रहा हैं ? और कौन ठोकने की तैयारी कर रहा है ?मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की दस साल की पारी का अंत अब निकट आता जा रहा हैं। उचित मुहुर्त और मौके की तलाश में कांग्रेस नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी के आला नेता जुटे ही नहीं बल्कि मौका और मुहुर्त भी तय कर दिया गया हैं। शिवराज को सर्वाधिक बड़ा संकट खड़ा करने वाला व्यापम का मुद्दा अस्त्र के तौर पर काम आने वाला हैं और सुप्रीम कोर्ट की तल्खी भरे अंदाज के चलते सी.बी. आई कदम उठाने वाला हैं। सूत्रों के अनुसार सी.बी.आई ने भी तैयारी शुरू कर दी हैं और किसी भी दिन शिवराज के अतयंत विश्वासपात्र व्यक्ति को इस मामले में लपेटा जा सकता हैं। गौरतलब हैं कि कांग्रेस लंबे समय से आरोप लगाती आ रही हैं कि व्यापम के मामले में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की धर्मपत्नी साधना सिंह चौहान की खासी भूमिका हैं। कांग्रेस का आरोप खासकर परिवहन आरक्षक की भर्ती परीक्षा को लेकर रहा हैं। इस मामले में मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने मोबाईल काल डिटेल और एस.एम.एस. को लेकर भी आरोप लगाया था। दिग्विजय ने व्यापम मामले की जॉच कर रही एस.टी.एफ पर जॉच में गड़बड़ी किए जाने के आरोप लगाये थे। एस.टी.एफ ने शिवराज और उनके नजदीकी लोगों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर जॉच में गड़बड़ी कर डाली। कांग्रेस के आरोपों को भाजपा हमेशा नकारती रही, बाद में यह मामला सी.बी.आई के पास चला गया। सूत्रों के अनुसार सीबीआई के पास हाल ही में कुछ ऐसे तथ्य प्राप्त हुए हैं। जिनके चलते मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान के  विश्वास पात्र व्यक्ति की संलिप्तता इस मामले में पाई हैं। जिसके चलते शिवराज को मुख्यमंत्री पद त्यागना पड़ेगा। सी.बी.आई सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव एस के मिश्रा के खिलाफ ऐसे सबूत प्राप्त हुए हैं जिनके चलते उन्हें घेरे में लिया जा सकता हैं। सीबीआई ऊपर से इशारे का इंतजार कर रही हैं। जिस दिन भी निर्देश प्राप्त हुए मध्यप्रदेश में कार्यवाही कर दी जाएगी। विश्वस्त सूत्रों के अनुसार भाजपा के दिग्गज नेताओं को भी इस बात के संकेत दे दिए गये हैं।  

प्रियंका गाँधी कांग्रेस का भविष्य हैं, राहुल फेल साबित हो रहे


डॉ. अरूण जैन
उत्तर प्रदेश के चुनाव को लेकर कांग्रेस कमर कस चुकी है जिस प्रकार से हाल ही में लखनऊ में रैली निकाली गई इससे यह साफ हो गया है कि इस बार कांग्रेस उत्तर प्रदेश को हल्के में नहीं ले रही है। इस बीच यह भी खबर आ रही है कि अब प्रियंका गांधी विधानसभा चुनाव में जोर शोर से प्रचार करेंगी लेकिन अभी इस खबर की पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन यह तय है कि आने वाले दिनों में वह महत्वपूर्ण भूमिका में होंगी। आखिर क्यों है प्रियंका को इतनी मांग?सच तो यह भी है कि पार्टी का एक तबका प्रियंका में उनकी दादी इंदिरा गांधी की झलक देखता है और वह चाहता है कि प्रियंका सक्रिय भूमिका निभाएं। एक तबके का मानना है कि उत्तर प्रदेश और अन्यत्र पार्टी के बेहतर भविष्य के लिए ऐसा किया जाना अनिवार्य है। पिछले 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने राहुल की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में बेहतर प्रदर्शन किया था और उसे 22 सीटें मिली थीं, लेकिन विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदर्शन अपेक्षित नहीं रहा और पार्टी के गढ़ माने जाने वाले अमेठी एवं रायबरेली जैसे स्थानों पर भी पार्टी ने खराब प्रदर्शन किया। उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में हार तो जगजाहिर है। चुनावों में प्रदर्शन खराब रहने के कारणों को लेकर राहुल ने खुद ही पार्टी विधायकों, सांसदों और वरिष्ठ नेताओं से बातचीत की थी। गौर करने योग्य यह भी है कि पहले राजनीति में आने के सवाल पर प्रियंका कहती थीं कि राजनीति में बिना आए भी समाज की सेवा की जा सकती है, लेकिन अब माहौल बदल गया लगता है। प्रियंका ने राजनीति में आने के संकेत कई महीने पहले ही देने शुरू कर दिए थे। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान जब मीडिया ने प्रियंका गांधी से पूछा था कि वे राजनीति में कब आएंगी, तो इसके जवाब में उन्होंने कहा था, जब राहुल भैया चाहेंगे तब राजनीति में आएंगी। हालांकि कांग्रेस के प्रवक्ता अब भी इसकी पुष्टि नहीं कर रहे कि प्रियंका सक्रिय राजनीति में आएंगी और यह कह कर सवालों को टाल देते हैं कि आखिरी निर्णय तो प्रियंका को ही करना है। इससे साफ जाहिर है कि कांग्रेस उन्हें आगे लाने को आतुर है। कुछ दिग्गज तो साफ कह भी चुके हैं कि प्रियंका को आगे आना चाहिए। सच तो यह है कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं व कार्यकर्ताओं में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि चूंकि राहुल गांधी खारिज होते नजर आ रहे हैं, ऐसे में प्रियंका को ही आखिरी दांव के रूप में इस्तेमाल किया जाना चाहिए। वे ही राजनीति के खेल में कांग्रेस का आखिरी ‘तुरूप का पत्ता’ साबित हो सकती हैं। मगर संभवत: सोनिया गांधी इस राय से इत्तेफाक नहीं रखतीं। दरअसल, कांग्रेस में गांधी परिवार का बड़ा ही योगदान रहा है। जब-जब कांग्रेस कमजोर हुई है या कमजोर की गई है, गांधी परिवार के किसी ना किसी व्यक्ति ने इसको उबारने में महती भूमिका निभायी है। जिसमें उनके बलिदान तक की बातें निहित हैं। 20वीं सदी के अंत में जब कांग्रेस कई टुकड़ों में विभाजित हो गई थी ओर देश में भाजपा की सरकार चल रही थी। उस समय कांग्रेस की अपील पर गांधी परिवार की मुखिया सोनिया गांधी ने अपने पुत्र राहुल गांधी के साथ राजनीति में सक्रिय होकर भारतीय कांग्रेस का नेतृत्व संभाला। इसमें संदेह नहीं की गांधी परिवार ने अपने नेतृत्व क्षमता और साफ सुथरी छवि के आधार पर 2004 के आम चुनाव में आम जनमानस के सहयोग से विखंडित कांग्रेस को संगठित एवं जोडक़र भारत की सत्ता में पुन: वापसी की। प्रियंका गांधी का राजनीतिक योगदान इस चुनाव में काफी बढ़ गया, वे कांग्रेसियों को जोडऩे में सफल रहीं। उनके सक्रिय राजनीति में आने का प्रश्न अब महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि उन्हें तो अब इसका विस्तारीकरण करना है। अमेठी और रायबरेली में वह लगातार समय देती आ रही हैं। उनके आने से निश्चित रूप से कांग्रेस को फायदा होगा, क्योंकि वह इंदिरा गांधी की प्रतिरूप मानी जाती हैं। साथ ही उनकी छवि संवेदनशील एवं ईमानदार राजनीतिज्ञ की है। रही बात वंशवाद की तो अगर किसी के पूर्वज राजनीति में थे, तो उसमें उसका क्या दोष?कांग्रेसियों की ओर से यह भी कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नि:सन्देह एक संभावनाशील महिला हैं। लोग अपने नेता के किसी गुण से सर्वाधिक प्रभावित होते हैं तो वह उसके द्वारा करिश्मा पैदा करने की क्षमता से होते हैं। 1999 के संसदीय चुनाव में प्रियंका गांधी के मात्र एक चुनावी संबोधन से रायबरेली लोकसभा में कांग्रेस ने भाजपा के प्रत्याशी अरुण नेहरू को हरा दिया था। प्रियंका गांधी के व्यक्तित्व में यदि कोई गुण सर्वाधिक प्रभावित करता है, तो वह उनके द्वारा लोगों से सहज संवाद स्थापित करने की क्षमता है, वह बोली-वाणी, पहनावे एवं रहन-सहन से लोगों को सीधे प्रभावित करती हैं। भीड़ में विषेशतया महिलाओं में अपने घुलने मिलने की क्षमता के कारण वह लोगों के दिलों में अपनी जगह बना लेती हैं। जो लोग कांग्रेस पर वंशवाद का आरोप लगाते हैं, वह अन्य राजनीतिक दलों के वंशवाद की तरफ से आंखें फेरे हुए हैं। अन्य दलों से विपरीत कांग्रेस का परंपरा से प्राप्त नेतृत्व सदैव जनता द्वारा बड़े इम्तिहान पास कर आता है। वह चाहे इंदिरा जी की ‘इन्डीकेट बनाम सिण्डीकेट’ की लड़ाई हो, संजय गांधी द्वारा 1977 के आम चुनाव में पस्त मृतप्राय कांग्रेस में जान फूंकने का काम हो, राजीव गांधी द्वारा इंदिरा जी की हत्या से उपजे शून्य को भरना रहा हो, या सोनिया गांधी द्वारा 2004 में कथित साम्प्रदायिक ताकतों को सत्ता से अप्रत्याशित तौर पर बाहर करना हो। इस तरह नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व जनता द्वारा कठिनतम परीक्षा पास करता आ रहा है। प्रियंका गांधी नि:सन्देह कांग्रेस का भविष्य हैं उनके आने से कांग्रेस को मजबूती मिलेगी एवं समाज को भी एक सक्षम नेतृत्व मिलेगा।

इनवेस्टर्स को लुभाने पत्नी संग सिंगापुर गए थे शिवराज


डॉ. अरूण जैन
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सिंगापुर यात्रा पर 1.39 करोड़ रुपए का खर्च आया था। एक क्रञ्जढ्ढ के तहत हुए खुलासे में पता चला है कि पिछले साल जनवरी में सिंगापुर के इनवेस्टर्स को मध्य प्रदेश में लाने के लिए महंगे-महंगे तोहफे दिए गए थे। चौंकाने वाली बात यह है कि इस बारे में विदेश मं त्रालय को कोई जानकारी ही नहीं दी गई। जबकि किसी बाहरी देश पर आधिकारिक यात्रा के बाद एक फॉलो-अप रिपोर्ट सौंपने का नियम है। आरटीआई के जवाब में खुलासा हुआ है कि विदेश मंत्रालय को न तो मध्य प्रदेश सरकार, न ही सिंगापुर में भारतीय उच्चायोग से इस संबंध में कोई कागजात नहीं मिले हैं। आरटीआई एक्टिविस्ट अजय दूबे को मिले कागजों के अनुसार, चौहान की यात्रा पर हुआ 1.39 करोड़ रुपए का खर्च मध्‍य प्रदेश ट्रेड एंड इनवेस्टमेंट फैसिलिटेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने उठाया। इसके अलावा सिंगापुर के भावी इनवेस्टर्स को 41,499 रुपए के गिफ्ट्स भी दिए गए। मध्‍य प्रदेश ट्रेड एंड इनवेस्टमेंट फैसिलिटेशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड के एक और जवाब के अनुसार, गिफ्ट्स का खर्च मृगनयनी मध्य प्रदेश इम्‍पोरियम और एमपी लघु उद्योग निगम लिमिटेड द्वारा किया है। दोनों मध्य प्रदेश सरकार के स्‍वामित्‍व वाली संस्थाएं हैं। इनवेस्‍टर्स को 22,291 रुपए की चार साडिय़ां और 11,718 रुपए की कीमत वाली लॉफिंग बुद्धा की 20 मूर्तियां बतौर गिफ्ट दिए गए। सरकार ने संत रविदास एमपी हस्तशिल्प एवं हस्तकरघा विकास निगम लिमिटेड से 7,490 रुपए में चार शॉल भी खरीदीं। क्रश्व्रष्ठ ्ररुस्ह्र: दुनिया के सबसे बड़े रूद्बद्यद्बह्लड्डह्म्4 ्रद्बह्म्ह्यद्धश2 में पिछड़ा अमेरिका, पाकिस्‍तानी जंगी जहाज को बेस्ट प्राइज सिंगापुर की यात्रा का मकसद मध्य प्रदेश में विभिन्न क्षेत्रों में निवेशकर्ताओं को आकर्षित करना था। सिंगापुर में भावी इनवेस्टर्स के साथ बैठकें और इंटरएक्टिव सेसंस हुए। ये बैठकें सिंगापुर में भारतीय उच्चायोग के समन्‍वय से आयोजित की गईं। कागजातों और हवाई टिकट के अनुसार मुख्यमंत्री की पत्नी साधना सिंह ने भी प्रतिनिधिमंडल के साथ यात्रा की। अभी तक साफ नहीं है कि 12-16 जनवरी के बीच यात्रा में उनकी भूमिका क्या थी, और उनकी ट्रिप का भुगतान किसने किया। 

क्या मीडिया के लिए कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए?

डॉ. अरूण जैन
पत्रकारिता एक कमीज की तरह है जो इतनी लंबी होनी चाहिए कि किसी विषय को पूरी तरह ढक ले और इतनी छोटा हो कि देखने में आकर्षक लगे। इतने सालों में, खबरों ने ऐसा आकार ले लिया है जिसमें सनसनी होती है और गैर−जरूरी फैलाव होता है। जब वरिष्ठ पत्रकार गुजरते जा रहे हैं, हमारे सामने यह सवाल मुंह बाए खड़ा है कि भविष्य की पत्रकारिता किस तरह की होगी। निश्चित तौर पर, मामला सिर्फ भारत तक सीमित नहीं है। पश्चिम और पूरब, सभी ओर के देशों (तानाशाही वाले शासनों को छोडक़र) में इसी तरह के सवाल पूछे जा रहे हैं कि वह कौन सी लक्ष्मण रेखा हो जिसे पत्रकार पार नहीं करें? और, आखिरकार क्या कोई लक्ष्मण रेखा होनी चाहिए? काफी लोग यह सवाल पूछने लगे हैं कि कि पत्रकार क्यों उनके निजी मामलों में ताक−झांक कर रहे हैं। दूसरी ओर, पत्रकार अपना बचाव यह कह कर करते हैं कि अगर वे जांच नहीं करेंगे तो गलत काम बाहर नहीं आएंगे। सरकार का बना-बनाया जवाब होता है कि कुछ चीजें ऐसी हैं जिसकी जानकारी सार्वजनिक हित में बाहर नहीं की जा सकती है और इस तरीके से बड़े कांडों पर भी पर्दा डाल दिया जाता है। मुझे याद है कि जब मैंने सुप्रीम कोर्ट के जजों हेगडे, ग्रोवर और शलाट के बारे में लिखा तो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने मेरी आलोचना की। उनकी दलील थी कि पत्रकारिता का काम जजों को प्रतिबद्धता का उपदेश देने का नहीं है। उन्होंने प्रतिबद्धता की व्याख्या नहीं की। मैं यह तो समझ सकता हूं कि जजों की प्रतिबद्धता संविधान के प्रति हो, लेकिन यह नहीं कि किसी व्यक्ति के प्रति, चाहे वह कितना भी बड़ा क्यों न हो। श्रीमती इंदिरा गांधी जजों से यह चाहती थीं कि वह उनके सोचने के तरीके का अनुकरण करें। यही वजह है कि उन्होंने तीन जजों की वरिष्ठता को नजरअंदाज कर सुप्रीम कोर्ट के एक कनिष्ठ जज जस्टिस रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। उन्होंने उन तीनों को इसकी सूचना पहले देने का शिष्टाचार भी नहीं दिखाया। यह खबर उन लोगों ने आल इंडिया रेडियो पर सुनी। इस तरह का राजनीतिक जोड़-तोड़ लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी पारदर्शिता के खिलाफ जाता है। वास्तव में, लोकतांत्रिक अधिकारों के बंटवारे और उसकी मर्यादा के पायों पर खड़ा होता है। उदाहरण के तौर पर, सेना सरकार के मामले में दखल नहीं देती है क्योंकि यह एक नागरिक प्रशासन के तहत काम करने वाला बल है। पाकिस्तान जैसे कुछ देश डूब गए क्योंकि सेना, हालांकि हाल में यह बैरक में वापस गई है, की उपस्थिति अभी भी पूरी तरह बनी हुई है। बांग्लादेश में भी ऐसा ही है, हालांकि वहां कुछ पत्रकार सशस्त्र सेना की आलोचना करने की हिम्मत अवश्य करते हैं। लोकतंत्र मांग करता है कि इसके सभी स्तंभ स्वतंत्र रूप से काम करें, लेकिन इस तरह कि सत्ता जनता के पास रहे। यह अलग बात है कि शासक निरंकुश हो जाते हैं और मुगल बादशाहों में से भी सबसे खराब की तरह व्यवहार करते हैं। जज यह सुनिश्चित करने वाले होते हैं कि लोकतंत्र लोगों के हित में काम करता है। उन्हें यहां तक अधिकार होता है कि वे विधायिका की घोषणाओं की जांच करें। यह बहस चलती रहेगी कि क्या न्यायापालिका सबसे ऊपर है या कार्यपालिका। अगर इसकी आलेाचना होती है कि जज क्या करते हैं और विधायिका किस तरह काम कर रही है तो पत्रकारों की ओर से होती है। ऐसा करना पत्रकारों का कर्त्तव्य है। अगर उन्हें वह करने में भय होता है जिसकी उनसे अपेक्षा की जाती है तो यह व्यवस्था के लिए दुर्भाग्य की बात है। मैंने इसका अनुभव किया है कि किस तरह आपातकाल, जिसने इस सप्ताह 26 जून को 41 साल पूरा किया, में पूरे प्रेस ने हथियार डाल दिया। शुरूआत में, विरोध हुए और बड़ी संख्या में पत्रकार (संपादक समेत) दिल्ली के प्रेस क्लब में यह प्रस्ताव पारित करने के लिए जमा हुए कि सेंसरशिप, जो आपातकाल का अभिन्न हिस्सा था, उन्हें मंजूर नहीं है। लेकिन दिन बीतने के साथ-साथ उन पर भय छा गया और वे व्यवस्था के हिस्सा बन गए, यहां तक कि श्रीमती गांधी के बेटे संजय गांधी, जो संविधान से बाहर की एक शक्ति थे, से आदेश भी लेने लगे। मुझे याद है कि प्रेस कौंसिल के सदस्य के रूप में, मैं इसके अध्यक्ष जस्टिस अय्यर के पास यह दरखास्त करने गया था कि सर्वोच्च संस्था होने की वजह से इसकी बैठक बुलाई जाए। मुझे यह नहीं मालूम था कि भय ने उन्हें आज्ञा का पालन करने वाला बना दिया था। उन्होंने कहा कि प्रेस कौंसिल की बैठक बुलाने का कोई मतलब नहीं है क्योंकि इसकी कार्यवाही के बारे में कहीं छपेगा नहीं। मेरा तर्क था कि अगर कोई विरोध नहीं हुआ तो सालों बाद जब इस शर्मनाक अध्याय का दस्तावेज बाहर आएगा तो इसमें पत्रकारों की प्रेस कौंसिल से किसी विरोध का रिकार्ड नहीं होगा। मेरी बात सुनने के बाद झिझक के साथ प्रेस कौंसिल के सदस्यों की एक मीटिंग उन्होंने बुलाई। आपातकाल खत्म होने के बाद जारी श्वेत पत्र में यह देख कर मैं स्तब्ध रह गया कि उन्होंने तत्कालीन सूचना प्रसारण मंत्री वीसी शुक्ला को लिखा था कि किस तरह उन्होंने (जस्टिस अय्यर) प्रेस कौंसिल की बैठक बलाने की कुलदीप नैय्यर की कोशिश को रोक दिया था। पत्रकारों की आजादी का वही सवाल अलग−अलग परिस्थितियों में हमारे सामने बार−बार उपस्थित होता है। मैं पाता हूं कि हम पत्रकार उस स्तर का पालन करने में विफल होते जा रहे हैं जिसकी हमसे अपेक्षा की जाती है। छोटी खबरों को आगे बढ़ाने वाली नई डिजिटल टेक्नोलौजी या रेडियो−टीवी पर आने वाले भाषण के छोटे अंशों से इसमें किसी प्रकार की मदद नहीं मिली है। वास्तव में, चीजें इस हद तक खराब हो गई हैं कि खबरों के कालम खरीदे जा सकते हैं। यह एक खुला सच है कि कई खबरें पेड़ न्यूज (पैसे लेकर छापी गई खबरें) हैं। कुछ बड़े अखबार अपने अखबारों में जगह बेचने में शर्म नहीं महसूस करते हैं चाहे जो भी इसे खरीद ले। उनके लिए यह विशुद्ध रूप से राजस्व का मामला है। हम उस स्तर से कितना नीचे गिर गए हैं जहां हम कभी थे? एक समय था जब हम तत्कालीन वित्त मंत्री टीटी कृष्णाचारी के समय हुए मूंधड़ा बीमा घोटाले को लोगों के सामने लाने में सफल हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने उन्हें कैबिनेट से इस्तीफा देने पर मजबूर किया। बाद में जब टीटीके से मैं मिला तो वह यह महसूस करते दिखाई नहीं दिए कि उन्होंने शासन व्यवस्था का कितना नुकसान किया था।

तेजी से बदल रही यूपी की राजनीतिक तस्वीर

डॉ. अरूण जैन
देश के सबसे बड़े सियासी सूबे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक परिदृश्य बड़ी तेजी से बदल रहा है। जोड़−तोड़, सेंधमारी और पाला बदल की कवायदें उफान पर हैं। ताजा घटनाक्रम में पहला जेल में बंद माफिया डॉन मुख्तार अंसारी के कौमी एकता दल का सपा में विलय और फिर विलय का रद्द होना है। दूसरा पिछले दो दशकों से ज्यादा तक बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती के सिपाहसालार स्वामी प्रसाद मौर्य का पार्टी को अलविदा कहना है। वैसे तो राजनीति में कभी भी, कुछ भी संभव होता है। पर जिस तेज गति और उम्मीद से परे का राजनीतिक वातावरण उत्तर प्रदेश का बन रहा है, उससे आने वाले दिनों का आभास हो रहा है। असल में सत्तारूढ़ समाजवादी पाटी, बहुजन समाज पार्टी, कांग्रेस और यूपी की सत्ता का सपना पाले बैठी भारतीय जनता पार्टी सब के लिये विधानसभा चुनाव करो या मरो का सवाल बन गये हैं। किसी को अपनी प्रतिष्ठा बचानी है तो किसी को अपना अस्तित्व। किसी को 2019 का लोकसभा चुनाव दिख रहा है तो किसी के लिए ये चुनाव डूबते को तिनके का सहारा लग रहे हैं। वोटों के मंडी में सबसे ज्यादा मांग दलित, पिछड़े और मुस्लिम की है। भाजपा दलित व पिछड़ों को रिझाने में लगी है। बसपा अपना घर बचाने में लगी है। सपा नेतृत्व तो यह मानकर बैठा है कि वो दोबारा सरकार बनाने जा रहा है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी इन दिनों यूपी में सक्रिय हैं। वो 2019 के लोकसभा चुनाव की जमीन तैयार करने में जुटे हैं। उत्तर प्रदेश की सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव इन दिनों बहुत परेशान हैं। उनके परिवार में घमासान छिड़ा हुआ है। कौमी एकता दल के समाजवादी पार्टी में विलय से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव बहुत भडक़े हैं। उन्होंने 2014 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले बाहुबली अतीक अहमद को सपा में शामिल होने से रोका था। उससे पहले 2012 के विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश ने डीपी यादव को पार्टी में शामिल होने के बाद निकलवा दिया था। तब उनको इसका बहुत फायदा मिला था और उनकी सपा के पारंपरिक नेताओं से अलग ब्रांडिंग हुई थी। लेकिन कौमी एकता दल के विलय से उनकी यह छवि प्रभावित हुई। हालांकि जेल में बंद मुख्तार अंसारी सपा में शामिल नहीं हुए, लेकिन अफजल अंसारी और शिबकतुल्ला अंसारी सपा में आ गए। शिवपाल यादव ने यह विलय कराया। इसमें पार्टी के वरिष्ठ नेता बलराम यादव भी शामिल थे। इससे नाराज अखिलेश ने बलराम यादव को तत्काल अपनी सरकार से निकाल दिया। मामला गरमाया तो बीच का रास्ता निकाला गया जिसके तहत कौमी एकता दल का विलय रद्द हुआ और बलराम यादव की मंत्री पद पर वापसी हुई। दूसरी ओर मुलायम सिंह की छोटी बहू अपर्णा यादव ने केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह के साथ एक इफ्तार दावत में हिस्सा लिया और उनके पैर छुए। कुछ दिन पहले मुलायम सिंह ने अखिलेश के करीबी कुछ नेताओं को पार्टी से निकाला था, लेकिन अखिलेश की नाराजगी के बाद उनको वापस लेना पड़ा था।  भारतीय जनता पार्टी अपने आपको यूपी की सत्ता का सबसे प्रबल दावेदार मान रही है। इसके लिये पार्टी जातीय गुणा−भाग ठीक करने में जुटी है। भाजपा आलाकमान के सामने सबसे बड़ी समस्या प्रदेश नेताओं के बीच बढ़ती गुटबाजी को रोकने की है। वहीं भाजपा के आधा दर्जन से ज्यादा नेता स्वयं को मुख्यमंत्री के तौर पर पेश करने में ताकत झोंक रहे हैं। सुलतानपुर के सांसद और मुख्यमंत्री पद के अघोषित दावेदार वरुण गांधी शांत होकर बैठ गए हैं। इलाहाबाद की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में उन्होंने पार्टी नेताओं का मूड भांप लिया और उसके बाद अपनी दावेदारी को आगे बढ़ाने या उस पर जोर देने का इरादा थोड़े समय के लिए छोड़ा है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के समर्थक भी चुप हैं। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से प्रदेश के नेताओं को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी महत्वाकांक्षाओं को काबू में रखें और उसका सार्वजनिक प्रदर्शन नहीं करें। लेकिन ऐसा लगता है कि वरुण गांधी और स्मृति ईरानी को छोड़ कर दूसरा कोई नेता इसे गंभीरता से नहीं ले रहा है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के समर्थक उनको लगातार मुख्यमंत्री पद के संभावित दावेदार के तौर पर पेश कर रहे हैं। इसी तरह गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ के समर्थक भी चुप नहीं बैठे हैं। योगी खुद हर कार्यक्रम और सभा में ध्रुवीकरण कराने वाले बयान दे रहे हैं। उनके समर्थकों ने सोशल मीडिया पर उनकी कट्टरपंथी छवि चमकाने की मुहिम छेड़ी है। इसी बीच पार्टी के एक और सांसद साक्षी महाराज ने अपनी दावेदारी पेश कर दी है। उनके समर्थकों का कहना है कि जब भाजपा गैर यादव पिछड़ा नेतृत्व पेश करना चाहती है तो साक्षी महाराज से बेहतर कोई नहीं हो सकता है। पार्टी के सवर्ण नेताओं में महेश शर्मा, दिनेश शर्मा और मनोज सिन्हा के समर्थक भी खूब सक्रिय हैं। उन्होंने स्थानीय स्तर पर और सोशल मीडिया पर अपने नेताओं के समर्थन में मुहिम छेड़ी है। इसका नतीजा यह हुआ है कि करीब एक दर्जन नेताओं के अलग अलग खेमे बन गए हैं और पार्टी के कार्यकर्ता भी इन खेमों में बंट गए हैं। पार्टी के शीर्ष नेता मान रहे हैं कि विधानसभा चुनाव में इसका नुकसान पार्टी को हो सकता है। अगले कुछ दिनों में मोदी मंत्रिमंडल के संभावित विस्तार में यूपी चुनाव के मद्देनजर यहां के नेताओं का कद बढ़ सकता है।  सूबे में भले ही कांग्रेस के नए बने प्रभारी महासचिव गुलाम नबी आजाद और चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने कांग्रेस की जोर शोर से चर्चा करा दी है और सीएम पद के दावेदार के नाम पर अटकलें लग रही हैं, लेकिन इस बारे में फिलहाल कोई फैसला अभी नहीं होगा। असल में भाजपा सीएम का दावेदार पेश करती है या नहीं और अगर करती है तो किसे चेहरा बनाती है। यह देख कर ही कांग्रेस नेतृत्व कोई फैसला लेगा। कांग्रेस के नेता सपा और बसपा दोनों के साथ तालमेल की बात कर रहे हैं। इसके अलावा एक तीसरे मोर्चे की संभावना पर भी बात हो रही है। लेकिन इस बारे में भी कोई फैसला नहीं होगा। इसका कारण यह है कि कांग्रेस में अब इस बात पर गंभीरता से विचार हो रहा है कि गांधी परिवार से किसी व्यक्ति को उत्तर प्रदेश में पेश किया जाए। अगर भाजपा के फैसले के बाद कांग्रेस प्रियंका गांधी को उतारने का फैसला करती है तो फिर कोई भी गठबंधन नहीं होगा और कांग्रेस अकेले चुनाव मैदान में उतरेगी। इसके लिए जमीनी स्तर पर तैयारी हो रही है।  यूपी में जोड़−तोड़ के साथ तोड़−फोड़ और आया राम−गया राम की राजनीति उफान पर है। सपा ने कुछ दिन पहले 146 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी। उसके बाद दस और उम्मीदवारों की एक सूची जारी हुई है। लेकिन मौजूदा 229 विधायकों के बारे में कुछ नहीं कहा जा रहा है। सिर्फ उन सीटों के उम्मीदवार घोषित किए जा रहे हैं, जहां पार्टी पिछली बार चुनाव हारी थी। जीती हुए सीटों को लेकर सपा की अलग रणनीति है, जिसके बारे में नहीं बताया जा रहा है। सपा से उलट मुख्य विपक्षी बसपा ने अपने विधायकों को संकेत दे दिए हैं उनकी टिकट नहीं कटेगी। यानी बसपा के 79 विधायकों की टिकट सुरक्षित है। इसी तरह भाजपा ने भी अपने 41 और कांग्रेस ने 29 विधायकों को भरोसा दे दिया है कि उनको लडऩा है। इस लिहाज से बसपा, कांग्रेस और भाजपा के विधायकों ने अपने क्षेत्र में काम शुरू कर दिया है। पर सपा के विधायक चिंता में हैं। 

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को कुछ ठोस उपाय करने होंगे

डॉ. अरूण जैन

उत्तर प्रदेश में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की तेजी चौंकाने वाली है। कांग्रेस आलाकमान ने देश भर के अपने तमाम धुरंधरों को मिशन यूपी पर लगा दिया है। कांग्रेस से जुड़ी खबरें मीडिया में सबसे अधिक सुर्खियां बटोर रही हैं। शायद ही कोई ऐसा दिन जाता होगा जब कांग्रेस खेमे से कोई चौंका देने वाली खबर न आती हो। चुनावी रणनीतिकार प्रशांत कुमार (पीके) जब से कांग्रेस के साथ आये हैं तब से पार्टी में कुछ अधिक तेजी देखने को मिल रही है। इस पर गुलाम नबी आजाद को यूपी का प्रभारी बनाया जाना सोने पर सुहागा साबित हो रहा है। उम्मीद है कि देर−सबेर यूपी कांग्रेस को निर्मल खत्री की जगह नया प्रदेश अध्यक्ष भी मिल जायेगा। कांग्रेसियों की तरफ से माहौल कुछ ऐसे बनाया जा रहा है जैसे वह (कांग्रेस) सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार हो। यह स्थिति तब है जबकि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के वादों-दावों को कोई ज्यादा गंभीरता से नहीं लेता है। इसकी वजह पर जाया जाये तो लगता है कि कांग्रेस आलाकमान में निर्णय लेने की क्षमता ही नहीं है। फैसले लेने की प्रक्रिया इतनी लंबी और सुस्त होती है कि जब तक फैसला लिया जाता है तब तक स्थितियां बहुत बदल जाती हैं। यूपी के प्रदेश अध्यक्ष निर्मल खत्री को हटाने के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। निर्मल खत्री जातीय समीकरण के हिसाब से कांग्रेस के लिये फायदेमंद नजर नहीं आ रहे हैं। कांग्रेस के भीतर इस बात पर सैद्धांतिक सहमति हो जाने के बाद भी दो साल से ज्यादा का वक्त गुजर गया लेकिन नये प्रदेश अध्यक्ष की तलाश अभी तक नहीं पूरी हो पाई है। एक तरफ निर्णय लेने में देरी और उस पर कांग्रेस के पास जनाधर वाले नेताओं की कमी पार्टी के लिये स्थायी समस्या बनती जा रही है। जो नेता बचे भी हैं, वे आपस में ही सिर फुटव्वल करे हैं। यूपी में तो कांग्रेस के कई प्रभारियों ने ही जिन्हें पार्टी की दिशा-दशा सुधारने के लिये भेजा गया था, पार्टी के भीतर अपने स्तर पर गुटबाजी को हवा देने का काम किया है तो कुछ प्रभारी पहले से चली आ रही गुटबाजी को खत्म करने में नाकाम रहे हैं। हाल ही में प्रदेश प्रभारी पद से हटाये गये मधुसूदन मिस्त्री इसकी मिसाल थे। नेताओं के अभाव के कारण संगठन भी कमजोर होता जा रहा है। किसी भी संगठन के लिए जो बूथ स्तर का संगठनात्मक ढांचा होता है, वह एक तरह से पार्टी या संगठन की जान होता है। कांग्रेस में यह दम तोड़ा चुका है। आज की तारीख में कांग्रेस के फ्रंटल संगठनों ने भी अपना औचित्य खो दिया है। वे जिस मकसद को लेकर बनाए गए हैं उसके अनुरूप काम ही नहीं कर रहे हैं। करीब तीन दशकों से यूपी की सियासत में हाशिये पर चल रही कांग्रेस कभी यूपी का सिरमौर हुआ करती थी। देश को कई प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री देने वाली पार्टी ने लम्बे समय तक प्रदेश पर राज किया। परंतु जब से यूपी में मंडल-कमंडल की राजनीति का उद्भव हुआ तब से कांग्रेस का रूतबा क्षेत्रीय दलों ने हासिल कर लिया। मंडल-कमंडल के दलदल से बड़ा-छोटा कोई नेता बच नहीं पाया। मंडल-कमंडल के अलावा भी 1984 से 1990 के दौरान ऐसे कई सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन हुए जिनकी वजह से कांग्रेस की जमीन खिसकती गई। कांग्रेस ने मंडल−कमंडल की राजनीति में अपने आप को फिट करने की काफी कोशिश की, मगर उसकी सियासी हांडी चढ़ नहीं पाई। वर्ष 1989 में भारतीय राजनीति में नए युग की शुरुआत हुई और कांग्रेस के कमजोर पडऩे और क्षेत्रीय दलों के उभार के बाद केन्द्र और राज्य की राजनीति में गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो गया। मंडल-कमंडल की राजनीति में, मंडल की राजनीति के नायक तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह बने तो मंडल की काट के लिये कमंडल (अयोध्या में भगवान राम के मंदिर का मुद्दा) को हवा देने में भगवा खेमा आगे रहा। सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए वीपी सिंह ने मंडल आयोग की आरक्षण संबंधित सिफारिशें लागू करके भले ही नौकरियों में नए अवसरों के द्वार खोल दिये थे, परंतु वीपी सिंह के इस कदम पर ऊपरी जाति के लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। जगह-जगह माहौल हिंसक होने लगा। आरक्षण विरोधी सडक़ पर उतर आये। यही वजह थी कि बुद्धिजीवी कहने लगा कि सामाजिक न्याय के नाम पर वीपी सिंह ने सिर्फ जाति विभेदों को बढ़ावा दिया। देश भर में छिड़ी आरक्षण की बहस ने पिछड़े वर्ग को अपनी पहचान का एहसास दिलाया। इस पहचान के एहसास ने उन लोगों का काम आसान कर दिया जो इस वर्ग को राजनीति में लाना चाहते थे। पिछड़े वर्ग को अच्छी शिक्षा, रोजगार के वायदे के साथ कई नई नई पार्टियां इस दौर में अस्तित्व में आईं। नीतीश कुमार, मुलायम सिंह यादव, लालू यादव आदि तमाम नेता इसी सियासत की देन थे। मंडल-कमंडल की सियासत में मंडल और कमंडल दोनों की ही राजनीति करने वालों को फायदा हुआ। सिर्फ कांग्रेस को ही नुकसान उठाना पड़ा। उसके पास इस स्थिति से मोर्चा लेने के लिये न तो इंदिरा गांधी मौजूद थीं, न संजय और राजीव गांधी। पार्टी का वोट बैंक तितर-बितर हो गया। मंडल कमंडल की काट कर सकने वाले नेताओं का पार्टी में अकाल पड़ गया। जब नेता नहीं बचे तो कार्यकर्ता भी मायूस होकर घरों में बैठ गया। यूपी में कांग्रेस को सबसे अधिक नुकसान हुआ। जिस पार्टी के 1980 में 309 और 1985 में 269 विधायक (425 में से) थे, 1989 में उनकी संख्या 94 पर सिमट गई। इसके बाद यूपी में कांग्रेस कभी उभर नहीं पाई। आज की तारीख में कांग्रेस के मात्र 28 (403 में से) विधायक हैं। बात वोट प्रतिशत की कि जाये तो 1993 में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को मात्र 15.1, 1996 में 29.1, 2002 में महज 08.9, 2007 में 08.8 और 2012 में 11.6 प्रतिशत मत ही मिले। 2012 में कांग्रेस की स्थिति में दो तीन प्रतिशत का सुधार तब आया था, जबकि राहुल गांधी ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी। वह वन मैन आर्मी की तरह सूबे में प्रचार कर रहे थे। उन्हीं के इशारे पर चुनावी रणनीति बनाई जा रही थी और उनकी पसंद के मुद्दों को हवा दी जा रही थी।