Sunday, 13 December 2015

सिर्फ वंचितों को आरक्षण देने की दलील में गलत क्या? 


डॉ. अरूण जैन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत ने आरक्षण के बारे में ऐसा क्या कह दिया कि राजनीति को महज वोट बैंक तक समेट देने वालों के समान ही भारतीय जनता पार्टी उसकी मुखालफत में मुखरित हो गई? क्या किसी व्यवस्था का उद्देश्य के अनुरूप क्रियान्वयन की समीक्षा करने से हमें गुरेज करना चाहिए। यह माना जाता है और प्राय: सभी सरकारें और संगठन निर्धारित किए गए कार्यक्रम और योजनाओं की नित्य ही समीक्षा करते रहते हैं। समीक्षा को क्रियान्वयन को सुनिश्चित कराने का सर्वोच्च उपाय माना जाता है। यदि मोहन भागवत ने चौथाई शताब्दी पहले पिछड़े वर्ग के और आधी शताब्दी से भी अधिक समय से अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए लागू आरक्षण की समीक्षा की आवश्यकता जतायी तो किसके सामने से परोसी थाली खिसका ली और आरक्षण के नाम पर जो कुछ देश में हो रहा है उसको देखते हुए आरक्षण को राजनीति का मुद्दा बनाने का परामर्श दिया? ऐसा उन्होंने नहीं किया है। समय−समय पर देश के तमाम विचारवान लोगों यहां तक कि सर्वोच्च न्यायालय तक ने आरक्षण के लिए लिये जाने वाले राजनीतिक निर्णय पर न केवल विपरीत टिप्पणी की है अपितु उसे खारिज भी कर दिया है। भारतीय जनता पार्टी का दावा है कि वह सत्ता के लिए राजनीति नहीं करती इसलिए उसका वोट बैंक की रणनीति में भरोसा नहीं है लेकिन आरक्षण के संदर्भ में श्री भागवत की अभिव्यक्ति पर उसकी प्रतिक्रिया शाब्दिक भेद के अलावा उन लोगों से भिन्न नहीं कही जा सकती जो केवल सत्ता से सम्पन्नता के लिए वोट बैंक की राजनीति में आकंठ डूबे हुए हैं। अर्ध और चौथाई शती से जो व्यवस्था लागू है क्या उस उद्देश्य की प्राप्ति में सफल रही है जिसको संज्ञान में लेकर उसे लागू किया गया था? समय−समय पर जो तथ्य उभरकर आते रहे हैं उससे तो यही पता चलता है कि इतनी अवधि बीत जाने के बाद भी अभी भी सत्तर प्रतिशत से अधिक लोग इसके संपर्क से भी अछूते हैं। कुल तीस प्रतिशत लोगों में यह व्यवस्था सिमट कर रह गई है और यही तीस प्रतिशत शेष के भी प्रवक्ता बनकर किसी भी समीक्षा के खिलाफ मुखरित हो उठते हैं। आरक्षण जो कि सामाजिक बराबरी के लिए आर्थिक उत्थान की अवधारणा से लागू किया गया था वह अब हक के रूप में परिवर्तित हो चुकी है तथा सामाजिक विषमयता और संघर्ष का कारण बनती जा रही है। संघ एक ऐसा संगठन है जो सामाजिक समरसता के लिए काम करता है। ऐसी स्थिति में उसका चिन्तित होना अस्वाभाविक नहीं है। आरक्षण की समीक्षा के लिए मोहन भागवत द्वारा की गई अभिव्यक्ति के बाद राजस्थान की भाजपा सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय द्वारा निर्धारित सीमा−पचास प्रतिशत−को नजरंदाज कर आरक्षित वर्ग को उनहत्तर प्रतिशत कर दिया है। समय−समय पर विभिन्न राज्य सरकारें वर्गों और सम्प्रदायों के आग्रह पर ऐसा ही विधेयक पारित करती रही हैं। क्या हुआ उनका परिणाम? सभी को सर्वोच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार कर दिया और वे लागू नहीं हो सकी। जिन सरकारों ने उन्हें लागू किया था उन्होंने मांगकर्ताओं से मुक्ति पाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सहारा लिया। राजस्थान सरकार के निर्णय का भी वही हश्र होने वाला है। आरक्षण की परिधि में शामिल किए जाने के लिए जो आंदोलन हो रहे हैं उससे अपनी साख को बचाने के लिए जानते हुए भी कि वह असंवैधानिक है, सरकार कानून बनाने से परहेज नहीं कर रही है। उन पर अमल नहीं हो सकेगा इसके लिए आश्वस्त होते हुए भी लिये गये निर्णय से ऐसी सरकारें जिस आकांक्षा को बलवती बना रही हैं वह हिंसक होती जा रही है। गूजरों ने लगभग एक महीने तक रेलपथ को घेरे रखा उनका अनुसरण अब सभी करने लगे हैं। चाहे पश्चिम उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट हों या फिर गुजरात का पाटीदार समुदाय, आवागमन बाधा से अरबों रूपये की क्षति हो रही है। तोड़ फोड़ से सरकारी सम्पत्ति को नष्ट किया जा रहा है। इसकी भरपायी किसको करनी पड़ेगी या पड़ रही है? सरकारी सम्पत्ति किसकी सम्पत्ति है? शायद ही किसी को इसकी परवाह होगी। उत्तर प्रदेश में आरक्षण ने एक अलग समस्या खड़ी कर दी है जिससे सम्पूर्ण प्रश्नतंत्र लुंज पुंज हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अनुसूचित जाति के लिए आरक्षण का क्रियान्वयन जिस ढ़ंग से किया, उसके फलस्वरूप कनिष्ठ−ज्येष्ठ हो गए और ज्येष्ठ कनिष्ठ। इसके विरूद्ध प्रभावित लोग उच्च न्यायालय की शरण में गए। न्यायालय ने सरकार के निर्णय को गलत करार कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले की ही पुष्टि की और वर्तमान सरकार को एक निर्धारित समय सीमा में दुरूस्ती का निर्देश दिया। उहापोह के बाद सरकार को न्यायालय के निर्देश के अनुसार काम करना पड़ा है। राज्य का कर्मचारी दो भागों में बंट गया है। धरना−प्रदर्शन से आगे बढ़कर धमकियां दी जाने लगी हैं। यह तनाव धमकियों से आगे भी बढ़ सकता है ऐसे संकेत मिल रहे हैं। आरक्षण ने युवा पीढ़ी को उत्तेजित और गुमराह करने का काम किया है और राजनीतिक दलों को वोट बैंक बनाने के लिए प्रेरित किया है। हमने जाति आधारित सामाजिक पिछड़ापन को आरक्षण का आधार माना है तो फिर मजहब के आधार पर आरक्षण दिलाने के वादे क्यों किए जा रहे हैं। यदि तथाकथित सवर्ण वर्ग को हमने सामाजिक पिछड़ा नहीं माना है तो फिर उनमें आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए आरक्षण का नारा हर राजनीतिक दल क्यों बुलंद कर रहा है। हमने ऐसे कानून बना लिए हैं जिसमें जन्म के आधार पर असमानता अपराध बन गया है। इसलिए जाति या सम्प्रदाय के आधार पर पिछड़ापन का कोई औचित्य नहीं है। पिछड़ा वह है जो वंचित है, जो वंचित है वही शोषित है वही असमानता का शिकार है। तो क्या यह औचित्य पूर्ण नहीं होगा कि वंचितों की पहचान जाति, सम्प्रदाय, क्षेत्र आदि के बजाय उनकी वंचित स्थिति को संज्ञान में लेकर की जाये। इस पहचान के आग्रह को शताब्दियों से शोषण कर रहे लोगों की साजिश की संज्ञा प्रदान कर शोर मचाया जाता है। यद्यपि इस शोर का कोई औचित्य नहीं है लेकिन क्योंकि राजनीति वोट बैंक की हो गई है इसलिए कोई भी दल इसके औचित्य का प्रतिपादन करने के लिए मुखरित नहीं होता। इसलिए यह कहा जाने लगा है कि क्या जिन वर्गों को सामाजिक बराबरी और आर्थिक उत्थान के लिए आरक्षण दिया जा रहा है, क्या इस वर्ग को उसका समुचित लाभ हुआ है या नहीं इसकी समीक्षा होनी चाहिए। और जो लोग आर्थिक उत्थान के कारण सामाजिक पिछड़ेपन के दायरे से बाहर हो गये हैं क्या उनको आरक्षण से लाभान्वित होने से वंचित कर जो वंचित हैं उनको लाभ नहीं पहुंचाया जा सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने पिछड़े वर्ग में ऐसे लोगों के लिए क्रीमीलेयर निर्धारित करने का निर्देश भी दिया लेकिन सरकारों ने क्रीमीलेयर के लिए जो मानक तय किया है उससे अरब खरबपति भी प्रभावित नहीं होता। अनुसूचित वर्ग में तो इस लेयर की चर्चा भी करना पाप कृत्य बन जाता है। फलत: आरक्षण कुछ परिवारों में ही बंधुआ बन गया है। यद्यपि अनुसूचित जाति आयोग के वर्तमान अध्यक्ष पीएल पूनिया ने जो एक प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं, समीक्षा के ओचित्य का प्रतिपादन किया है तथापि उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती के समान ही असर करने वाली साबित हुई है। कई दलित लेखकों और उद्यमियों ने भी आरक्षण के वर्तमान स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लगाए हैं लेकिन वोट बैंक के सौदागरों द्वारा भयदोहन अभियान से उसे कुंठित कर दिया गया।

मोदी विरोधी अभियान का नेता कौन- राहुल या लालू? 



डॉ. अरूण जैन
दिल्ली के बाद बिहार विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी की भारी पराजय से एक बात बहुत स्पष्ट हो गई है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के लिए आने वाले दिन अधिकतम कठिनाई भरे होंगे। संसद और संसद के बाहर असहिष्णुता का मुद्दा बनाकर भाजपा की लोकसभा चुनाव में अभूतपूर्व विजय के माहौल से मतदाताओं को निकालकर सारे देश में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास होगा, जिसका सामना करने में भाजपा को अकेले जूझना पड़ेगा। लोकसभा चुनाव में जो उसके साथ रहे हैं उसमें शिवसेना ने तो बिहार चुनाव के पहले से ही ताल ठोंक रखी है और जो सहयोगी अल्पसंख्यक अर्थात् मुस्लिम मतदाताओं के विपरीत रूख से हतोत्साहित होकर साथ छोड़ सकते हैं उनमें तेलुगूदेशम पार्टी संभवत: सबसे आगे रहेगी। पंजाब में अकाली दल के लिए भाजपा का साथ छोडऩा संभव नहीं है, लेकिन जम्मू कश्मीर में पीडीपी कब तक कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस के आमंत्रण को ठुकराती रहेगी यह कह पाना कठिन है। भाजपा का बिहार में चुनाव जीत पाना संदिग्ध अवश्य था लेकिन वह दिल्ली के समान ध्वस्त होगी इसका अनुमान किसी ने नहीं लगाया। इस परिणाम के लिए भाजपा की वही रणनीति भी जिम्मेदार है जिसके कारण वह दिल्ली में हारी थी। दिल्ली में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अरविन्द केजरीवाल की व्यक्तिगत आलोचना कर उन्हें अपने समकक्ष न खड़ा कर दिया होता तो शायद परिणाम का वैसा स्वरूप प्रगट नहीं हुआ होता जैसा हुआ है। उम्मीद यह थी कि बिहार में जिस विकास की आस जगाने के लिए भाजपा चुनाव मैदान में उतरी थी उसी पर कायम रहेगी तथा प्रधानमंत्री नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव की व्यक्तिगत आलोचना नहीं करेंगे लेकिन ऐसा हुआ नहीं। प्रधानमंत्री बिहार के इन दो धुरंधर राजनीतिक विरोधियों की संयुक्त शक्ति का अनुमान लगवाने में असफल रहे। बिहार में भाजपा वैसे ही अकेले दम पर विकल्प की स्थिति में कभी नहीं रही है, इसलिए वह मत प्रतिशत के आधार पर अपने लिए संतोष का दावा कर सकती है लेकिन जो नतीजा सीटों के रूप में सामने आता है समीक्षा का आधार वही बनता है। लोकसभा में पूर्ण बहुमत पाने के बावजूद उसका मत प्रतिशत चालीस तक नहीं पहुंच सका था। तो क्या यह संभव है कि आगामी आने वाले चुनावों में चाहे वह विधानसभा का हो या फिर 2019 में लोकसभा का जिस हिन्दी क्षेत्र में उसे भारी सफलता अन्य दलों के बिखराव से मिली थी, उसका संज्ञान लेकर जैसी एकजुटता बिहार में हुई है वह आगे बढ़ेगी। इसकी संभावना कम है। हिन्दीभाषी प्रदेशों में अगला आम चुनाव उत्तर प्रदेश में 2017 में होना है। उत्तर प्रदेश के दो प्रभावी दल समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी हैं। भाजपा लोकसभा चुनाव में भारी सफलता के बावजूद तीसरे स्थान और कांग्रेस चौथे स्थान पर है। यद्यपि एक बार 1993 में सपा−बसपा ने मिलकर चुनाव लड़ा था, लेकिन उसके बाद से वे एक−दूसरे का विकल्प भर बनकर रह गए हैं। कांग्रेस का अस्तित्व नाममात्र के लिए है। ऐसे में भाजपा को किसी महागठबंधन की चुनौती का सामना तो नहीं करना पड़ेगा लेकिन एक चुनौती स्थायित्व पा चुकी है। वह कारण जिसके फलस्वरूप 1990 में पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने के बाद से विधानसभा में प्रत्येक निर्वाचन में उसकी संख्या घटती जा रही है। जिस प्रकार सपा−बसपा सरकार रहते हुए हार के कारणों में जाने से परहेज करती हैं, शायद भाजपा भी निरंतर घटती जा रही विधायकों की संख्या के कारण का संज्ञान लेने में असफल रही है। बिहार में महागठबंधन का एजेंडा लालू प्रसाद यादव ने पटना की प्रथम जनसभा में जिसमें नीतीश कुमार और सोनिया गांधी दोनों मौजूद थे, बहुत स्पष्ट कर दिया था। चुनाव अगड़ों और पिछड़ों के बीच होगा। बिहार में पिछड़ा वर्ग वर्चस्व राजनीति का केंद्र बिन्दु रहा है। इसलिए आरक्षण नीति की समीक्षा के औचित्य की चाहे जितनी वांछनीयता हो, इस अभिव्यक्ति ने इस वर्ग में भाजपा के प्रति अनुकूलता को प्रतिकूलता में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी है। लालू यादव और नीतीश कुमार ने बड़ी चालाकी से अनुसूचित वर्ग में भी इस आशंका की पैठ बढ़ाई। भाजपा सफाई देती रही लेकिन वह इस आशंका से मतदाताओं को उबार पाने में असफल रही। देशभर में जो भाजपा विरोधी हैं उन्होंने कुछ क्रियाओं पर भाजपा के छुटभैय्यों की प्रतिक्रिया को मुद्दा बनाकर जो माहौल पैदा किया उसने राष्ट्रपति को असहिष्णुता के माहौल से विचलित कर दिया। मुस्लिम मतदाता भाजपा के प्रति कभी अनुकूल नहीं रहा है। लेकिन वह जब बंट जाता है तो उसका लाभ भाजपा को मिल जाता है। लोकसभा चुनाव के समय समग्र रूप से भाजपा के खिलाफ एकजुट ना हो पाने का उसे मलाल रहा है। इसलिए गौमांस भक्षण और दादरी जैसी घटनाओं को मुद्दा बनाकर मुखरित विशिष्टता प्राप्त लोगों की अभिव्यक्ति ने उसे एकजुट होने की प्रेरणा दी। भाजपा और कुछ अन्य संगठनों के निचले पायदान के लोगों ने उस पर जो प्रतिक्रिया की वही भाजपा का एजेंडा है यह बात मुसलमानों को समझाने में महागठबंधन सफल रहा। इसीलिए जो मुस्लिम दल जोर आजमाइश के लिए उतरे थे, उनका मुलम्मा मुसलमानों पर नहीं चढ़ पाया। सजायाफ्ता लालू यादव को यादव वर्ग अपना नेता मानता है उनके राजनीतिक हाशिए पर चले जाने का उनको मलाल था, नीतीश कुमार के साथ आने पर उन्हें अपना वर्चस्व लौटाने का स्वर्णिम अवसर प्राप्त हो गया। यद्यपि भाजपा ने किसी भी राज्य विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं किया तथापि जहां पहले से मुख्यमंत्री मौजूद थे, यथा राजस्थान, मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ के अलावा जहां उसे सफलता मिली। यथा गोवा, महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड वहां कांग्रेस या जिन दलों से उसे संघर्ष करना था, उनकी भी साख कांग्रेस के समान ही थी। लोकसभा चुनाव के मुकाबले मत प्रतिशत कम होने के बावजूद उसे सफलता मिली। इन सभी राज्यों में महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहां बड़े भाई की भूमिका निभा रहे शिवसेना को छोटे भाई की स्थिति असहनीय हो गई है, वह वहां कुछ विस्फोट कर दे तो आश्चर्य नहीं होगा। फिलहाल तो वह शल्य के समान मनोबल तोडऩे में लगी है। बिहार के चुनाव में भाजपा को परास्त करने की एकजुटता की स्थिति कैसी रहेगी, इस पर भावी राजनीति निर्भर रहेगी।

क्या नरेंद्र मोदी का जादू कम हो गया है? 

डॉ. अरूण जैन

नरेंद्र मोदी का जादू कम हो गया है या चुनाव प्रचार गलत ढंग से हुआ। वजह कुछ भी हो, वास्तविकता यह है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का बिहार में सफाया हो गया। भाजपा आत्मविश्वास दिखा रही है और उसे लगता है कि विपक्षी एकता उसके नुकसान का कारण है। फिर भी, बिहार के चुनावों ने भाजपा, खासकर प्रधानमंत्री-पार्टी अध्यक्ष के रूप में मोदी और अमित शाह की जोड़ी के मंसूबों पर करारा प्रहार है। एक दूसरे पर दोष लगाने का सिलसिला, जो मतगणना के कुछ घंटों के बाद ही शुरू हो गया था, लगातार जारी है। नेतृत्व वर्ग में क्रोध के स्वर बढ़ते जा रहे हैं। आने वाले समय में यह और भी बढ़ेगा। हर चुनाव के बाद जिस तरह विश्लेषण होते हैं, बिहार का भी बार-बार विश्लेषण किया जाएगा। बेशक, किसी समय में लड़े जाने वाले चुनाव के मुकाबले सबसे ज्यादा तीखे ढंग से लड़ा गया चुनाव था। पहले कोई भी चुनाव सांप्रदायिक नफरत के आधार पर बांटने वाली राजनीति और धार्मिक असहिष्णुता के आधार पर नहीं लड़ा गया है। हमने ऐसा कोई विधानसभा चुनाव नहीं देखा जिसमें दर्जनों केंद्रीय मंत्रियों ने प्रचार किया हो और प्रधानमंत्री ने 30 रैलियों में भाषण किया हो। पार्टी अमित शाह रणनीति तैयार करने के लिए आठ महीनों से भी ज्यादा बिहार में जमे रहे। लेकिन परिणाम आए तो महागठबंधन को सफलता हाथ लगी। नीतिश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी कांग्रेस, जिसे 2014 के आम चुनावों के बाद से मिल रही लगातार पराजय के बाद अपनी स्थिति में बदलाव जरूरत थी, के साथ खामोशी से भारी विजय की ओर बढ़ गई। यह आरएसएस और भाजपा की बांटने वाली राजनीति के मुकाबले सामाजिक कल्याण और आर्थिक विकास के लिए वोट था। अंत में, जैसा पाया गया कि बिहार के लोगों ने मोदी के जोर और तथाकथित गुजरात मॉडल के कारण 2014 में केंद्र की सत्ता में आई भाजपा की पूरी तरह नकार दिया। वास्तव में दोनों को अस्वीकार करने में दिल्ली पहली थी जो 70 में से 67 सीटें देकर आम आदमी पार्टी को सत्ता में ले आई। बेशक, भाजपा ने कुछ राज्यों में सफलता का स्वाद जरूर चखा। झारखंड और हरियाणा में उसे सफलता मिली और जम्मू-कश्मीर में उसने पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ सरकार बनी ली। लेकिन बिहार एक ऐसा राज्य था जहां भाजपा को मुश्किलों को पार कर लेने का भरोसा था। दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं होना था। मेरी राय में भाजपा के नुकसान के कई कारण हैं- ध्रुवीकरण, आरक्षण, गाय आदि। लेकिन मेरे हिसाब से, पिछले दो कार्यकलापों में नीतिश कुमार ने जो सुशासन दिया वह साफ दिखाई देता है। नीतीश कुमार ने उपहार के रूप में थोड़े समय के लिए सत्ता जीतनराम मांझी को चलाने दी। इसे एक छोटा भटकाव मानकर भूल जाना चाहिए। दूसरों शब्दों में कहें, बिहार के लोग सुशासन का चेहरा बन चुके नीतीश कुमार को इसके बावजूद चुनना चाहते थे कि उन्होंने अपने घोर विरोधी राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव से हाथ मिला था। आरजेडी को जनता दल युनाइटेड से ज्यादा सीटें मिली हैं और लालू यादव मंत्रिमंडल बनाने में तकलीफ देने वाली कीमत मांग सकते हैं। लेकिन मुझे विश्वास है कि नीतीश कुमार बागडोर थामेंगे और लोगों को निराश नहीं करेंगे जिन्होंने उनमें विश्वास जाहिर किया है। मुझे यह भी उम्मीद है कि कांग्रेस, जिसकी विधानसभा में अच्छी संख्या है, आसपास में जो कुछ हो रहा है उसे नजरअंदाज नहीं करेगी। मैं इसे कोई ज्यादा मायने की बात नहीं समझता कि लालू ने कहा कि नीतीश बिहार में शासन करेंगे और वह खुद केंद्र में मोदी का मुकाबला करेंगे, बिहार के मामलों में दखलदाजी किए बगैर। मैं यह बड़बड़ाहट सुन सकता हूं कि लालू के बेटों को मंत्रिमंडल में लिए जाने और एक को उपमुख्यमंत्री बनाने का संकेत दिया जा रहा है। यहीं पर नीतीश को संतुलन बनाना होगा क्योंकि भाजपा और एनडीए में उनके प्रतिद्वंदियों को ऐसे ही मौके की तलाश है ताकि वे कूदकर उसे दोनों हाथ से लपक लें। मैं इसमें नहीं जाना चाहता कि भाजपा से कहां चूक हुई क्योंकि पार्टी में चुनाव मैनेजर हैं जो इसका विश्लेषण करेंगे। लेकिन मैं अधिकार के साथ कह सकता हूं कि बिहार के उदाहरण ने भविष्य में आ रहे चुनावों के लिए एक ढांचा दे दिया है। अगले साल असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु को चुनाव में जाना है तो क्षेत्रीय पार्टियां हर राज्य में बिहार के मॉडल पर भाजपा के खिलाफ कुछ गठबंधन बना सकती है। निस्संदेह, हर राज्य की अपनी जरूरतें हैं और विकास के कार्यक्रम हैं, इसके अलावा अपने स्थानीय नेताओं के साथ खास मॉडल पर काम करते है। सिर्फ एक चालाक गठजोड़ जो लालू और नीतीश कुमार की तरह का हो और जिसे स्थानीय मतदाताओं की नब्ज की पहचान हो, उस हद तक सफलता हासिल कर सकता है जिस हद तक बिहार में सफलता मिली है। चुनाव के पहले का समझौता निश्चित और स्थानीय जरूरतों की पक्की समझदारी के आधार पर होना चाहिए। मोदी-शाह के नेतृत्व माडल पर लौटें तो मुझे यह कहते हुए दुख है कि दोनों ने चीजों को महत्व नहीं दिया। चुनाव अभियान के दौरान दिखाया गया उनका घमंड पार्टी के सफाए का एकमात्र कारण हो सकता है। निश्चित तौर पर, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने आरक्षण का मुद्दा उठा कर आग में घी डाला। यहां तक कि बिहार के भाजपा नेतृत्व ने कई बयान दिए हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि पार्टी कुछ मुद्दों पर अंतिम हद तक गई और वे यह बताते दिखते हैं कि आरएसएस प्रमुख के बयान बिहारियों को ठीक नहीं लगे। ऐसा लगता है कि मोदी रास्ता भटक गए हैं और नहीं जानते कि नौकरशाही की खामियों पर किस तरह काबू पाया जा सकता है, ऐसी चीज जिसका सामना पहले शासन करने वालों को करना पड़ा था। पार्टी की ओर से घोषित आर्थिक सुधार देश को निर्लज्जता से दक्षिण पंथ की ओर ले जाता है। अगर जवाहर लाल नेहरू की समाजवादी जैसी पद्धति बहुत ज्यादा है, तो ज्यादातर गरीब जनता वाले देश में भाजपा अमीरों और कारपोरेट समर्थक होने का आभास नहीं दे सकती और उसे दक्षिणपंथी नीतियों से बाहर आना होगा। मैं यह सुझाव नहीं दे रहा हूं कि पार्टी भारतीय संविधान की प्रस्तावना के हर अक्षर का पालन करे। लेकिन वह ऐसी कोई राह नहीं अपना सकती जो संविधान के भावना के एकदम विपरीत हो, ऐसा शासन जो उस कदम के खिलाफ हो जो अमीरों और गरीबों के बीच कम करने के लिए उठाया गया हो। मोदी और उनकी पार्टी जितनी जल्दी यह समझ लें, उतना बेहतर होगा।

Monday, 7 December 2015

सर्दियों में कई पर्यटन स्थल हो जाते हैं गुलजार 





अरूण जैन
सर्दियों की ठंडी रातें और सर्द सुबह। ऐसे में मन करता हैं, बस चाय और किताबें लेकर रजाई में मजा है। गुलमर्ग की बर्फबारी देखने का आनंद तो इसी मौसम में है। हिमालय की पहाडिय़ां बर्फ की रजाई ओढ़े अलग ही दृश्य प्रस्तुत करती हैं। भारत में भी कुछ ऐसी जगहें हैं जहां इन सर्दियों में घूमने का मजा लिया जा सकता हैं। तो आइए चलें और खूबसूरत सर्दियां मनाएं इन जगहों पर- मनाली- दिसम्बर में मनाली की बर्फबारी यहां की सुंदरता में चार चांद लगा देती है। बर्फ से ढकी पहाड़ की चोटियों को देखकर ऐसा लगता हैं मानों पूरा हिल स्टेशन सफेद मखमली रजाई से ढका हो। गुलमर्ग- अगर आप ऐसी जगह जाना चाहते हैं, जहां की खूबसूरती देखकर एक पल के लिए निहारते रह जाएं, तो गुलमर्ग से बेहतर कुछ नहीं। कश्मीर घाटी को तो धरती का स्वर्ग कहा जाता है जब यह पूरी तरह बर्फ से ढ़क जाती है। श्रीनगर से 50 किलोमीटर दूर गुलमर्ग में सबसे ज्यादा बर्फबारी देखने को मिलती हैं। इस दौरान यहां स्कींग का मजा लिया जा सकता है। जैसलमेर- इसे डेजर्ट (रेतीला) शहर भी कहा जाता है। यहां के खूबसूरत किले देखने के लिए पूरे देश से पर्यटक आते हैं। शादी-शुदा जोड़े और हनीमून के लिए यह जगह बेहतर है। यहां का कैमेल राइड, सूर्योदय और सूर्यास्त देखने का अलग ही आनंद है। यहां आकर ऐसा लगता हैं मानों हम खुद ही राजा है। मुन्नार- मुन्नार के चाय के बागान बादलों से ढकी ढलानें, खूबसूरत पहाड़ी और प्राकृतिक दृश्य के कारण इसे भगवान का देश कहा जाता है। मुन्नार में साहसिक खेलों का भी आनंद लिया जाता है। हनीमूनर्स के लिए यह बेहतरीन जगह हैं। यहां पूरे परिवार के साथ जा सकते हैं। कसोल- कुल्लू से 42 किलोमीटर दूर छोटा सा गांव कसोल पार्वती घाटी में बसा है। यहां की खूबसूरती देखते बनती है। मनिकर्ण से सिर्फ पांच किलोमीटर दूर यह गांव बेहतरीन पर्यटक स्थल है। मसूरी- देहरादून से सिर्फ एक घंटे की यात्रा कर आप खूबसूरत शहर मसूरी पहुंच सकते ळैं। साप्ताहांत में भी यहं के खूबसूरत दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। दिसम्बर के अंत में यहां की बर्फबारी देखते बनती है। क्रिसमस की छुट्टियों में यहां की बर्फबारी और चारों तरफ फैली हरियाली का मजा आप ले सकते हैं। शिमला- सर्दियों में ज्यादातर लोग शिमला जाना पसंद करते हैं। मनोरंजन के हिसाब से भी शिमला बेहतरीन है। यहां की बर्फबारी पूरे देश से देखने लोग आते हैं। इसके अलावा दार्जलिंग की खूबसूरत पहाडिय़ां, पटनीटॉप की शिवालिक पहाडिय़ों पर बर्फबारी और जोधपुर के ऐतिहासिक किले और यहां की वास्तुकला भी देखने लायक है।
कितना कामयाब रहेगा बिहार का नया राजनैतिक संयोजन 
अरूण जैन
बिहार में नयी सरकार के गठन के बाद मंत्रिमंडल का जो स्वरूप उभर कर आया है उस पर कई सवाल खड़े किये जा रहे हैं। मात्र आठवीं कक्षा पास व्यक्ति यदि आज के दौर में भी किसी राज्य का उपमुख्यमंत्री बनने में कामयाब हो पाया है तो इसे भारतीय लोकतंत्र का कमाल नहीं बल्कि खामी कहा जाना चाहिए। उल्लेखनीय है कि महागठबंधन में सबसे ज्यादा विधायकों वाली पार्टी राष्ट्रीय जनता दल है और उसके प्रमुख लालू प्रसाद यादव के दोनों युवा पुत्र राज्य मंत्रिमंडल में कैबिनेट मंत्री बनाये गये हैं। यह दोनों मंत्रिमंडल में कितने वरिष्ठ हैं इसका अंदाजा इसी बात से लगा लेना चाहिए कि तमाम वरिष्ठों और अनुभवी नेताओं को दरकिनार करते हुए मुख्यमंत्री के बाद लालू पुत्रों को शपथ दिलाई गई। लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव बिहार के उपमुख्यमंत्री बनाये गये हैं और वह सड़क निर्माण विभाग संभालेंगे जबकि उनके बड़े भाई तेज प्रताप यादव जोकि शपथ लेते वक्त उच्चारण भी सही तरह से नहीं कर पा रहे थे अब स्वास्थ्य, सिंचाई और पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण महकमों की जिम्मेदारी संभालेंगे। यह सही है कि बिहार या देश में कम शैक्षणिक योग्यता वाले व्यक्ति का मंत्री या मुख्यमंत्री बनना कोई नयी बात नहीं है लेकिन आज जबकि भारत तेजी से तरक्की कर रहा है और उसे विश्व के अन्य देशों के साथ सतत संपर्क की जरूरत है और तेजी से बदलती तकनीकी दुनिया से सांमजस्य बनाने की जरूरत है, ऐसे में हमारे नेता यदि कोई पत्र आदि पढऩे लिखने के ही काबिल नहीं हों तो उन्हें पूरी तरह प्रशासनिक अधिकारियों पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। यदि कोई वाकई नेक इरादों के साथ राजनीति में आया हो और जनहितकारी नीतियों को लागू कराना चाहता हो लेकिन शिक्षित नहीं हो तो वह अपनी अज्ञानता के चलते काम नहीं कर पाएगा। नीतीश कुमार बिहार की छवि बदलने के प्रयास में लंबे समय से लगे हैं और इस काम में उन्हें सफलता भी मिल रही है लेकिन यह भी गौरतलब है कि बिहार में नकल करते छात्रों और नकल करवाते लोगों तथा पुलिस के मूक दर्शक बने रहने की तसवीरें पिछले दिनों वायरल हो गयी थीं। उसी तरह अब बिहार के मंत्रियों की शैक्षणिक योग्यता भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा पा रही है। बढ़ते बिहार ही नहीं बढ़ते भारत की छवि पर भी इन सबसे प्रभाव पड़ रहा है लेकिन राजनीति की अपनी मजबूरियां भी हैं क्योंकि सामाजिक गणित को साधने और राजनीति में परिवारवाद के चलते एडज़स्ट करने के चक्कर में कई बार राजनीतिक दलों को ऐसे लोगों को मंत्री बनाना पड़ता है जोकि काबिल नहीं होते हैं। पिछले दिनों देखने में आया कि कुछ राज्य सरकारों ने पंचायत चुनाव लडऩे के लिए शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने की दिशा में कदम उठाया लेकिन जब ऐसा ही कदम विधानसभा और लोकसभा के उम्मीदवारों के लिए उठाने की मांग उठती है तो उसे खारिज कर दिया जाता है। ज्यादा दूर नहीं जाएं तो एकदम बगल यानि पड़ोसी पाकिस्तान में भले लोकतंत्र नाम का ही हो लेकिन वहां पर संसद का चुनाव लडऩे के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता स्नातक निर्धारित है। एक बड़ा सवाल और उठता है कि जब कुछ राज्यों जैसे हाल ही में राजस्थान और हरियाणा ने विधानसभा से अध्यादेश पास कर जिला परिषद के चुनाव लडऩे के लिए न्यूनतम दसवीं पास और सरपंच पद के लिए चुनाव लडऩे की योग्यता कम से कम आठवीं पास होना अनिवार्य करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो केंद्र सरकार को भी चाहिए कि लोकसभा और विधानसभा के लिए भी ऐसी व्यवस्थाएं करने के लिए कदम बढ़ाए। यदि बहाना यह है कि ऐसा करने से ज्यादातर आबादी का चुनाव लडऩे का अधिकार वंचित होगा तो सरकारों को अपने सर्वशिक्षा अभियान की सफलता और स्कूल छोडऩे वालों की संख्या में कमी आने के दावों पर गौर करना चाहिए। हरियाणा सरकार ने जब पंचायत चुनावों में शैक्षिक योग्यता निर्धारित करने की दिशा में कदम बढ़ाया तो मामला सर्वोच्च अदालत तक गया और वहां पर दलील दी गयी कि यह अध्यादेश असंवैधानिक है और इसे लागू नहीं किया जा सकता। कहा गया कि इस अध्यादेश से संविधान द्वारा दिए गए चुनाव लडऩे के अधिकार का हनन हो रहा है और अगर इसे लागू किया जाएगा तो करीब 95 फीसदी महिलाएं अपने हक से वंचित हो जाएंगी, जबकि 80 फीसदी लोग इससे प्रभावित होंगे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया था कि वह चुनाव लडऩे के लिए पात्रता मापदंड के रूप में शैक्षणिक योग्यता के खिलाफ नहीं है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत यह भेदभाव पूर्ण है, क्योंकि यह अनुच्छेद बराबर अवसर की गारंटी देता है। बहरहाल, विकास के नारे और अपनी साफ छवि की बदौलत चुनाव जीते नीतीश कुमार की राह जनता ने इस बार जितनी आसान की है उतनी ही कठिनाई महागठबंधन के सहयोगी पैदा भी कर सकते हैं। मुख्यमंत्री भले जनता दल युनाइटेड का है लेकिन वह विधायकों की संख्या मामले में दूसरे नंबर का दल है। देखना होगा कि राजद कोटे के मंत्री यदि आगे चलकर विवाद पैदा करते हैं तो नीतीश उन पर कैसे लगाम लगाते हैं। जहां तक नीतीश के मंत्रिमंडल में सर्वसमाज की भागीदारी का सवाल है तो यकीनन उन्होंने मंत्रिमंडल गठन में सामाजिक जातिगत आंकड़ों को ध्यान में रखा है। मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा यादव जाति से 7 मंत्री बने हैं जबकि पांच लोग दलित हैं। चार अति पिछड़ा वर्ग से और चार मुस्लिम हैं। चार मंत्री पद सर्वणों को दिये गये हैं जबकि तीन पद कोइरी और एक कुर्मी (मुख्यमंत्री को छोड़कर) मंत्री बना है। इन मंत्रियों में मात्र दो महिलाएं हैं। नीतीश के 28 सदस्यीय मंत्रिमंडल में 17 लोग पहली बार मंत्री बने हैं इसलिए माना जाना चाहिए कि सरकार नये उत्साह के साथ काम करेगी।

जानिए सोनिया-मन-मोदी की 'चाय पे चर्चा'की 


सोनिया और मनमोहन सिंह के साथ उनकी मुलाकात पहले से फिक्स नहीं थी। प्रधानमंत्री ने अचानक यह मीटिंग फिक्स की थी। दरअसल, यह सारी कवायद बिहार चुनाव में हार के बाद की जा रही है। हमारे सूत्र बता रहे हैं कि बात सिर्फ इतनी ही नहीं थी। कई और कारण हैं, जिनकी वजह से पीएम मोदी को सोनिया और मनमोहन को बुलाना पड़ा। 
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने  पीएम नरेंद्र मोदी से 7 रेसकोर्स रोड मुलाकात की। करीब 35 मिनट चली इस मुलाकात में पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम, संसदीय कार्य मंत्री वैंकया नायडू और वित्त मंत्री अरुण जेटली भी मौजूद थे। 'बैठक के दौरान संसद में अटके हुए कई बिलों पर चर्चा हुई। जीएसटी पर कांग्रेस ने अपना पक्ष रखा। सरकार ने भी उन मुद्दों पर अपना रुख साफ किया। कांग्रेस नेताओं ने बताया कि वे अपनी पार्टी से चर्चा करेंगे।Ó लेकिन बिहार चुनाव में हार ; कांग्रेस के एक सीनियर लीडर ने बताया कि इससे पहले तो वे आसमान में उड़ रहे थे, लेकिन अब मोदी जमीन पर आ गए हैं और देश की जनता के लिए कुछ अच्छा करना चाहते हैं। हम जनता के बीच स्पष्ट संदेश देना चाहते हैं कि कांग्रेस राष्ट्रहित के कार्यों में पूरा सहयोग देना को तैयार है। मोदी सरकार की छवि ; सूत्रों के मुताबिक, बिहार चुनाव में हार के बाद मोदी अपनी सरकार की नकारात्मक छवि को बदलना चाहते हैं। मोदी की टीम को यह एहसास भी हो चुका है कि निकट भविष्य में एनडीए को राज्यसभा में बहुमत मिलने वाला नहीं है। जेटली-राहुल की मुलाकात ने खोला रास्ता ; सूत्रों का कहना है कि सोनिया-मोदी की मुलाकात पर्सनल लेवल पर आ रहे बदलाव की ओर भी इशारा करती है। अब इसे संयोग ही कहेंगे कि निजी स्तर पर इसकी शुरुआत अरुण जेटली की राहुल गांधी के साथ मुलाकात से हुई। जब वह कांग्रेस उपाध्यक्ष को अपनी बेटी की शादी में बुलाने के लिए पहुंचे थे। यहीं से दोनों पक्षों के शीर्ष स्तर पर बातचीत का रास्ता खुला। राहुल की ताजपोशी ; वहीं, कांग्रेस सूत्रों की मानें तो सोनिया गांधी इस समय विरोध का महौल नहीं चाहती हैं। उनका फोकस राहुल गांधी को सत्ता सौंपने पर है। जिससे कि राहुल मिडिल क्लास वोटर और युवाओं के बीच जगह बना सकें। 

अस्थायी कामों में बंदरबांट शुरू



अरूण जैन
अब जबकि सिंहस्थ महापर्व सिर पर है, ऐसे समय में ताबड़तोड़ अस्थायी कामों पर जो विशाल बंदरबांट शुरू हो गई है उस पर किसी की नजर नही है, अथवा देखकर भी अनदेखा किया जा रहा है। सभी अस्थायी प्रकृति के कार्य तीन से दस गुना उॅंचे भावों पर करवाए जा रहे हैं। सरकारी मशीनरी किसी भी ‘खॉं’ को पत नही कर रही है। 
मेरे ख्याल से एक उदाहरण ही काफी होगा। सिंहस्थ मेला क्षेत्र में साधु-संतों और आगंतुकों के लिए अस्थायी शौचालय बनाए जाना है। नगरनिगम ने इसका आंकलन 36 करोड का बनाया था। इसे अब बढ़ाकर 111 करोड़ कर दिया गया है। पहले 15 हजार शौचालय बनाना थे, इनकी संख्या बढ़ाकर अब 48 हजार कर दी गई है। कहा जा रहा है कि इसमें भारतीय और यूरोपियन शौचालय के साथ सुविधाजनक बाथरूम भी शामिल हैं। निविदाएं दिखाने को चार कंपनियों को दी गई हैं। पर जानकार सूत्र बताते हैं कि अधिकांश कार्य लल्लूजी एंड संस को ही दिया गया है और इस कंपनी ने पेटी कांट्रेक्ट अन्य छोटी कंपनियों को दे दिया है। प्रश्न यह है कि ये 48 हजार शौचालय बनने का सत्यापन कौन करेगा ? फिर-शौचालय का जो स्पेशिफिकेशन दिया है वह मात्र गढ्ढे बनाकर उसमें मेटल बाक्स रखने का है। जो खेत अथवा जमीन मात्र एक-दो माह के लिए लोगों से अधिग्रहीत किए है उनमें से इन बाक्स और स्ट्रक्चर को निकालकर कहां सहेजा जाएगा या ले जाया जाएगा यह स्पष्ट नहीं है। अर्थात काम हुवा, आया-गया, कुछ भी स्पष्ट नही है। मतलब सब पानी में। मेरे अनुमान से मात्र इसी कार्य में कम से कम 70-80 करोड़ रूपए का लोचा है। इसके बाद अभी ताबड़तोड में कुछ नए घाट बनाए जा रहें है। जमीन समतलीकरण का कार्य चल रहा है। सेटेलाइट टाउन का काम होना है, पार्किंग स्थल तैयार होना है। कई पहुंच मार्ग बनना है।
वैसे तो सिंहस्थ केन्द्रीय समिति के अध्यक्ष के रूप में माखनसिंह जी आ चुके हैं। आरएसएस से जुड़े श्री सिंह अत्यन्त साफ छवि के व्यक्तित्व है, पर वे ‘इलेवन्थ अवर’ के भ्रष्टाचार में कितनी रोक लगा पाएंगे यह कह सकना मुश्किल है। क्योंकि अब समय शुरू हो चुका है कि कैसे व्यवस्थाए ठीक से ठीक की जाएं। ताकि संतो और श्रद्धालुओं को असुविधाएं न हो। निश्चित है ऐसे समय में पैसे का कोई मोल नहीं है और यही अधिकारियों के लिए चांदी कूटने का सही समय है।
वैसे, स्थायी प्रकृति के कामों की बातें करें तो मात्र दो-तीन ओवरब्रिज ही, वो भी काम लायक पूरे हो पाएंगे। शेष मानकर चलिए अगले सिंहस्थ तक भी पूरे हो जाएं तो भगवान की कृपा समझिए। डामर और पक्की सड़कों की बात तो छोड़ ही दीजिए। अधिकतर बनाई गई सड़के उखड़ने लगी हैं। सीमेंट कांक्रीट सड़कों के काम काफी कुछ अधूरे पड़े हैं। और पक्का विश्वास करिए कि महापर्व के तुरन्त बाद पहली बारिश में लगभग सभी सड़के उखड जाने वाली हैं। घाटों और बाहरी सड़कों पर चार आदमी बाद में नही मिलने वाले। फिर रख रखाव की बात तो भूल ही जाइए। यही है क्लीन सिंहस्थ-ग्रीन सिंहस्थ ।