Tuesday, 10 July 2018

सेनाध्यक्ष ने ठीक ही तो कहा, उनका बयान राजनीति से नहीं जोड़ें

डाॅ. अरूण जैन

सेना प्रमुख बिपिन रावत ने असम में बढ़ रही बंगलादेशी घुसपैठ को लेकर वहां के राजनीतिक दल ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट को लेकर जो ब्यान दिया है उस पर सियासी चिल्लपों की नहीं बल्कि उसे सही संदर्भ में समझते हुए गहन चिंतन और कार्रवाई करने की आवश्यकता है। जनरल ने देश के सीमावर्ती राज्य असम में बदल रही जनसांख्यिकी, बढ़ रहे आतंकवाद, कानून-व्यवस्था को लेकर पैदा हो रही चुनौती के मद्देनजर अपनी चिंता जताने का प्रयास किया है। इसको राजनीतिक चश्मे से देखना उतना ही अनैतिक व खतरनाक है जितना कि देश के पूर्वोत्तर में बंगलादेशी घुसपैठियों की अनदेखी करना। मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने 2005 में ऑल इंडिया युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की नींव डाली। इसी दल को लेकर सेना प्रमुख ने 21 फरवरी को बयान दिया कि असम में एआईयूडीएफ नाम की एक पार्टी है। अगर आप देखेंगे तो वह बीजेपी के मुकाबले बेहद तेजी से बढ़ी है। यह पार्टी मुस्लिमों के हित में काम करने का दावा करती है। अजमल की पार्टी असम के 5 राजनैतिक दलों में सबसे युवा है। गठन के सिर्फ 6 महीने बाद, 2006 में पार्टी ने 10 सीटें जीतीं। 2011 में विधानसभा में पार्टी के 18 सदस्य हो गए, इसी चुनाव में बीजेपी को सिर्फ 5 सीटें हासिल हुई थीं। 2016 के असम विधानसभा चुनाव में पार्टी ने 126 सीटों में से 13 सीटों पर जीत दर्ज की। इस चुनाव में उसने 13 प्रतिशत मत प्राप्त किए। वर्तमान में पार्टी के लोकसभा में तीन सदस्य हैं। इसके नेता बदरुद्दीन अजमल असम की धुबरी सीट से लोकसभा सांसद हैं। अजमल असम राज्य जामिया-उलेमा-ए-हिन्द के प्रमुख व दारूल उलूम देवबंद के सदस्य भी हैं। 2016 में चुनावी शपथपत्र में अजमल ने 54 करोड़ रुपये की संपत्ति घोषित की थी। लाइव मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, इसमें परिवार की संपत्ति जोडऩे पर यह आंकड़ा 200 करोड़ को पार कर जाता है। 2016-17 में भाजपा को कुल 290.22 करोड़ रुपये का कॉर्पोरेट चंदा प्राप्त हुआ। अजमल का परिवार एशिया का सबसे अमीर गैर-सरकारी संगठन मरकज-उल मारिस चलाता है। इसके अलावा परिवार के पास एशिया का सबसे बड़ा चैरिटेबल अस्पताल- 500 बिस्तर का हाजी अब्दुल माजिद स्मृति अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र भी है। मौलाना अजमल की इन उपलब्धियों से किसी को कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए, परंतु उन पर सबसे गंभीर आरोप यह लगते हैं कि वे बंगलादेशी घुसपैठियों को शरण देते हैं। उन्हें भारतीय नागरिकता दिलवाने के लिए अपने प्रभाव का प्रयोग कर उनका आधार कार्ड, राशन कार्ड और वोटर कार्ड जैसे सरकारी दस्तावेज उपलब्ध करवाने में सहायता करते हैं। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर घुसपैठिए भारतीय नागरिक होने का दावा पेश करते हैं। चाहे मौलाना इन आरोपों को नकारते रहे हैं परंतु धरातल की सच्चाई चिंता पैदा करती है। इन घुसपैठियों के कारण केवल असम ही नहीं बल्कि पूरे पूर्वोत्तर भारत की जनसांख्यिकी में परिवर्तन हुआ है। भारत सरकार के सीमा प्रबंधन कार्यदल की वर्ष 2000 की रिपोर्ट के अनुसार 1.5 करोड़ बांग्लादेशी घुसपैठ कर चुके हैं और लगभग तीन लाख प्रतिवर्ष घुसपैठ कर रहे हैं। असम में जिन तीन जिलों में जातीय संघर्ष चल रहा है, उसमें सबसे पहले कोकराझार जिले पर नजर डालें। 2001-2011 में यहां जनसंख्या में वृद्धि दर 5.19 प्रतिशत रही और 2001 की जनगणना के अनुसार इस जिले में मुस्लिमों की संख्या बढ़कर लगभग 20 प्रतिशत हो गई है। अगर हम असम मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि दर को देखें तो बंगलादेश से सटे जिलों में यह सबसे अधिक है जिसके पीछे बंगलादेशी घुसपैठ मुख्य कारण है। धुबड़ी जिला भी बंगलादेश सीमा से सटा हुआ है। 1971 में यहां मुस्लिम जनसंख्या 64.46 प्रतिशत थी जो 1991 में बढ़कर 70.45 और 2001 में 75 प्रतिशत हो गई। कमोबेश यही हाल 2004 में बने चिरांग जिले का भी है। जनसंख्या की बढ़ोतरी का अनुपात देखकर यह साफ प्रतीत होता है कि यह जनसंख्या में सहज हुई वृद्धि नहीं है अपितु यह बंग्लादेशी घुसपैठ का नतीजा है। इतने सारे विदेशी लोग किसी राजनीतिक संरक्षण के घुसपैठ नहीं कर सकते और न ही यहां अपना अड्डा बना सकते। स्वाभाविक है कि यह एक खतरनाक राजनीतिक सौदा है इसके लिए देश चाहे जाए भाड़ में, केवल वोट दो और भारत की नागरिकता ले लो। इसके लिए केवल मौलाना की पार्टी को ही जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता बल्कि सेक्युलरिज्म की राजनीति करने वाले वामपंथी, कांग्रेस, समाजवादी दलों के वह नेता भी बराबर के कसूरवार हैं जो आज जनरल रावत के बयान को केवल भाजपा व गैर-भाजपा या हिंदू-मुसलमान की तुला में तौलने की कोशिश कर रहे हैं। अंतर केवल इतना है कि मौलाना की एआईयूडीएफ घुसपैठियों को शरण देने व दिलवाने में बाकी दलों से आगे हो सकती है। बंगलादेशी घुसपैठियों और मौलाना की पार्टी की साथ-साथ हो रही वृद्धि को लेकर जनरल रावत ने इस पार्टी का उल्लेख किया है न कि किसी और कारण से। रावत का उद्देश्य इलाके में बंगलादेशियों की घुसपैठ की समस्या को उजागर करना है कि कि किसी दल विशेष के साथ पक्षपात करना। आश्चर्य है कि सेक्युलरवादी यह शिकायत करते रहते हैं कि सरकार का विरोध करने वालों को देशद्रोही ठहरा दिया जाता है जबकि वास्तविकता यह है कि देश की चिंता करने वालों को भाजपा और आरएसएस का एजेंट करार दे दिया जाता है। आज जनरल रावत को भी इसी आधार पर संघ और भाजपा का एजेंट बताया जाने लगा है।  वैसे जनरल रावत पहले सैनिक अधिकारी नहीं हैं जिन्होंने असम में बंगलादेशी घुसपैठियों पर चिंता जताई हो। 8 नवंबर, 1998 में तत्कालीन राज्यपाल लेफ्टीनेंट जनरल एस.के. सिन्हा ने देश के राष्ट्रपति को भेजी अपनी रिपोर्ट में भी इसकी चेतावनी दी थी। जनरल सिन्हा अपनी रिपोर्ट के पृष्ठ क्रमांक 1 से 18 तक में बताते हैं कि किस प्रकार असम के सीमांत जिलों का जनसांख्यिकी परिवर्तन हो रहा है, बंगलादेशी घुसपैठिए किस प्रकार अवैध गतिविधियों में लिप्त हो कानून-व्यवस्था, देश की एकता-अखण्डता के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। जनरल रावत ने गुप्तचर एजेंसियों के हवाले से देश को चेताया है न कि किसी दल विशेष पर अंगुली उठाई या किसी को प्रोत्साहन दिया। भारतीय सेना राजनीति से सदैव दूर रही है और यही कारण है कि जनरल रावत ने बेबाकी से अपनी बात कही है न कि राजनीतिक नफा नुक्सान देख कर। 

भाजपा से पहले संघ जुटा चुनावी तैयारी में, 25 को होगा बड़ा आयोजन

डाॅ. अरूण जैन
अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव की सरगर्मी धीरे-धीरे जोर पकड़ रही है। बंद कमरों में रणनीति बनाई जा रही है तो सड़क पर संघर्ष से लेकर मीडिया तक का सहारा लेकर उसे जन−जन तक पहुंचाया जा रहा है। जातिवाद का खेल खेला जा रहा है। वोट बैंक की सियासत परवान चढ़ रही है। राष्ट्रवाद का ढिंढोरा पीटा जा रहा है। झूठ के सहारे सच को दबाया एवं कुचला जा रहा है। यहां तक की जब किसी की, किसी भी वजह से हत्या के कारण मानवता शर्मशार होती है तो नेतागण उसे भी सियासी चश्मे से ही देखते हैं। कहीं बयान बहादुर अपने बयानों से सियासत का रूख मोडऩे की कोशिश करते हैं तो कहीं राष्ट्रीय स्वयं सेवक जैसे संगठन अपनी पसंद की पार्टी के लिये सियासी जमीन तैयार करने में जुट जाते हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में अगर बीजेपी को बड़ी सफलता हाथ लगी तो इसका जितना श्रेय मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है तो उतना ही हकदार आरएसएस भी है। आरएसएस काफी पहले से बीजेपी के पक्ष में माहौल तैयार करने में लगा हुआ था। इस बार भी चुनावी आहट से काफी पहले आरएसएस इस काम में जुट गया था। आरएसएस के स्वयं सेवक पूरे प्रदेश में घूम−घूम कर जनजागृति अभियान चलाये हुए थे। जिसका फायदा बीजेपी को आम चुनाव के बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भी मिला था। अब 2019 के लिये भी आरएसएस ने कमर कस ली है। इसी क्रम में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हिन्दुओं को साधने के लिये राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ 25 फरवरी को जिला मेरठ में आरएसएस के इतिहास का सबसे बड़ा समागम करने जा रहा है जिसमें लाखों की संख्या में भीड़ जुटने का अनुमान है। राष्ट्रोदय स्वयंसेवक समागम के नाम से मेरठ में होने वाले इस आयोजन में तीन लाख से अधिक स्वयंसेवक भाग लेंगे तो आरएसएस के सरसंघचालक मोहन भागवत मुख्य भी इस समागम में मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद रहेंगे। इस समागम की अध्यक्षता जूनागढ़ अखाड़े के महामंडलेश्वर अवधेशानन्द गिरि करेंगे और जैन मुनि विहर्ष सागर विशिष्ट अतिथि होंगे। समागम में सियासी हस्तियां उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत भी शिरकत कर सकते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 14 जिलों के गांवों में आरएसएस की पैठ बढ़ाने की रणनीति के मद्देनजर आने वाले स्वयंसेवकों के कुल 3.11 लाख पंजीकरण में 2.18 लाख ग्रामीण क्षेत्रों के हैं। ये ग्रामीण आरएसएस के मेरठ प्रांत के 10 हजार 580 गांवों से आएंगे। आरएसएस के मेरठ प्रांत में मेरठ, सहारनपुर और मुरादाबाद मंडल आते हैं। समागम में आने वाले स्वयंसेवकों में ज्यादतर की उम्र 40 से कम होगी और इनकी उपस्थिति सवा दो लाख के करीब होने का अनुमान है। इसमें से करीब एक लाख स्कूल−कालेजों के विद्यार्थी हैं। इस आयोजन में सभी 3.11 लाख स्वयंसेवक गणवेश में आयेंगे। इनमें सवा दो लाख पहली बार संघ के कार्यक्रम में आ रहे हैं।  गणवेश बनवाने पर आने वाला करीब 800 रुपये का खर्च स्वयंसेवक ही स्वयं उठायेंगे। आयोजन स्थल पर सुरक्षा के मद्देनजर मुख्य द्वार से प्रवेश करने पर संघ कार्यकर्ता को अपने मोबाइल ऐप से बार कोड का मिलान करना पड़ेगा। इसके बाद गणवेशधारी को पंडाल में प्रवेश मिल सकेगा। एक दिवसीय इस समागम में दोपहर तीन से पांच बजे तक संघ प्रमुख मोहन भागवत का बौद्धिक संवाद होगा। आरएसएस का यह सबसे बड़ा आयोजन है। इससे पहले पश्चिम महाराष्ट्र प्रांत पुणो में 3 जनवरी 2016 को सवा लाख स्वयंसेवकों का एक आयोजन किया गया था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में 25 को आरएसएस का समागम होगा तो इससे ठीक एक दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ 24 फरवरी से दिल्ली में एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित कर रहा है, जिसका उद्घाटन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली करेंगे। खास बात यह है कि कार्यक्रम में पचास देशों के राजदूत या प्रतिनिधियों के साथ देशभर से 30 कुलपति भी मंच साझा करेंगे। दिल्ली में दो दिन तक चलने वाले इस सम्मेलन से दुनिया के सभी देशों से अशांति, स्वार्थ को छोड़कर दुनिया को ग्लोबल विलेज बनाने पर जोर दिया जाएगा। इससे संस्कृतियों व विचारों का आदान-प्रदान होगा, जिससे आपसी भाईचारे की भावना को भी बढ़ाया जाएगा। बता दें कि कार्यक्रम का आयोजन अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ कर रहा है, जोकि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 48 अनुषांगिक संगठनों में से एक है।

मालदीव में यामीन पर सख्त कार्रवाई कर अपना कर्तव्य निभाये भारत

डाॅ. अरूण जैन
मालदीव के राष्ट्रपति अब्दुल्ला यामीन किसी की नहीं सुन रहे हैं। उनसे संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और श्रीलंका ने अनुरोध किया है कि वे अपने संविधान और सर्वोच्च न्यायालय का सम्मान करें। मालदीव के सबसे बड़े पड़ोसी और शुभेच्छु राष्ट्र भारत के अनुरोध को वे ठुकरा चुके हैं। मालदीव के सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वसम्मति से यह फैसला दिया था कि जिन 12 सांसदों को संसद से निकाल दिया गया था, उन्हें वापस लिया जाए और विरोधी दलों के नौ नेताओं को रिहा किया जाए। इनमें मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद और यामीन के अपने एक उपराष्ट्रपति भी हैं। यह फैसला मानने की बजाय यामीन ने मालदीव में आपातकाल लगा दिया। अब उनका बर्ताव किसी निरंकुश तानाशाह जैसा हो गया है। उन्होंने मुख्य न्यायाधीश अब्दुल्ला सईद और एक न्यायाधीश अली हमीद को गिरफ्तार कर लिया है। सईद के वकील ने आरोप लगाया है कि सईद से यह कहा गया है कि यदि वे फैसला वापस नहीं लेंगे तो उनके टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएंगे। डर के मारे शेष तीन जजों ने वह फैसला रद्‌द कर दिया है। यदि सांसदों और नेताओं की वापसी हो जाती तो यामीन की गद्‌दी हिल जाती। चुनाव तो साल भर बाद है लेकिन, यामीन को अभी ही गद्‌दी छोडऩी पड़ती, क्योंकि 85 सदस्यीय संसद में इन 12 सांसदों के विरोध के कारण उनकी पार्टी अल्पमत में आ जाती और यदि उन पर महाभियोग चलता तो उनके हारने की नौबत आ जाती। पूर्व राष्ट्रपति नशीद को 2015 में 13 साल के लिए जेल में डाल दिया गया था। लेकिन, इलाज के बहाने नशीद लंदन चले गए और अब यामीन के खिलाफ जबर्दस्त अभियान छेड़े हुए हैं। यदि नशीद और शेष आठ नेता मुक्त होकर आज मालदीव में राजनीति करें तो यामीन का जीना मुश्किल हो सकता है। नशीद ने यामीन-सरकार के भ्रष्टाचार के ऐसे आंकड़े पेश किए हैं, जिनका तथ्यपूर्ण खंडन अभी तक नहीं किया जा सका है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि नशीद का साथ दे रहे हैं 80 वर्षीय मौमून गय्यूम, जो कि यामीन के सौतेले भाई हैं और जिन्होंने 30 साल तक राष्ट्रपति के रुप में मालदीव पर राज किया है। पूर्व राष्ट्रपति नशीद और गय्यूम, दोनों के साथ दिल्ली में मेरी व्यक्तिगत भेंट और लंबी वार्ता हुई है। दोनों ही भारत के अभिन्न मित्र हैं। यामीन ने इतनी क्रूरता दिखाई है कि 80 वर्षीय गय्यूम को भी जेल में डाल दिया है। मालदीव की संसद के अध्यक्ष और यामीन के एक मंत्री ने तंग आकर इस्तीफा दे दिया है। खुद यामीन इतने बौखलाए हुए हैं कि उन्होंने पहले दो दिन में अपने दो पुलिस मुखियाओं को बर्खास्त कर दिया। अब उन्होंने अपने तीन परम मित्र राष्ट्रों- चीन, पाकिस्तान और सऊदी अरब को अपने विशेष दूत भिजवाए हैं। भारत ने उनके विशेष दूत को दिल्ली आने की अनुमति नहीं दी है। इस समय चीन खुलकर यामीन का समर्थन कर रहा है। उसने घुमा-फिराकर भारत को धमकी भी दी है कि मालदीव में बाहरी हस्तक्षेप अनुचित होगा। मालदीव भारत का पड़ोसी है और दक्षेस का सदस्य है लेकिन, ऐसा लग रहा है कि वह चीन का प्रदेश-सा बनता जा रहा है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग तो 2014 में ही मालदीव जा चुके हैं। हमारे प्रधानमंत्री बाकी सारे पड़ोसी देशों में हो आए, पाकिस्तान भी, लेकिन अभी तक मालदीव नहीं जा सके। मालदीव ने अभी-अभी चीन के साथ मुक्त व्यापार समझौता कर लिया है। 777 पृष्ठ के इस समझौते को संसद ने सिर्फ 10 मिनिट में बिना बहस हरी झंडी दे दी। 85 सदस्यीय संसद में सिर्फ 30 वोटों से उसे पास कर दिया गया। बिल्कुल इसी तरह जुलाई 2015 में संसद ने एक ऐसा कानून आनन-फानन में बना दिया, जिसके तहत कोई भी विदेशी सरकार या व्यक्ति मालदीव के द्वीपों को खरीद सकता था। ये दोनों सुविधाएं चीन के लिए की गई हैं ताकि वह वहां अपना सैनिक अड्‌डा बना सके। राष्ट्रपति शी की मालदीव-यात्रा के दौरान दोनों पक्षों ने 8 समझौते किए थे। सबसे बड़ा समझौता इब्राहिम अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्‌डा बनाने का था। इस हवाई अड्‌डे को पहले एक भारतीय कंपनी बना रही थी। उसे रद्‌द करके यह चीन को दे दिया गया। माले और उससे 10 किमी दूर समुद्र में स्थित द्वीप हुलहुले के बीच चीन अब एक पुल बनाएगा। मालदीव चीन के रेशम महापथ की योजना में सक्रिय हिस्सा लेगा। इसके अलावा चीन ने वहां सड़कें और मकान बनाने की योजनाएं भी शुरू कर दी हैं। गत वर्ष मालदीव पहुंचने वाले पर्यटकों में 90 प्रतिशत चीनी थे। मालदीव आजकल इस्लामी कट्‌टरवाद का अड्‌डा भी बनता जा रहा है। उसके सैंकड़ों युवक आजकल सीरिया में छापामारी कर रहे हैं। पिछले तीन-चार महीनों में मैं कई बार लिख चुका हूं कि मालदीव में भारत-विरोधी लहर उठने वाली है। पिछले माह जब हमारे विदेश मंत्रालय की नींद खुली तो उसने मालदीव के विदेश मंत्री मोहम्मद असीम को भारत बुलवाया। उन्होंने सरकार परस्त एक मालदीवी अखबार के इस कथन का खंडन किया कि 'मालदीव का सबसे बड़ा दुश्मन भारत है और सबसे बड़ा दोस्त चीन है।Ó उसने भारत के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते की बात कही। मैंने लिखा था कि यह सिर्फ जबानी जमा-खर्च है। अब भारत क्या करे? यदि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण विरोधी नेताओं को यामीन रिहा कर दें, उनमें सर्वसम्मति करवाएं और चुनावों की घोषणा कर दें तो भारत को कुछ करने की जरूरत नहीं है लेकिन, यदि वे तानाशाही रवैया जारी रखेंगे तो मालदीव में अराजकता फैल सकती है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ेगा। भारत ने यदि 1988 में सैन्य-हस्तक्षेप नहीं किया होता तो सिंगापुर और श्रीलंका से आए हुए हुड़दंगी मालदीव में राष्ट्रपति गय्यूम का तख्ता पलट देते। 1971 में श्रीलंका की प्रधानमंत्री सिरिमाओ भंडारनायक के अनुरोध पर भारत ने सेना भेजकर उन्हें बचाया था। नेपाल के राजा त्रिभुवन की भी 1950 में भारत ने रक्षा की थी। 1971 में शेख मुजीब के निमंत्रण पर भारत ने सेना भेजकर बांग्लादेश का निर्माण करवाया था। मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति नशीद तथा अन्य महत्वपूर्ण नेताओं ने इस संकट की घड़ी में भारत से मदद मांगी है। भारत को अपने लिए कुछ नहीं चाहिए लेकिन, इस चार लाख लोगों के देश में खून की नदियों को बहने से रोकना उसका कर्तव्य है।

मोदी-शाह की मजबूरी बने शिवराज

डाॅ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी और भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की मजबूरी बन गए हैं। दिल्ली भेजी गई एक खुफिया रिपोर्ट में जहां मध्यप्रदेश सरकार और संगठन के चाल-चरित्र-चेहरे को बदलने की आवश्यकता जतलाई गई हैं, वही रिपोर्ट में चेतावनी भी दी गई हैं कि शिवराज के बिना नैय्या पार भी नहीं हो पाएगी। आज के हालात में आगामी विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी के 70 सीटों पर ही सिमटने की आशंका जतलाई गई हैं। सूत्रों के अनुसार सरकार के चाल-चरित्र-चेहरे को लेकर काफी तीखी टिप्पणी की गई हैं। सरकार के भ्रष्ट कारनामों के साथ साथ जनप्रतिनिधियो के भ्रष्टाचार, जनता के साथ संवादहीनता, शासकीय योजनाओं का लाभ न दिला पाना, झूठी वाहवाही बटोरने जैसी टिप्पणी की गई हैं। जो सरकार के चरित्र को दर्शा रहा हैं। सरकार की चाल को लेकर अधिकारियों और कर्मचारियों से मनमानी पूर्ण रवैय्या, लालफीताशाही, समयबद्ध कार्य न होना, सरकारी योजनाओं में भी गड़बड़ी को लेकर टिप्पणी की गई हैं। उपरी स्तर पर सरकार का चेहरा बदलने की आवश्यकता बताई हैं। जिसमें प्रमुख पदों पर बैठे अधिकारियों के साथ-साथ कई मंत्रियों सहित मुख्यमंत्री भी शामिल हैं। हालांकि लोकप्रियता के लिहाज से मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खासकर मध्यप्रदेश में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के मुकाबले ज्यादा लोकप्रिय माने गए हैं। पर पूर्व के मुकाबले उनकी लोकप्रियता में गिरावट दर्ज की गई हैं। इस रिपोर्ट में लगभग ऐसे दस प्रमुख अधिकारियों को बदलने की आवश्यकता जताई गई हैं। जिन पर शिवराज सिंह चौहान अत्यंत भरोसा करते हैं। दिल्ली नेतृत्व को भेजी गई रिपोर्ट में आगामी विधानसभा चुनाव में सरकार बनाने लायक फार्मुले तक पहुंचने के लिए भाजपा प्रदेश संगठन का भी चाल चरित्र चेहरे को लेकर प्रतिकुल टिप्पणी की गई हैं। कार्यकर्ता असंतुष्ट ही नहीं सरकार और संगठन से नाराज हैं। जिसके चलते सरकारी और संगठन के कार्यक्रम से कार्यकर्ता दूरी बना रहा हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पदाधिकारी आपसी लड़ाई में उलझे हुए हैं। चुनिन्दा नेता और पदाधिकारी सरकार की मलाई जमकर खा रहे हैं। जिसके चलते आमजन के बीच पार्टी का पक्ष नहीं रखा जा रहा हैं। रिपोर्ट में कार्यकर्ताओं में उत्साह, संगठन के प्रति दायित्व का भाव जगाने की आवश्यकता जतलाई गई हैं। मध्यप्रदेश भाजपा के कार्यकर्ताओं के मूल चरित्र को वापस लाने की आवश्यकता जतलाई गई हैं जिससे भाजपा की चाल भी बदलेगी। संगठन का भी चेहरा बदले बिना कार्यकर्ता के चाल और चरित्र को नहीं बदला जा सकता इसलिए प्रदेशाध्यक्ष सहित पॉच पदाधिकारियों के ऐसे नाम भेजे गए हैं। जो विभिन्न स्तरों पर सरकार का जमकर दोहन कर रहे हैं। दो दिन पूर्व दिल्ली में प्रदेश के दो आला नेताओं को अमित शाह ने तलब किया था और उनसे ताजा हालात पर चर्चा भी की थी। हालियां भेजी गई रिपोर्ट इसी माह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत के प्रदेश दौरे के बाद एकत्रित की गई हैं। जिसको लेकर अमित शाह ने अपनी रणनीति को अंतिम रूप देना भी शुरू कर दिया हैं। कुछ ही दिनों में इसके परिणाम दिखना शुरू भी हो जाएंगे। हालांकि यह बात काफी लंबे समय से संगठन के आला स्तर पर चर्चा में थी। पर बात शिवरा के विकल्प पर आकर अटक रही हैं। चुनावी वर्ष में शिवराज को हटाना आला नेतृत्व रिस्क बतौर मान रहा हैं। क्योंकि मोदी और शाह की चिंता अक्टूबर-नवंबर 2018 के चुनाव के साथ साथ 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव भी हैं और मध्यप्रदेश में सीटों का गणित गड़बड़ाना काफी नुकसान भरा हो सकता हैं।

जब 42 की उम्र में शादी कर चर्चा में आई यह एक्ट्रेस


डाॅ. अरूण जैन
मेरी खुशियों का समंदर मेरे पिनकोड का नंबर, आज से तेरा हो गया...
यह गीत गुनगुनाते हुए अपने पैडमैन यानी लक्ष्मी प्रसाद चौहान, यानी खिलाड़ी अक्षय कुमार अपनी दुल्हनियां गायत्री यानी राधिका आप्टे को घर ले आते हैं। एक रोज उन्हें पता लगता है कि 'उन दिनोंÓ के चलते गायत्री कुछ दिन तक सबसे दूर घर के एक अंधेरे कोने में रहेगी। सबके मना करने के बावजूद वह उस कोने में पहुंच जाते हैं और पाते हैं कि गायत्री एक गंदे कपड़े को अपनी साड़ी के नीचे फैलाकर सुखा रही है। इतना गंदा कपड़ा, जिससे वह अपनी साइकिल भी साफ न करें! यह देख लक्ष्मी के साथ ही हम भी बेचैन हो उठते हैं। और लक्ष्मी तुरंत ही मेडिकल स्टोर पहुंच जाते हैं सैनिटरी नैपकिन खरीदने। नैपकिन काफी महंगा होता है। गायत्री इतनी महंगी चीज इस्तेमाल करने से मना कर देती है। और लक्ष्मी इस ख्याल में डूब जाते हैं, कि आखिर इतनी हल्की चीज की कीमत इतनी भारी क्यों है? वह तय करते हैं कि खुद ही सैनिटरी नैपकिन बनाएंगे। कुछ अटपटे प्रयोग करते हैं पर सफल नहीं होते। उनकी पत्नी, उनका परिवार, समाज- सब उनके खिलाफ हो जाता है और उन्हें घर छोड़कर जाना पड़ता है। फिर एक दिन कुछ ऐसा होता है कि वह तय करते हैं कि वह सैनिटरी नैपकिन नहीं, बल्कि सैनिटरी नैपकिन बनाने की मशीन बनाएंगे। एक आठवीं पास इंसान की इसी जद्दोजहद की कहानी है पैडमैन। कुल मिलाकर माहवारी जैसे विषय को लेकर फिल्म बनाने की हिम्मत जुटाने के लिए इसके निर्माता-निर्देशक की तारीफ होनी चाहिए। यह सच है कि कई बार बड़े फिल्मी सितारों को लेकर अहम मुद्दों-समस्याओं पर फिल्म बनाना उन्हें लेकर जागरूकता फैलाने का सबसे माकूल जरिया होता है। आज भी गांव-कस्बों में माहवारी को लेकर जो मिथक हैं, उन्हें तोडऩे की मुहिम में यह फिल्म एक बड़ा कदम हो सकती है। हालांकि इस विषय को उठाने वाली यह पहली हिंदी फिल्म नहीं है। इससे पहले पिछले साल हम 'फुल्लूÓ के रूप में इसी कहानी पर बनी एक दूसरी फिल्म देख चुके हैंं। साथ ही इस विषय पर 'आई पैडÓ नामक एक फिल्म भी बनी थी जो किन्हीं कारणों से रिलीज नहीं हो सकी। आर. बाल्की जैसे निर्देशक और अक्षय कुमार-सोनम कपूर जैसे सितारों की मौजूदगी की वजह से इस फिल्म को एक बड़ा कैनवस मिल गया। जाहिर है इसे देखने बड़ी संख्या में लोग जाएंगे और जाना भी चाहिए। पी. सी. श्रीराम की सिनेमैटोग्राफी की जितनी तारीफ की जाए, कम होगी। मध्य प्रदेश के किलों, नर्मदा घाट और गलियों को जिस बारीकी से कैमरे में कैद किया गया है, उसे देखकर बहुत सारे लोग यहां के टूर का प्लान बना सकते हैं। पर... फिल्म की अपनी खामियां भी हैं। एक ऐसी फिल्म जिसका मुख्य किरदार दक्षिण भारतीय है, जिसमें दक्षिण भारत के ऋतु कला संस्कारम (किसी लड़की की माहवारी शुरू होने पर मनाया जाने वाला उत्सव) जैसे रिवाज दिखाए गए हैं, उसे मध्य प्रदेश की जगह अगर दक्षिण भारत में ही कहीं फिल्माया जाता, तो यह ज्यादा विश्वसनीय लगता। बहुत संभालने के बावजूद इसका उपदेशात्मक पक्ष थोड़ा ज्यादा हो गया है। कुछ चीजें और खटकती हैं, जैसे एक दृश्य में अक्षय कुमार आधी रात को अपने पड़ोसी की 13-14 साल की लड़की के कमरे की खिड़की पर चोरी-छुपे चढ़ते हैं और उसे अपने बनाए सैनिटरी नैपकिन देते हैं, जिस पर उन्हें गालियां पड़ती हैं। भाई, आपका मकसद कितना भी पाकसाफ हो, इस हरकत पर तो कोई खुले विचारों का पड़ोसी भी ऐसा ही बर्ताव करेगा। एक और बात, आठवीं पास लक्ष्मी जिसे पीरियड्स के बारे में शादी होने के बाद ही पता लगता है, वह पीरियड के लिए इस्तेमाल होने वाले अति शहरी शब्द 'चम्सÓ से अच्छी तरह परिचित है, यह बात चौंकाती है। अक्षय कुमार का डायलॉग डिलिवरी का अंदाज टॉयलेट एक प्रेमकथा वाला ही है। अपने अंदर के स्त्री पक्ष को महसूस कर रहे एक पुरुष और 'सुप्परहीरोÓ अक्षय कुमार के बीच अच्छी-खासी रस्साकशी चलती है। राधिका आप्टे अपने किरदार में पूरी तरह रच-बस गई हैं, पर... उनका यह लजाती हुई ग्रामीण महिला वाला अंदाज हम पाच्र्ड और मांझी दि माउंटेन मैन में भी देख चुके हैं। फिल्म में वह इतनी बार शर्म से मरने की बात कहती हैं कि न चाहते हुए भी हम भी अपने मन को एकाध बार शर्मिंदा होने के लिए मना ही लेते हैं। एक लाइन में कहें तो,'मेलोड्रामा थोड़ा ओवर हो गया।Ó राधिका कमाल की एक्ट्रेस हैं और इससे पहले कि लोग उन्हें टाइप्ड कहने लगें, उन्हें अब कुछ अलग किस्म के रोल निभाने चाहिए। और अब, बात परी वालिया, यानी सोनम कपूर की। साउथ दिल्ली की एक मॉडर्न लड़की के किरदार में परी ही तो लगी हैं सोनम। वह खूबसूरत परी जो पैडमैन को उडऩा सिखाती है। उनके एंट्री मारते ही गंभीरता और संदेश के वजन से झुक रही फिल्म ताजी हवा की तरह बहने लगती है। उनके और अक्षय कुमार के बीच का प्यार शुरुआत में प्लैटॉनिक रहता है, और बाद में खालिस बॉलीवुड रोमांस के रंग में ढल जाता है। गीत-संगीत की बात करें तो अरिजित के 'आज से तेरीÓ गीत के अलावा मीका का गाया 'सुप्परहीरोÓ गीत भी जुबान पर चढऩे वाला है।

चीनी दादागिरी से परेशान देश भारत की छतरी तले आ रहे

डाॅ. अरूण जैन
अबकी बार लीक से हट कर गणतंत्र दिवस पर दस देशों के राष्ट्राध्यक्षों को बुलाना वह भी सभी दक्षिण एशियाई देश और सभी राष्ट्राध्यक्षों का आना क्या इसका इशारा नहीं है कि चीन की दादागिरी के खिलाफ भारत एशिया में सुरक्षा छतरी बन कर उभर रहा है? यूं तो चीन के व्यवहार से अमेरिका सहित दुनिया के बहुत से लोग किसी न किसी रूप में पीडि़त हैं, परंतु खुद चीन के एक एशियाई महाशक्ति होने के चलते इस महाद्वीप व विशेषकर उसके पड़ोसी देश अधिक परेशान हैं। इनमें अभी तक भारत भी शामिल रहा है। जिस तरह के संकेत मिल रहे हैं उससे लगता है कि इन पीडि़त देशों को एक सुरक्षा छतरी की आवश्यकता है जिसकी आपूर्ति भारत अपनी बदली हुई छवि व नीति से करने के प्रयास में है। हरियाणवी कहावत है कि सिर पर छत्र को बनाए रखने के लिए पैर के छित्तर को मजबूत करना पड़ता है। डोकलाम विवाद के बाद दुनिया को लगने लगा है कि भारत के पैर का छित्तर अब मजबूत है। भारत ने इस मोर्चे पर जिस तरीके से शौर्य, संयम और कूटनयन गुणों का प्रदर्शन किया उससे हिमालय पर तूफान की तरह चढ़ कर आए चीन को आंधी बन कर वापिस लौटना पड़ा। चीन की वापसी ने उसकी भारत पर 1962 की चली आ रही मनोवैज्ञानिक हैंकड़बाजी को भी लगभग समाप्त कर दिया। दुनिया में भी इसका सकारात्मक संदेश गया और चीन पीडि़तों को लगने लगा कि भारत उन्हें सुरक्षा छतरी उपलब्ध करवा सकता है। नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आसियान देशों के साथ जो द्विपक्षीय वार्ताएं कीं उनमें यों तो ऊर्जा, शिक्षा, स्वास्थ्य, आपदा-राहत जैसे मुद्दे उठे, पर जो मुद्दा सबसे ज्यादा छाया रहा वह था समुद्री सुरक्षा सहयोग का। चाहे किसी ने भी चीन का नाम नहीं लिया, पर दक्षिण चीन सागर विवाद की पृष्ठभूमि में समुद्री सुरक्षा सहयोग पर जोर देने से यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि इन देशों के भारत के नजदीक आने का असली कारण चीन की दादागिरी ही है। चीन की दक्षिण चीन सागर में दिखाई जाने वाली अकड़ से उक्त आसियान देश, भारत और जापान के अलावा आस्ट्रेलिया, अमेरिका समेत पश्चिमी देश भी अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन का मामला उठाते रहते हैं। आसियान देशों व भारत के दिल्ली घोषणापत्र में 1982 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा मंजूर किए गए समुद्र संबंधी कानूनों, अंतरराष्ट्रीय नागरिक उड्डयन संगठन और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन द्वारा संस्तुत मानकों और व्यवहारों के मुताबिक मतभेदों तथा विवादों के निपटारे की वकालत की गई है। यह सभी बातें इशारा करती हैं कि एशिया के छोटे-छोटे विकसित व विकासशील देश चीन के खिलाफ भारत को एक शक्ति मानते हुए एक सुरक्षा छतरी के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। चीन की स्थिति आज ही ऐसी नहीं, हिंसक वामपंथी विचारधारा और माओ जैसे नेताओं से दुखी एशिया के देशों के साथ-साथ विश्व के कई देशों ने भारत की स्वतंत्रता का स्वागत भी इसीलिए किया था कि भारत उन्हें सुरक्षा छतरी प्रदान करेगा। भारत दमनकारी चीन पर अंकुश रखेगा। इसके लिए भारत को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में सदस्यता थाली में परोस कर दी गई परंतु हमारे अति आदर्शवादी नेतृत्व ने चीन का समर्थन कर दिया। केवल इतना ही नहीं परमाणु ऊजा आपूर्ति समूह (एनएसजी) की सदस्यता भी भारत को देने का प्रस्ताव किया गया परंतु स्वप्नलोक में विचरन कर रहे हमारे राजनेताओं ने इससे भी इंकार कर दिया। आज हम इसी दूरदर्शिता विहीन नीतियों का खमियाजा भुगतने को विवश हैं और संयुक्त राष्ट्र की स्थाई सीट के साथ-साथ एनएसजी की सदस्यता के लिए अपना समय, धन व ऊर्जा खर्च कर रहे हैं। दूसरी ओर चीन के तिब्बत पर साम्राज्यवादी हमले के समय दुनिया को उम्मीद थी कि भारत इसका प्रतिरोध करेगा। इस निर्णायक घड़ी में हमने तिब्बत से निर्वासित धर्मगुरु दलाई लामा को शरण देने का पराक्रम तो अवश्य किया परंतु साथ में ही दुनिया में अध्यात्म की महाशक्ति के रूप में विख्यात तिब्बत पर चीन का आधिपत्य स्वीकार कर लिया। इन सभी गलतियों से उन देशों के विश्वास को आघात लगा जो भारत को चीन की दादागिरी के खिलाफ मजबूत सुरक्षा कवच के रूप में देख रहे थे। रही सही कसर 1962 के चीनी हमले ने पूरी कर दी जिसमें चीन ने न केवल हमारे जवानों के खून से होली खेली बल्कि हजारों वर्ग किलोमीटर भू-भाग पर भी कब्जा कर लिया। इस पराजय से कई दशकों तक भारतीय मन भी पराजित रहा और दुनिया को भी यह संदेश गया कि भारत जब अपनी रक्षा नहीं कर सकता तो उनकी क्या करेगा। तिब्बत जो भारत-चीन के बीच सुरक्षा दीवार थी वह खुद ही हमने अपने हाथों से गिरा ली। यही उक्त कारण रहे कि हमारी वह धाक खत्म हो गई जिसकी कि दुनिया को अपेक्षा थी, लेकिन अब डोकलाम विवाद और इरान में बनी चाबाहार बंदरगाह से इन देशों का विश्वास एक बार फिर भारत पर बनता दिख रहा है। एशिया में चीन के पास पाकिस्तान को छोड़ कर कोई विश्वसनीय मित्र नहीं बचा। तो दूसरी ओर भारत एशिया के नेतृत्व के रूप में उभरा है। इसके पीछे बदली हुई राजनीतिक परिस्थितियां व अमेरिका और भारत की बढ़ी नजदीकियां भी बहुत बड़ा कारण हैं। डोकलाम में अपनी असफलता पर चीन इतना बौखलाया हुआ है कि बार-बार फिर डोकलाम दोहराने की चेतावनी देता है और मीडिया में खबरें भी उछालता है। लेकिन इस मोर्चे पर सफलता ने भारत के कद को बढ़ाया है और चीन को मनोवैज्ञानिक पराजय मिली है। भविष्य में हमें न केवल सतत् जागरुक रहना होगा बल्कि हमारे प्रति दुनिया की पैदा हो रही अपेक्षाओं पर खरे उतरने के भी प्रयास करने होंगे। भारत अगर सज्जन शक्ति के रूप में स्थापित होता है तो यह पूरी मानवता के लिए शुभ होगा। हाल ही में दावोस में आतंकवाद, जलवायु परिवर्तन और आत्मकेंद्रीकरण जैसे जिन वैश्विक खतरों का नरेंद्र मोदी ने जिक्र किया, उनसे निपटने का मार्ग भी भारतीय चिंतन व नेतृत्व दुनिया को दिखाएगा यह विश्वास दुनिया में पैदा होगा। 

Monday, 9 July 2018

मप्र नगरपालिका चुनाव ; खड़ा हो गया ऊंट, किसी भी करवट बैठ सकता है

डाॅ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश में हुए नगरपालिका चुनाव परिणाम की जनादेश के आधार पर सरल शब्दों में समीक्षा की जाए तो आप कह सकते हैं कि मप्र में ऊंट खड़ा हो गया है, अब वो किसी भी करवट बैठ सकता है। जनता ने एक तरफ का अतिआत्मविश्वास तोड़ दिया तो दूसरी तरफ का मुगालता भी जमीन चाटता नजर आया। कुल 19 परिषदों में सीधे चुनाव हुए। इनमें से 9 भाजपा को मिलीं, 9 कांग्रेस को और शेष बची एक जनता ने निर्दलीय को दे दी। भाजपा का अति आत्मविश्वास क्या था भाजपा के दिग्गज नेता इन दिनों अतिआत्मविश्वास का शिकार हैं। उनका कहना है कि मप्र में विकास की बाढ़ आ गई है। शिवराज सिंह से ज्यादा लोकप्रिय कोई नेता है ही नहीं। शिवराज सिंह की रैलियां जादू करतीं हैं। शिवराज सिंह के भाषण वोट खींच लाते हैं। चुनाव के दौरान सीएम शिवराज सिंह ने कई सभाएं और रैलियां कीं। बावजूद इसके 19 में से 9 पर सिमटकर रह गई। इस परिणाम को देखकर भी यदि कोई मिठाई बांट दे तो उसे आत्ममुग्ध ही कहा जाएगा। चौंकाने वाली बात तो यह है कि अनूपपुर की जैतहरी सीट से भाजपा ने एक ऐसे प्रत्याशी को टिकट थमा दिया जिसकी जीत की संभावनाएं ही नहीं थीं। नवरत्नी शुक्ला निर्दलीय मैदान में उतरीं तो उन्हे निष्कासित कर दिया। नंदकुमार सिंह को लगता होगा कि उनके निष्कासित कर देने से जनता भी निष्कासित कर देगी परंतु ऐसा नहीं हुआ। भाजपा के हाथ से यह सीट फिसल गई। कांग्रेस का मुगालता क्या है कांग्रेसी नेताओं ने इन दिनों एक अजीब सा मुगालता पाल लिया है। उन्हे लगता है कि मप्र में शिवराज सिंह विरोधी लहर चल रही है। वो कुछ भी नहीं करेंगे तब भी जीत जाएंगे। जमीनी हकीकत से दूर पीसीसी के कर्ताधर्ताओं ने नगरपालिका चुनाव में प्रत्याशियों का ऐलान भी लास्ट डेट पर किया गया। मुगालता देखिए कि बड़वानी की सेंधवा सीट पर एक दागी नेता के सामने कांग्रेस ने सरेंडर कर दिया। यहां कांग्रेस अपना प्रत्याशी ही नहीं उतार पाई। कांग्रेस का टिकट खुले मैदान में पड़ा था, किसी ने नहीं उठाया। कांग्रेस के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक शायद कुछ भी नहीं हो सकता। जनता ने 19 में से 9 सीटें देकर कांग्रेस को समझा दिया कि मुगालते में ना रहें, शिवराज सिंह विरोधी लहर से कांग्रेस की जीत सुनिश्चित नहीं होती।