Thursday, 5 January 2017

स्वयं को प्रकृति के निकट पाएंगे रानीखेत में


डॉ. अरूण जैन
रानीखेत को पहाड़ों की रानी भी कहा जाता है। प्रकृति का अनुपम सौंदर्य रानीखेत के कण-कण में बिखरा पड़ा है। यहां पर दूर-−दूर तक फैली घाटियां, घने जंगल तथा फूलों से ढके रास्ते व ठंडी मस्त हवा पर्यटकों का मन बरबस ही मोह लेती है। रानीखेत की खास बात यह है कि यहां पर लोगों का कोलाहल व भीड़भाड़ बहुत कम है। यकीन जानिए यहां पहुंचने के बाद पर्यटक स्वयं को प्रकृति के निकट पाता है। अंग्रेजों के शासन के दौरान अंग्रेजी फौज की छावनी रहे इस क्षेत्र में कुमाऊं रेजीमेंट का मुख्यालय भी है। छावनी क्षेत्र होने के कारण एक तो यहां वैसे ही साफ−सफाई रहती है दूसरे यहां पर प्रदूषण की मात्रा भी अन्य जगहों की अपेक्षा बहुत कम है। चलिए सबसे पहले आपको लिए चलते हैं चौबटिया। चौबटिया में बहुत ही सुंदर बाग-बगीचे हैं। यहां पर स्थित सरकारी उद्यान व फल अनुसंधान केंद्र भी देखने योग्य हैं। यहां पर पास में ही एक जल प्रपात है, जिसके ऊंचाई से गिरते संगमरमर जैसे पानी का दृश्य आपका मन मोह लेगा।  द्वाराहाट रानीखेत से लगभग 32 किमी की दूरी पर स्थित है। द्वाराहाट पुरातात्विक दृष्टि से भी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है। कभी कत्यूरी वंश के शासकों की राजधानी रहे इस स्थल पर पूरे 65 मंदिर हैं जोकि तत्कालीन कला के बेजोड़ नमूने के रूप में विख्यात हैं। बदरीकेदार मंदिर, गूजरदेव का कलात्मक मंदिर, पाषाण मंदिर और बावडिय़ां पर्यटकों को अपने अतीत की गाथा सुनाते हुए लगते हैं। यहां स्थित मंदिरों में से विमांडेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर एवं कुबेर की विशालकाय मूर्ति देखना न भूलें।  रानीखेत से 6 किमी की दूरी पर स्थित है उपत एवं कालिका। यहां पर गोल्फ का विशाल मैदान है। हरी−हरी घास से भरे इस मैदान में गोल्फ खेलने का आनंद ही कुछ और है। कालिका में कालीदेवी का प्रसिद्ध मंदिर भी है। अब आप दूनागिरी जा सकते हैं। द्वाराहाट से लगभग 14 किमी की दूरी पर स्थित दूनागिरी से आप हिमालय की बर्फ से ढकी चोटियों के मनोहारी दर्शन कर सकते हैं। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि यहां पर 1181 के शिलालेख भी पाए गए हैं। दूनागिरी में चोटी पर दुर्गा जी सहित अन्य कई मंदिर भी हैं जहां पर आसपास के लोग बड़ी संख्या में आते हैं। इस स्थान को पर्यटन के लिहाज से सर्वश्रेष्ठ भी कहा जा सकता है।  शीतलाखेत को आप पर्यटक गांव भी कह सकते हैं। यहां तक आने के लिए आप रानीखेत व अल्मोड़ा से सीधी बस सेवा का भी लाभ उठा सकते हैं। ऊंचाई पर शांत व खूबसूरत नजारों से भरे दृश्य पर्यटकों को भा जाते हैं। ट्रैकिंग की दृष्टि से भी यह अच्छा स्थल है। आप चिलियानौला भी घूमने जा सकते हैं। यहां पर हेड़ाखान बाबा का भव्य मंदिर है। कहते हैं कि इस आधुनिक मंदिर में देवी−देवताओं की कलात्मक मूर्तियां देखने लायक हैं। द्योलीखेत का मैदान तीन ओर से पर्वतों से घिरा हुआ है। इसके एक ओर देवदार तथा चीड़ के वृक्ष इस स्थल की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। खड़ी बाजार रानीखेत का मुख्य बाजार है। एक ओर से उठे होने के कारण ही शायद इसका नाम खड़ी बाजार पड़ा। इस बाजार के दोनों ओर दुकानें हैं जहां से आप रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने वाले सामानों के साथ ही स्थानीय काष्ठकला की वस्तुएं भी खरीद सकते हैं। ट्रैकिंग में दिलचस्पी रखने वाले पर्यटकों के लिए रानीखेत के आसपास कई ऐसे स्थान हैं जहां पर ट्रैकिंग करके आप अपनी यात्रा को रोमांचक बनाने के साथ ही यादगार भी बना सकते हैं।  आसपास के दर्शनीय स्थानों की सैर पर जाने के लिए आपको यहां से निर्धारित दरों पर टैक्सी मिल सकती हैं। यदि आप भारवाहकों की सेवा लेने चाहें तो दाम पहले ही तय कर लें। अप्रैल व जून तथा सितंबर से नवंबर के बीच आप जब भी चाहें, रानीखेत घूमने जा सकते हैं क्योंकि यह माह यहां की सैर के लिए सर्वाधिक उपयुक्त समय है। हां, रानीखेत आप जब भी जाएं, ऊनी कपड़े साथ रखना न भूलें।

पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ाई में सदा अग्रण्य रहे फिदेल कास्त्रो

डॉ. अरूण जैन
जब 20वीं शताब्दी का विश्व इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें क्यूबा के पूर्व प्रधानमंत्री एवं राष्ट्रपति फिदेल कास्त्रो का नाम सबसे ऊपर होगा। यह केवल इसलिए नहीं कि उन्होंने क्यूबा जैसे छोटे देश में साम्यवादी क्रांति की थी, इसका सबसे बड़ा कारण यह होगा कि क्यूबा की क्रांति चीन एवं सोवियत संघ से बिल्कुल अलग थी, जो न तो लेनिनवादी क्रांति थी न ही माओवादी क्रांति। फोकोवाद के माध्यम से मुक्ति आंदोलन चलाया गया तथा बिल्कुल एक नया विकल्प रखा। क्यूबा ने सोवियत संघ से बड़ी सहायता ली, परंतु अपनी स्वाधीनता के साथ कभी कोई समझौता नहीं किया। नन्हें क्यूबा ने जिस  प्रकार विश्व शक्ति पूँजीवादी अमेरिका के विरुद्ध विरोध का बिगुल फूँका, वह भी विश्व इतिहास में एक चिरस्मरणीय घटना रही। भारत के साथ उनके संबंध बहुत बेहतर थे, विशेषकर नेहरु जी के साथ। भारतीय गुटनिरपेक्ष आंदोलन के विशिष्ट समर्थकों में फिदेल कास्त्रो का नाम भी उल्लेखनीय है। यही कारण है कि आज भी भारत और क्यूबा के संबंध काफी मधुर हैं। ये संबंध इतने घनिष्ठ हैं कि राजनीति से लेकर खेल के मैदान तक देखे जा सकते हैं। भारत को बॉक्सिंग के क्षेत्र में आगे बढ़ाने में क्यूबा का महत्वपूर्ण योगदान है। फिदेल कास्त्रो ने ही भारतीय बॉक्सर को क्यूबा में उच्चस्तरीय प्रशिक्षण की व्यवस्था की थी। ऐसे में 26 नवंबर को उनके निधन की सूचना से न केवल भारत में फिदेल कास्त्रो के समर्थक दुखी हुए हैं अपितु समतावादी समाज की इच्छा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति दुखी हुआ है। उनके निधन से विश्व में वंचित वर्गों के हितों का ध्यान रखने वाले एवं साम्यवाद के आखिरी क्रांतिकारी का युग समाप्त हुआ है।  अमेरिका ने सदैव फिदेल को मारने या अपदस्थ करने की कोशिश की, परंतु उनकी अति कुशाग्र नीतियों के कारण अमेरिका कभी इसमें सफल नहीं रहा। मगर दुर्भाग्य कहें कि क्यूबा में फिदेल कास्त्रो का युग आज से 10-15 वर्ष पूर्व तब समाप्त हो गया था, जब अमेरिका से क्यूबा के संबंध क्रमश: धीरे -धीरे ठीक हो गए। उनके भाई राउल कास्त्रो के पूँजीवादी मार्ग की ओर आने से भी यह स्पष्ट हो गया था कि फिदेल का युग समाप्त हो गया है। दरअसल उनके भाई यह समझ गए थे कि विश्व में साम्यवादी युग समाप्त हो चुका है जो भी साम्यवादी विकल्प थे, वे चाहे माओवादी हों या अल्बेनिया वाला, या चेकोस्लावाकिया वाला या पोलैंड, सारे अलग-अलग संस्करण अप्रासंगिक हो चुके हैं। ऐसे में राउल कास्त्रो ने संशोधित उदारवाद को क्रमश: स्वीकार किया। उग्रवामपंथी से लेकर साम्यवाद तक जितने भी लैटिन अमेरिकी साम्यवादी विकल्प थे, उसमें क्यूबा के फिदेल कास्त्रो का विकल्प काफी अनोखा व अति महत्वपूर्ण था। वहाँ शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओं की नई एवं मजबूत पद्धति का विकल्प भी रखा जो आज भी संपूर्ण विश्व के लिए एक अनुकरणीय मॉडल है। जो लोग भी वंचित वर्ग या अथवा समतामूलक समाज में विश्वास रखते हैं, उन्हें बड़ी ही निराशा होगी फिदेल के इस युग समाप्ति से क्योंकि इस मॉडल को इतने सफलता के साथ कहीं पुन: स्थापित नहीं किया जा सकेगा। मगर एक प्रेरणादायक नेतृत्व के रूप में फिदेल कास्त्रो सदैव अमर रहेंगे। पूँजीवाद के विरुद्ध लड़ाई में वे अग्रगण्य रहे। शीत युद्ध से जारी अमेरिकी वर्चस्व की चुनौती देने की फिदेल कास्त्रो की नीति शीतयुद्धोत्तर युग में भी अकेले दम पर जारी रही। बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद ही क्यूबा एवं अमेरिका के रिश्ते सुधर सके। क्यूबा की अर्थव्यवस्था सोवियत संघ पर निर्भर थी लेकिन सोवियत यूनियन के विघटन ने क्यूबा को बुरी तरह प्रभावित किया था। एक समय ऐसा था कि क्यूबा ने नाभीकीय हथियार प्राप्त करने की कोशिश की थी, सोवियत संघ ने भी उसे नाभीकीय शक्ति बना दिया था, लेकिन सोवियत संघ के विघटन एवं अमेरिकी वर्चस्व स्थापित होने के बाद सोवियत संघ ने अपने हाथ पीछे खींच लिए। एक तरह से शीत युद्ध में क्यूबा नाभीकीय हथियार के मुहाने पर खड़ा था। यही सब कारण था कि अंत तक फिदेल कास्त्रो क्यूबा की जनता में अपनी अतिलोकप्रियता बरकरार रख पाए। भूमि सुधार हो या किसानों को सत्ता की मुख्य धारा में लाने का कार्य, वह सभी में सफल रहे। क्यूबा के विकास एवं पूँजीवाद के विरुद्ध संघर्ष में वे सदैव गतिशील रहे।  गन्ने के खेतों में हैती के मजदूरों से हो रहे अन्यायों ने ही फिदेल कास्त्रो को क्रांति की ओर खींचा। कास्त्रो ने 1953 में तानाशाह बतिस्ता के विरुद्ध क्रांति का बिगुल फूँका, क्रांति असफल रही तथा उन्हें 15 वर्षों के लिए जेल की सजा दी गई, लेकिन 2 वर्ष बाद ही रिहा कर दिया गया। जेल से छूटने के बाद ही अपने भाई राउल कास्त्रो के साथ वह मैक्सिको चले गए। यहीं से उन्होंने चे ग्वारा के साथ मिलकर बतिस्ता के खिलाफ गुरिल्ला लड़ाई शुरु की। 1959 में उन्होंने बतिस्ता को अपदस्थ कर खदेड़ दिया तथा क्यूबा के प्रधानमंत्री बने। बाद में 1976 में क्यूबा के राष्ट्रपति बने। 2008 में वे पद से हट गए और राउल कास्त्रो को सत्ता सौंप दी। पूरे विश्व से साम्यवाद की समाप्ति के बाद भी फिदेल कास्त्रो क्यूबा में साम्यवाद का झंडा लहराते रहे। मार्क्स ने जहाँ धर्म को अफीम की संज्ञा दी, वहीं फिदेल का धर्म को लेकर काफी उदारवादी रवैया था। इस तरह उन्होंने धर्म को लेकर भी साम्यवाद को नवीन आयाम से विभूषित किया। न केवल क्यूबा अपितु संपूर्ण लैटिन अमेरिकी देशों का नेतृत्व किया। फिदेल ने संपूर्ण संपत्तियों का राष्ट्रीरकरण किया था, साथ ही श्रमिक कानून लागू किए, ससे वास्तव में श्रमिकों के हितों का संरक्षण हो सका। आज जिस तरह उदारीकरण एवं वैश्वीकरण की असफलता से दुनिया की एक बड़ी आबादी मुख्य धारा से बाहर हो रही है तथा कहीं ब्रेक्सिट तो कहीं ट्रंप जैसे राष्ट्रपति का चयन कर संरक्षणवादी नीतियों को प्रोत्साहन दे रही है, ऐसे में फिदेल कास्त्रो जैसे साम्यवादी आंदोलन के पुरोधा का हमें छोडक़र जाना सचमुच काफी एक युग की दुखद समाप्ति है। उनका व्यक्तित्व स्मरणीय है, जो सदैव 20वीं शताब्दी के विश्व इतिहास को नए रूप और स्वरूप के साथ परिभाषित करेगा। हमारे नीति निर्माता यदि क्यूबा के शिक्षा एवं चिकित्सा मॉडल को भारत में क्रियान्वित कर सकें तो यही फिदेल कास्त्रो को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
सिंधिया होंगे सीएम उम्मीदवार कमलनाथ पीसीसी चीफ-प्रशांत किशोर, राहुल गांधी का मिशन म प्र 2018
डॉ. अरूण जैन
रकार बनाने के लिये कांग्रेस हाईकमान ने प्रशांत किशोर की सेवाएं लेना शुरू कर दी हे। प्रशांत किशोर ने काँग्रेस को अपनी राय दी हे कि़ यदि सिंधिया को  प्रोजेक्ट करे एवं कमलनाथ को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाये । तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस ऐतिहासिक विजय हासिल करेगी । टीम प्रशांत किशोर ने प्रदेश में कांग्रेस की जित पर राहुल को आश्वस्त करते बताया की प्रदेश में भाजपा द्वारा कांग्रेस की जित को रोक पाना गली की हड्डी साबित होगा अगर कांग्रेस इस फार्मूले पर चलती है । क्या हे प्रशांत किशोर का फार्मूला प्रशांत किशोर के अनुसार प्रदेश में कांग्रेस को एकसुत्र में पिरोने के लिए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एवं राज्य सभा सांसद दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचोरी को प्रदेश समन्वयन समिति की जिम्मेदारी सोपी जाए । गुना सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया को सीएम उम्मीदवार और छिंदवाड़ा के सांसद कमलनाथ को पीसीसी चीफ बनाया जाये । इस फार्मूले पर अगर कांग्रेस चलती है तो कांग्रेस आसानी से शिवराज का किला ढहा सकती है । युवा चेहरा दिलाएगा जित सिंधिया के ष्टरू प्रोजेक्ट करने पर खास कर युवाओ में उनका बढ़ती लोकप्रियता का फायद कांग्रेस को मिलेगा । दिल्ली की संसद हो या कोई रैली हर जगह जनता उनको व्यक्तव्य को बड़े गौर से सुनती है । और पसन्द भी करती है । साफ बेदाग छवि के चलते उनका विरोध कर पाना भाजपा के लिए कड़ी चुनोती साबित होगा ।  कमलनाथ का माइंड गेम राष्ट्रिय राजनीती में अपनी गहरी छाप रखने वाले कांग्रेस के दिग्गज नेताओ में शामिल कमलनाथ का माइंड गेम कांग्रेस के लिए संजीवनी का काम कर सकता है । वेंटिलेटर पर पड़ी कांग्रेस में जान फूकने के लिए प्रशांत किशोर ने कमलनाथ का नाम पीसीसी चीफ के तौर पर राहुल को दिया है । उनका मानना है की कमलनाथ एक सीनियर लीडर हे जिसका फायदा प्रदेश में कांग्रेस को उठाना चाहिए है । राज्यसभा के चुनाव में उन्होंने जिस प्रकार विवेक तनख्वा को जित दिलाई उनकी नेतृत्व क्षमता को भी दरकिनार नही किया जाना चाहिए । पीसीसी की जिम्मेदारी कमलनाथ जैसे अनुभवी लीडर के हाथ में होना चाहिए । दिग्विजय और पचोरी प्रभाव का लाभ प्रदेश में कांग्रेस को अधिक सशक्त बनाने के लिए प्रशांत किशोर ने म प्र के पूर्व मुख्यमंत्री वर्तमान राज्यसभा सांसद दिग्विजय सिंह और पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश पचोरी को प्रदेश की समन्वय समिति के चीफ की जिम्मेदारी देने की बात रखी । टीम प्रशांत किशोर के अनुसार दिग्विजय सिंह व् सुरेश पचोरी का प्रदेश की राजनीती में बड़ा प्रभाव है । जिसका लाभ अगर कांग्रेस लेती है तो कांग्रेस एक नई ऊर्जा के साथ प्रदेश में खड़ी हो सकती है । टीम प्रशांत किशोर के इस फार्मूले पर अगर सहमती बन जाती है । बीजेपी सोचने पर मजबूर हो सकती है । यूपी में खाट सभा और रेलियो के माध्यम से चर्चा में आये प्रशांत किशोर के फार्मूले पर राहुल का फैसला जल्द आने वाला है । जिस प्रकार पीके ने यूपी में शीला दीक्षित को सीएम उम्मीदवार व् राज बब्बर को पीसीसी चीफ बनाकर यूपी कांग्रेस में जान फूंकी है ।उसी पर चलते म प्र में भी यह प्रोयोग किया जा रहा है। जिस पर अब मध्य प्रदेश की राजनीतीक सरगर्मी तेज होती दिखाई दे रही है । जिसके चलते प्रदेश कांग्रेस के कई नेताओ ने आल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सामने अपनी उपस्तिथि दिखाने के लिए प्रदेश में गुट बाजी को हवा देना शुरू कर दी है । प्रदेश में जोड़ तोड़ की राजनीती शुरू हो गई है । वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव और गोविन्द सिंह को सिंधिया सक्रियता खल रही हे । जिसके चलते मिडिया में सिंधिया के खिलाफ बयान बाजी तेज हो गयी है । प्रदेश कांग्रेस में फि़लहाल कुछ भी ठीक नही चल रहा है । कांग्रेस आईटी सेल के 6 कार्यकर्ताओ ने अरुण यादव से नाराज होकर पार्टी पद से स्तीफा दे दिया है बताया जा रहा है को अरुण यादव ने अपने समर्थको को ही दिल्ली आईटी सेल की मीटिंग में भेज कर प्रदेश में सिर्फ अरुण यादव सक्रीय हे जेसी वाह वाही लूटने के प्रयास से यह किया है जिससे नाराज कार्यकर्ताओ ने ये कदम उठाया है । एक गुमनाम पत्र सोशल मिडिया पर वायरल किया अरुण यादव द्वारा कार्यकर्ता को प्रदेश के अन्य नेताओ का प्रचार करने पर रोक टोक की जा रही है । जिसके कारन अब कांग्रेस आईटीसेल भी भिखर चूकी है । सूत्रो से प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल में अरुण यादव की समर्थक विभा बिंदु डोंगरे ने सोशल मिडिया पर समर्थक एक गुमनाम पत्र सोशल मिडिया पर वायरल किया जिसमे कमलनाथ दिग्विजय और सिंधिया के नाम देकर प्रदेश में पार्टी की बैठको में शामिल नहीं होने की बात कही गयी साथ साथ अरुण यादव के प्रति आम जन से सहानुभूति प्राप्त करने के लिए प्रदेश के वरिष्ठ नेताओ पर तंज कसते हुवे उन्हें बदनाम करने की भी कोशिश की गयी । शुरू कर दिए राजनितीक गणित प्रदेश में जब से सिंधिया के सीएम उम्मुद्वार की खबर बहार आई है प्रदेश के नेताओ ने अपने अपने स्तर से अपने राजनितीक गणित बेठने शुरू कर दिए है । जीतू पटवारी सज्जन सिंह वर्मा और अब विवेक त्नख्या के बयांन मिडिया में आने के बाद से स्पष्ट रहा हे की प्रदेश में कांग्रेस के कुछ नेता अपना रुतबा बचाने के लिए बड़े नेताओ के खिलाफ केम्पनिंग शुरू कर दी है । इन सबके बिच राहुल अब प्रशांत किशोर के भरोसे प्रदेश में कांग्रेस का किला लड़ाने के लिए तैय्यर हो चुके है । अब देखाना ये ही की राहुल गांधी और प्रशांत किशोर के प्लान को प्रदेश कांग्रेस के छुटभैया नेता अपनी साख बचाने के लिए रोकने में कामयाब हो पाते है की नही । राजनितिक विश्लेषकों का मानना है की दीवाली तक पीसीसी में बदलाव हो जाना चाहिए । कुछ विद्वानों के अनुसार यूपी चुनाव हे इसलिए यादव को अभी बनाये रखेगे । दमदार और प्रभावशाली नेता को पीसीसी का चेहरा मगर राजनीतक दृष्टिकोण कहता हे की अरुण यादव की यादव वोट पर भी प्रभाव नही है । घोडा डोंगरी उप चुनाव में 20 हजार यादव वोट थे मगर यादव उन्हें भी नहीं साध पाये । तो यूपी चुनाव के लिए उनकी उपयोगिता के कोई मायने नहीं है । नहीं उनसे यूपी में किसी प्रकार का पार्टी को लाभ हुवा है । इसके उलट प्रदेश में गुडबाजी को हवा देने में अधिक कामयाब नजर आये यादव ।इन सब विवादों और रिपोर्ट के बाद अब पार्टी एक दमदार और प्रभावशाली नेता को पीसीसी का चेहरा बनाने जा रही है । जिससे प्रदेश में 2018 में कांग्रेस का क्या भविष्य होगा तय हो जायेगा।

ब्रिक्स की अहमियत और अंतर्विरोध

डॉ. अरूण जैन
भारत ने न सिर्फ विश्व मंच पर अपनी मजबूत स्थिति दर्ज करवाई है, बल्कि वैश्विक संगठनों में उसकी भूमिका और प्रभाव में वृद्धि हुई है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में भारत ने न सिर्फ विश्व मंच पर अपनी मजबूत स्थिति दर्ज करवाई है, बल्कि वैश्विक संगठनों में उसकी भूमिका और प्रभाव में वृद्धि हुई है। यह बात ब्रिक्स के परिप्रेक्ष्य में भी लागू होती है। आगामी पंद्रह-सोलह अक्टूबर को भारत की अध्यक्षता में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का गोवा में आयोजन वैश्विक स्तर पर भारत के बढ़ते कूटनीतिक प्रभाव को ही प्रतिबिंबित करता है। उड़ी हमले के बाद ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ से जहां भारत की ‘सॉफ्ट स्टेट’ (नरम राज्य) की छवि परिवर्तित हुई है, वहीं ब्रिक्स में भी आतंकवाद के मुद््दे पर गंभीर विमर्श संभावित है। पाकिस्तान की पहले से ही अंतरराष्ट्रीय घेराबंदी हो चुकी है। भारत गोवा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भी पाकिस्तान को कड़ा कूटनीतिक जवाब देगा। विश्व-व्यवस्था को बहुध्रुवीय बनाने के लिए प्रमुख गैर-पश्चिमी राष्ट्रों में एकजुटता की भावना प्रबल हुई है। चीन जहां आर्थिक व सैनिक दृष्टि से अमेरिका की बराबरी में आने की राह पर है, वहीं पुतिन के नेतृत्व में रूस अपना खोया हुआ गौरव पाने को लालायित है। दक्षिण एशिया में एक सैनिक एवं आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारत की पहचान भी असंदिग्ध है। लातिन अमेरिकी राष्ट्रों में जहां अमेरिका-विरोधी स्वर तेज हुए हैं, वहीं इन राष्ट्रों के बीच उभरती अर्थव्यवस्था वाले ब्राजील की स्वीकार्यता बढ़ी है। अफ्रीका महाद्वीप के देशों में दक्षिण अफ्रीका अपनी नई पहचान बना रहा है। विश्व की इन्हीं उभरती आर्थिक शक्तियों- ब्राजील, रूस, भारत व दक्षिण अफ्रीका- की सदस्यता वाले अंतरराष्ट्रीय समूह ‘ब्रिक्स’ की प्रगति को वैश्विक शक्ति संतुलन के अंतर्गत महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है। ब्रिक्स की संकल्पना सर्वप्रथम गोल्डमैन सैश बैंक के अर्थशास्त्रियों द्वारा वर्तमान शताब्दी के प्रारंभ में आगामी अर्द्धशताब्दी में वैश्विक आर्थिक प्रवृत्तियों के अध्ययन के संदर्भ में प्रस्तुत की गई थी। वर्ष 2003 में इस निवेश बैंक के अर्थशास्त्री जिम ओ’ नील द्वारा प्रस्तुत थीसिस ‘ड्रमिंग विद ब्रिक्स: द पाथ टू 2050’ में कहा गया था कि ब्राजील, रूस, भारत व चीन की संभाव्य आर्थिक क्षमता इतनी अधिक है कि ये चारों वर्ष 2050 तक विश्व की सर्वाधिक प्रभुत्वशाली अर्थव्यवस्थाओं वाले देश बन सकते हैं।ब्रिक्स दुनिया की पांच उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। एक समूह के रूप में इसकी स्थापना वर्ष 2009 में हुई थी। तब इसमें चार ही देश- ब्राजील, रूस, भारत और चीन- शामिल थे और इसे ‘ब्रिक’ नाम दिया गया था। यह वह समय था जब पूरा विश्व आर्थिक मंदी से जूझ रहा था। इस काल में जहां विश्व के सभी बड़े देश वित्तीय संकट से ग्रस्त थे, वहीं ब्राजील, रूस, भारत व चीन जैसे देश न सिर्फ इस वैश्विक समस्या से अछूते रहे बल्कि एक नए आर्थिक संगठन की स्थापना भी कर दी। अप्रैल 2011 में चीन में इस संगठन का तीसरा सम्मेलन हुआ, जिसमें दक्षिण अफ्रीका को औपचारिक रूप से संगठन का सदस्य बनाया गया और यह ‘ब्रिक’ से ‘ब्रिक्स’ हो गया। ऐसा माना जा रहा है कि वर्ष 2050 तक ब्रिक्स के सदस्य-देश विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के रूप में जाने जाएंगे। आज विश्व की तैंतालीस प्रतिशत जनसंख्या व कुल वैश्विक जीडीपी में अठारह प्रतिशत हिस्सेदारी वाला यह समूह तेजी से उभर रही अर्थव्यवस्थाओं वाला समूह है। भारत को पंद्रह फरवरी को रूस से इसकी अध्यक्षता मिली थी। भारत इकतीस दिसंबर 2016 तक ब्रिक्स का अध्यक्ष रहेगा। भारत की अध्यक्षता में आयोजित होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का ध्येय-वाक्य होगा- ‘उत्तरदायी, समावेशी व सामूहिक समाधान विकसित करना’। भारत अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता के दौरान पंचमुखी दृष्टिकोण अपनाएगा। प्रथम, ब्रिक्स सहयोग को प्रगाढ़ बनाने तथा इसे बरकरार रखने के लिए संस्थागत व्यवस्था करना। दूसरा, पूर्व शिखर सम्मेलनों में लिए गए निर्णयों का कार्यान्वयन। तीसरा, मौजूदा सहयोग तंत्रों का एकीकरण। चौथा, नवाचार अर्थात स्तरीय नए सहयोग तंत्र विकसित करना। और पांचवां, निरंतरता अर्थात परस्पर सम्मत मौजूदा ब्रिक्स सहयोग तंत्रों को जारी रखना।  भारत की अध्यक्षता में होने वाले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का फोकस ब्रिक्स के सदस्य-राष्ट्रों के लोगों विशेषत: युवाओं के बीच आपसी संपर्क बढ़ाने पर केंद्रित होगा। इस संदर्भ मेंअंडर-17 फुटबॉल टूर्नामेंट, युवा शिखर सम्मेलन, मैत्री शहर कॉनक्लेव: युवा राजनयिक मंच, फिल्म महोत्सव जैसे कार्यकलापों का आयोजन किया जा रहा है। विदेशमंत्री सुषमा स्वराज के अनुसार ब्रिक्स की अध्यक्षता के दौरान मंत्री, आधिकारिक, तकनीकी और ट्रैक-2 स्तर की पचास से अधिक बैठकें आयोजित की गर्इं। उन्होंने कहा कि ब्रिक्स की अध्यक्षता के लिए भारत का विषय ‘बिल्डिंग रिस्पांसिव, इनक्लूसिव एंड कलेक्टिव सॉल्यूशंस’ (ब्रिक्स) है। ब्रिक्स नेताओं ने 4 सितंबर 2016 को हांगझाऊ में जी-20 शिखर सम्मेलन के बाद मुलाकात की। नेताओं ने वैश्विक राजनीति, सुरक्षा, आर्थिक और वैश्विक शासन और आपसी हितों के महत्त्वपूर्ण मुद््दों पर विस्तृत विचार-विमर्श किया। इसके अलावा नेताओं ने ब्रिक्स में आपसी व्यापार, पर्यटन और यात्रा संबंधों को मजबूत बनाने पर भी विचार किया। साथ ही ब्रिक्स के नेताओं ने भारत की ब्रिक्स की अध्यक्षता और कार्यान्वयन की अच्छी गति तथा भारत की अध्यक्षता में भारत के शहरों व प्रांतों में आयोजनों के माध्यम से ब्रिक्स में लोगों के बीच आदान-प्रदान के सुदृढ़ीकरण सहित ब्रिक्स सहयोग एजेंडे के विस्तार की सराहना की। सूचना तकनीक, अंतरिक्ष अनुसंधान, सामरिक तथा परमाणु क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां हासिल कर भारत ने अपनी महत्त्वपूर्ण स्थिति बनाई है। वैश्विक मंदी में जब अमेरिका जैसे देशों की आर्थिक संस्थाएं दिवालिया हो रही थीं, तब भी भारत के वाणिज्यिक संस्थान पूरी गति से काम कर रहे थे। इस अवधि में देश की विकास दर की गति थोड़ी धीमी जरूर पड़ी, पर आज हम पुन: नौ-दस फीसद की विकास दर प्राप्त करने की ओर अग्रसर हैं। वर्तमान में विश्व के तीस तेजी से विकसित होते शहरों में से दस शहर भारत में हैं। भारत से जुड़ी ये स्थितियां ब्रिक्स के लिए लाभप्रद हैं। ब्रिक्स के संदर्भ में भारत के अन्य सदस्य देशों से द्विपक्षीय संबंध को देखें तो भारत और ब्राजील के मध्य अस्सी लाख डॉलर का वार्षिक व्यापार होता है। कुछ समय पहले भारत तथा ब्राजील के मध्य सूचना प्रौद्योगिकी, नैनो प्रौद्योगिकी, शिक्षा तथा द्विपक्षीय व्यापार के क्षेत्र में समझौते हुए हैं, जिससे दोनों देश लाभान्वित हुए हैं। इसी प्रकार ब्रिक्स का नया सदस्य दक्षिण अफ्रीका भी भारत का प्रमुख वाणिज्यिक सहयोगी है। जहां तक चीन का प्रश्न है, भारत तथा चीन के बीच लगभग तीन सौ वस्तुओं का व्यापार होता है। दक्षिण एशिया में दोनों देशों की स्थिति बराबर मजबूत हुई है और इसी कारण दोनों कई मायनों में प्रतिस्पर्धी भी हैं। सीमा संबंधी विवाद, पाकिस्तान से चीन की मित्रता तथा रूस और अमेरिका से भारत की मित्रता आदि कुछ ऐसी स्थितियां हैं जिनके कारण भारत और चीन के मध्य विश्वास का रिश्ता कायम नहीं हो पा रहा है। फिर भी दोनों देश व्यापारिक हितों को लेकर सजग हैं और इस पर किसी भी प्रकार की आंच नहीं आने दे रहे हैं। रूस के साथ तो हमारे संबंध जगजाहिर हैं। इससे दोनों देशों के बीच लाभकारी स्थितियां निर्मित हो रही हैं। ब्रिक्स के गोवा शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजरें टिकी हुई हैं। इसके कई कारण हैं। सकल राष्ट्रीय उत्पाद की दृष्टि से भारत ब्रिक्स-सदस्यों में दूसरे स्थान पर है, जबकि चीन प्रथम स्थान पर। रूस जहां क्षेत्रफल की दृष्टि से विश्व में प्रथम स्थान पर है, वहीं जनसंख्या की दृष्टि से चीन और भारत क्रमश: पहले और दूसरे स्थान पर हैं। ब्रिक्स देशों की सामूहिक शक्ति सदस्य-राष्ट्रों की अपनी-अपनी क्षमता का परिणाम है। सदस्य देशों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इनकी अर्थव्यवस्थाएं एक दूसरे की पूरक हैं। जहां भारत और चीन ऊर्जा के सबसे बड़े उपभोक्ता देश हैं, वहीं रूस व ब्राजील ऊर्जा के सबसे बड़े उत्पादक राष्ट्र हैं। ब्राजील व रूस जहां खनिज और कच्चे माल के संदर्भ में समृद्ध हैं, वहीं चीन और भारत सेवा तथा विनिर्माण क्षेत्र में आगे हैं। भारत और ब्राजील जहां कृषि उत्पादन में अग्रणी राष्ट्र हैं, वहीं रूस तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन में अग्रणी है। ये सारी बातें ब्रिक्स के उज्ज्वल भविष्य की ओर संकेत कर रही हैं। यहां यह बताना भी महत्त्वपूर्ण होगा कि ब्रिक्स देशों की सम्मिलित जनसंख्या विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग चौवालीस प्रतिशत है। ब्रिक्स देशों का कुल क्षेत्रफल विश्व का छब्बीस प्रतिशत है। विश्व के कुल जीडीपी में लगभग बीस प्रतिशत भागीदारी ब्रिक्स देशों की है तथा वर्ष 2020 तक इनका कुल जीडीपी पचास खरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। ब्रिक्स ने अपने दो नए वित्तीय संस्थानों ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ व ‘आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था’ को आकार देना शुरू कर दिया है। न्यू डेवलपमेंट बैंक का मुख्यालय शंघाई में स्थापित किया जा चुका है, जिसका प्रथम अध्यक्ष बनने का गौरव प्रख्यात बैंकर केवी कामथ को प्राप्त हुआ है। आपसी सामंजस्य ब्रिक्स के स्वर्णिम भविष्य की ओर संकेत करता है। ब्रिक्स के सभी पांच सदस्य-देश जी-20 के भी सदस्य हैं और वैश्विक आर्थिक मंदी के प्रभावों को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ब्रिक्स के सदस्य राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय मुद्र्राकोष तथा विश्व बैंक में भी लोकतंत्रीकरण के लिए प्रतिबद्ध हैं। पर ब्रिक्स के कुछ अंतर्विरोध भी हैं, जो इसे राजनीतिक व कूटनीतिक रूप से कमजोर करते हैं। भारत-चीन के बीच सीमा विवाद व पाकिस्तान के आतंकवाद के प्रति चीन का दोहरा रवैया तथा रूस-चीन के बीच विभिन्न मुद््दों पर मतभेद ब्रिक्स के भविष्य को प्रभावित कर सकते हैं।

संघ मुक्त भारत का आह्वान दिवास्वप्न है

डॉ. अरूण जैन
प्रधानमंत्री मोदी ने जब से कांग्रेस मुक्त भारत का नारा दिया, बिहार के मुख्यमंत्री और मोदी के धुर विरोधी नीतीश कुमार ने भी राग अलापा संघ मुक्त भारत का। साथ ही जोड़ दिया नशा मुक्त बिहार। अब नीतीश कुमार जी से कोई पूछे कि नशा मुक्त बिहार बनाने के चक्कर में उन्होंने बिहार में शराब पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया, हजारों करोड़ की राजस्व की हानि तो हुई ही साथ ही बिहार में जहां अधिकांश लोग पान, तम्बाकू, बीड़ी व चबाने वाले तम्बाकू के बिना रह ही नहीं सकते वहां शराब बन्दी का क्या और कितना फायदा होगा। एक सूचना के अनुसार बिहार में शराब बन्दी के बाद से ही ड्रग्स व अन्य प्रकार के नशे का अवैध कारोबार खूब फलफूल रहा है। हो सकता है कि इसमें सरकार में सम्मिलित सफेदपोश लोग भी शामिल हों किन्तु कहा तो यही जायेगा कि कुएं से निकले, खाई में गिरे। खैर, अब मूल विशय पर आते हैं। सन् 1925 में जब डॉ. केशव बलिराव हेडगेवार ने विजयदशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की थी, तब से लेकर अब तक संघ की इतनी शाखाएं हो गयी हैं कि एक विशाल वट वृक्ष की तरह कौन सी मूल शाखा है, पहचानना ही मुश्किल है। संघ मूलत: एक सामाजिक संघटन है जिसमें सदस्य स्वयं की प्रेरणा से बनते हैं, किसी प्रलोभन अथवा लालच के कारण नहीं। एक बार संघ की शाखा में जाकर ध्वज प्रणाम करके कोई भी स्वयंसेवक बन सकता है, बशर्ते वो भारत माता से प्रेम करता हो, भारत माता की जय और वन्दे मातरम बोलता हो, आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त न हो और समाज सेवा की भावना से ओतप्रोत हो। संघ मुक्त भारत की परिकल्पना करना ही ऐसा कार्य है मानो दिन में जागते हुए स्वप्न देखना। संघ भारत की आत्मा है, कोई भी कैसे आत्मा को शरीर से अलग करने की सोच सकता है। संघ आत्मा है और भारत शरीर है, जब आत्मा शरीर से पृथक होती है तो निष्प्राण शरीर रह जाता है। भारत में शिक्षा के क्षेत्र में अनेकों शिक्षाविद् संघ से जुड़े हैं अथवा संघ ने दिये हैं। अनेकों वरिष्ठ चिकित्सक, अभियन्ता, अधिवक्ता, न्यायाधीश, समाज सुधारक, चिन्तक, विचारक, सैनिक, मजदूर और भारत के सभी वर्गों में, सभी प्रकार की विधाओं में संघ के स्वयंसेवक हैं और अपना कार्य पूरी निष्ठा के साथ कर रहे हैं। जब भी देश में कोई दैवीय आपदा अथवा दुर्घटना की स्थिति होती है, सर्वप्रथम संघ का स्वयंसेवक तैयार होता है सहायता के लिये। चाहे उत्तराखण्ड की आपदा हो, भूकम्प हो, बाढ़ हो, संघ सदैव सहायता के लिये सर्वप्रथम आगे आया। देश ही नहीं विदेशों में भी संघ विभिन्न नामों से सेवा के कार्य कर रहा है। इस देश को दो ऊर्जावान प्रधानमंत्री संघ की ही देन है, दर्जनों मुख्यमंत्री, राज्यपाल व मंत्री प्रत्यक्ष रूप से संघ से जुड़े हैं। इन सबकी प्राथमिक पाठशाला संघ की शाखा है। संघ मात्र एक संघटन का नाम ही नहीं अपितु भारत का तंत्रिका तंत्र है।  संघ का मानना है कि देश मात्र कानूनों से नहीं चलता, देश को चलाने के लिये संस्कारों की आवश्यकता होती है और संस्कार देश के प्रत्येक देशवासी में होना आवश्यक है। संस्कार धर्म से आते हैं, धर्म मानव की जीवन पद्धति का द्योतक होता है। संघ के प्रचारक व मनीशी स्व. पं. दीनदयाल उपाध्याय के अनुसार प्रत्येक मानव जीवन को पेट भरने के लिये अन्न, मस्तिष्क के लिये विचार व शरीर के लिये वस्त्रों की आवश्यकता होती है। इन सबकी भरपाई व्यक्ति कुसंस्कारों के द्वारा भी कर सकता है अर्थात छीन कर खाना, मस्तिष्क में कुविचारों का होना तथा संस्कारहीन वस्त्रों का प्रयोग। इसके विपरीत यदि कोई जीवन के चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को अपने जीवन का आधार मान कर जीवन यापन करना सीख ले तो उसके जीवन में कभी भी कोई कमी नहीं आ सकती, इसी मार्ग से उसकी आत्मा को संस्कार, पेट को भोजन व मस्तिष्क को विचार मिल सकेंगे। इसके विपरीत यदि व्यक्ति कामनाओं के वशीभूत होकर काम, क्रोध, लोभ व मोह के प्रति आसक्त हो जाये तो जीवन के साथ संस्कारों का नष्ट होना निश्चित है। प्रत्येक कर्म का आधार धर्म ही होना चाहिये तभी संस्कार जीवित रहेंगे तथा मानव जीवन परहित के काम आ सकता है। किन्तु संघ रहित भारत की परिकल्पना करने वाले नीतीश कुमार सम्भवत: अल्पज्ञानी होने के साथ राजनीति के भी कच्चे खिलाड़ी ही साबित होन के कगार पर हैं। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबन्ध लगा, इन्दिरा गांधी ने आपातकाल में संघ पर प्रतिबंध लगाया, रामजन्म भूमि आन्दोलन में संघ पर प्रतिबन्ध लगा किन्तु प्रत्येक बार संघ नई ऊर्जा, नई ताकत के साथ उभरा और संघ विरोधियों को मुंह की खानी पड़ी, यही हश्र नीतीश कुमार का भी होगा।

विश्व भर के सैलानियों को आकर्षित करता है ज्यूरिख


डॉ. अरूण जैन
कुदरत ने ज्यूरिख को प्राकृतिक सौंदर्य का वरदान तो दिया ही है, साथ ही यहां के रखरखाव व पर्यटकों की सुविधा के लिए कुशल प्रबंधन का योगदान भी कम नहीं है। तभी तो स्विट्जरलैंड का यह शहर विश्व भर के सैलानियों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है तथा पर्यटन यहां एक उद्योग की तरह फलफूल रहा है। यहां का मुख्य आकर्षण ज्यूरिख झील है। यहां तक आने के लिए आप नदी मार्ग का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। नदी के किनारे खरीदारी के लिए बड़ी-बड़ी दुकानें, खाने-पीने के लिए रेस्तरां तथा रहने के लिए होटल और दूसरे किनारे पर मछुआरों के साफ-सुथरे रंगरोगन किए घर भी हैं। नदी में पारदर्शी छतों व दीवारों वाली तैरती नावें पर्यटकों को घुमाती हैं व गाइड शहर का इतिहास बताता है।  शॉपिंग माल के बाद सबसे अधिक पर्यटक झील पर ही दिखाई देते हैं। यह यहां की तीसरी सबसे बड़ी झील है। इसमें बत्तखें तथा जलमुर्गियां अठखेलियां करती रहती हैं। कितना भी समय झील के किनारे बिताओ, प्राकृतिक सौंदर्य देखकर मन ही नहीं भरता। पर्यटकों को चाहे ज्यूरिख के आसपास के शहरों की यात्रा करनी हो या आल्पस की बर्फ से ढकी चोटियों को करीब से देखना हो या इंटरलेकन के प्राकृतिक सौंदर्य का दर्शन करना हो अथवा फिर जुंगफ्रा की घाटियों के ऊपर हवा में तैरती ट्रालियों में सैर करनी हो, हर जगह के लिए तीव्र व सुविधाजनक तथा आरामदेह लेकिन महंगी रेल सेवा उपलब्ध है। ज्यूरिख से लूसर्न तक का मार्ग बेहद सुंदर है। स्विट्जरलैंड में किसी भी पहाड़ की चोटी तक जाना हो, किसी भी शहर में पहुंचना हो तो यातायात के साधन उपलब्ध हैं, जोकि आरामदायक और तेज हैं। कहीं भी पैदल आने-जाने में समय बरबाद करने की आपको जरूरत नहीं पड़ेगी। पितालुस पर्वत की चोटियों के नीचे खुले मुंह वाली गुफाएं बनी हुई हैं। यहां से चारों ओर का सुंदर दृश्य देखा जा सकता है।  स्विट्जरलैंड में पर्यटन का विस्तार एक फलते−फूलते उद्योग की तरह हुआ है जो दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रहा है। हर होटल और टूरिस्ट सेंटर पर रंग-बिरंगे ब्रोशर और नक्शे पर्याप्त मात्रा में मिलते हैं तथा पहाड़ की चोटी तक पहुंचाने के लिए यातायात के साधन उपलब्ध हैं। समूचे यूरोप में हर सार्वजनिक स्थान पर चाहे वह स्टेशन हो या पार्क, पहाड़ हो या रेस्तरां, साफ-सुथरे सुलभ शौचालयों की व्यवस्था है। प्राकृतिक सौंदर्य की छवि को बनाए रखने में यहां के निवासियों का कम योगदान नहीं है। इस शहर में होटलों की अच्छी भरमार है। पांच सितारा से लेकर एक सितारा तक और अपार्टमेंट होटल से लेकर बोर्डिंग हाऊस तक यहां आसानी से उपलब्ध हैं। इन होटलों में आरक्षण करवा कर स्विट्जरलैंड आना सुविधाजनक रहता है।

विकास का पैमाना क्या हो

डॉ. अरूण जैन
केंद्र सरकार हो या राज्य सरकारें, आजकल सभी विकास का राग अलाप रही हैं। लेकिन इस विकास का लाभ आम आदमी को कितना मिल रहा है यह विचारणीय विषय है। विकास का पैमाना क्या हो? यह शुरू से ही विवाद का विषय रहा है। पर आज देश या प्रदेश के विकास का पता उस देश या प्रदेश की दौलत, उसके लोगों की खुशहाली और अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी हैसियत से चलता है। कोई देश या प्रदेश कितना दौलतमंद है, इसका पता उसके कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी), भुगतानों की बकाया रकम, विदेशी-विनियिम-मुद्रा की सुरक्षित निधि, आर्थिक विकास की दर और प्रतिव्यक्ति आय से भी चलता है। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उसकी हिस्सेदारी और इन दोनों क्षेत्रों में उसके विकास की दर भी यह संकेत देती है कि उसकी आर्थिक स्थिति कितनी मजबूत है और उसमें कमाई हुई दौलत को संभाले रखने और उसे लगातार बढ़ाते रहने की सामर्थ्य है या नहीं। ये आर्थिक संकेत वैसे अपने आप में काफी अहमियत रखते हैं, लेकिन ये काफी कुछ छिपा जाते हैं, जैसे देश या प्रदेश के आम आदमी की दशा और बेरोजगारी का इन संकेतकों से कुछ पता नहीं चलता है। ‘प्रतिव्यक्ति आय’ लोगों की औसत आय को बताती है। लेकिन वह यह नहीं बताती कि हर देशवासी के पास उतना धन है। इसका आंकड़ा अमीरों और गरीबों, दोनों की आमदनियों के औसत से निकाला जाता है। इससे यह भी नहीं पता चलता कि किसी एक देश या एक राज्य या एक क्षेत्र की खुशहाली दूसरे देशों की तुलना के लिए एक जैसी है। आजकल एक नया मानदंड अपनाया जाने लगा है। खरीद-क्षमता में समानता। इस कार्य के लिए कई इससे भी ज्यादा पेचीदा तरीके अपनाए जाने लगे हैं। पर ये सब मिल कर भी आम आदमी के दैनिक जीवन के चंद पहलुओं को ही दर्शा पाते हैं। ये आंकड़े इस बात पर बिल्कुल प्रकाश नहीं डालते कि लोगों ने जो जीवन-स्तर प्राप्त कर लिया है, उसे वे बनाए रख सकते हैं या नहीं। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश में जहां मजदूरों, किसानों, बुनकरों और तमाम छोटे-मोटे कारीगरों की संख्या कुल जनसंख्या का दो तिहाई से भी अधिक हो, वहां जीडीपी या प्रतिव्यक्ति आय के पैमाने से उनकी दशा को नहीं जाना जा सकता है। इस बहुसंख्यक आबादी के जीवन से जुड़े मुद््दों की पहचान करने के लिए जो मानदंड अपनाए जा सकते हैं वे हैं- इन लोगों को किस प्रकार का भोजन मिलता है और उसकी पौष्टिकता की स्थिति क्या है? शिशुओं की मृत्यु दर, पीने के पानी की सुलभता और गुणवत्ता, रहने की जगह, लोगों के आवासों की श्रेणियां, रोग के आक्रमण उसके दुष्प्रभाव, असमर्थताएं और गड़बडिय़ां, चिकित्सा सुविधाओं की सुलभता, साक्षरता, प्राथमिक स्कूलों की संख्या और पढ़ाई का स्तर, आवागमन की सुविधा, बिजली की उपलब्धता और तेजी से बदलते आर्थिक माहौल में समाज की मांगों के हिसाब से युवाओं को तरह-तरह के कारीगरी व हुनर को सिखाने और प्रशिक्षित करने के केंद्रों की संख्या बेरोजगारी की तुलना में कितनी है। आम जनता के जीवन में सुधार लाने के लिए जरूरी कई और सुझावों का जिक्र भी किया जा सकता है। महात्मा गांधी का कहना था कि देश के लिए किए गए हर काम की कसौटी यह होनी चाहिए कि उसके द्वारा सबसे गरीब और पिछड़े आदमी की आंखों के आंसू पोंछे जा सकते हैं या नहीं। उनका मानना था कि जब ऐसा दिन आएगा तभी यह माना जाएगा कि हमारा राष्ट्र सुखी राष्ट्र हो गया है। गरीबी, बेरोजगारी, बीमारी, अज्ञान के निराकरण के साथ-साथ जब तक हर नागरिक को आगे बढऩे का अवसर नहीं मिलेगा तब तक देश की प्रगति अवरुद्ध रहेगी। पर सामाजिक और आर्थिक विकास को देखें तो बड़ी भयानक तस्वीर सामने आएगी। जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हो रही है, बेरोजगारी और गरीबी बढ़ रही है। देश की एक चौथाई जनता गरीबी रेखा के नीचे है। भोजन, वस्त्र के अलावा पेयजल, मनुष्य के रहने लायक मकान, चिकित्सा सेवा, आवागमन की सामान्य सुविधा जैसी न्यूनतम आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं। अब सवाल यह उठता है कि प्रचलित लोकतांत्रिक प्रक्रिया से क्या यह तस्वीर बुनियादी रूप से बदल सकती है। क्या केंद्र और राज्य सरकारें इसके लिए कोई ठोस उपाय कर रही हैं। हमारी संवैधानिक व्यवस्था के अनुसार, जनकल्याण के लिए तमाम योजनाओं के मद में केंद्र सरकार राज्य सरकारों को सिर्फ धन मुहैया कराती है। इन योजनाओं को लागू करने का जिम्मा राज्य सरकारों का है। लेकिन इन योजनाओं का लाभ वास्तविक जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पा रहा है। कई राज्यों में इस कदर लूट चल रही है लोकतांत्रिक सत्ता का मतलब ही हो गया है अपना और अपने लोगों को दौलतमंद बनाना। उनकी दौलत तो दिन दूनी रात चौगुनी की रफ्तार से बढ़ जाती है, पर आम जनता गरीबी व बेबसी में पिसती रहती है। आखिर हमारी प्रचलित व्यवस्था और उसका दर्शन क्या है? यह एक बुनियादी सवाल है, क्योंकि पहली बात यह है कि क्या कोई प्रचलित व्यवस्था भी है? देश की पैंसठ फीसद आबादी गांवों में रहती है और पैंतीस फीसद शहरों में। इस पैंतीस फीसद का एक तिहाई हिस्सा औद्योगिक मजदूर है और कुछ चौथे या तीसरे वर्ग के कर्मचारी हैं। इसके अलावा छोटे-मोटे कारोबारी और उनसे जुड़े हुए लोग हैं। इनमें टैक्सी, टैम्पो और रिक्शाचालक आदि हैं। शहरी क्षेत्रों में भी गरीबी और गंदगी है, गंदी बस्तियां हैं, फिर भी गांव से शहर की ओर लगातार पलायन हो रहा है। इस आबादी के एक छोटे-से हिस्से को वहां रोजगार मिल जाता है। शहरों की ओर ग्रामीण आबादी के पलायन की प्रमुख वजह यही है। शहरों में एक छोटा-सा हिस्सा पाश्चात्य रहन-सहन की दृष्टि से काफी सुखी है। इनमें सरकारी अधिकारी, कर्मचारी और विश्वविद्यालयों, विद्यालयों के शिक्षक, कर्मचारी, कुछ व्यापारी और उद्यमी भी शामिल हैं। राजधानियों में सरकारी अधिकारी और मंत्री भी रहते हैं। इसलिए अगर कोई व्यवस्था है तो वह इन्हीं लोगों से बनी है, जिनका हर दस साल बाद वेतन लगभग दोगुना हो जाता है। सांसद और विधायक तो खुद अपना वेतन-भत्ता मनमाने ढंग से बढ़ा लेते हैं। इस व्यवस्था का दर्शन शिक्षित और आर्थिक दृष्टि से संपन्न वर्ग का दर्शन है। ग्रामीण क्षेत्रों का भी जो विशिष्ट वर्ग है वह लगातार शहरी क्षेत्रों की ओर खिंचा जा रहा है। इस व्यवस्था का दर्शन यही है कि जितना हमारे पास हो, उससे हम ऊपर उठें। परिवर्तनकारी जमातों का कहना है कि जो उपलब्ध है, वह और भी अधिक लोगों को उपलब्ध कराया जाए अर्थात लाभों का वितरण हो। सारी राजनीति, सारे विशेषाधिकार एक छोटे तबके तक सीमित है। यह आवश्यक नहीं है कि ये सभी पूंजीपति हों। पर सबके सब विशेषाधिकार-युक्त हैं और सार्वजनिक क्षेत्र ही औद्योगिक संरचना का सबसे बड़ा हिस्सा है। देश का विशिष्ट वर्ग चाहता है कि तकनीक और भी अधिक आधुनिक हो, औद्योगीकरण बढ़े तथा कृषि का अधिक से अधिक यंत्रीकरण हो। आज भारत की आधुनिकता का मर्म यही है। गांधीजी की कल्पना इससे बिल्कुल भिन्न थी। पर जवाहरलाल नेहरू के जमाने में इन्हीं विद्वानों ने या इनके ही जैसे विद्वानों ने गांधीजी के मार्ग को दकियानूस माना और जवाहरलाल की आधुनिक दृष्टि के प्रशंसक बने रहे। परिणाम सामने है। गरीबी बढ़ती जा रही है। अगर वास्तविक आकलन हो तो कम से कम चालीस प्रतिशत जनता आज भी गरीबी रेखा के नीचे जी रही है। बेकारी भी बढ़ती जा रही है। साथ-साथ विषमता भी कम होने के बदले बढ़ ही रही है। इसीलिए अब सबका ध्यान फिर से गांधीजी के विचारों की ओर जाने लगा है। उच्च वर्ग के बहुत-से विद्वानों को भी ऐसा महसूस होने लगा है कि गांधीजी के दिखाए रास्ते को छोड़ कर भारत ने बहुत गलती की है। अत: ये सब लोग भी गांधीजी की विचारधारा से मिलते-जुलते विचार रखने लगे हैं। जैसे कि कृषि-विकास हमारी विकास योजना का मुख्य आधार बनना चाहिए। इसकी बुनियाद पर ही गृह उद्योगों और ग्रामोद्योगों की एक रूपरेखा गांवों के विकास के लिए बनानी चाहिए। उसमें बिजली, परिवहन और बाजार आदि की सुविधाएं भी उपलब्ध कराई जाएं। बड़े उद्योगों की उपेक्षा करने की बात नहीं है, पर अपने देश में जहां पूंजी की बहुत कमी हो और मानव-शक्ति बड़े पैमाने पर बेकार पड़ी हो तथा देश की अधिकांश आबादी गांवों में बसती हो, वहां योजना की बुनियाद ही बदलनी चाहिए। मगर यह बात खासतौर पर ध्यान में रखनी चाहिए कि आज भी हमारे उच्चवर्गीय और सत्ताधारी लोग आवश्यकताओं को निरंतर बढ़ाते जाने, अधिकाधिक प्राप्त करने की होड़ में लगे रहने की ‘विकास’ और ‘प्रगति’ की पश्चिम की पुरानी अवधारणाओं पर मोहित हैं। यही वजह है कि हमारी योजनाएं तथा विकास के सारे कार्यक्रम उलटे हमारी समस्याओं को अधिक पेचीदा बना रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि सभी देशवासियों को सुरक्षित और सुखद वर्तमान तो मिले ही, बेहतर भविष्य भी मिले। यह तभी संभव है जब देश की जनता में भी अपने देश को बेहतर बनने की प्रबल भावना जगे। दुनिया के जो देश विकसित बने हैं, उसमें वहां की जनता का भी योगदान है। अमेरिका, जापान, चीन, दक्षिण कोरिया आदि देश जिस प्रकार कार्य योजना बना कर आगे बढ़े हैं, हम भी उसी प्रकार कार्य योजना बना कर और लागू करके आगे बढ़ सकते हैं।