Monday, 8 February 2016

मध्यप्रदेश में बड़ा चैनल घोटाला ,जीरो टीआरपी वाली चैनल्स पर मेहरबान हुआ जनसम्पर्क विभाग

डॉ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश में इन दिनों बड़ा चैनल घोटाला चर्चा में है जिसकी अंतर्कथा व्यापम से जोडक़र देखी जा रही है।  खबर यह है की वर्ष 2012 से उन  चैनलस पर मेहरबानी की  जो अधिकांश जीरो टीआरपी पर हैं या बंद पड़ी हैं जबकि बड़ी चैनल्स अपने प्राइम टाइम के समाचरों के विज्ञापन के लिए  तरस रहीं हैं यहाँ तक की प्रधानमंत्री मोदी की पसंद दूरदर्शन को छ अंकों की राशि में भी शामिल नहीं किया गया है ,कुल 100 करोड़ के इस घोटाले में उन चैनल मालिकों की पौ बारह हो गयी है जो या तो जेल में बंद हैं या उन पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं. दरअसल मध्यप्रदेश विधानसभा में 8 दिसम्बर 2015 को कांग्रेस के विधायक बालबच्चन  ने ताराकित प्रश्न क्रमांक 288 के माध्यम से सरकार से यह जानकारी मांगी तब से मध्यप्रदेश के राजनैतिक और प्रशासनिक हलकों में मीडिया मैनेजमेंट और चैनल घोटाले के चर्चों को पर लग गए हैं मध्यप्रेश शासन के जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख सचिव् एस के मिश्रा ने आज मंत्रालय  में इस घोटाले की जाँच के आदेश दिए हैं दूसरी और कांग्रेस इस मुद्दे को व्यापम से जोडक़र भुनाने चाहती है कांग्रेस के नेताओं ने इसे मीडिया मैनजमेंट में जनधन लुटाने का आरोप लगते हुए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को खरीदने का सीधा सीधा आरोप सरकार पर लगाया है. मध्य्रपदेश के सहारा समय को 12 करोड पचास लाख रुपये की राशि दी गयी है वहीँ ई टीवी मध्यप्रदेश को 13 करोड़ और ई टी वी उर्दू को लगभग 1 करोड़ की राशि दी गए है, मध्यप्रदेश के स्थानीय चैनल बंसल न्यूज़ को 11 करोड़ 57 लाख , साधना न्यूज़ मध्यप्रदेश को 8 करोड 78 लाख रुपये की राशि विज्ञापनों के नाम पर बाँट दी गयी है. जबकि देश के प्रधानमंत्री की सर्वाधिक पसंद और शासकीय समाचारों की अधिकृत चैनल दूरदर्शन को  मात्र 8 लाख में संतोष करना पड़ा है। लोकल चैनल आपरेटर हाथ वे इंदौर को 50 लाख ,सुदर्शन न्यूज़ को 14 लाख ,सिटी केबल को 84 लाख ,टाइम्स नाउ को 1 करोड़ 39 लाख , एबीपी न्यूज़ को 12 करोड 76 लाख , ज़ी मीडिया को 6 करोड़ 10 लाख, सी एन बी सी आवाज को 6 करोड़ 50 लाख , इंडिया न्यूज़ को 8 करोड 68 लाख , एन डी टी वी को 12 लाख 84 हजार, न्यूज़ वर्ल्ड को 1 करोड 28 लाख रुपये , भास्कर मल्टिनेट के मालिक सुधीर अग्रवाल को 6 लाख 95 हजार , सेंट्रल इंडिया डिजिटल नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड को 1 करोड़ 41 लाख की राशि लुटाए गयी है. अपराधिक छवि वाले संचालकों पर कृपा सरकार का जनसम्पर्क महकमा मध्यप्रदेश की जनता का पैसा लूटने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है ,जिन चैनल्स को विज्ञापनों के नाम पर करोड़ों रुपये दिए गए हैं उनमें से अधिकांश चैनल के मालिक जेलों में बंद हैं या उनके विरुद्ध वारंट निकले हुए हैं मसलन पी 7 के संचालक केसर सिंह पर आर्थिक अपराध के कई मामले चल रहे हैं उनकी बंद पड़ी चैनल को सरकारी खजाने से 76 लाख रुपये की राशि दी गई हैं. चिटफंड कंपनी साईं प्रसाद मीडिया लिमिटेड के चैनल को 23 करोड़ 33 लाख रुपये दिए गए हैं जिसमें कंपनी ने दो बार कंपनी और चैनल का नाम बदला , सूत्र बताते हैं  की चैनल के मालिक भापकर मुंबई जेल में बंद हैं।  खबर भारती , भारत समाचार और स्टेट न्यूज़ को क्रमश 9 करोड़, 45 लाख और 1 करोड़ से नवाजा गया है जबकि जो चैनल गर्भ में ही हैं दबंग डी लाइव को  1 लाख अग्रिम रूप से दे दिए गए हैं , बात यहीं खत्म नहीं होती प्रोडक्शन हाउस निकिता फिल्म्स को चैनल की आड़ में 61 लाख रुपये की रेवाड़ी बांटी  गयी है।  कई नेशनल चैनल्स के स्टेट ब्यूरो भी इस घोटाले की आड़ में भरी भरकम राशि ले कर उपकृत हुए हैं , इस घोटाले की सूची बहुत लम्बी है किन्तु स्थानाभाव के कारन चुनिंदा नाम ही यहाँ दिए गए हैं। कांग्रेस के मुख्य प्रवक्ता केके मिश्रा ने पूरे मुद्दे पर अपनी बात रखते हुए कहा है कि देश की आजादी में लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानि मीडिया ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी लेकिन लोकतंत्र के मूल्यों को भभ्रष्टाचार से बचाने  का प्रतिबिम्ब मीडिया भी शिवराज सिंह चौहान के बदनाम चेहरे को बचाने  में इस्तेमाल हो गया है.  मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने पहले डम्पर कांड फिर व्यापम घोटाल के कलंक को धोने के लिए लोकतंत्र के महत्वपूर्ण आधार स्तम्भ की प्रतिमा और प्रतिभा को खंडित करने का दुस्साहसास सरकारी खजाने से धन लूटा कर किया है. मध्यप्रदेश शासन के जनसम्पर्क विभाग के प्रमुख सचिव एस  के मिश्रा ने राज्य में हुए चैनल घोटाले के उजागर होने का बाद अब जाकर संपूर्ण मामले की जाँच करवाने के आदेश दिए हैं। कुल मिलाकर  मध्यप्रदेश की राजनीती में एक बार फिर व्यापम घोटाले को मैनेज करने के लिए चैनल घोटाला सुर्खियां बटोर रहा है ऐसे में सरकार की छवि बनाने वाले विभाग जनसम्पर्क और राज्य के मुखिया मुख्यमंत्री की परेशानी बढ़ गई  है देखना यह है की इस संकट की घडी में शिवराज किस मीडिया के सहारे पार लगते हैं।

सिंहस्थ में खलल डाल सकते हैं खंडवा से फरार हुए सिमी आतंकवादी , रेलवे को सतर्क रहने के निर्देश

डॉ. अरूण जैन
सिंहस्थ के चलते रेलवे ने सुरक्षा व्यवस्था चाक चौबंद करने की तैयारी कर ली है।   खुफिया विभाग के अनुसार करीब दो साल पहले खंडवा जेल से भागे सिमी के गुर्गे उज्जैन सिंहस्थ में खलल डाल सकते हैं। इसके चलते एटीएस के एक वरिष्ठ अधिकारी को उज्जैन का प्रभार देकर भेजा गया है।  खुफिया विभाग ने सूचना दी है कि यह फरार आतंकी यहां गड़बड़ी कर सकते हैं। इसलिए इन पर विशेष नजर रखने की जरूरत है।  इसके चलते विभाग ने आरपीएफ व जीआरपी से इस मामले में सहयोग मांगा है। रेलवे अधिकारियों को शंका है कि यह लोग उज्जैन पहुंचने के लिए रतलाम से ट्रेन, सडक़ मार्ग के अलावा अन्य किसी भी रास्ते का उपयोग कर सकते हैं। इसी को लेकर सुरक्षा व्यवस्था दुरूस्त की गई है। इसको लेकर स्टेशनों पर मेटल डिटेक्टर, बम निरोधन दस्ता, खोजी श्वान की मदद ली जाएगी।  2013 में सिमी के यह गुर्गे खंडवा जेल से फरार हुए थे। इनमें से कुछ पकड़े गए तो कुछ तेलंगाना में मुठभेड़ के दौरान आमने-सामने की लड़ाई में मारे गए। इनके अलावा अब भी चार गुर्गे फरार हैं। जिनकी तलाश में अलग अलग संगठन लगे हैं। महाराष्ट्र एटीएस ने इनके ऊपर 5 लाख रुपए का तो एनआईए ने 10 लाख रुपए का इनाम रखा है। पुलिस व एटीएस को मेहबूब गुड्डू, जाकिर, अमजद व सलीख की तलाश है। यह चारों बिजनौर उत्तर प्रदेश में ब्लास्ट के बाद से फरार चल रहे हैं।हालांकि खुफिया विभाग को इनके बीच में राजस्थान व महाराष्ट्र बार्डर होने की सूचना मिली थी, लेकिन इसमें अधिक नहीं हो पाया।              सिमी के गुर्गे कुछ कर न पाएं, इसके लिए विशेष जागरुकता की जरुरत है। रेलवे को इसके लिए अतिरिक्त चौकसी के लिए कहा है।  महेंद्र खत्री, सिंहस्थ प्रभारी, पुलिसविभाग आतंकी पकड़ में आएं इसके लिए हमारा विभाग जागरुक है। चौकसी को बढ़ाया गया है। इसके अलावा यात्रियों से भी अपील है कि कुछ संदिग्ध दिखे तो तुरंत 138 या 182 पर सूचना दें। एस सुधाकर, मंडल सुरक्षा आयुक्त, रतलाम रेल मंडल

पीएम के औचक-भौंचक दौरे 

डॉ. अरूण जैन
  प्रधानमंत्री का अचानक पाकिस्तान पंहुच जाना क्या था? इसे कोई भी बता नहीं पा रहा है। ऐन वक्त पर औचक-भौंचक दौरे का पता लगने के बाद खुद भाजपा के प्रवक्ताओं को भी तैयार होने में ढाई घंटे से ज्यादा लग गए। वो भी तब जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भाजपा प्रवक्ताओं की बाकायदा क्लास लगाकर उन्हें पढ़ाया कि क्या बोलना है। इस बीच टीवी पर भी अफरातफरी मची रही। टीवी चैनल तो इतने बेखबर थे कि उन्हें पाकिस्तान के पत्रकारों से पूछ-पूछकर अपने दर्शकों को बताना पड़ा कि हमारे प्रधानमंत्री इस समय कहां हैं? कब लाहौर पहुंचेगे? पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बातचीत का उनका क्या कार्यक्रम है? कुल मिलाकर भारतीय टीवी चैनलों और उनके बहसिया कार्यक्रमों में बैठने वाले विशेषज्ञों को इतना भौंचक इससे पहले कभी नहीं देखा गया था। पाकिस्तान के मीडिया में अचानक जान पड़ी-ऐसे मौकों पर अक्सर पाकिस्तानी टीवी चैनलों को दबा दबा से देखा जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री के इस औचक-भौंचक दौरे से पाकिस्तान के मीडिया में अचानक जान सी आ गई। हमारे अपने टीवी पत्रकारों को हर क्षण उनसे ही पूछना पड़ रहा था कि वहां आगे क्या होने वाला है। जबकि ऐसा हो नहीं सकता कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ भारतीय पत्रकारों का दल न हो, लेकिन इस सनसनीखेज कार्यक्रम की उन्हें भनक तक नहीं लगी। सिर्फ शुरू या बीच में ही नहीं बल्कि आखिर तक। किसी को कुछ नहीं पता था कि इस समय पाकिस्तान में क्या हो रहा है और आगे क्या होने वाला है।  टूट टाट गया नयाचार- दो देशों के राष्ट्राध्यक्षों के बीच चाहे औपचारिक बात होनी हो या अनौवचारिक, उसके कायदे यानी प्रोटोकॉल यानी नयाचार तय होते हैं। इस दौरे से यह नयाचार गायब हो गया। बारह घंटे हो गए, लेकिन अब तक रहस्य बना हुआ है कि हमारे प्रधानमंत्री का पाकिस्तान में रुकने का फैसला कब हुआ था? किस मकसद से हुआ? और इसके राजदार कौन कौन थे? हद तो तब हो गई जब अफगानिस्तान से लाहौर के बीच के घंटे भर के सफर के बीच ही भारत में अफरातफरी और अटकलों का ऐसा दौर चल पड़ा कि सुनने वालों का सिर चकरा गया। किसी ने कहा कि यह चकराने वाला कार्यक्रम देश के भीतर की परेशानियों की बातों से ध्यान हटाने के लिए था। किसी ने कहा कि ये सब दुनिया की बड़ी ताकतों के दबाव का नतीजा था। कोई कह रहा था कि पाकिस्तान से बातचीत शुरू करने का यह अच्छा तरीका साबित होगा। नए नयाचार का नाम देने की कोशिश- भाजपा प्रवक्ताओं ने इस औचक दौरे को अपारंपरिक नयाचार यानी अनकन्वेंशनल प्रोटोकॉल का नाम देने की कोशिश की। लेकिन इस अजीब और नई चीज का यह नाम जंचता नहीं है। जरा हटके वाला जुमला हम हर कहीं नहीं लगा सकते। और अगर भौंचक दौरों को आगे भी चलाना हो, तो कई नए रट्टे पैदा हो सकते हैं। मसलन राष्ट्राध्यक्षों की सुरक्षा इतना बड़ा मसला है कि बिना तारीख और समय तय किए या गुपचुप तरीके से राष्ट्राध्यक्षों के दौरे तय करने का चलन नई जटिलताएं पैदा कर देगा। दो देशों के बीच संबंधों खासतौर पर पाकिस्तान के मामले में भारत की विदेश नीति कोई आकस्मिक या तात्कालिक रूप से निर्धारित नहीं की जा सकती। पिछली घटनाएं, दुर्घटनाएं, संधियां, समझौते देखने ही पड़ते हैं। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं से भी हम सब बंधे हुए हैं। लिहाजा तदर्थ और औचक हलचल किसी बड़े पचड़े में डाल सकती है। नए प्रयोग की शुरुआत पाकिस्तान से क्यों?- पाकिस्तान से अपने रिश्तों की मुश्किल से पूरी दुनिया वाकिफ है। किसी भी तरह की बातचीत से पहले आतंकवाद और कश्मीर का पच्चर फंस जाता है। देश के भीतर सांप्रदायिक रंग की बातों और आंतरिक राजनीति में पाकिस्तान की बातों के बिना हम अपना राजनीतिक गुजारा नहीं कर पा रहे हैं। जिस तरह किसी कथा या उपन्यास में खलनायक जरूरी है उसी तरह घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक खलनायक बनाए रखने का चलन है। क्या यह सच नहीं है कि दोनों देशों के राजनीतिक दलों ने अपनी सियासी जरूरतों के लिहाज से अपनी अपनी जनता के मन में अपने पड़ोसी के प्रति उसी तरह के खलनायक की छवि बनाए रखने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। कमोबेश दोनों तरफ से। लिहाजा अब भाजपा के सत्ता में आने के बाद अचानक पाकिस्तान के प्रति अपने रुझान को बदलने का आधार क्या बताया जा सकता है। और फिर भाजपा के सहयोगी दल और भाजपा के कार्यकर्ता इस मामले में इतनी जल्दी पुराने रुख को छोडक़र उस पड़ोसी से अचानक अपनापा दिखाने के लिए आसानी से तैयार कैसे हो पाएंगे? और किस बिना पर? इसीलिए पिछले एक दशक से सत्ता में रही यूपीए के नेता को नरेंद्र मोदी के अचानक पाकिस्तान दौरे को लेकर सवाल उठाते रहे। वे पूछते रहे कि पिछले दो साल में पाकिस्तान की तरफ से ऐसा कौन सा संकेत मिला है जिसके आधार पर कहा जा सके कि पाकिस्तान से बातचीत लायक माहौल बन गया है। फर्ज कीजिए मनमोहन सिंह ने ऐसा किया होता-यूपीए सरकार गए अभी दो साल भी नहीं हुए हैं। आतंकवाद के खिलाफ और उस बहाने पाकिस्तान के खिलाफ माहौल बनाए रखने के लिए तब विपक्ष में रही भाजपा के रुख को इतनी जल्दी भुलाया नहीं जा सकता। सोचकर देखें कि अगर मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान से बातचीत का ऐसा रुख दिखाया होता, तो भाजपा का क्या रवैया होता? इस काल्पनिक स्थिति को यह कहते हुए भी खारिज नहीं किया जा सकता कि तब स्थितियां भिन्न थीं। क्योंकि पाकिस्तान की तरफ से हाल फिलहाल कोई भी संकेत नहीं आया है कि हालात बदले हैं। यानी आज प्रधानमंत्री का औचक दौरा माहौल बदलने के मकसद से साबित किया जाए, तो आज से दो साल पहले के माहौल में भी साबित हो सकता था। लेकिन तब विपक्ष में रही भाजपा का रुख पाकिस्तान के प्रति शुक्रवार जैसा उदार नहीं था। यानी वह मनमोहन के दौरे के खिलाफ आसमान सिर पर उठा लेती।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नवाज शरीफ को एक दूसरे से जोडऩे वाले का नाम है सज्जन जिंदल
प्रधानमंत्री नरेगमोदी अचानक पहली बार पाकिस्तान पहुंचे और अगले वर्ष फिर से वह सार्क सम्मेलन में हिस्सा लेने पाकिस्तान जाएंगे। पीएम मोदी के इस अचानक कुछ घंटे के पाकिस्‍तान दौरे से हर कोई हैरान है। वहीं एक नाम जो बार-बार हर किसी के जेहन में आ रहा है वह जिंदल स्टील्स के सज्जन जिंदल का। सज्न पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ के करीबी हैं और वह भी आज ही लाहौर पहुंचे हैं। सज्जन कांग्रेस के पूर्व सांसद नवीन जिंदल के भाई भी हैं। नवाज शरीफ और मोदी की नेपाल के काठमांडू में सार्क सम्‍मेलन के दौरान हुई मुलाकात हर किसी को याद है। साथ ही यह भी कोई नहीं भूला है कि दोनों नेता सम्मेलन की शुरुआत में एक दूसरे की ओर देख भी नहीं रहे थे। लेकिन इसी सम्मेलन में दोनों नेताओं के बीच एक घंटे की एक सीक्रेट मीटिंग भी हुई थी। सार्क सम्मेलन से अलग हुई इस सीक्रेट मीटिंग पीछे सज्‍जन जिंदल की कोशिशों को श्रेय दिया जा रहा था। सीनियर जर्नलिस्‍ट बरखा दत्त ने हाल ही में अपनी किताब में इस बात का खुलासा किया है। बरखा ने अपनी किताब में लिखा है कि सबके सामने एक-दूसरे से मुंह चुराने वाले पीएम शरीफ और पीएम मोदी को एक व्यक्ति ऐसा मिला जो चीजों के कठिन होने के बावजूद उन्हें एक साथ जोडक़र रख सकता है। दत्त ने अपनी किताब में जिंदल को दोनों नेताओं के बीच एक तरह के अप्रत्यक्ष पुल के तौर पर परिभाषित किया है।

सिंहस्थ की ब्रांडिंग पर विदेशों में 58 करोड़ खर्च होंगे

डॉ. अरूण जैन
 सिंहस्थ 2016 की ब्रांडिंग अब विदेशों में भी होगी। अकेले जनसंपर्क विभाग इस पर करीब 58 करोड़ रूपए खर्च करने जा रहा है। युएसए और यूके में भी सिंहस्थ महाकुंभ के पोस्टर लगाए गए है। वहीं फ्लाईट मैगजिन, विदेशी समाचार पत्रों में भी विज्ञापन देने की योजना बनाई गई है।

अकाल के कारण 1897 में सिंहस्थ महिदपुर में हुआ था...

डॉ. अरूण जैन
   आपको यह जानकर थोड़ा आश्चर्य होगा कि वर्ष 1897 में उज्जैन नगरी में होने वाला सिंहस्थ आयोजित नहीं किया गया था। मगर यह सत्य है कि सिंहस्थ का आयोजन उज्जैन के स्थान पर अन्यत्र महिदपुर में आयोजित किया गया था। आज से 118 वर्ष पूर्व 1897 में उज्जैन भीषण अकाल की चपेट में था। उस समय भीषण अकाल के कारण लोग अन्न और जल के लिये तरस गये थे। सिंहस्थ के साल लोग पलायन करने लगे। ऐसे में शिप्रा नदी में पानी सूख गया था। शिप्रा में स्नान की समस्या उठ खड़ी हुई। साधुओं के लिये अन्न-जल के प्रबंध की समस्या भी सामने ही थी। तत्कालीन सिंहस्थ रियासत सिंहस्थ की व्यवस्था करने में असहाय महसूस करने लगी। सिन्धिया शासन ने इन्दौर के होल्कर राजा के माध्यम से साधुओं को यह सन्देश दिया कि अकाल के कारण उनके लिये उज्जैन में सिंहस्थ का आयोजन करना असंभव है। अत; वे उज्जैन न आयें। सिन्धिया रियासत ने आपातकालीन व्यवस्था न कर पाने के साथ सख्ती के भी संकेत दिये। उस समय इन्दौर से होकर उन्हेल होते हुए महिदपुर का रास्ता था। महिदपुर में होल्कर रियासत का राज था। शिप्रा की एक उगाल अर्थात् पानी का एक बड़ा हिस्सा महिदपुर के गंगवाड़ी क्षेत्र में भी था। होल्कर नरेश ने साधुओं के सिंहस्थ स्नान की व्यवस्था गंगवाड़ी में की और यहां आने वाली जमातों की व्यवस्था भी की गई। इस कार्य से साधुओं के गंगवाड़ी पहुंचने पर महिदपुर में सिंहस्थ मेला भरा और साधुओं को गंगवाड़ी में स्थित शिप्रा नदी की उगाल में ही स्नान कर संतोष करना पड़ा। उस समय सिंहस्थ के इतिहास में यह पहली घटना थी, जब सिंहस्थ के दौरान रामघाट और समूचा स्थान सूना रहा और सिंहस्थ यहां से 60 किलो मीटर दूर महिदपुर के गंगवाड़ी में आयोजित हुआ। इसके बाद सन् 1919 में पुन: अगला सिंहस्थ परम्परागत रूप से पुन: उज्जैन में ही होना शुरू हुआप गौरव नारायण उपाध्याय अकाल के कारण 1897 में सिंहस्थ उज्जैन की जगह महिदपुर में हुआ था

धूल भरे गुबार में होगा क्या सिंहस्थ !

अरूण जैन
सिर पटक- पटक कर मर जाओ, पर अधिकारी सिस्टेमेटिक काम नही करेंगे। काम हो रहे हैं, पर उनका लाभ इसलिए नही मिल रहा क्योंकि जुड़े हुए छोटे-छोटे काम पूरे नहीं हो रहे है। सिंहस्थ को किस प्रकार से करना चाहते हैं यह शायद सरकार में बैठे किसी भी जनप्रतिनिधि को नही समझ आ रहा! आखिर कौन जिम्मेदारी लेगा व्यवस्थित कामकाज की ?
बड़े-बड़े कामों पर ही नजर डालें तो जीरो पाइंट ओवरब्रिज के पहुंच मार्ग काम मंथर गति से चल रहा है। यह सिंहस्थ का सबसे जरूरी ओवरब्रिज है। जयसिंहपुरा सड़क मार्ग देखें तो यह महत्वपूर्ण पड़ाव स्थल है, पर इसके उबड़-खाबड़ पन का भगवान मालिक है। कई जगह तो इतना उॅंचा-नीचा और गढ्ढे हैं कि दुर्घटनाएं अवश्यम्भावी है। कुछ सड़क मार्ग अभी भी अधूरा है। वाकणकर ब्रिज और शांतिपैलेस के समीप के ओवरब्रिज के पहुंच मार्ग के छोटे-छोटे टुकड़े बचे हुए है। कोई उन्हें पूरे करने नहीं जा रहा ।
मंगलनाथ-सिद्धवट और आयुर्वेद कालेज वाली सड़के भी धूल चाट रही है। ये सभी जरूरी पड़ाव स्थल हैं । पड़ाव स्थलो पर शौचालय निर्माण, समतलीकरण बहुत सुस्त स्थिति में चल रहा है। निम्नस्तरीय भी है। मानकर चलिए यह पैसा तो पानी में बहाया जा रहा है । मेरा मानना है कि अधिकारियों को अभय दान देने की बातें करना फिजूल हैं। एक केन्द्रीय व्यक्ति सिलसिलेवार काम देखें प्रतिदिन और उन्हे क्रम से पूरे करवाए अन्यथा धूल के गुबार भरा सिंहस्थ ही होगा ।

कामों से असन्तुष्ट संतो के अखाड़े कर सकते है सिंहस्थ का बहिष्कार


डॉ. अरूण जैन
संतों का कहना है कि सरकार सिहंस्थ के आयोजन में तीन हजार करोड़ रुपए खर्च कर रही है, जिसका सदुपयोग नहीं हुआ है. इसकी जगह इतने बड़ी राशि का थोड़ा सा भी हिस्सा अखाड़ों पर खर्च कर दिया जाता तो उनका कायाकल्प हो जाता. अखाड़ों का कहना है कि अगर यही हाल रहा तो उनके जरिए मेले का बहिष्कार करने का निर्णय भी लिया जा सकता है ।
अखाड़ों ने कहा -कर सकते हैं मेले का बहिष्कार उज्जैन सिंहस्थ को तीन महीने से भी कम समय बचा है लेकिन उसकी तैयारियां अभी भी पूरी नहीं हो सकी है. इससे नाराज संत -अखाड़ों ने अब प्रशासन पर सवाल खड़े करना शुरू कर दिया है. गुरु दत्तात्रेय अखाड़े के प्रमुख पीर महंत परमानंद पुरीजी महाराज ने नवनियुक्त सिंहस्थ केंद्रीय समिति के अध्यक्ष माखनसिंह चौहान से सिंहस्थ की तैयारी को लेकर बड़े ही तल्ख लहजे में सवाल किए. उन्होंने चौहान से सीधे पूछा कि जो काम पिछले तीन साल से सरकार पूरा नहीं कर पाई है वहीं काम महज पांच महीने में भला वो कैसे पूरा कर पाएंगे. इस पर चौहान ने संत से उनका आशीर्वाद मांग काम अच्छे से और समय पर पूरा करने की बात कही. सभी अखाड़े हैं नाराज सिहंस्थ-2016 की तैयारी को लेकर सभी अखाड़ों में भारी असंतोष है.अभी तक की व्यवस्था से कोई भी अखाड़ा संतुष्ट नजर नहीं आ रहा है.