Tuesday, 10 July 2018

मोदी तूफान से बचने को एक दूसरे का सहारा लेने में जुटे विपक्षी दल




डाॅ. अरूण जैन
देश के वर्तमान राजनैतिक पटल पर लगातार तेजी से बदलते घटनाक्रमों के अंतर्गत ताजा घटना आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने के मुद्दे पर वित्त मंत्री अरुण जेटली के बयान को आधार बनाकर तेलुगु देशम पार्टी के दो केंद्रीय मंत्रियों का एनडीए सरकार से इस्तीफा है। एक आर्थिक मामले को किस प्रकार राजनैतिक रंग देकर फायदा उठाया जा सकता है इसका चन्द्रबाबू नायडू ने अपने कदम से एक बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया है। क्योंकि जब केन्द्र सरकार आन्ध्र प्रदेश को विशेष पैकेज के तहत हर संभव मदद और धनराशि दे रही थी तो "विशेष राज्य" के दर्जे की जिद राजनैतिक स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ और क्या हो सकती है। कहना गलत नहीं होगा कि पूर्वोत्तर की जीत के साथ देश के 21 राज्यों में फैलते जा रहे भगवा रंग की चकाचौंध के आगे बाकी सभी रंगों की फीकी पड़ती चमक से देश के लगभग सभी राजनैतिक दलों को अपने वजूद पर संकट के बादल मंडराते नजर आने लगे हैं। मोदी नाम की तूफानी बारिश ने जहाँ एक तरफ पतझड़ में भी केसरिया की बहार खिला दी वहीं दूसरी तरफ काँग्रेस जैसे बरगद की जड़ें भी हिला दीं। आज की स्थिति यह है कि जहाँ तमाम क्षेत्रीय पार्टियां अपने आस्तित्व को बनाए रखने के लिए एक दूसरे में सहारा ढूंढ रही हैं तो कांग्रेस जैसा राष्ट्रीय राजनैतिक दल भी इसी का जवाब ढूंढने की जद्दोजहद में लगा है। जो उम्मीद की किरण उसे और समूचे विपक्ष को मध्य प्रदेश और राजस्थान के उपचुनावों के परिणामों में दिखाई दी थी वो पूर्वोत्तर के नतीजों की आँधी में कब की बुझ गई। यही कारण है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री चन्द्रशेखर राव ने हाल ही में कहा कि देश में एक गैर भाजपा और गैर कांग्रेस मोर्चे की जरूरत है और उनके इस बयान को तुरंत ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी, झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और ओवैसी जैसे नेताओं का समर्थन मिला गया। शिवसेना पहले ही भाजपा से अलग होने का एलान कर चुकी है। इससे पहले, इसी साल के आरंभ में शरद पवार भी तीसरे मोर्चे के गठन की ऐसी ही एक नाकाम कोशिश कर चुके हैं। उधर मायावती ने भी उत्तर प्रदेश के दोनों उपचुनावों में समाजवादी पार्टी को समर्थन देने की घोषणा करके अपनी राजनैतिक असुरक्षा की भावना से उपजी बेचैनी जाहिर कर दी है। राज्य दर राज्य भाजपा की जीत से हताश विपक्ष साम दाम दंड भेद से उसके विजय रथ को रोकने की रणनीति पर कार्य करने के लिए विवश है।  लेकिन कटु सत्य यह है कि दुर्भाग्य से भाजपा का मुकाबला करने के लिए इन सभी गैर भाजपा राजनैतिक दलों की एकमात्र ताकत इनका वो वोटबैंक है जो इनकी उन नीतियों के कारण बना जो आज तक इनके द्वारा केवल अपने राजनैतिक हितों को ध्यान में रखकर बनाई जाती रही हैं न कि राष्ट्र हित को। हालांकि इसमें कोई दो राय नहीं है कि पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वोट बैंक वाली ये सभी पार्टियां यदि मिल जाएं तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी कर सकती हैं। लेकिन एक सत्य यह भी कि जाति आधारित राजनैतिक जमीन पर खड़े होकर अपने वोट बैंक को राजनैतिक सत्ता में परिवर्तित करने के लिए, जनता को अपनी ओर आकर्षित करना पड़ता है जिसके लिए इनके पास देश के विकास का कोई ठोस प्रोपोजल या आकर्षण नहीं है। आज की जनता भी इस बात को समझ रही है कि अपने अपने इसी वोट बैंक और संकीर्ण राजनैतिक जमीन के बल पर इन सभी दलों के एकजुट होने का एकमात्र लक्ष्य अपनी राजनैतिक सत्ता बचाना है। इनके संयुक्त होने के एजेन्डे का मूल देश का विकास करना नहीं अपने राजनैतिक स्वार्थों के चलते बीजेपी को हराना है। एक ओर भाजपा अपने राष्ट्र व्यापी लक्ष्यों का विस्तार करती जा रही है तो दूसरी ओर तमाम विरोधी दल अभी तक मोदी विरोध के अलावा अपना कोई साझा लक्ष्य न तो ढूंढ पा रहे हैं और न ही देश के सामने स्वयं को भाजपा के एक बेहतर विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर पा रहे हैं। विपक्ष की मानसिक स्थिति की दयनीयता इसी बात से जाहिर हो रही है कि वो यह नहीं समझ पा रहा कि भाजपा को हराने के लिए आवश्यक है कि जब इस तथाकथित तीसरे मोर्चे की योजनाओं और विचारधारा के मूल में देश के आम आदमी को अपना भविष्य दिखाई देगा तभी वो इसे चुनेगा। लेकिन आज की हकीकत यह है कि इनकी एकता की योजनाओं में देश का बच्चा भी इनका खुद का स्वार्थ देख पा रहा है। एक तरफ इन कथित सेक्युलर पार्टियों के लिए आज अपने ही वोट बैंक में अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने का संकट है तो दूसरी तरफ भाजपा अपने हिन्दू एजेन्डे के साथ आगे बढ़ते हुए पूर्वोत्तर के ईसाई बहुल राज्य के लोगों के दिलों को जीतने में भी कामयाब रही। वो इन राज्यों में यह संदेश देने में सफल रही कि गोरक्षा और बीफ दो अलग अलग मुद्दे हैं जिन्हें एक दूसरे के बीच नहीं आने दिया जाएगा। विपक्ष समझ ही नहीं पाया कि कब मोदी की सबका साथ सबका विकास के नारे की वजह से उनका वोट बैंक उनका नहीं रहा। इससे पहले जब ट्रिपल तलाक के मुद्दे पर काँग्रेस समेत सभी विपक्षी दल अपने अपने वोट बैंक के मद्देनजर इस मसले पर फूंक फूंक कर कदम रख रहे थे, बीजेपी खुलकर इसके खिलाफ खड़ी थी जिसका परिणाम यूपी विधानसभा चुनाव के नतीजों में पूरे देश ने सभी विपक्षी दलों के अल्पसंख्यक वोट बैंक के गणित की धज्जियां उड़ती देखी।

ताजा चुनावी नतीजों का एक अर्थ यह भी

डाॅ. अरूण जैन

त्रिपुरा और अन्य दो राज्यों के नतीजों ने भाजपा को पूर्वोत्तर में उस मुकाम पर पहुंचा दिया जिसके लिए वो वर्षों से जद्दोजेहद कर रही थी। एक बार फिर भारतीय लोकतंत्र में जो यह नया घटा है उसके दूरगामी परिणामों पर चिन्तन शुरू हो गया है। क्या वाम पन्थ शून्य की और जा रहा है ? क्यों कांग्रेस बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है ? जैसे सवाल उठने लगे हैं,इनका उठाना लाजिमी भी है। इस सारे घटनाक्रम का विश्लेष्ण करें, तो अभी एक बात साफ़ दिखती है, भाजपा में लोगों का भरोसा कायम है साथ ही यह भी, कि क्या यह भरोसा राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में दोहराया जायेगा ? चार साल पहले केंद्र में काबिज होते समय विपक्षियों को अनुमान था कि लंबे-चौड़े चुनावी वायदों और मतदाताओं की अपार उम्मीदों का बोझ उनकी छवि पर बहुत जल्द प्रतिकूल असर डालेगा,ऐसा पंजाब में हुआ भी। अब के नतीजे कहते हैं भाजपा संभल गई। भारत में ऐसे वाकये पहले भी हुए हैं। 1984 में 404 सीटें जीतने और 1971 में 352 सीटें पर कांग्रेस में जैसा माहौल था उससे कुछ कम पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के चुनावों ने बनाया है। कांग्रेस ने तत्समय जो गलतियाँ की थी उस गलती से भाजपा को उससे बचना चाहिए। अब यह साफ़ लगने लगा है कि नरेंद्र मोदी ठहराव के खिलाफ हैं। अब वे अपनी छवि को नया रूप देने में जुटे हैं। इसकी बानगी कल फिर देखने को मिली। भाजपा मुख्यालय में जीत के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह को उन्होंने संबोधित करना शुरू ही किया था कि पास की मस्जिद में अजान शुरू हो गई। उन्होंने कहा कि अजान खत्म होने तक दो मिनट के लिए मौन रहते हैं। उस समय वे टी.वी. पर 'लाइवÓ थे। मोदी जानते हैं कि उनके मुंह से निकली यह बात यकीनन दूर तलक जाएगी। यह एक त्वरित प्रतिक्रिया थी। ऐसे कई छोटे-बड़े कारक इस जीत में छिपे हैं प्रमुख दो है। पहला संघ के कार्यकर्ताओं का जमीनी काम दूसरा भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुआई में पेशेवरों के एक दल का समर्पण। इस दल का काम साल के 365 दिन जनरुचि के मुद्दों को तलाशना और उनकी बारीकी से समीक्षा करते रहना है। इन्ही आधारों पर चुनावी रणनीति तय हुई थी। अमित शाह प्रत्याशियों के चयन में भी बेमुरव्वत हैं। वे समझ गये हैं कि अगर हार का ठीकरा उनके सिर फूटना है, तो फिर जीत के लिए उन्हें स्वतंत्रतापूर्वक निर्णय करने का हक है। जिसका अमित शाह ने खुल कर इस्तेमाल किया। अब सवाल ऐसा क्या था जो कांग्रेस में नहीं था ? बूथ कार्यकर्ताओं की कमी। भाजपा ने इस पर भी जबरदस्त काम किया, संघ ने उसे सहयोगी तैयार करके दिए कांग्रेस तो राहुल गाँधी को अध्यक्ष बनाने में और यह जताने में लगी रही कि दुनिया का सर्व श्रेष्ठ नेतृत्व उसके पास है। इसके विपरीत भाजपा ने  एक वोटर लिस्ट में जितने पन्ने होते हैं, उनमें से हरेक में दर्ज मतदाताओं को साधने के लिए एक 'पन्ना प्रमुखÓ बनाया। जो लोग त्रिपुरा के चुनावी फैसलों से अचंभित हैं, वहां हर साठ वोटर पर एक 'पन्ना प्रमुखÓ था। इसके अलावा विपक्ष की संभावित रणनीति, हर नई चाल की काट और किसी भी अप्रत्याशित हमले से निपटने के लिए अलग टीमें थी। अभी मोदी और शाह संघ में खासा सामंजस्य बना हुआ  है। पूर्वोत्तर की सफलता में संघ की बरसों की मेहनत का खासा योगदान है। कर्नाटक में भी संघ ने महीनों पहले से अपने कार्यकर्ता झोंक रखे हैं। यह मोदी-शाह की जोड़ी को मिलने वाला ऐसा लाभ है, जिसकी काट विपक्ष के पास नहीं। इसीलिए आज देश में 29 पूर्ण राज्यों में से 20 राज्यों में भाजपा की अगुआई वाले एनडीए की हुकूमत है। कांग्रेस की अगुआई वाला यूपीए सिर्फ तीन राज्यों में सत्ता में है। इससे भाजपा आत्म मुग्ध होकर ऊँघने नहीं लगना चाहिए। उसे यह भी याद रखना चाहिए कि तमाम राज्यों में भाजपा और उसके गठबंधन की सरकारें कैडर पर नहीं बल्कि दल-बदलुओं पर टिकी हैं। पूर्वोत्तर भी इसका अपवाद नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी इस बार 'स्टारÓ हो गये। उनकी सभाओं में जिस तरह से भीड़ जुटी, वह आश्चर्यजनक है। यह ठीक है कि सीमावर्ती राज्य में नाथ संप्रदाय के लोग बहुत बड़ी तादाद में हैं पर योगी अन्य राज्यों में भी हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय के तौर पर उभर रहे हैं, इसके बावजूद  राजस्थान और मध्यप्रदेश के लिए भाजपा को किसी और को  तलाशना, तराशना होगा, कांग्रेस में तो राहुल गाँधी हैं ही न।

खूबसूरत तीर्थस्थल है गंगोत्री मंत्रमुग्ध कर देता है प्राकृतिक नजारा

डाॅ. अरूण जैन
गंगोत्री हिमालय की गोद में स्थित है। हिंदू धर्मग्रंथों में मां गंगा के रूप में जिस नदी का जिक्र आता है, यह उसका उद्गम स्थल है इसलिए इसका धार्मिक महत्व भी खूब है। यहां के दर्शनीय स्थलों में 18वीं शताब्दी के दौरान गोरखा कमांडर अमर सिंह द्वारा बनवाया गया गंगोत्री मंदिर प्रमुख है। गंगोत्री के प्राकृतिक सौंदर्य की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। यह स्थान अपने अनुपम प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। गंगोत्री की यात्रा पर आए सैलानियों को यहां का अलौकिक सौंदर्य मंत्रमुग्ध सा कर देता है। गंगोत्री चूंकि एक खूबसूरत तीर्थस्थल है सो इसके आसपास का वातावरण बहुत ही शांतिमय है। गंगोत्री के आसपास में स्थित तपोवन, नंदनवन तथा गोमुख स्थलों का जब आप पैदल भ्रमण करेंगे तो आपको अविस्मरणीय अनुभव प्राप्त होगा। लंबे-लंबे देवदार वृक्ष और उनके मध्य से बहती हुई ठंडी हवा सैलानियों का मन बरबस ही मोह लेती है और उन्हें एक सुखद अहसास भी कराती है। यदि आप पर्वतारोही हैं तो आपके लिए यह स्थल और भी बढिय़ा है। यहां आप न सिर्फ अपनी पर्वतारोहण की इच्छा पूरी कर सकते हैं अपितु प्रकृति के अलौकिक सौंदर्य का दर्शन भी कर सकते हैं।  वैसे तो सर्दियों के मौसम में यह स्थल बर्फ से ढंका रहता है इसलिए यहां सैलानियों की संख्या कम ही रहती है। लेकिन यदि आप अभी युवा हैं और अपने मित्रों के साथ कहीं घूमने की योजना बना रहे हैं, तो आप सर्दियों में गंगोत्री जरूर जाइए। यहां के लोगों का भी कहना है कि सर्दियों में यहां युवा सैलानियों की संख्या अधिक रहती है तो अन्य मौसम में सामान्य तीर्थयात्रियों की। यहां के दर्शनीय स्थलों में गंगोत्री मंदिर, नंदनवन, तपोवन, मनेरी, गंगनानी और गोमुख के साथ ही केदारताल आदि प्रमुख हैं। वैसे इन सबकी यात्रा करने से पहले आइए आपको लिए चलते हैं हरसिल। यह स्थल स्वादिष्ट सेबों और अपनी प्राकृतिक सुन्दरता के लिए प्रसिद्ध है। यहां पर पर्यटन विश्रामगृह के साथ ही लोक निर्माण विभाग का विश्रामगृह एवं विल्सन काटेज भी मौजूद है जिसमें सैलानी आराम फरमा सकते हैं। आइए अब चलते हैं सात ताल। यहां पर बहुत ही खूबसूरत सी सात झीलें हैं। इन झीलों के आसपास का नजारा भी बहुत सुंदर है आप चाहें तो यहां पर बच्चों के साथ फोटो इत्यादि भी खिंचवा सकते हैं। झील के शीतल जल का एक-दूसरे पर छीटाकंशी करना भी सैलानियों को खूब भाता है। डोडी ताल भी अच्छी जगह है। इस ताल की दो खास बातें हैं पहली तो यह कि यह एक स्वच्छ जल वाली झील है और दूसरी यह कि यह झील चारों ओर से जंगलों से घिरी हुई है। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस झील में हिमालय की प्रसिद्ध मछली ट्राउट भी पाई जाती है। दयार बुग्याल भी अवश्य जाना चाहिए। यहां विस्तृत घास के मैदान का प्राकृतिक सौंदर्य देखते ही बनता है। इस स्थान का नाम बुग्याल इसलिए पड़ा क्योंकि स्थानीय भाषा में ज्यादा ऊंचाई पर स्थित घास के मैदान को बुग्याल ही कहा जाता है। ऋषिकेश यहां का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन है। आप चाहें तो गंगोत्री तक आने के लिए सड़क मार्ग का भी उपयोग कर सकते हैं जोकि बहुत ही सुविधाजनक है। आप यदि दिल्ली, चंडीगढ़, हरिद्वार, देहरादून आदि स्थानों के रहने वाले हैं तो आप यहां तक आने के लिए अपने वाहनों का भी प्रयोग कर सकते हैं।

नरेंद्र मोदी के लिए दोबारा सत्ता में आना आसान नहीं होगा

डाॅ. अरूण जैन
पूर्वोत्तर में जीत पर देशभर में जश्न मनाने वाली बीजेपी को 10 दिन बाद तगड़ा झटका लगेगा इसका अंदाजा पार्टी के दिग्गजों को भी नहीं होगा। यूपी और बिहार में हुए उपचुनाव में मिली करारी हार ने बीजेपी में खलबली मचा दी है। 25 साल बाद त्रिपुरा में लेफ्ट का किला ढहाने के बाद जो बीजेपी अपनी जीत पर इतरा रही थी उपचुनाव के नतीजे के बाद उसी बीजेपी के दफ्तर में सन्नाटा पसरा था। बिहार में मिली हार को बीजेपी पचा भी ले लेकिन यूपी के गोरखपुर और फूलपुर में उसका हारना बड़े खतरे का इशारा कर रहा है। यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ के शहर गोरखपुर में बीजेपी 28 साल से जीत रही थी...मुख्यमंत्री बनने के बाद योगी ने जब गोरखपुर सीट छोड़ी थी तो बीजेपी को कहीं से इसका अंदाजा नहीं था कि ये सीट उसके हाथ से निकल जाएगी...लेकिन जब उपचुनाव के नतीजे आए तो योगी से लेकर पार्टी का हर बड़ा नेता हैरान रह गया। वैसे योगी ने इसे जनता का जनादेश बताकर हार तो मान ली...लेकिन साथ में ये भी माना कि उनकी पार्टी अति आत्मविश्वास के कारण हारी। बीजेपी को झटका सिर्फ गोरखपुर में ही नहीं लगा...फूलपुर सीट जहां पिछले चुनाव में डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य ने भारी बहुमत से जीत हासिल की थी वहां भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। फूलपुर में एसपी उम्मीदवार ने बीजेपी उम्मीदवार को 59000 से ज्यादा मतों से हराया। गोरखपुर और फूलपुर में बीजेपी को मिली हार के पीछे ज्यादातर लोगों की यही राय है कि ऐसा इसलिए मुमकिन हुआ क्योंकि अखिलेश और मायावती साथ आ गए। मायावती ने दोनों सीटों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारे और उन्होंने समाजवादी पार्टी को समर्थन देने का एलान कर दिया। ये बात सही है कि अगर इन दोनों सीटों पर बीएसपी अपना उम्मीदवार उतारती तो उसका फायदा बीजेपी को मिलता...लेकिन हार तो हार होती है।  अब बिहार की बात करते हैं...अररिया लोकसभा सीट पर आरजेडी उम्मीदवार का बड़े अंतर से जीतना न सिर्फ बीजेपी के लिए बल्कि नीतीश कुमार के लिए भी बड़ा झटका है। लालू के जेल में रहते अररिया लोकसभा और जहानाबाद विधानसभा सीट पर आरजेडी उम्मीदवार की बड़ी जीत ने तेजस्वी को एक बड़े नेता के तौर पर पेश किया है। बीजेपी ने भभुआ विधानसभा उपुचनाव में जीत हासिल कर अपनी लाज तो बचा ली...लेकिन यूपी और बिहार में मिली हार ये बता रही है कि बीजेपी के लिए 2019 का लोकसभा चुनाव आसान नहीं होगा। वैसे 2019 को लेकर अखिलेश की पार्टी से मायावती ने अभी गठबंधन का एलान नहीं किया है...लेकिन उपचुनाव नतीजे के बाद अखिलेश का मायावती की तारीफ करना और फिर लखनऊ में उनके घर जाकर उनसे एक घंटे तक मुलाकात करना बताता है कि बीजेपी को हराने के लिए दोनों साथ आ सकते हैं। दो दिन पहले दिल्ली में सोनिया गांधी के घर 10 जनपथ पर हुई डिनर पार्टी में 20 विपक्षी दलों के नेताओं का पहुंचना साफ-साफ बताता है कि विपक्ष ने 2019 में मोदी को हराने के लिए रणनीति तैयार कर ली है। अगर 2019 में यूपी में बीएसपी-एसपी साथ-साथ चुनाव लड़ती हैं तो बीजेपी की राह काफी मुश्किल हो जाएगी। महाराष्ट्र में पिछली बार कांग्रेस-एनसीपी अलग-अलग चुनाव लड़ी थीं...लेकिन सोनिया के घर डिनर पार्टी में पहुंचकर शरद पवार ने संकेत दे दिया है कि अब आगे ये गलती नहीं दोहराएंगे। बीजेपी से नाराज शिवसेना अगर लोकसभा चुनाव से पहले गठबंधन तोडऩे का एलान कर डाले तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।  आंध्र प्रदेश में जो हो रहा है वो सभी को मालूम है....राज्य को विशेष दर्जे की मांग को लेकर टीडीपी सांसदों ने संसद नहीं चलने दी...और तो और उसके दो मंत्रियों ने इस्तीफा भी सौंप दिया। बंगाल में बीजेपी को हराने के लिए ममता और कांग्रेस साथ आ सकती है। मोदी के विजय रथ को रोकने के लिए विपक्ष आपसी मतभेद भुलाकर साथ आने को तैयार है। अगर कांग्रेस बीजेपी के विरोधियों को एकजुट करने में कामयाब हो जाती है तो फिर मोदी के लिए दोबारा सत्ता में आना आसान नहीं होगा। आज अगर राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव हुए तो वहां बीजेपी के लिए वापसी करना आसान नहीं होगा। राजस्थान में हुए उपचुनाव में हार के बाद वसुंधरा के खिलाफ बगावत के सुर तो नरम पड़ गए हैं लेकिन वहां कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है। यही हाल मध्य प्रदेश का है। तो क्या देश में मोदी का जादू खत्म हो रहा है...क्या मोदी के खिलाफ विपक्ष का एकजुट होना ही बीजेपी के लिए खतरा है..अब बीजेपी को भले ही इसका अहसास नहीं हो लेकिन यूपी और बिहार में हुए उपचुनाव के नतीजे इस बात के संकेत दे रहे हैं कि जो जनता कल तक बीजेपी के साथ थी अब वो धीरे-धीरे उसके खिलाफ हो रही है। गोरखपुर जैसी सीट पर बीजेपी का हारना ये बताता है कि लोग गुस्से में हैं...कई लोगों का ये भी मानना है कि शाइनिंग इंडिया की तरह उनका अच्छे दिन वाला जुमला ही बीजेपी को ले डूबेगा।

महेश भट्ट को चैन से सोने नहीं दे रही इस बात की चिंता

डाॅ. अरूण जैन
बॉलीवुड डायरेक्टर-प्रोड्यूसर महेश भट्ट ने हाल ही में लाइव हिन्दुस्तान से बात करते हुए अपनी जिंदगी के कई बड़े खुलासे किए। इसके साथ ही उन्होंने ये भी बताया कि वो आलिया का सपोर्ट देकर उन्हें कमजोर नहीं बनाना चाहते। वो पहले से चाहते थे कि आलिया स्ट्रगल करे। आईए जानते हैं कि उन्होंने क्या कहा। महेश भट्ट ने कहा, आलिया हमेशा से मेरी बनाई फिल्म का हिस्सा बनना चाहती है। पर मैं नहीं चाहता था कि मैं उसका वह सहारा बनूं जो उसे कमजोर कर दे।। मैं चाहता था कि वह अपने हिस्से का संघर्ष करे और उसका अनुभव ले। आपने बॉलीवुड को कई सफल फिल्में दी हैं। खुद अपनी कोई फिल्म, जो आपकी मनपसंद रही हो?एक मां से आप पूछ रहे हैं कि उसे अपने बच्चों में से कौन सा बच्च प्यारा है। मेरे लिए, मेरी हर फिल्म शानदार है, फिर चाहे वह सुपरहिट हो या फ्लॉप। मैंने तो सभी को अपना खून-पसीना दिया था और अभी भी जब कोई फिल्म बनाते हैं तो उसे भी देते हैं। एक वक्त ऐसा भी था, जब आप डिप्रेशन के शिकार हो गए थे। उससे आपने खुद को कैसे बाहर निकाला?हां, उस वक्त मेरा हाल ऐसा था कि लोग मुझे पकड़-पकड़ के घर लाते थे। उस वक्त मैं खुद से खफा था। मुझे लग रहा था कि जिस सफर तक पहुंचने के लिए मैंने बॉलीवुड को चुना है, मैं वहां तक पहुंच नहीं पा रहा हूं। लेकिन जब मेरी बेटी शाहिन पैदा हुई तो मैं वहां पर नहीं था। उन दिनों मैं ज्यादा पीने लगा था। जब उसके जन्म के दो दिन बाद मुझे होश आया और मैं घर गया तो मैंने उसे देखा। मैंने उसे प्यार से गोद में उठाया तो उसने मेरी तरफ देखा ही नहीं। उस दिन मैंने खुद से कसम खाई कि बस अब नहीं। अब और मैं शराब को खुद पर हावी नहीं होने दूंगा। आप कहते हैं कि आपने जो भी गलतियां की हैं, उन्हें बताने से ज्यादा आपको उन्हें छुपाने में डर लगता है। ऐसा क्यों? जिंदगी में मैंने कुछ ऐसे काम किए, जो शायद नहीं करने चाहिए थे। मेरी फिल्मों में भी आप मेरी जिंदगी की कुछ झलकियां देख सकते हैं। मुझे चीजों को छुपाने से डर लगने लगा है। मुझे यह चिंता सोने नहीं देती कि यदि मेरा कोई राज किसी और ने मेरे करीबियों को बता दिया तो शायद वे मुझसे मुंह मोड़ लेंगे। इसलिए मैं खुद ही सब कुछ बोल देता हूं। अब इस उम्र में हताशा शायद बर्दाश्त न हो। बेटी आलिया को पर्दे पर चमकते देख कर कैसा लगता है? क्या एक पिता के तौर पर उन्हें लेकर कोई चिंता होती है?आलिया ने एक बेटी और एक अभिनेत्री के तौर पर मुझे हमेशा चौंकाया है। मैंने कभी नहीं सोचा था कि उसे इतनी जल्दी इतना कुछ मिलेगा। वह हम सबके लिए और खुद अपने लिए एक खोज रही है। मैं खुश हूं कि जो अच्छे अभिनेता हमारे पास इस दौर में हैं, उनमें से वह सबसे उम्दा अभिनेत्रियों में से एक है। जब उसने 'स्टूडेंट ऑफ द ईयर' से अपना करियर शुरू किया था तो मैंने नहीं सोचा था कि वह 'हाइवे' के साथ इतनी बड़ी छलांग लगाएगी। उसके बाद वह अब तक नहीं रुकी है। लेकिन आलिया ने अभी अपना करियर शुरू किया है और उसे बहुत आगे तक जाना है। इन दिनों बॉलीवुड में 'सड़क 2Ó पर चर्चा हो रही है। क्या इस फिल्म में आप आलिया को लेन जा रहे हैं?फिलहाल अभी मेरा ध्यान इंडियाज नेक्स्ट सुपरस्टार पर है, इसलिए दूसरी बातों पर बात करने का कोई फायदा नहीं है। रही बात 'सड़क 2Ó में आलिया को लेने की, तो जब फिल्म का काम शुरू होगा तो पता चल ही जाएगा। आलिया हमेशा से मेरी बनाई फिल्म का हिस्सा बनना चाहती है। पर मैं नहीं चाहता था कि मैं उसका वह सहारा बनूं, जो उसे बर्बाद कर दे। मैं चाहता था कि वह अपने हिस्से का संघर्ष करे और उसका अनुभव ले। कुछ सालों में पूजा और आलिया के रिश्तों में काफी बदलाव देखने को मिला है। क्या आप इससे खुश हैं?मुझे कुछ बदलाव नहीं लगा। दोनों ही एक दूसरे से प्यार करती हैं और उन्हें पता है कि वे एक ही परिवार की बच्चियां हैं। पूजा, आलिया से बड़ी है, इसलिए थोड़ा सा फर्क हो जाता है। लेकिन परिवार में जब आप उन दोनों को बैठे हुए देखेंगे तो समझ जाएंगे कि उनके बीच कितना प्यार है।

मप्र में कई दिग्गज भाजपा नेता इस बार बेटों को चुनाव लड़वाएंगे!

डाॅ. अरूण जैन

मध्य प्रदेश में लगातार पिछले तीन विधानसभा चुनाव जीतकर सत्ता संभालने वाली भारतीय जनता पार्टी के कई दिग्गज नेता आगामी विधानसभा के होने वाले चुनाव में नही दिखाई देंगे। ऐसा नहीं है कि इन  नेताओं की अहमियत खत्म हो गयी या इनका वजूद सिमट गया है और सक्रिय राजनीति से इन्हें दरकिनार किया जा रहा है। दरअसल भाजपा के दिग्गज नेता अपनी विरासत अपनी आने वाली पीढ़ी को सौंपने के लिये इन्हें राजनीति के मैदान में उतर कर खुद को नेपथ्य में ले जाने को तैयार हैं। इसके लिए इन नेताओं ने अपने पुत्रों की पृष्ठभूमि भी तैयार कर ली है। गौरतलब है कि मध्य प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव नवंबर में होने हैं। सब कुछ ठीक ठाक रहा तो प्रदेश की राजनीति में कई चर्चित चेहरों की जगह उनके पुत्र ले लेंगे, लेकिन ये इस बात पर भी निर्भर करेगा कि इन नेता पुत्रों को जनता कितनी स्वीकार करती है या उनकी लांचिंग उनके पिता कितने बेहतरीन तरीके से कर पाते हैं। कांग्रेस के युवा नेता कहे जाने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया जिन्हें पार्टी बतौर सम्भावित मुख्यमंत्री कांग्रेस पेश कर सकती है, के सामने अभी तक कोई युवा चेहरा भाजपा के पास नही है, गौरतलब यह भी है कि भाजपा में ही 70 पार उम्र के फार्मूले के तहत मध्य प्रदेश में बुजुर्ग मान कर मंत्रियों को घर बैठाया गया है। ऐसे में कहना जरूरी नहीं है कि आगामी चुनाव में भी उम्रदराज नेताओं को टिकिट मिलेगा या नहीं, लेकिन कई नेताओं ने अपने पुत्रों को अपनी विरासत सौंपने की तैयारी शुरू कर दी है। ऐसे नेताओं में केंद्र स्तर पर पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और केंद्रीय पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर शामिल हैं, जिन्होंने अपने बेटों के राज्याभिषेक के लिए बिसात भी बिछा दी है। हालांकि लोकसभा अध्यक्ष और इंदौर से लगातार आठ बार की सांसद श्रीमती सुमित्रा महाजन अपने पुत्र को अभी तक राजनीति के मैदान में नहीं ला सकी हैं। वहीं मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान खुद अपने पुत्र कार्तिकेय को राजनीतिक समर में लाने की तैयारी कर चुके हैं। उनकी पत्नी साधना सिंह की भी सामाजिक आयोजनों में भागीदारी इस बात की संभावना को बल दे रही है कि गाहे बगाहे वे भी राजनीति में कदम रख सकती हैं। आशंका इस बात की भी है कि यदि शिवराज सिंह चौहान को बीजेपी केंद्र की राजनीति में ले जाती है तो उनका प्रतिनिधित्व प्रदेश में भी बना रहे इसलिए वे अपने पुत्र या पत्नी के बहाने राज्य की राजनीति में अपने रसूख को कायम रख सकें।  मध्य प्रदेश सरकार के दो बड़े मंत्रियों जयंत मलैया और गोपाल भार्गव ने भी अपनी राजनीतिक विरासत के लिए उत्तराधिकारी तय कर दिए हैं। इस बात का इशारा इससे मिलता है कि इन चारों नेताओं के बेटों का संगठन की राजनीति में पदार्पण हो चुका है। भारतीय जनता युवा मोर्चा की कार्यकारिणी में केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र सिंह तोमर, राज्यसभा सदस्य प्रभात झा के बेटे त्रिशमूल झा, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय, पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार चौहान के बेटे हर्षवर्धन सिंह, मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बेटे सुकर्ण मिश्रा, मंत्री गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक भार्गव शामिल किए गए। राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद में भी पांच नेता पुत्रों को जगह दी गई। प्रदेश की राजनीति के साथ राष्ट्रीय भाजपा में भी दखल रखने वाले भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के खास सिपहसालारों में गिने जाते हैं। ये कयास लोगों की जुबान पर है कि उनके बेटे आकाश विजयवर्गीय अगले विधानसभा चुनाव में पिता की महू विधानसभा सीट से उम्मीदवार बन सकते हैं। आकाश की महू में राजनीतिक सक्रियता से इस बात के संकेत भी मिले हैं। ये संभावना इसलिए आंकी जा रही है कि राष्ट्रीय राजनीति में कद बढ़ जाने से कैलाश विजयवर्गीय अब राज्य की राजनीति से दूर होना चाहते हैं। मध्य प्रदेश के पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव ने भी अपने बेटे के राजनीतिक पदार्पण की तैयारी कर ली है। जहां तक अभिषेक की राजनीतिक सक्रियता की बात करें तो बुंदेलखंड इलाके में अभिषेक पिता की राजनीतिक विरासत एक तरह से संभाल चुके हैं। केंद्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर के बेटे देवेन्द्र सिंह तोमर भी पिता की विरासत संभालने के लिए तैयार हैं। नरेन्द्र तोमर का मध्य प्रदेश की सत्ता और संगठन में खासा दखल है। कार्यकर्ता से लेकर बड़े नेता भी देवेन्द्र सिंह तोमर के इर्द गिर्द नजर आते हैं।  भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान के बेटे हर्षवर्धन सिंह चौहान, भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा के बेटे त्रिशमूल झा, प्रदेश के वित्तमंत्री जयंत मलैया के  बेटे सिद्धार्थ मलैया, पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्री गोपाल भार्गव के बेटे अभिषेक भार्गव, पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय के बेटे आकाश विजयवर्गीय, मंत्री नरोत्तम मिश्रा के बेटे सुकर्ण मिश्रा, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर के बेटे देवेंद्र सिंह तोमर, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के बेटे मंदार महाजन, मंत्री हर्ष सिंह के बेटे विक्रम सिंह, पूर्व मंत्री करणसिंह वर्मा के बेटे विष्णु वर्मा, कृषि मंत्री गौरीशंकर बिसेन के बेटे मौसम बिसेन, वनमंत्री गौरीशंकर शेजवार के बेटे मुदित शेजवार, राज्यसभा सदस्य सत्यनारायण जटिया के बेटे राजकुमार जटिया, लक्ष्मीनारायण यादव के बेटे सुधीर यादव, मंत्री माया सिंह के बेटे पितांबर सिंह सहित कई नेता पुत्र राजनीति में अवतरित होने को बेताब हैं। 

सलमान का बड़ा खुलासा, कहा- इस वजह से हैं आज तक सिंगल



डाॅ. अरूण जैन
सलमान खान की शादी को लेकर फैन्स में काफी एक्साइटमेंट रहती हैं। सभी जानना चाहते हैं कि सलमान शादी क्यों नहीं कर रहे हैं? तो अब फाइनली सलमान ने इसका खुलासा कर दिया है। सलमान ने हाल ही में एक इंटरव्यू के दौरान इसका खुलासा किया। सलमान ने कहा, आज कल शादियां बहुत महंगी हो गई हैं। शादी करने में लाखों करोड़ों खर्च हो जाते हैं और मैं इतनी मेहंगी शादी का खर्चा नहीं उठा सकता, इसलिए मैंने सिंगल रहने का फैसला लिया। अपने पेरेंट्स की शादी के बारे में बताते हुए सलमान ने कहा, मेरे पिता की शादी मात्र 180 रूपए में हुई थी। मेरे पेरेंट्स ने हम 5 भाई-बहनों को कम आमदनी में अच्छे से पाला पोसा है। सलमान की अपकमिंग फिल्म के बारे में बात करें तो वो जल्द ही रेस 3 में नजर आने वाले हैं। फिल्म में सलमान के साथ जैकलीन फर्नांडिज, बॉबी देओल, अनिल कपूर और डेजी शाह हैं। बॉलीवुड एक्ट्रेस जरीन खान का कहना है कि बॉलीवुड में उनकी पहली फिल्म वीर उनके दिल के बहुत करीब है। जरीन ने एक इंटरव्यू में कहा, आज लोग अगर मुझे जानते हैं कि तो वह वीर की वजह से, भले ही फिल्म सफल नहीं हुई। क्योंकि, मैं सलमान खान की हीरोइन थी, इसलिए आज लोग मुझे जानते हैं। इसलिए सक्सेसफुल न होने के बावजूद वीर मेरे दिल के बहुत करीब है, क्योंकि यह मेरी पहली फिल्म थी। बड़े बजट की फिल्मों पर ये कहा... जरीन कहना है कि आज की तुलना में उस समय जिन फिल्मों की उन्हें पेशकश की गई, उनके किरदार उतने खास नहीं थे। उन्होंने कहा, उन (फिल्मों) ने भी काम किया, लेकिन उतना नहीं, जिन्हें मैं अभी कर रही हूं। क्योंकि मेरी भूमिका महत्वपूर्ण नहीं थी। रेडी में मैंने केवल एक गाना किया। हाउसफुल-2 में बहुत सारे कलाकार थे और मेरी भूमिका बहुत छोटी थी। इसलिए हो सकता है लोगों का मुझ पर अधिक ध्यान नहीं गया या मुझे फिल्म में बहुत कुछ करने को नहीं मिला। हेट स्टोरी-3 ने बदली पहचान...जरीन के अनुसार, हेट स्टोरी-3 के बाद लोगों ने मुझे अलग नजरिए से देखना और मुझे ऐसी फिल्मों की पेशकश करनी शुरू की, जहां उन्हें महसूस हुआ कि मैं एकल भूमिका निभा सकती हूं। मुझे लगता है कि बड़ी फिल्मों की बात मायने नहीं रखती है, बल्कि किरदार मायने रखते हैं। बता दें कि 2010 में वीर से बॉलीवुड में कदम रख चुकी जरीन रेडी और हाउसफुल-2 जैसी फिल्मों में भी नजर आ चुकी हैं। हेट स्टोरी-3 ने उन्हें एक नई पहचान दिलाई है।