Thursday, 14 April 2016

अब पत्रकारों का दमन नही कर पायेगी पुलिस

डॉ. अरूण जैन
पत्रकारों के साथ बढ़ती ज्यादती और पुलिस के अनुचित व्यवहार के चलते कई बार पत्रकार आजादी के साथ अपना काम नही कर पाते है... उसी को ध्यान में रखते हुए भारतीय प्रेस काउंसिल के अध्यक्ष ने राज्य सरकारों को चेतावनी देते हुए निर्देश भी दिया है कि पुलिस आदि पत्रकारों के साथ बदसलूकी ना करे...। पत्रकार भीड़ का हिस्सा नही है...। किसी स्थान पर हिंसा या बवाल होने की स्थिति में पत्रकारों को उनके काम करने में पुलिस व्यवधान नही पहुँचा सकती। पुलिस जैसे भीड़ को हटाती है वैसा व्यवहार पत्रकारों के साथ नही कर सकती। ऐसा होने की स्थिति में बदसलूकी करने वाले पुलिसवालों या अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक मामला दर्ज किया जायेगा...। कहाँ कि जिस तरह कोर्ट में एक अधिवक्ता अपने मुवक्किल का हत्या का केस लड़ता है पर वह हत्यारा नही हो जाता है। उसी प्रकार किसी सावर्जनिक स्थान पर पत्रकार अपना काम करते है पर वे भीड़ का हिस्सा नही होते। इस लिए पत्रकारों को उनके काम से रोकना मिडिया की स्वतंत्रता का हनन करना है...सभी राज्यों को दिए निर्देश. प्रेस काउन्सिल ने देश के केबिनेट सचिव, गृह सचिव, सभी राज्यों के मुख्यमंत्री, मुख्य सचिवों व गृह सचिवों को इस सम्बन्ध में निर्देश भेजा है... और उसमे स्पष्ट कहा है कि पत्रकारों के साथ पुलिस या अर्द्ध सैनिक बलों की हिंसा बर्दाश्त नही की जायेगी...। सरकारे ये सुनिश्चित करे की पत्रकारों के साथ ऐसी कोई कार्यवाही कही न हो। पुलिस की पत्रकारों के साथ की गयी हिंसा मिडिया की स्वतन्त्रता के अधिकार का हनन माना जायेगा जो उसे संविधान की धारा 19 एक ए में दी गयी है। और इस संविधान की धारा के तहत बदसलूकी करने वाले पुलिसकर्मी या अधिकारी पर आपराधिक मामला दर्ज होगा।

Wednesday, 13 April 2016

आनन्दी बेन के बहाने मोदी का कईयों पर निशाना


डाॅ. अरूण जैन
पिछले दिनों गुजरात की मुख्यमंत्री आनन्दी बेन पटेल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिलीं, इसी दौरान नरेन्द्र मोदी ने अनन्दी बेन से भेंट के दौरान कहा कि शिकायतें मिली हैं कि सरकार के कामकाज में आपके दोनों भाई-बहन जबरदस्ती  दखल करते हैं और खूब पैसा बना रहे हैं, मोदी के द्वारा अनन्दी बेन से की गई इस तरह की चर्चा के बाद राजनीतिक क्षेत्र में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं इस संबंध में राजनीतिक पण्डितों का मानना है कि कहीं मोदी ने अपने प्रदेश गुजरात की मुख्यमंत्री अनन्दी बेन के बहाने पार्टी के अन्य मुख्यमंत्री और मंत्रियों पर तो निशाना नहीं साधा है? यह उल्लेखनीय है कि मध्यप्रदेश के संगठन के मुखिया नन्दकुमार सिंह चौहान के द्वारा मोदी की प्रदेश में आने की तैयारी के दौरान यह कहना कि हमारे कामकाज का आंकलन दिल्ली भी करती है, श्री चौहान के इस तरह के संकेत से यह झलकता है कि कहीं मोदी ने अनन्दी बेन के बहाने मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री  और मंत्रियों को तो चेतावनी देने का काम तो नहीं किया है, यह सर्वविदित है कि जिस तरह की शिकायतें अनन्दी बेन के मामले में उनके परिजनों का राजनीति में दखलंदाजी करने और पैसा कमाने जैसी बात नरेन्द्र मोदी द्वारा की गई। ठीक उसी तरह का माहौल मध्यप्रदेश में वर्षों से स्थित है और प्रदेश की प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस के नेताओं द्वारा सदन से लेकर सड़कों तक मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिजनों से लेकर उनके मंत्रीमण्डल के सदस्यों पर कई गंभीर आरोप लगाए हालांकि यह आरोप सत्ता बल के दम पर दबा दिए गए तो वहीं कई मामलों को लेकर न्यायालय तक विपक्षी दलों के नेताओं को घसीटा गया। शायद इसी वजह से वह दबते रहे मगर भाजपा के संगठन के मुखिया नन्दकुमार सिंह चौहान के हाल ही में इस तरह के दिये गये बयान से अब यह स्पष्ट हो गया है कि प्रदेश के सत्ताधीशों के परिजनों द्वारा राज्य में चल रही चर्चाओं के अनुसार प्रदेश में भी सत्ता पर काबिज सत्ताधारियों के परिजनों के द्वारा ठीक गुजरात की मुख्यमंत्री अनंदी बेन के परिजनों की तरह लगातार गतिविधियां चल रही हैं, शायद इसका भान प्रधानमंत्री को है, हालांकि लोगों का यह भी मानना है कि प्रधानमंत्री के राज्य के सत्ता से जुड़े हर व्यक्ति की पल-पल की खबरें ले रहे हैं, इसके पीछे प्रधानमंत्री की क्या मंशा है, यह तो वही जाने लेकिन उनका यह नारा कि ना खायेंगे और ना खाने देंगे के विपरीत इस प्रदेश में खाओ और खाने दो की नीति का अनुसरण किया जा रहा है और इसी के चलते राज्य में मंत्रियों अधिकारियों, सत्ता के दलालों और ठेकेदारों का एक रैकेट सक्रिय है जो तमाम सरकारी योजनाओं में हेराफेरी करके जहां सरकारी खजाने को चूना लगाने का काम कर रहा है इसके प्रमाण पिछले दिनों मुख्यमंत्री द्वारा अपने अधिकारियों के  सूखा पर्यटन के अंतर्गत राज्यभर में भेजने और जमीनी हकीकत का पता लगाने के बाद जो रिपोर्ट इस सूखा पर्यटन के बाद अधिकारियों ने मुख्यमंत्री को सौंपी है उसमें इस बात का उल्लेख है कि राज्य में सरकारी योजनाओं में भयंकर धांधली चल रही है और बिना पैसे लिये लोगों का कोई काम नहीं हो रहा है तो वहीं सरकारी योजनाओं की जानकारी आमजन तक नहीं है, इससे यह साफ जाहिर हो जाता है कि सरकारी योजनाओं की जानकारी देने काम जहां सरकारी अधिकारियों का है तो वहीं संगठन से जुड़े लोगों का भी यह दायित्व बनता है कि वह लोगों की समस्याओं से रूबरू हों और उनकी पार्टी की सरकार द्वारा चलाई जा रही लोककल्याणकारी योजनाओं की जानकारी प्रदेश के जन-जन तक पहुंचायें लेकिन ऐसा कुछ नजर नहीं आ रहा है कि पार्टी से संगठन से जुड़े लोगों की रुचि इस ओर हो, ऐसे कई अवसर भी आए जब प्रदेश के सत्ता और संगठन से जुड़े मुखियाओं द्वारा अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं और नेताओं से यह कहा गया कि वह राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही जनहितैषी योजनाओं की जानकारी जन-जन तक पहुंचाएं लेकिन आज तक ऐसा कहीं नजर नहीं आया कि संगठन से जुड़े लोगों द्वारा इस तरह का कोई कदम उठाया हो, हाँ यह जरूर देखा गया कि जो सरकार द्वारा जनकल्याणकारी येाजनायें आम जनता के लिये चलाई जा रही हैं उन योजनाओं का लाभ उठाने में संगठन के लोग सक्रिय दिखाई देते हैं, शायद यही वजह है कि प्रदेश भर में संगठन से जुड़े अधिकांश लोगों का जीवन स्तर इस सरकार के चलते ही सुधरा है यह उनके आसपास के रहनेवाले लोग भी जान रहे हैं तो वहीं शिवराज सिंह चौहान ने शायद यही वजह है कि नरेन्द्र मोदी के मध्यप्रदेश प्रवास के दौरान सीहोर जिले के शेरपुरा में आने का जब न्यौता पूरे प्रदेश के किसानों को किसान कुंभ के लिये देते वक्त यह भी कहा कि कार्यकर्ता अपने वाहनों से आयें मुख्यमंत्री के इस संदेश से यह साफ जाहिर होता है कि प्रदेश में उनके कार्याकाल के दौरान उन भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं की स्थिति में सुधार हुआ है जिनके पास कल तक टूटी साइकिल खरीदने तक के पैसे नहीं रहते थे आज वह आलीशान भवनों और लग्जरी वाहनों में फर्राटे लेते नजर आ रहे हैं। इस सब स्थिति को देखते हुए राष्ट्रीय जनशक्ति पार्टी की तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सुश्री उमा भारती के 2009 तक लगाए गए इस तरह के आरोपों की याद आ जाती है और यह साफ हो जाता है कि उन्होंने उस समय जो कहा वह अब हकीकत प्रदेश में भाजपाई कार्यकर्ताओं और नेताओं के विकास को देखकर नजर आने लगा है, मामला जो भी हो लेकिन हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा उनके गृह जिले गुजरात की मुख्यमंत्री अनन्दी बेन के परिजनों के सरकारी कामकाज में दखलंदाजी और पैसा कमाने की जो बात कही है, देखना अब यह है कि मध्यप्रदेश में चल रहे इस तरह के वातावरण को लेकर प्रधानमंत्री इस प्रदेश पर कब निगाहे करम करेंगे जब ऐसा होगा तो उनका यह नारा न खाएंगे न खाने देंगे के प्रति प्रदेश के साढ़े सात करोड़ नागरिकों में भी यह विश्वास जागृत होगा कि वह जो कहते हैं वह करते हैं, देखना अब यह है कि वह क्षण कब आएगा जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस तरह का संदेश प्रदेश के अपने नेताओं को देंगे। 

Monday, 8 February 2016

अखबारों से हटाये गये मीडिया कर्मिंयो का विवरण मांगा

डॉ. अरूण जैन
मजीठिया वेज बोर्ड मामले में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में अदालत ने अखबार मालिकों की गुंडई और दुस्साहस को संज्ञान लेते हुए वकीलों को निर्देश दिया कि वे वेज बोर्ड मांगने के कारण अखबारों से निकाले गए या ट्रांसफर किए गए या किसी रूप में प्रताडि़त किए गए मीडियाकर्मियों के डिटेल दाखिल करें. मीडियाकर्मियों के वकीलों के तर्क को अदालत ने गंभीरता से सुनने के बाद रजिस्ट्री को कहा कि राज्यों से जो रिपोर्ट मंगाई गई है उसे वकीलों को अधिकृत रूप से मुहैया कराया जाए ताकि वो अध्ययन करके रिपोर्ट अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकें और उसी पक्ष में मीडियाकर्मियों के साथ हो रहे नकारात्मक व्यवहार का उल्लेख करें.अदालत ने पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए छह हफ्ते बाद आने को कहा. इसके अलावा एक अन्य बड़ा डेवलपमेंट ये रहा कि मजीठिया मामले में जो केस नंबर एक है, दैनिक जागरण के कुछ कर्मियों से जुड़ा, उसके वकील अब परमानंद पांडेय नहीं होंगे. उनकी जगह कर्मियों ने कालिन गोंजाल्विस को वकील नियुक्त किया है. चर्चा है कि दैनिक जागरण के अन्य कर्मी भी परमानंद पांडेय को अपने वकील के रूप में न रखने को लेकर सक्रिय हैं और जल्द ही कोई बड़ा डेवलपमेंट हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट मे मजीठिया मामले की जब सुनवाई हुई तो सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगई ने देश भर के अखबारो में मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं करने पर न सिर्फ नाराजगी जताई बल्कि पत्रकारों के दुखों को अदालत के संज्ञान में लाने के लिए वकीलों से कहा. वकीलों ने बहस के दौरान कोर्ट के बताया कि अदालत द्वारा दिए गए समय के भीतर कई राज्यों ने मजीठिया वेज बोर्ड के इंप्लीमेंटेशन पर स्टेटस रिपोर्ट पेश नहीं की है. इस कारण पूरा मामला टलता जा रहा है और मीडियाकर्मियों का उत्पीडऩ किया जा रहा है. जस्टिस गोगई ने पीडि़त पत्रकारों को दो सप्ताह में एडिशनल एफिडेविट पेश करने को कहा. साथ ही सभी राज्यों को भी आदेश दिया कि वो दो सप्ताह में रिपोर्ट पेश करें. मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी. [1/30, 21:50] क्चह्म्ड्डद्भ . क्कड्डह्म्द्वड्डह्म्: मजीठिया वेज बोर्ड मामले में आज सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई में अदालत ने अखबार मालिकों की गुंडई और दुस्साहस को संज्ञान लेते हुए वकीलों को निर्देश दिया कि वे वेज बोर्ड मांगने के कारण अखबारों से निकाले गए या ट्रांसफर किए गए या किसी रूप में प्रताडि़त किए गए मीडियाकर्मियों के डिटेल दाखिल करें. मीडियाकर्मियों के वकीलों के तर्क को अदालत ने गंभीरता से सुनने के बाद रजिस्ट्री को कहा कि राज्यों से जो रिपोर्ट मंगाई गई है उसे वकीलों को अधिकृत रूप से मुहैया कराया जाए ताकि वो अध्ययन करके रिपोर्ट अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकें और उसी पक्ष में मीडियाकर्मियों के साथ हो रहे नकारात्मक व्यवहार का उल्लेख करें. अदालत ने पूरे मामले की अगली सुनवाई के लिए छह हफ्ते बाद आने को कहा. इसके अलावा एक अन्य बड़ा डेवलपमेंट ये रहा कि मजीठिया मामले में जो केस नंबर एक है, दैनिक जागरण के कुछ कर्मियों से जुड़ा, उसके वकील अब परमानंद पांडेय नहीं होंगे. उनकी जगह कर्मियों ने कालिन गोंजाल्विस को वकील नियुक्त किया है. चर्चा है कि दैनिक जागरण के अन्य कर्मी भी परमानंद पांडेय को अपने वकील के रूप में न रखने को लेकर सक्रिय हैं और जल्द ही कोई बड़ा डेवलपमेंट हो सकता है. सुप्रीम कोर्ट मे मजीठिया मामले की जब सुनवाई हुई तो सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस रंजन गोगई ने देश भर के अखबारो में मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं करने पर न सिर्फ नाराजगी जताई बल्कि पत्रकारों के दुखों को अदालत के संज्ञान में लाने के लिए वकीलों से कहा. वकीलों ने बहस के दौरान कोर्ट के बताया कि अदालत द्वारा दिए गए समय के भीतर कई राज्यों ने मजीठिया वेज बोर्ड के इंप्लीमेंटेशन पर स्टेटस रिपोर्ट पेश नहीं की है. इस कारण पूरा मामला टलता जा रहा है और मीडियाकर्मियों का उत्पीडऩ किया जा रहा है. जस्टिस गोगई ने पीडि़त पत्रकारों को दो सप्ताह में एडिशनल एफिडेविट पेश करने को कहा. साथ ही सभी राज्यों को भी आदेश दिया कि वो दो सप्ताह में रिपोर्ट पेश करें. मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद होगी.

इस सिंहस्थ के बाद क्या ?

डॉ. अरूण जैन
सिंहस्थ के साथ प्रदेश की सत्ता का अजब संयोग है। जिसकी अगुवाई में मेले का आयोजन होता है, उसकी सत्ता चली जाती है। संदर्भ तो यहीं संकेत देते है कि जिस वर्ष उज्जैन में मेला आयोजित हुआ, प्राय: उसी वर्ष में मध्यप्रदेश के सत्ता नेतृत्व में फेरबदल हो गया। कभी रातों-रात मुख्यमंत्री बदले तो कहीं चुनावी नतीजों के कारण पूरी सत्ता का ही परिवर्तन हो गया। कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन सिंहस्थ और सत्ता परिवर्तन के इस संयोग की चर्चा राजनीतिक गलियारों में भी है। आजादी के बाद दो बार साधु-संतों व विद्वानों के बीच विवाद के कारण ऐसा संयोग भी बना कि लगातार दो वर्षों तक दो बार सिंहस्थ आयोजित हुआ।  कब-किसकी कैसे बदली सत्ता ज्योतिषाचार्य एवम्  भारतीय ज्योतिष शास्त्र के अनुसार राजनीति का कारक ग्रह राहु तथा शनि को विशेष तौर पर माना गया है। जब भी गोचर काल में राहु-शनि का अन्य पाप ग्रहों से खडाष्टक अथवा दृष्टि संबंध या युति संबंध होता है तो राजनीति परिप्रेक्ष्य में परिवर्तन की स्थितियां बनती हैं। चूंकि बृहस्पति का गोचर काल सिंह राशि में बारह वर्ष बाद बनता है तब विपरीत स्थितियों में ग्रहों का दृष्टि संबंध शासन परिवर्तन करवाता है और प्राय: जब शनि, मंगल का भी गोचर काल वक्र गति से होता है तो वह परिवर्तन की स्थिति को बल प्रदान करता है। इस बार भी सिंहस्थ में इस प्रकार के योग बन रहे हैं, जो प्रदेश में सत्ता सहित बड़े स्तर पर शासकीय परिवर्तन की ओर  इशारा कर रहे हैं। अप्रैल-मई 2004 में सिंहस्थ हुआ। प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ 8 दिसंबर 2003 को मुख्यमंत्री बनीं भाजपा नेता उमा भारती एक साल भी पद पर काबिज नहीं रह सकीं। 1994 में हुए हुबली दंगा मामले में कर्नाटक की कोर्ट से अरेस्ट वारंट जारी होने के कारण उन्हें 23 अगस्त 2004 को रातों-रात इस्तीफा देकर पद छोडऩा पड़ा और 23 अगस्त 2004 को ही बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री बने। अप्रैल-मई 1992 में सिंहस्थ हुआ। तब सुंदरलाल पटवा (5 मार्च 1990 से 15 दिसंबर 1992 तक) मुख्यमंत्री थे। बाबरी मस्जिद ढहने के कारण बीजेपी शासित प्रदेशों में 16 दिसंबर 1992 को रातों-रात सरकार बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। प्रदेश में 6 दिसंबर 1993 तक राष्ट्रपति शासन रहा। इसके बाद 7 दिसंबर 1993 को कांग्रेस के दिग्विजयसिंह मुख्यमंत्री बने। मार्च-अप्रैल 1980 में सिंहस्थ हुआ। जनता पार्टी की सरकार थी, वीरेंद्र सकलेचा 18 जनवरी 1978 से 19 जनवरी 1980 तक सीएम रहे। इनके बाद 20 जनवरी 80 से 17 फरवरी 80 तक सुंदरलाल पटवा सीएम रहे। इमरजेंसी के बाद प्रदेश में 18 फरवरी 1980 को राष्ट्रपति शासन लगा दिया। 8 जून 80 तक राष्ट्रपति शासन रहा। 9 जून 1980 को कांग्रेस के अर्जुन सिंह सीएम बने। अप्रैल-मई 1968 और अप्रैल-मई 1969 में सिंहस्थ हुआ। गोविंद नारायण सिंह (30 जुलाई 1967 से 12 मार्च 1969 तक) मुख्यमंत्री थे। इंदिरा और नेहरु कांग्रेस की उलझन के चलते 13 मार्च 1969 को राजा नरेशचंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने। हालांकि वे भी केवल 25 मार्च 1969 तक ही सीएम रह सके। इनके बाद 26 मार्च 1969 को श्यामाचरण शुक्ल मुख्यमंत्री बने। अप्रैल-मई 1956 और अप्रैल-मई 1957 में सिंहस्थ हुआ। 1 नवंबर 1956 को मप्र की स्थापना हुई, तब रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री थे। 31 दिसंबर 1956 को उनके निधन के बाद भगवंत राव मंडलोई को 1 जनवरी 1957 को सीएम बनाया। वे भी 30 जनवरी 57 तक मात्र एक महीने मुख्यमंत्री रह सके। इनके बाद 31 जनवरी 1957 को कैलाशनाथ काटजू मुख्यमंत्री बने।

शिप्रा में नहीं मिलेगा खान का पानी

डॉ. अरूण जैन

सिंहस्थ-2016 के दौरान क्षिप्रा नदी में शुद्ध जल से स्नान हो सके, इसके लिये राज्य शासन द्वारा खान नदी डायवर्शन योजना पर काम किया जा रहा है। 19 किलो मीटर लम्बाई में ग्राम पिपल्याराघौ से निकालकर खान नदी को पाइप लाइन के जरिये कालियादेह महल के आगे क्षिप्रा नदी से जोड़ा जायेगा। इस तरह त्रिवेणी के आगे से भूखी माता, रामघाट और मंगलनाथ क्षेत्र के सभी घाटों पर क्षिप्रा नदी का शुद्ध जल प्रवाहित होगा। सम्पूर्ण योजना के लिये राज्य शासन द्वारा 90 करोड रूपये की राशि स्वीकृत की गई है। निर्माण कार्य पूर्ण गति के साथ चलाया जा रहा है और अनुमान है फरवरी-2016 तक यह कार्य पूर्ण हो जायेगा। योजना अन्तर्गत अब तक 1.8 किलो मीटर लम्बाई में पाइप लाइन बिछाने का कार्य पूर्ण हो चुका है।  साथ ही इस पर 14 करोड रूपये का व्यय करते हुए भुगतान कॉन्ट्रेक्टर मेसर्स के.के.स्पन पाइप को किया गया है। योजना के रास्ते में आने वाले रेलवे एवं सडक मार्गों के नीचे पुशिंग पद्धति से पाइप लाइन नीचे सरकाकर बिना सडक को नुकसान किये कार्य किया जा रहा है। खान डायवर्शन में सीमेन्ट-कांक्रीट के 2.6 मीटर व्यास के पाइप डाले जा रहे हैं। पाइप का आकार इतना बड़ा है कि छोटी कार इसमें से होकर गुजर सकती है। पाइप लाइन डालने के लिये मिट्टी की खुदाई का कार्य भी तेजी से जारी है। सम्पूर्ण योजना के लिये 15 लाख घनमीटर मिट्टी की खुदाई करना है। पिपल्याराघौ से लेकर कालियादेह महल तक अलग-अलग गहराई में पाइप लाइन के लिये खुदाई हो गई है। 7.75 मिलीयन गैलन (एमजीडी) के 2 जलशोधन प्लांट सिंहस्थ-2016 के लिये गऊघाट पर छह मिलीयन गैलन (एमजीडी) जलशोधन का प्लांट छह करोड़ 17 लाख रूपये की लागत से तैयार हो रहा है। इसी तरह साहिबखेड़ी पर पाँच करोड़ 90 लाख रूपये से 1.75 एमजीडी का, इस तरह दो जलशोधन प्लांट तैयार हो रहे हैं। गऊघाट के जलशोधन प्लांट से नर्मदा-क्षिप्रा लिंक से प्राप्त होने वाले पानी का शोधन कर पीने योग्य बनायेगा तथा साहिबखेडी जलशोधन प्लांट साहिबखेडी के जल को शुद्ध करेगा। वर्तमान में इस तरह के चार प्लांट पूर्व से ही कार्यरत् हैं। सिंहस्थ में उक्त प्लांट से 35 मिलीयन लीटर प्रतिदिन अतिरिक्त जल प्राप्त हो सकेगा। सिंहस्थ के लिये विकसित की जा रही इस सुविधा का लाभ आने वाले समय में उज्जैन की जनता को निरन्तर मिलता रहेगा। सिंहस्थ में शाही स्नान के दिन लोक स्वास्थ  यांत्रिकी विभाग द्वारा 162 एम.एल.डी. जल प्रदाय होगा। इसी के अनुरुप  सम्पूर्ण मेला अवधि की कार्ययोजना बनाई गई है।
सिंहस्थ-2016 में मध्य प्रदेश पर्यटन विकास निगम 300 स्वीस कॉटेज का निर्माण करेगा। इन्हीं कॉटेजों में से कुछ में वीआईपी के रूकने की व्यवस्था भी की जायेगी। अस्थायी टेन्टों का यह नगर सांवराखेडी क्षेत्र में प्रस्तावित किया गया है। यहां पर पार्किंग एरिया, सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट सहित अन्य उच्चस्तरीय व्यवस्थाएं की जायेंगी। इन कॉटेजेस का प्रबंधन पर्यटन विकास निगम द्वारा होटल की तरह किया जायेगा। कॉटेज के इस नगर को पाँच सेक्टर में बांटा गया है। पर्यटन विकास निगम को सिंहस्थ में 16 करोड 12 लाख रूपये आवंटित किये गये हैं, जबकि गत सिंहस्थ में 46 लाख रूपये पर्यटन विकास निगम को आवंटित किये थे। 
नन्दी हॉल का विस्तार महाकालेश्वर मन्दिर में आने वाले लाखों श्रध्दालुओं व दर्शनार्थियों की सुविधा के मद्देनजर नन्दी हॉल का विस्तार किया गया है। इस विस्तार से अधिक श्रध्दालु भस्मार्ती दर्शन का लाभ ले सकेंगे। नन्दी हॉल की क्षमता दो करोड़ 56 लाख रूपये व्यय कर 700 से दो हजार कर दी गई है।
धर्मशाला विस्तार व अन्य कार्य श्री महाकालेश्वर धर्मशाला में विस्तार किया गया है। यहां पर 68 लाख 90 हजार रूपये की लागत से 12 एसी और 12 नॉनएसी कमरे बनाये गये हैं तथा भूमिगत पार्किंग की व्यवस्था की गई है। इसी तरह हरसिध्दि मन्दिर स्थित अतिथि गृह में आठ कमरे 55 लाख रूपये की लागत से बनाये गये हैं। इसी तरह महाकाल प्रवचन हॉल में इको ट्रीटमेंट एवं एयर कूलिंग सिस्टम लगाया गया है। श्री महाकालेश्वर मन्दिर के बाहरी एवं आन्तरिक परिसर में दर्शनार्थियों की सुविधा हेतु एलईडी लाईट भी लगाये गये हैं।
प्रमुख मन्दिरों का सौंदर्यीकरण सिंहस्थ-2016 में आने वाले श्रध्दालुओं की सुविधा हेतु उज्जैन में प्रमुख मन्दिरों का जीर्णोध्दार व कायाकल्प देवस्थान मद से किया जा रहा है। प्रमुख रूप से मंगलनाथ मन्दिर परिसर, सान्दीपनि आश्रम में गोमती कुंड का जीर्णोध्दार व परिसर का सौंदर्यीकरण, चिन्तामन गणेश मन्दिर परिसर का सौंदर्यीकरण, भर्तृहरि गुफा व काल भैरव मन्दिर परिसर को आकर्षक व सुन्दर बनाकर वहां विजिटर्स फेसिलिटी विकसित की जा रही है।
सिंहस्थ में ट्राफिक कंट्रोल एवं सुरक्षा व्यवस्था पुलिस अधीक्षक के अनुसार सिंहस्थ के लिये पुलिस द्वारा ट्रैफिक कंट्रोल की डायनामिक व्यवस्था की गई है। प्रमुख तीन शाही स्नानों 22 अप्रैल, 9 मई तथा 21 मई 2016 में पार्किंग की अलग व्यवस्था रहेगी। मेला अवधि में अन्य सामान्य दिनों में अलग व्यवस्था रहेगी।
छह सेटेलाइट टाउन सिंहस्थ अवधि में छह सेटेलाइट टाउन बनाये जा रहे हैं, जहां पर वाहन पार्किंग, यात्रियों के लिये पानी, शौचालय व छाया की व्यवस्था की जा रही है। सभी सेटेलाइट टाउनों के लिये कुल 393 हेक्टेयर भूमि आरक्षित की गई है। सेटेलाइट टाउन इंजीनियरिंग कॉलेज, सांवराखेड़ी, सोयाबीन प्लांट देवास रोड, पंवासा मक्सी रोड, उन्हेल रोड, आगर रोड व बड़नगर रोड पर बनाये जायेंगे। शाही स्नानों के दिन इन्हीं स्थानों पर पार्किंग करवाई जायेगी। आम दिनों में पार्किंग स्थल शाही स्नान की तिथियों को छोडकर (मेला अवधि 22 अप्रैल से 21 मई 2016) आम दिनों में सांवराखेड़ी, लालपुल, भूखीमाता बायपास, जूना सोमवारिया, रणजीत हनुमान, कालभैरव, मंगलनाथ तथा वीर सांवरकर चौराहा पर पार्किंग की सुविधा रहेगी। यात्री बसें यहां तक जायेंगी सिंहस्थ के दौरान उज्जैन शहर में आने वाली यात्री बसों से आने वाले श्रद्धालुओं के लिये विभिन्न बस स्टेण्ड निर्धारित किये गये हैं वे इस प्रकार हैं मक्सी, देवास और इन्दौर रोड से आने वाली बसें नानाखेडा बस स्टेण्ड तक आयेंगी। बडनगर रोड की बसें बड़नगर रोड सेटेलाइट टाउन तक आयेंगी। उन्हेल रोड से आने वाली बसें उन्हेल रोड सेटेलाइट टाउन तक आयेंगी। आगर रोड से आने वाली बसें आगर रोड सेटेलाइट टाउन तक आयेंगी। शहर में सडक पर खडे रहने वाले वाहन एक मार्च से पार्किंग पर शहर में सडकों पर खडे रहने वाले वाहनों को एक मार्च 2016 से नजदीक के पार्किंग स्थल पर खडा करने के निर्देश प्रसारित किये जायेंगे। इस हेतु वाहनों का सर्वेक्षण किया जा रहा है।
1000 मैजिक व 400 मिनी बसें लोक परिवहन के लिये 28 रूट तय किये गये हैं। इन पर एक हजार मैजिक व चार सौ मिनी बसों का संचालन श्रद्धालुओं को लाने-ले जाने के लिये किया जायेगा। नि:शक्तजनों के लिये ई-रिक्शा महाकाल व रामघाट तक चलेंगे। चाक-चौबन्द सुरक्षा व्यवस्था सिंहस्थ में पुलिस द्वारा चाक-चौबन्द सुरक्षा व्यवस्था की जायेगी। सभी प्रवेश-द्वारों पर सशस्त्र नाका चैकिंग लगाई जायेगी। सिंहस्थ क्षेत्र में प्रवेश पर वाहनों व व्यक्तियों की गणना तथा चेकिंग होगी। रेलवे स्टेशनों, हवाई पट्टी पर भी चेकिंग होगी। प्रमुख मन्दिरों की सुरक्षा, स्नान घाटों पर प्रवेश मार्गों पर तथा कोर एरिया में सशस्त्र गार्डों द्वारा निगरानी होगी। इसी के साथ अन्य धार्मिक स्थलों की सुरक्षा, एंटी टेरेरिस्ट स्क्वाड की तैनाती, घाटों व जुलूस मार्ग की ऊंचे भवनों से बायनाकुलर से निगरानी की जायेगी। इसी के साथ होटल, लॉज, ढाबों व धर्मस्थलों की जांच की जायेगी।

शरीफ को सहारे की जरूरत

डॉ. अरूण जैन
इस समय दुनिया में अगर किसी राजनेता को सर्वाधिक सहानुभूति और नैतिक सहारे की जरूरत है, तो वह हैं पाकिस्तान के वजीर-ए-आजम नवाज शरीफ। शरीफ को अपने ही मुल्क में तमाम मोर्चों पर लडऩा पड़ रहा है। अगर वह सफल रहे, तो दुनिया में उनका दर्जा कमाल अतातुर्क जैसा हो जाएगा। असफल होने पर उन्हें मिखाइल गोर्बाचेव की तरह कलंकित होना पड़ सकता है, क्योंकि पाकिस्तान पर विखंडन का खतरा भी मंडरा रहा है। भारत में जो लोग यह सोचकर खुश होते हैं कि पाकिस्तान अपनी लगाई आग में झुलस रहा है, वे आत्मघाती हैं। अशांत और विखंडित पड़ोसी खतरनाक साबित होता है। अपनी सीमाओं पर बसे देशों से भारत के सर्द-गरम रिश्तों पर नजर डाल देखें, सब समझ में आ जाएगा। चीन को हम शत्रु मानते आए हैं। आज उसकी गिनती दुनिया के अमीर मुल्कों में होती है, इसीलिए उसकी सरजमीं से आतंकवादियों का निर्यात नहीं होता। उसके हुक्मरां सीमा विवाद पर बात करने की बजाय व्यापार की बढ़ोतरी पर बल देते हैं। इसके उलट पाकिस्तान की सत्ता और सेना हमारे सीमाई सूबों में आग लगाती रही हैं। अगर पाकिस्तान में भी खुशहाली की बयार बहने लगे, तो वे इधर-उधर उलझने की बजाय अपना घर संवारने में जुट जाएंगे। यह हो कैसे? पहले वहां के अंदरूनी हालात पर नजर डालते हैं। पाकिस्तान एक इस्लामी राष्ट्र है। पाकिस्तान की स्थापना के पीछे अवधारणा थी कि मुसलमानों को ऐसा राज्य चाहिए, जहां वे अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुरूप फल-फूल सकें। मोहनदास करमचंद गांधी के आभा मंडल के सामने अपनी प्रतिष्ठा का दीप बुझता देख मोहम्मद अली जिन्ना ने यह ‘मीठी गोली’ अखंड भारत के मुसलमानों को दी थी। वे अलग देश बनाकर भी नाकामयाब रहे। अपने उदय के साथ पाकिस्तान तमाम विरोधाभासों से घिर गया। धर्म भले एक था, पर इस देश में बहुलतावाद के इतने कारक मौजूद थे कि उन पर सिर्फ मजहब से फतह नहीं पाई जा सकती थी। यही वजह है कि आज के पाकिस्तान में पठानों, बलूचों और अल्पसंख्यकों की सत्ता में भागीदारी लगभग न के बराबर है। जिस पाकिस्तान का गठन इस्लाम के नाम पर हुआ था, वहां के लोगों की हालत अन्य इस्लामी देशों के मुकाबले बेहद खराब है। संसार की सबसे बड़ी मुसलमान आबादी इंडोनेशिया में है। वहां के लोगों की तुलना पाकिस्तानियों से करने पर हम अचरज से भर जाते हैं। इंडोनेशिया की प्रति व्यक्ति सालाना आय 2015 में तकरीबन 11,135 अमेरिकी डॉलर थी। पाकिस्तान में प्रति व्यक्ति आय इसकी आधी से भी कम 4,902 डॉलर है। पिछली गरमियों में पाक में बिजली की इतनी भयंकर कटौती हुई कि 1,200 से ज्यादा लोग लू और ताप से मर गए। इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता पर गुरुवार को हुए आईएस के हमले ने इस्लामाबाद को भी साफ संदेश दिया है। इंडोनेशिया कभी पाकिस्तान की तरह आतंकवाद की ‘प्रयोगशाला’ नहीं रहा। अल बगदादी वहां कयामत बरपाने में जुटा है। पाकिस्तान में तो ओसामा तक शरण पाता रहा है। दहशत के कारोबारी जब जकार्ता को नहीं बख्श रहे, तो भला पाक को क्यों छोड़ेंगे?आतंकवादियों को पालने-पोसने की सजा हमारे पड़ोसी को शिद्दत से मिल रही है। साल 2004 से 2014 के बीच पाकिस्तान में हुए ‘दोस्त’ अमेरिका के ड्रोन हमलों में 2,414 लोग मारे गए और मुल्क में खून-खराबे की वजह से 18 लाख लोगों को दर-बदर होना पड़ा। वहां आपसी मार-काट कितनी भयंकर है, इसका उदाहरण पेशावर के सैनिक स्कूल पर हुआ हमला है। 16 दिसंबर, 2014 को हुई इस घिनौनी आतंकवादी हरकत में 132 बच्चों को मौत के घाट उतार दिया गया था। इसके बाद से पाकिस्तान में बहस तेज हो गई है कि दहशतगर्दी से हमें क्या मिला? नवाज शरीफ और पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष जनरल राहील शरीफ के पास उनसे जूझने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा। सैकड़ों आतंकवादियों को पकडक़र सैनिक अदालतों के हवाले कर दिया गया और दर्जनों लोगों को सूली पर लटका दिया गया। इन कठोरतम फैसलों में भी दोमुंहापन झलक रहा था। अलगाववादियों से तो वहां की हुकूमत निपट रही थी, पर भारत विद्वेषियों को तब भी पनाह दी जा रही थी। यह गलत फैसला था। हाफिज सईद, जकीउर्रहमान लखवी, दाऊद इब्राहिम, मसूद अजहर और इन जैसे दहशतगर्दों ने पाकिस्तानी सत्ता और समाज पर इतनी पकड़ बना ली है कि वे अब इस्लामाबाद के हुक्मरानों को आंखें दिखाने लगे हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण मसूद अजहर का ताजा बयान है। हिरासत में लिए जाते ही जैश की साइट पर पोस्ट किए गए उसके खत में भारत-पाकिस्तान, दोनों को धमकाया गया है। उसने मुशर्रफ पर हुए हमले का भी जिक्र किया है। मतलब, मौलाना अप्रत्यक्ष तौर पर शरीफ को जान से मारने की धमकी दे रहा है। यही नहीं, मुंबई हमलों के ‘मास्टर माइंड’ हाफिज सईद ने जुम्मे की तकरीर में मोदी के साथ नवाज शरीफ को भी कोसा। साफ है। सेना और सत्ता को मिलकर ऐसे तत्वों का सफाया करना होगा, जो परेशानियों से घिरे पाक को नई मुसीबतों में डाल रहे हैं। पाकिस्तान को अब अपनी रीत-नीत में आमूल परिवर्तन करना होगा। आतंकवादियों ने उसे अपनी मिल्कियत समझ लिया है। वे वहां अपनी कारगुजारियों को मालिकाना अंदाज में अंजाम देते हैं। मसूद अजहर की नजरबंदी से उम्मीद जगी है कि आईएसआई, सेना और वहां की अन्य एजेंसियां शांति के इन शत्रुओं को भविष्य में आस और आसरा नहीं देंगी। ऐसे लोगों को सैनिक अदालत के हवाले कर इंसाफ के दरवाजे तक पहुंचाया जाएगा। इसके लिए जरूरी है कि नई दिल्ली, वाशिंगटन और बीजिंग के सत्तानायक मिलकर आतंकवादियों के स्वर्ग (बकौल बराक ओबामा) पाकिस्तान के मौजूदा सत्ता प्रतिष्ठान को यह नैतिक बल प्रदान करें कि वह ऐसे तत्वों की गर्दन मरोड़ सके। इस संबंध में गृह मंत्री राजनाथ सिंह का बयान गौरतलब है कि फिलहाल वहां के हुक्मरानों की नीयत पर शक करने का कोई कारण नहीं है। पाकिस्तान को अपनी नेकनीयती साबित करने के लिए थोड़ा वक्त देना चाहिए। यही वजह है कि पठानकोट हमले के बावजूद नई दिल्ली के सत्तानायकों ने संयमित भाषा का इस्तेमाल किया। परिणाम सामने है। जैश के लोगों की गिरफ्तारी के शुरुआती संकेत शुभ हैं। आप दोनों देशों के विदेश मंत्रालयों के प्रवक्ताओं की भाषा पर गौर करें। ऐसा लगता है, जैसे स्क्रिप्ट साथ बैठकर लिखी गई है। दोनों को मौलाना मसूद की गिरफ्तारी की खबर नहीं, दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकार लगातार संपर्क में हैं, दोनों विदेश सचिवों ने विचार-विनिमय के बाद 15 जनवरी को प्रस्तावित बातचीत को टाला आदि-इत्यादि। और तो और, पाकिस्तान के जांच दल को पठानकोट आने की अनुमति देने को भारत तैयार है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। उम्मीद है, शरीफ और मोदी उन निष्कर्षों पर भी पहुंचेंगे, जिनकी पहले महज कल्पना की गई थी। यहां यह भी गौरतलब है कि राहील शरीफ ने पाकिस्तानी अवाम से वायदा किया है कि 2016 में वह पाक को आतंकवाद से मुक्त करके रहेंगे। उनका यह संकल्प भारत के साथ सुलह किए बिना कैसे पूरा हो सकता है?

यादगार पल सहेजने देना होगी यादगार दक्षिणा

डॉ. अरूण जैन
एक साधु महाराज ने जनसम्पर्क विभाग के बड़े साहब की टेबल पर एक रुक्का धर दिया। अनुशन्सा प्रदेश के मुखिया की और डिमांड दस लाख रुपए के विज्ञापन आरओ की थी। मौका था महाराज की किसी स्मारिका के प्रकाशन का। साहब ने नियम दिखाए, कायदे समझाए, इतना विज्ञापन न दे पाने के दस कारण गिनाए। महाराज ने फिर मुखिया जी का फोन नंबर डायल कर मोबाइल साहब की तरफ सरकाने की प्रक्रिया की। मरता, क्या न करता, साहब को वह करना पड़ा, जो वह करने की मन्शा नहीं रखते थे। इस आरओ को जारी न करने के पीछे साहब दर्द नियमों का अनदेखापन नहीं था, बल्कि बिना दक्षिणा हाथ से फिसलते बड़े आरओ ने उन्हें आहत कर दिया था। हजारों सन्स्थान, एनजीओ और तरह-तरह की दुकानें मौजूद हैं। साल में एक बार स्मारिका के नाम पर 25 से 35 हजार रुपये देने का सरकारी प्रावधान। इससे ज्यादा पाने के लिए पचासों तरह के हथकन्डे। रजिस्टर्ड सन्स्था का जनक भले भूल जाए, लेकिन जनसम्पर्क का एक अमला विशेष इसे नहीं भूलता। शहरभर (या प्रदेशभर कहना भी अतिशयोक्ति भरा नहीं होगा) में फैले गोरखधंधा विशेषज्ञों के अय्यार चुन चुनकर सन्स्थाए जनसम्पर्क की झोली में डाल देते हैं। सन्स्थान सन्चालक(?) के हिस्से आता है जारी विज्ञापन राशि का 30 से 35 फीसदी, 10-15 प्रतिशत बकरा लाने वाले अय्यार की झोली में और बची रकम साहब तथा साहब के कारिन्दो के जेब में। सिलसिला सालों का है, आगे भी जारी रहने की प्रबल संभावना हैं। दस-बीस पेज की मुड़ी तुड़ी मैग्जिन में छपे एक सरकारी विज्ञापन से सरकार की किसी योजना का प्रचार प्रसार की उम्मीद नहीं की जा सकती। सरकार की मन्शा भी इन संस्थाओं को आर्थिक मदद पहुंचाने भर की ही होती है। लेकिन मदद की इस मद से कौन मदमस्त हो रहा है, सब जानते हैं। पुछल्ला एक बड़े साहब, एक उनसे भी बड़े साहब। छोटे छोटे साहबों की भी भरमार। छोटे बाबू, बड़े बाबुओं की फौज से फारिग होते चतुर्थ श्रेणी अधिकारियों की सीरीज कहाँ शुरु हो जाती है, पता ही नहीं लगता। कोई काम लेकर पहुंचे तो मिले किससे? चक्रव्यूह को भेदने की महारत सिर्फ एक ही अभिमन्यु जानता है, वह हैं के अधिकारियों के मुह लगे दलाल।