Tuesday, 18 April 2017

हॉलीडे मनाने लंदन जाएं तो याद रखें यह कुछ बातें 


डॉ. अरूण जैन
छुट्टियां मनाने के लिए लंदन एक आदर्श शहर है। इसे बसंत ऋतु में देखने का अपना ही मजा है क्योंकि तब नर्गिस खिलकर यहां के बगीचों की सुंदरता में चार चांद लगा देते हैं। चूंकि यहां थियेटर−ऑपेरा वगैरह भी हैं इसलिए यहां समय कैसे कट जाता है पता ही नहीं चलता। लंदन शहर के मुख्यत: तीन भाग हैं− पुराना शहर, जहां पुरानी इमारतें जैसे वेस्ट मिन्स्टर जहां शाही परिवार के भवन और सरकारी कार्यालय हैं और वेस्ट एंड जहां खरीदारी के मुख्य तीन स्थान बॉन्ड स्ट्रीट, रीजेंट स्ट्रीट और ऑक्सफोर्ड स्ट्रीट हैं। जब आप वायुयान द्वारा लंदन पहुंचेंगे तो वहां के तीन हवाई अड्डों− हीथ्रो, गेटविक और स्टैन्स्टेड में से किसी एक पर उतरेंगे। हीथ्रो हवाई अड्डे से भूमिगत रेल या एयर बस द्वारा सेंट्रल लंदन पहुंच सकते हैं। ये आपको लंदन के प्रमुख होटलों वाले क्षेत्रों से होते हुए ले जाएंगे। आप अपनी वांछित जगह पर 45 से 85 मिनट के बीच पहुंच सकते हैं। गेटविक हवाई अड्डे से बाहर जाने का बेहतर साधन रेल ही है। वहां दिन में हर 15 मिनट पर और रात में हर एक घंटे पर रेलगाड़ी मिल जाएगी। इसी तरह स्टैन्स्टेड हवाई अड्डे से भी नियमित रेल सेवाएं उपलब्ध हैं। लंदन में घूमने के लिए सबसे अच्छा साधन है ट्यूब रेलवे। इसकी रेलगाडिय़ां रविवार को सुबह 7.30 से रात 11.30 बजे तक और अन्य दिन सुबह 5.30 बजे से रात 12 बजे तक थोड़े−थोड़े अंतराल पर उपलब्ध होती हैं। लंदन घूमने आए हैं तो कम से कम आप यहां चार दिन अवश्य ठहरने का कार्यक्रम बनाएं।  लंदन के प्रमुख स्थलों में बकिंघम पैलेस, कॉमनवेल्थ इंस्टीट्यूट, गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्डस, टावर ऑफ लंदन, ज्वेल हाउस, मदाम तुसाओ संग्रहालय, लंदन संग्रहालय, विक्टोरिया संग्रहालय और सेंट पाल गिरजाघर प्रमुख हैं। बंकिघम पैलेस महारानी का शाही निवास है। यहां अप्रेल से अगस्त के बीच तक ठंड के मौसम में एक दिन के अंतराल पर सवेरे 11.30 बजे महारानी के अंगरक्षकों के दल का अदलाबदली समरोह देखने लायक होता है।  टेम्स नदी के तट पर बनी किलेनुमा इमारत टावर ऑफ लंदन कहलाता है। यहां पर सेन्ट जॉन का गिरजाघर भी है। टावर के पास ही ज्वेल हाउस भी है। यह वास्तव में सोना, हीरा व जवाहरात का भंडार है। विख्यात भारतीय हीरा कोहिनूर भी यहीं पर है। फरवरी माह में ज्वेल हाउस बंद रहता है। मदाम तुसाद का संग्रहालय पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह अपनी तरह का एकमात्र संग्रहालय है। यहां विश्व के अनेक महान और विशिष्ट लोगों की मोम से बनाई मूर्तियां रखी गई हैं। इन मूर्तियों को बहुत ही सहेजकर रखा जाता है। इन्हें इतनी सफाई से बनाया जाता है कि आपको लगेगा कि यह मूर्ति अभी बोल पड़ेगी।  लंदन में स्थित सेन्ट पॉल गिरजाघर 33 सालों में बनकर तैयार हुआ था। ईसाई समुदाय के लोग रोम के सेन्ट पीटर गिरजाघर के बाद इसे संसार का दूसरा महत्वपूर्ण गिरजाघर मानते हैं। यहां सोने की अनेक मूर्तियां हैं। दीवारों पर की गई चित्रकारी में भी सोने का प्रयोग किया गया है। इनके अतिरिक्त यहां बारबिकन आर्ट सेंटर, पार्लियामेंट लंदन, डायमंड सेंटर, प्लेनिटॅरियम, टावर ब्रिज, ब्रिटिश म्यूजियम, कैबिनेट वार रूम्स, जियॉलाजिकल म्यूजियम आदि दर्शनीय स्थल भी हैं।

कुछ मुद्दों पर ठन भी सकती है मोदी-ट्रंप के बीच


डॉ. अरूण जैन
अमेरिका के नये राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच अच्छा संवाद कायम हो गया है। वे दोनों दो बार फोन पर बात कर चुके हैं और अपने चुनाव-अभियान के दौरान हजारों प्रवासियों भारतीयों के बीच ट्रंप कह चुके हैं कि 'आई लव हिंदू एंड इंडियाÓ। इसके अलावा चार-पांच भारतीय मूल के लोगों को उन्होंने अपने प्रशासन में काफी जिम्मेदारी के पद भी दे दिए हैं। ट्रंप अपने मन की बात बिना लाग-लपेट के कहने के लिए विख्यात हो चुके हैं। उन्होंने कई देशों के बारे में काफी सख्त टिप्पणियां भी की हैं लेकिन भारत के विरुद्ध उन्होंने अभी तक एक शब्द भी नहीं बोला है। उनके चुनाव के दौरान भारतीय मूल के कई लोगों ने उनका डटकर समर्थन भी किया था। इन सब तथ्यों को देखते हुए ऐसा लगता है कि ट्रंप के अमेरिका के साथ भारत के संबंध ओबामा के अमेरिका से भी ज्यादा गहरे हो सकते हैं। गहरे का मतलब क्या? यही कि ओबामा के दौरान दोनों देशों के बीच जो समझौते हुए हैं (उनमें से ज्यादातर अभी तक अधर में लटके हुए हैं), उन्हें अमली जामा पहनाना। पिछले ढाई साल में ओबामा और मोदी की नौ मुलाकातें हो चुकी हैं, लगभग तीन दर्जन मुद्दों पर दोनों देशों का संवाद भी चल रहा है, भारत ने अमेरिका से 15-16 बिलियन डॉलर के शस्त्रास्त्र भी खरीद लिए हैं लेकिन परमाणु भ_ियां लगाने के महत्वपूर्ण समझौते पर कोई ठोस प्रगति नहीं हुई हैं। ट्रंप और मोदी, दोनों ही अपने-अपने देश की राष्ट्रीय राजनीति में अचानक उभरे हैं। दोनों को विदेश नीति के संचालन का अनुभव नहीं है लेकिन दोनों ही अपने संकल्प के धनी मालूम पड़ते हैं। दोनों का अतिवाद और बड़बोलापन आम जनता को उनकी तरफ खींचता है। इसीलिए आशंका होती है कि जब ट्रंप को अपनी भारत-नीति लागू करनी होगी तो वे कहीं पल्टा न खा जाएं जैसे कि मोदी की पाकिस्तान-नीति पिछले ढाई-साल में कई बार उलट-पलट चुकी है। कम से कम दो मुद्दे ऐसे हैं, जिन पर भारत से ट्रंप की ठन सकती है। पहला तो भारतीय नागरिकों को अमेरिका में काम करने के लिए वीजा का प्रश्न है। ट्रंप ने अपने पहले पद-ग्रहण में ही कह दिया है कि वे आप्रवासियों पर रोक लगाएंगे। क्या वे भारतीयों के मामले में ढील देंगे? इस समय अमेरिका की अर्थव्यवस्था में भारतीयों की भूमिका अद्वितीय है। अमेरिका के प्रवासी भारतीय सबसे अधिक समृद्ध, सबसे अधिक शिक्षित, सबसे अधिक खुशहाल और सबसे अधिक मर्यादित समुदाय है। यदि उनके आगमन पर ट्रंप रोक लगाएंगे और यदि उनसे रोजगार छीनेंगे तो भारत चुप कैसे बैठेगा? इसके अलावा वे अमेरिका की ही हानि करेंगे। यदि भारतीय लोग अमेरिका छोड़ दें तो ट्रंप इतने योग्य और अनुशासित अमेरिकियों को कहां से लाएंगे? ट्रंप ने अपने चुनाव-अभियान के दौरान भी इस रोक की रट लगा रखी थी। अब राष्ट्रपति बनते ही उन्होंने अपने अटपटे लगने वाले वादों को लागू करना शुरू कर दिया है, उससे यह संकेत मिलता है कि उक्त मुद्दा शीघ्र ही विवादास्पद बनने वाला है। ऐसे में दो देशों के नेताओं के बीच कायम किया गया दिखावटी सद्भाव कहां तक टिक पाएगा? अगर टिका रहे तो बहुत अच्छा हो! दूसरी बात भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। वह सिर्फ भारत के बारे में ही नहीं है। उसका संदर्भ बड़ा है। ट्रंप का कहना है कि अमेरिकी पूंजी का फायदा दुनिया के दूसरे देश उठा रहे हैं। अब ट्रंप-प्रशासन इस नीति पर पुनर्विचार करेगा। क्या भारत में लगी अमेरिकी पूंजी और उससे पैदा होने वाले रोजगारों पर भी ट्रंपजी की वक्र-दृष्टि होगी? वे स्वयं व्यवसायी रहे हैं। उन्हें पता होना चाहिए कि अब से कई दशक पहले अमेरिका के प्रसिद्ध विदेश मंत्री जॉन फॉस्टर डलेस ने बाहर जाने वाले अमेरिकी डॉलर के बारे में क्या कहा था। डलेस का कहना था कि सहायता या विनियोग के नाम पर बाहर जाने वाला एक डॉलर, तीन डॉलर बनकर वापस लौटता है। भारत-जैसे देशों में लगी अमेरिकी पूंजी हमेशा अमेरिका के लिए ही ज्यादा फायदे दुहती है। ट्रंप का यह कहना सही नहीं है कि 'हमने अन्य देशों को मालदार बना दिया हैÓ और हमारे देश की 'संपदा, शक्ति और आत्मविश्वास हवा में उड़ गए हैं।Ó आशा है कि ट्रंप प्रशासन के अफसर उन्हें जब अमेरिकी नीतियों के अंदरुनी रहस्य समझाएंगे तो उनके विचारों में कुछ बदलाव आएगा। तब शायद वे सिर्फ 'पहले अमेरिकाÓ कहने के साथ-साथ यह भी कह देंगे कि 'दूसरे भी साथ-साथ।Ó इन आशंकाओं के बावजूद अभी ऐसा लगता है कि ट्रंप के अमेरिका और मोदी के भारत में एक मुद्दे पर जबर्दस्त जुगलबंदी हो सकती है। वह है, आतंकवाद का! यों तो ओबामा भी आतंकवाद का विरोध करते रहे लेकिन ट्रंप ने आतंकवाद के उन्मूलन के लिए जैसा खांडा खड़काया है, पिछले 20 साल में किसी भी अमेरिकी राष्ट्रपति ने नहीं खड़काया। उन्होंने सात मुस्लिम राष्ट्रों के नागरिकों के अमेरिका आने पर भी रोक लगा दी है। पश्चिम एशिया के इन राष्ट्रों में आतंकवादियों का दबदबा है। भारत के लिए जरा आश्चर्य की बात है कि इन राष्ट्रों की सूची में पाकिस्तान और अफगानिस्तान का नाम नहीं है। भारत तो इन्हीं राष्ट्रों के आतंकवादियों का शिकार है। क्या ट्रंप भी अन्य राष्ट्रपतियों की तरह केवल उन्हीं आतंकी राष्ट्रों के खिलाफ होंगे, जो अमेरिकी हितों को चोट पहुंचाते हैं? यदि ऐसा होगा तो मानना पड़ेगा कि उन्होंने मोदी को सब्जबाग दिखा दिया है। चने के पेड़ पर चढ़ा दिया है। उन्हें जब नवाज शरीफ ने जीतने पर बधाई दी थी, तब उनकी लफ्फाजी देखने लायक थी। उन्होंने नवाज और पाकिस्तान को भी सिर पर बिठा लिया था। यदि ट्रंप अफगानिस्तान से पूरी तरह हाथ धोना चाहेंगे और पाकिस्तान को चीन के हाथों में सौंप देंगे तो अमेरिका की दक्षिण एशियाई नीति शीर्षासन की मुद्रा धारण कर लेगी। यद्यपि इस्राइल के प्रति मोदी और ट्रंप का भाव चाहे एक-जैसा हो लेकिन भारत इस्राइल की ट्रंप-नीति का पूर्ण समर्थन नहीं कर पाएगा। हमारे सुयोग्य विदेश सचिव जयशंकर पर निर्भर करता है कि ट्रंप की इस अल्हड़ नदी में वे भारत की नाव को किस तरह खेते रहेंगे।  ट्रंप ने अमेरिका को 12 राष्ट्रीय प्रशांत संगठन (टीपीटी) से भी मुक्त कर लिया है। इन राष्ट्रों पर चीन का दबदबा बढ़ेगा। वे 'नाटोÓ सैन्य संगठन को भी अप्रासंगिक कह चुके हैं। वे पुतिन के रूस को अमेरिका के बहुत निकट लाना चाहते हैं। वे मेक्सिको और अमेरिका के बीच दीवार खड़ी करने पर तुले हुए हैं। वे जलवायु संबंधी वैश्विक सर्वसम्मति के भी विरुद्ध हैं। उनका और उनकी नीतियों का अमेरिका में ही जमकर विरोध हो रहा है। वे किसी को नहीं बख्श रहे। उन्होंने अपनी पार्टी के असंतुष्ट नेताओं और अमेरिकी पत्रकारों की भी खूब खबर ली है। पिछले राष्ट्रपतियों और प्रशासनों पर भी रंदा चलाने में वे नहीं चूके हैं। ऐसी हालत में ट्रंप के साथ चलते वक्त भारत को अपने कदम फूंक-फूंककर रखने होंगे।

बांग्ला देश का बड़ा नुकसान कर रही हैं शेख हसीना


डॉ. अरूण जैन
यह समझ में आने लायक नहीं है कि जब बांग्ला देश आजादी के जश्न में लगा है तो हिंदुओं के मंदिर और उनकी संपत्ति को तहस-नहस क्यों किया जा रहा है। 45 साल पहले भारत, जहां की बहसुंख्यक आबादी हिंदु है, ने पूर्व पाकिस्तान के लोगों को सेना के बोलबाले वाले पश्चिमी पाकिस्तान के हाथों से आजादी छीनने में मदद की। दो हजार से ज्यादा भारतीय सैनिकों और अफसरों ने इस्लामाबाद के खिलाफ लड़ाई में जान दी। खास बात यह है कि शेख हसीना उन शेख मुजीबुर रहमान की बेटी हैं जिन्होंने जनआंदोलन खड़ा किया और इस क्षेत्र को मुक्त कराया। धार्मिक ताकतों के खिलाफ लडऩे की उनकी पहचान पर संदेह नहीं किया जा सकता है। लेकिन यह अलग बात है कि उन्होंने कट्टरपंथियों के खिलाफ कार्रवाई का इस्तेमाल विपक्षी पार्टियों के खिलाफ लडऩे में किया है। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की शिकायत है कि हसीना की नाराजगी उनके खिलाफ है क्योंकि वही एकमात्र विकल्प है। उनकी शिकायत है कि शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग उन्हें खत्म करने के लिए हर चाल चल रही है। यहां तक कि यह अफवाह भी फैला दी गई है कि वे भारत−विरोधी हैं ताकि खालिदा जिया की छवि खराब कर दी जाए। मुझे शेख मुजीबुर रहमान के साथ ढाका में हुई मुलाकात याद है जो आज बांग्लादेश कहे जाने वाले क्षेत्र की मुक्ति के तत्काल बाद हुई थी। मैंने उनसे शिकायत की थी कि बहुत ज्यादा भारत विरोधी भावना है। मैं ढाका प्रेस क्लब गया था और पत्रकारों को यह मजाक करते पाया कि हिलसा मछली कोलकाता के होटलों में मिलती है, लेकिन बांग्लादेश में नहीं। नई दिल्ली और कोलकाता की तीखी आलोचना की कि गई कि वे बांग्लादेश की मुक्ति का फायदा उठा रहे हैं। लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा, जिन्होंने भरतीय सेना का नेतृत्व किया था, का खास जिक्र किया गया कि उन्होंने पूर्व पाकिस्तान के साथ व्यापार करने वाले अमीर पश्चिमी पाकिस्तानियों को लूटा। शेख मुजीबुर रहमान ने मुझे कहा कि बंगाली एक गिलास पानी देने देने वाले का एहसान भी नहीं भूलता। आपके देश वालों ने क्षेत्र को मुक्त कराने के लिए मुक्ति वाहिनी की मदद की और अपनी जान दी है। उन्होंने कहा कि बांग्लादेश में सेकलुरिज्म की गहरी जड़ें हैं और इसे किसी भी हालत में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लेकिन हैरत की बात है कि बांग्लादेश की सेकुलर पहचान पर आज सवाल खड़े हो रहे हैं। जम्मातए इस्लामिया, जो एक समय जनरल एचएम एरशाद के सैनिक शासन के समय सरकार का हिस्सा थी, शासन करने के इस्लामिक तरीके को लेकप्रिय बनाने की भरपूर कोशिश कर रही है और दुनिया के एक इस्लामिक राज्य के साथ नजदीकी संबंध बनाना चाहती है। सौभाग्य से, बांग्ला देश में इसे व्यावहारिक रूप से कोई समर्थन नहीं है।  लेकिन शेख हसीना की बदनामी के कारण बांग्लादेशी न केवल भारत विरोधी बल्कि नरम रूप में इस्लामिक भी दिखाई देते हैं। वह मुख्य विपक्षी नेता खालिदा जिया के समर्थकों को मिटाने में व्यस्त हैं। इस लड़ाई में बेगम जिया के साथ के सेकुलर लोगों को भी सांप्रदायिक बताया जा रहा है और उन्हें खदेड़ा जा रहा है। अब शेख हसीना की चिंता जड़ जमाने की और सत्ता नहीं छोडऩे की है। विरोधी दल खुल कर कह रहे हैं कि वे शायद उन्हें हटा पाने में सफल नहीं होंगी क्योंकि वह कभी निष्पक्ष चुनाव नहीं होने देंगी। वह पहले से ही खानदानी शासन की चर्चा करने लगी हैं और अमेरिका में रहने वाले अपने बेटे के साथ सरकार के सभी मामलों को लेकर मशविरा कर रही हैं। इसी सोच के अनुसार, प्रधानमंत्री विश्वविद्यालय और शिक्षण संस्थानों में महत्वपूर्ण जगहों पर अपने समर्थकों की नियुक्त किर रही हैं, इसके बावजूद कि उनके पास योग्यता और डिग्री नहीं है। इस प्रक्रिया में, वह योग्यता पर आधारित शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद कर रही हैं। लेकिन उन्हें इसकी कोई फिक्र नहीं है क्योंकि उन्हें भरोसा है कि सेकुलरिजम के नाम पर वह अपने किसी भी समर्थक को ऊंचे पद पर बिठा सकती हैं। एक कानून बनाने पर विचार हो रहा है जिसमें उनके पिता या उनके शासन को चुनौती देने वाले को राष्ट्रद्रोही समझा जाएगा। निस्संदेह, लोकतांत्रिक परंपरा को देखने का यह अजीब तरीका है। लेकिन एक बार यह कानून बन जाता है तो बांग्लादेश में कोई भी आश्चर्य जनक बात हो सकती है। आने वाले दिनों में, विरोधी पार्टियां जो आज उनका खास निशाना हैं, की कोई आवाज नहीं उठेगी। माहौल ज्यादा निरंकुश और तानाशाही वाला हो जाएगा। और बहुत कम लोग रह जाएंगे जो सरकार से सवाल कर पाएंगे।  अपने सभी कामों में, शेख हसीना देश का कल्याण भूल चुकी हैं। जब वह अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, बांग्लादेश इस समस्या का सामना कर रहा है कि आर्थिक विकास के जरिए लोगों को लाभ दिलाने में सरकार कितनी सफल हो रही है। दुर्भाग्य से, ऐसा नहीं है। प्रधानमंत्री अपनी उपलब्धि इसी में गिनती हैं कि उन्होंने अपने पक्के समर्थकों को कितने पद दिए हैं।

योगी का चाबुक अपने पराये में अंतर नहीं कर रहा


डॉ. अरूण जैन

21वीं सदी के शुरुआती वर्ष 2002 में विक्रम भट्ट निर्देशित हिन्दी फीचर फिल्म राज के एक गीत, यह शहर है अमन का, यहां की फिजा है निराली, यहां पर सब शांति-शांति है, यहां पर सब शांति-शांति है। ने खूब शोहरत बटोरी थी। यह गीत आजकल उत्तर प्रदेश पर काफी फिट बैठ रहा है। यूपी में सत्ता परिवर्तन होते ही एक गजब तरह की खामोशी ने पूरे राज्य को अपने आगोश में ले लिया है। इसका कारण है योगी सरकार का अपराधियों पर कसता शिकंजा, जिसके कारण यूपी में योगी सरकार का इकबाल बुलंद है। पूरे प्रदेश में जिस तेजी के साथ माहौल बदल रहा है, उसने प्रदेश की अमन प्रिय जनता काफी सुकून महसूस कर रही है। शहर की सड़कें और चौराहे इस बात के गवाह हैं। बात−बात पर मारपीट पर उतारू दबंग किस्म के लोग अब कहीं नहीं दिखाई देते हैं। बड़े-बड़े मॉल और पार्कों में अब शोहदे लफंगई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब छोटी-छोटी बात पर लोग अपना आपा खो बैठते थे, मरने-मारने तक की नौबत पहुंच जाती थी। न खाकी वर्दी का डर रह गया था, न कानून की चिंता। महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएं समाज को अभिशप्त करती जा रही थीं। जिसकी बेटी या बहन के साथ छेड़छाड़ होती थी, वह अपना मुंह नहीं खोल सकता था। अगर खोलता तो जान के लाले पड़ जाते। उलटा उसी को किसी केस में फंसा दिया जाता। कदम−कदम पर सड़क पर दहशत का माहौल देखने को मिलता था। यह सब सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के नेताओं की शह में चल रहा था। जिनका समाजवाद से दूर-दूर का नाता नहीं है, वह भी सपा राज में सपाई चोला ओढ़कर कारनामे कर रहे थे। अवैध कब्जेदार, नकल और खनन माफिया, अवैध निर्माण, अवैध नर्सिंग होम, खाद्य पदार्थों में मिलावट, कालाबाजारी से लेकर कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं रहा था। सरकारी पैसों की बंदरबांट, थानों की नीलामी, ठेकेदारों की मनमानी सब कुछ चल रहा था। ऐसा नहीं है कि योगी राज में अब सब कुछ खत्म हो गया हो या फिर बदल गया हो, लेकिन कम से कम कोई यह तो नहीं कह सकता है कि यूपी में कानून व्यवस्था की धज्जियां सरकारी संरक्षण में उड़ाई जा रही हैं। अपराधिक वारदातें आज भी घटित हो रही हैं, लेकिन अनुपात में कमी आई है। अब समाज विरोधी तत्व यह नहीं सोच सकते हैं कि उन्हें कहीं से संरक्षण मिल जायेगा, इसलिये अपराधी पकड़े भी जा रहे हैं ओर जेल की सलाखों के पीछे भी पहुंच रहे हैं। जिसके चलते ऐसा लगता है कि यूपी की बदनाम सड़कों पर खामोशी का पहरा बैठ गया हो। यह जरूर है कि सड़क पर अब पहले जैसा तांडव देखने को नहीं मिलता है, मगर चारदिवारी के भीतर होने वाले अपराधों पर अभी नियंत्रण नहीं हो पाया है। बहरहाल, समाज में आ रहे बदलाव को अगर सियासी चश्मा उतार कर देखा जाये तो काफी कुछ साफ नजर आने लगता है। अपराधिक प्रवृति के लोगों में सरकार और पुलिस का भय पनपने की वजह से ऐसा हुआ है। गुंडे माफियाओं को पता है कि अगर वह कानून को अपने हाथ लेंगे तो उनको कोई बचाने वाला नहीं मिलेगा यह दृश्य जगह-जगह देखने को भी मिल रहा है। लखनऊ में विधान भवन के समाने से अगर ट्रैफिक पुलिस का सब इंस्पेक्टर एक मंत्री की लालनीली बत्ती लगी पुलिस स्क्वॉड की गाड़ी को गलत पार्किंग के कारण क्रेन से उठाकर ले जा सकती है और यदि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से बीजेपी विधायक सुशील सिंह की हत्या आरोपियों को छुड़ाने की कोशिश को पुलिस नाकाम करके बीएसपी नेता की हत्या के आरोपियों को जेल भेज देती है तो इसका मतलब यही हुआ कि योगी सरकार की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं है। उनका चाबूक अपने पराये में अंतर नहीं कर रहा है। सीएम योगी ने कानून व्यवस्था चुस्त−दुरूस्त करने के लिये पुलिस को खुली छूट दे रखी है, जिसकी वजह से ही अपराध का ग्राफ घटा है। पुलिस अब बेजा दबाव बीजेपी नेताओं और विधायकों का भी नहीं मान रही है। हाँ, इस बीच कई और तरह की समस्याओं ने जरूर जन्म लिया है, जिस कारण पुलिस को कानून व्यवस्था बनाये रखने में दिक्कत आ रही है। योगी के सत्ता संभालते ही आंदोलनों की बयार बहने लगी है। शराब बंदी के खिलाफ आंदोलन, प्राइवेट स्कूल मालिकों की मनमानी के खिलाफ आंदोलन, कट्टर हिन्दूवादी नेताओं की हठधर्मी के किस्से, अयोध्या में भगवान राम लला के मंदिर के निर्माण की मांग जोर पकडऩे जैसी समस्याएं जरूर योगी सरकार के लिये सिरदर्द बनी हुई हैं। लब्बोलुआब यह है कि योगी राज में उत्तर प्रदेश उम्मीदों का प्रदेश बन गया है। ऐसा लग रहा है पूर्ववर्ती सरकारों को लेकर प्रदेश की जनता में या तो विश्वास की कमी रही होगी अथवा जनता का मिजाज समझ पाने में यह सरकारें नाकाम रही होंगी। योगी को सत्ता संभाले चंद दिन बीते हैं, इन चंद दिनों में सरकार ने काफी अहम फैसले भी लिये हैं, जिसके चलते प्रदेश में अपराध के ग्राफ में कमी आई है। नौकरशाहों, अधिकारियों और कर्मचारियों के काम का तौर-तरीका बदल गया है। चाहें अवैध बूचडख़ाने हो या फिर अवैध निर्माण अथवा खनन, भू और नकल माफिया योगी, सरकार का हंटर सभी के खिलाफ तेजी के साथ चल रहा है।  योगी राज आते ही यूपी में सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई भी तेज हो गई है। चाहे तीन तलाक का मामला हो या फिर शराब जैसी बुराइयों के कारण बिगड़ता सामाजिक तानाबाना। महिलाओं से छेड़छाड़ का मसला हो अथवा उनको आगे बढऩे देने का मौका मिलने की बात। जनता को कम पैसे में बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना, शिक्षा को व्यवसायीकरण से बचाना, सरकारी स्कूलों की स्थिति में सुधार से लेकर सड़कों के गड्ढे, अतिक्रमण, सरकारी संपत्ति पर कब्जा करने वाले सभी पर योगी की नजरें जमी हैं।

आखिर मप्र में कैसे आए विकास की बहार आईएएस की कमी से सरकार बेहाल!

डॉ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार अभी से मिशन 2018 के मूड में आ गई है। इसी को दृष्टिगत करते हुए मप्र सरकार ने बजट 2017-18 में बिना किसी को नाराज किए सभी वर्ग को साधने की कोशिश की है। जमीनी और मैदानी तैयारी के साथ सरकार प्रशासनिक स्तर पर भी चौसर बिछा रही है। लेकिन चौसर पर उसकी सारी कवायद आकर थम-सी गई है, क्योंकि मुख्यमंत्री जिन घोषणाओं के दम पर प्रदेश में लगातार चौथी बार सरकार बनाने का सपना देख रहे हैं उनमें से करीब 3,200 घोषणाओं को कद्रदान की तलाश है। लेकिन आईएएस अफसरों की कमी के कारण करीब 6,40,000 करोड़ की योजनाएं कागजों की शोभा बनी हुई हैं। कार्मिक, लोक शिकायत, कानून और न्याय मामलों की संसदीय समिति ने भी अपनी ताजा रिपोर्ट में कहा है कि आईएएस अफसरों की कमी चिंताजनक स्थिति में पहुंच गई है। दरअसल, पिछले 11 साल से अधिक समय के कार्यकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी लगभग हर सभा और बैठक में किसी न किसी योजना की घोषणा की है। मुख्यमंत्री ने अपने तीसरे शासनकाल में ही अभी तक करीब 3300 घोषणाएं की हैं। इनमें 1500 से अधिक घोषणाएं लंबित हैं। जानकारी के अनुसार, 11 साल में मुख्यमंत्री ने करीब 13,000 घोषणाएं की है। सूत्र बताते हैं कि 11 साल के दौरान हुई कुल घोषणाओं में 3,200 से अधिक अभी तक लंबित हैं। मुख्यमंत्री, मंत्री और भाजपा संगठन सभी घोषणाओं को पूरा करने के लिए अफसरों पर दबाव बना रहे हैं। विभागों के प्रमुख समीक्षाएं कर रहे हैं जिसमें यह बात सामने आ रही है कि आईएएस अफसरों और बजट की कमी के कारण मुख्यमंत्री की घोषणाएं धरातल पर उतर नहीं पा रही हैं। प्रदेश के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि अगर सरकार बजट देने को तैयार भी हो जाए तो आईएएस अफसरों की कमी के कारण योजनाओं को अमलीजामा नहीं पहनाया जा सकता। मप्र में 20 फीसदी आईएएस की कमी प्रशासनिक ढांचे को राज्य की रीढ़ की हड्डी कहा जाता है। देश में सरकार भले ही जनता द्वारा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी जाती है, लेकिन सरकार का असली संचालन नौकरशाही द्वारा होती है। सरकार चलाने के लिए मंत्री अपने सचिवों पर निर्भर रहते हैं। सही मायनों में देखा जाए तो देश-प्रदेश और विदेशी नीतियों से लेकर विकास का दायित्व इन आईएएस अफसरों पर रहता है। लेकिन विसंगति यह देखिए कि केंद्र या राज्य सरकारें आईएएस की कमी को लेकर मौन हैं। सरकारों की योजनाएं बनाने, उन्हें लागू करवाने में इन अफसरों का अहम योगदान होता है। जनता के बीच सरकार के कामकाज की सराहना के पीछे इन्हीं अफसरों की दूरगामी नीतियां होती हैं। वास्तव में आईएएस अफसर देश को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद अकेले मप्र में 20 फीसदी आईएएस अफसरों की कमी है। केंद्र सरकार ने मप्र के लिए 417 आईएएस का कैडर मंजूर किया है, लेकिन वर्तमान में 334 अधिकारी की मप्र को मिले हैं। इनमें से 31 केंद्र में पदस्थ है। इस तरह प्रदेश में करीब 114 आईएएस की कमी है। ऐसे में घोषणाओंं को अमलीजामा कैसे पहनाया जा सकता है?

दुष्कर्मियों को मौत की सजा का कानून बनेगा


डॉ. अरूण जैन
उत्तर प्रदेश में नए मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ ने एंटी रोमियो स्क्वॉड बनाई तो यूपी में छेडख़ानी करने वाले मनचलों की शामत आ गई। एंटी रोमियो स्क्वॉड के बनए एक हफ्ते ही हुए और मनचले अपने घरों में दुबक गए। यूपी के सीएम आदित्यनाथ योगी की ये योजना पड़ोसी राज्य मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी खूब पसंद आई है। यूपी में एंटी रोमियो स्क्वॉड के शुरू किए जाने के एक हफ्ते बाद मध्य प्रदेश के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भी मनचलों पर इसी तरह की कार्रवाई किए जाने का ऐलान किया है। एक कदम आगे बढ़ते हुए शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि उनकी सरकार दुष्कर्म के दोषियों को फांसी की सजा देने का कानून भी लाएगी। दुष्कर्म के दोषियों को सीधे फांसी देने की मांग अक्सर उठती रहती है। यह तीसरी बार है जब शिवराज सिंह चौहान ने भी दुष्कर्म के दोषियों को मौत की सजा दिए जाने की बात कही है। हालांकि उन्होंने ये पहली बार कहा है कि एक तय वक्त में वो इस बारे में कानून को भी ला सकते हैं। शुक्रवार को भोपाल पुलिस अकादमी के पासिंग आउट परेड में पहुंचे शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि हम इस मानसून सत्र में विधानसभा में बिल पेश करेंगे। अगर यह पारित हो जाता है तो इसे लागू करने के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। शिवराज ने कहा कि राज्य में मनचलों के खिलाफ एक अभियान चलाएंगे ताकि बहन-बेटियां सुरक्षित रहें। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि मनचलों को किसी भी कीमत पर बख्शा नहीं जाएगा। वो मानते हैं कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि अपराधियों में इस बात का खौफ रहे कि अपराध के लिए उन्हें सख्त सजा मिलेगी। दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध करने वालों को इस बात का खौफ रहे कि अगर वो ऐसा अपराध करते हैं तो खुद भी जिंदा नहीं रह पाएंगे। शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि विकास के लिए जरूरी है कि राज्य में अच्छी कानून व्यवस्था हो, जोकि पुलिस की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि दुष्कर्मियों को फांसी देने का कानून लाने के लिए भारतीय दंड संहिता (ढ्ढक्कष्ट) में संशोधन की जरूरत पड़ेगी, लेकिन इसके लिए अपनी तरफ से की जा सकने वाली कोशिशों से वो पीछे नहीं हटेंगे। शिवराज सिंह लगातार शराब के खिलाफ बोलते आए हैं और नर्मदा के आसपास खुली शराब की दुकानों को बंद करने की बात उठा चुके हैं। ऐसे में अब महिलाओं से अपराध करने वालों कड़ी सजा देने की बात कहकर वह राज्य की महिलाओं की नजर में और अच्छी छवि बना लेंगे। उन्हें इसका फायदा 2018 में होने वाले विधानसभा चुनाव में हो सकता है। शिवराज सिंह अच्छी तरह जानते हैं कि मध्य प्रदेश दुष्कर्म के मामले में सबसे ऊपर है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के पिछले कुछ वर्षों के आंकड़ों ने इस मुद्दे पर देश भर में राज्य की छवि को नुकसान पहुंचाया है। मुख्यमंत्री चौहान इसी छवि से लड़ रहे हैं और इससे मुक्ति दिलाने के लिए प्रयासरत हैं। इसीलिए उन्होंने कहा कि विधानसभा के मानसून सत्र में विधेयक लाकर दुष्कर्मियों को मौत की सजा का कानून बनाया जाएगा।

अमेरिकी अधिकारियों से मिले डोभाल, सहयोग बढ़ाने पर चर्चा


डॉ. अरूण जैन
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत के. डोभाल की शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकों के बाद यहां सूत्रों ने बताया कि ट्रंप प्रशासन आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के साथ सहयोग बढ़ाना और मजबूत करना चाहता है। डोभाल ने इस सप्ताह अमेरिका की यात्रा के दौरान अमेरिका के रक्षा मंत्री जनरल (सेवानिवृत्त) जेम्स मैटिस, गृह सुरक्षा मंत्री जनरल (सेवानिवृत्त) जॉन केली और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार लेफ्टिनेंट जनरल एचआर मैकमास्टर से मुलाकात की। इन सभी बैठकों में दक्षिण एशिया में आतंकवाद से पैदा हुई चुनौती से मिलकर निपटने के लिए भारत और अमेरिका के बीच सहयोग को गहरा करने और विस्तार देने की बात की गई।  उन्होंने शक्तिशाली सीनेट आर्म्ड सर्विसेस कमेटी के अध्यक्ष जॉन मैकेन और सीनेट सलेक्ट कमेटी ऑन इंटेलीजेंस के अध्यक्ष रिचर्ड बर से भी मुलाकात की। पेंटागन ने प्रवक्ता कैप्टन जेफ डेविस ने बैठक की जानकारी देते हुए कहा कि मैटिस और डोभाल ने अंतरराष्ट्रीय कानूनों एवं सिद्धांतों को बरकरार रखने में सहयोग को लेकर अपनी भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने कहा, ''मैटिस ने दक्षिण एशिया क्षेत्र में स्थिरता को प्रोत्साहित करने के भारत के प्रयासों की प्रशंसा की। दोनों नेताओं ने हालिया वर्षों में रक्षा सहयोग में की गई अहम प्रगति को आगे बढ़ाने की पुन: पुष्टि की।  डेविस ने कहा, ''रक्षा मंत्री मैटिस और एनएसए डोभाल ने समुद्री सुरक्षा और आतंकवाद से निपटने समेत क्षेत्रीय सुरक्षा के कई मुद्दों पर सहयोग को लेकर चर्चा की। दोनों ने अपने देशों के बीच मजबूत रक्षा साझेदारी जारी रखने पर जोर दिया।ÓÓ ट्रंप प्रशासन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि डोभाल और मैकमास्टर ने बृहस्पतिवार को व्हाइट हाउस में मुलाकात के दौरान आतंकवादी खतरों से ''पूरी तरह लडऩेÓÓ के लिए साझेदारों के तौर पर साथ मिलकर काम करने की ''प्रतिबद्धताÓÓ जतायी। साथ ही उन्होंने कहा कि दोनों बड़े लोकतांत्रिक देश आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में एक साथ खड़े हैं। वाशिंगटन में शुक्रवार को डोभाल की बैठकों का समापन होने के बाद भारतीय सूत्रों ने कहा, ''सभी बैठकें अच्छी, बहुत सकारात्मक और बहुत रचनात्मक रहीं। मुझे लगता है कि भारत को लेकर खुला नजरिया है।ÓÓ ट्रंप के नवंबर में राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद यह डोभाल की दूसरी अमेरिकी यात्रा है। दिसंबर में डोभाल ने मनोनीत एनएसए जनरल (सेवानिवृत) माइकल फ्लिन से मुलाकात की थी जिन्होंने कुछ सप्ताह बाद सत्ता हस्तांतरण और चुनाव अभियान के दौरान रूसी दूतों संबंधी विवाद के कारण इस्तीफा दे दिया था। फ्लिन का स्थान मैकमास्टर ने लिया और अधिकारियों के अनुसार उनका भारत के बारे में काफी सकारात्मक नजरिया है। वरिष्ठ अधिकारी ने गोपनीयता की शर्त पर कहा, ''इन सभी बैठकों में भारत की आर्थिक योजनाओं, सुधारों और वृद्धि पर चर्चा की गयी। इनमें भारत-अमेरिकी संबंधों की मुख्य सुरक्षा चिंताओं, क्षेत्रीय चिंताओं, रक्षा और सुरक्षा के आयामों पर बात की गयी।ÓÓ बातचीत में विमुद्रीकरण और वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसे मुद्दों को भी उठाया गया, जो भारत की आर्थिक वृद्धि में अमेरिका के हितों को दर्शाता है। पाकिस्तान पर कोई विशेष चर्चा नहीं की गयी लेकिन क्षेत्र में आतंकवाद के संदर्भ में उसका जिक्र किया गया। अधिकारी ने कहा कि ट्रंप प्रशासन के नेतृत्व में यह स्पष्ट है कि भारत का यह पड़ोसी आतंकवाद से किस प्रकार निकटता से जुड़ा हुआ है।