Monday, 2 January 2017

भाजपा में जबरदस्त बेचैनी का आलम

डॉ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश में 2018 के विधानसभा चुनाव के लिये जमावट शुरू हो चली है। सत्तारूढ़ दल के लिये जीत का चौका लगाना इस बार आसान नहीं लग रहा है। प्रतिपक्ष कांग्रेस में वैसी मुस्तैदी अभी दिखलाई नहीं पड़ रही है जिसकी सख्त जरूरत है। उधर, मध्यप्रदेश भाजपा में जबरदस्त बेचैनी का आलमज् स्पष्ट तौर पर नजर आ रहा है। बेचैनी आम कार्यकर्ता से लेकर आला नेताओं तक में है। जो हालात हैं उसे देखते हुए न केवल भोपाल से लेकर दिल्ली तक भाजपा बल्कि आरएसएस भी इस बात को लेकर खासा चिंतित है कि ‘बाउंड्री’ लगाने (चौथी जीत दर्ज करने) की बजाय, ‘कैच-आउट’ (सत्ता से बाहर) ना हो जाएं। मध्यप्रदेश में सत्ता के पांच साला ‘फायनल टूर्नामेंट’ के पहले फिलहाल दो छोटे मुकाबले नजदीक हैं। एक- शहडोल लोकसभा और दूसरा- बुरहानपुर जिले की नेपानगर सीट का उपचुनाव। ये दोनों ही सीटें भाजपा के पास थीं। शहडोल सीट, पार्टी सांसद दलपत सिंह परस्ते के बीमारी से निधन और नेपानगर सीट से भाजपा का विधानसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले राजेन्द्र श्यामलाल दादू की सडक़ हादसे में मौत की वजह से रिक्त हुई है। उपचुनाव दिवाली के बाद संभावित है। प्रदेश में कांग्रेस के पास उपचुनाव में खोने के लिये बहुत ज्यादा नहीं है। विधानसभा के 2018 के चुनाव में सत्ता में वापसी उसका एकमात्र लक्ष्य है। पिछले तीन विधानसभा चुनावों की सतत हार से कांग्रेस भले ही सबक सीखती नहीं दिखी, मगर सरकार में वापसी के लिये इस गलती से बचने संबंधी उपायों की शुरूआत देश की इस सबसे पुरानी पार्टी की प्रदेश इकाई में कुछ-कुछ नजर आने लगी है। यह तय माना जा रहा है कि मिशन 2018 के लिये कांग्रेस आलाकमान मध्यप्रदेश में कई तरह के बहुतेरे प्रयोग करेगा। सूत्रों के अनुसार इनकी (लीक से हटके कुछ करने की) शुरुआत बहुत शीघ्र प्रदेश में होने वाली है। सूत्रों के दावों के अनुसार छिटपुट ‘श्रीगणेश’ दिखने भी लगा है। सत्तारूढ़ दल भाजपाज् मध्यप्रदेश में भी अब ‘पार्टी विद द डिफरेंस’ कतई नहीं रही है। अनेक उदाहरण इसके सामने हैं। कलह का कैक्टस बीजेपी में जमकर फूल रहा है। प्लस 75 फार्मूले के तहत शिवराज काबीना से बाहर किये गये बाबूलाल गौर और सरताज सिंह खासे भन्नाए हुए हैं। खासकर दोनों बुजुर्ग नेता जिन तबकों से आते हैं, वहां जबरदस्त नाराजगी है। आम वोटर को भी गौर की बेइज्जती पसंद नहीं आई है। प्रदेश में बहुत बड़ा या सरकार बनाने-बिगाडऩे में रोल अदा करने वाला जातीय आधार प्लस 75 के तहत हटाए गए इन नेताओं के तबकों का नही है, लेकिन नाराजगी तो नाराजगी है। भोपाल से लेकर दिल्ली तक समीकरण का गुणा-भाग हुआ है और जैसे-जैसे चुनाव पास आयेंगे, फिर नये सिरे से होगा। मध्यप्रदेश भाजपा में आम कार्यकर्ता से लेकर काफी संख्या में ‘खास’ नेता खफा हैं। व्यक्तिगत हित और हुकूक़ों को लेकर नाराजगियां हैं। कार्यकर्ता से लेकर नेताओं द्वारा अपनी नाराजगी का इजहार सरेआम करने (खुले मंचों पर पार्टी के विरोध में तल्ख तेवर और बयानबाजी) का सिलसिला तेज हुआ है। कई ताजा बयानों ने पार्टी और सरकार की किरकिरी की है। भाजपा में चल रही इस आपसी खींचतान का कांग्रेस भरपूर लुत्फ ले रही है। भाजपा में स्थितियां कांग्रेस के समान हो चली हैं। जैसे कांग्रेस को लेकर कहा जाता है कि कांग्रेस को खुद कांग्रेस हराती है। कुछ उसी तरह का माहौल भाजपा में बन रहा है।भाजपा प्रदेश अध्यक्ष नंदकुमार सिंह चौहान की स्थिति शोभा की सुपारी वाली है। मसलन जितनी चाबी भरी जाती है, उतना ही वे चल पाते हैं। सत्ता और संगठन का वैसा सेतु अभी नये संगठन महामंत्री नहीं बन पाये हैं, जो अरविंद मेनन के संगठन महामंत्री रहने के दौरान था। अरविंद मेनन की तरह शिवराज एंड कंपनी से नये संगठन महामंत्री की ट्यूनिंग नहीं हो पा रही है। सिरदर्द कम होने की बजाय बढ़ता चला जा रहा है। कथित खींचतान के बीच राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी मध्यप्रदेश को लेकर अपने तरीके से कदम बढ़ा रहा है। सत्तारूढ़ दल में नौकरशाही के रवैये को लेकर ‘बलवे’ के हालात हैं। कमीशनखोरी के खुले आरोप ब्यूरोक्रेसी पर लगाये गये हैं। मंत्री अपने अंदाज में सरकारी मशीनरी से पेश आ रहे हैं। सांसद-विधायकों के अलावा अदने कार्यकर्ता भी अफसरशाही के खिलाफ ‘एंग्री यंगमैन’ वाली भूमिका में हैं। हर धान को एक पसेरी तोलने से ब्यूरोक्रेसी में बड़ा तबका बेहद खफा है। अफसरों की कतिपय बिरादरियों ने तो कुछ मंत्रियों के खिलाफ खुलकर मोर्चा खोल रखा है। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री ओमप्रकाश धुर्वे का महकमा बिना देर किए बदलने की मांग मुख्यमंत्री से कर डाली गई है। वन मैन आर्मीज्शिवराज हालात पर काबू वन मैन आर्मीज् शिवराज को पाना है। संगठन में हालात ‘पहले’ वाले नहीं होने की वजह से उनकी कठिनाईयां बढ़ी हुई हैं। शिवराज ने हाल ही में नौकरषाही के खिलाफ सख्त रवैया दिखाने का प्रयास किया है। चूंकि मामला फिलहाल ‘जुबानी जमा खर्च’ तक सीमित था, लिहाजा सवाल उठाने वाले पार्टीजनों को ‘बहुत मजा’ नहीं आया है। शिवराज की अधिकारियों के साथ इनहाउस बैठकों का ब्यौरा मीडिया तक पहुंचने को सीएम की छवि सुधारने का सुनियोजित प्लॉन करार रहा है। पार्टीजन इस तरह के ‘एक्शन ‘ से आनंदित नहीं हैं। उधर वोटर भी अल्हादित नहीं है। नौकरषाही ज्यादा खफा हो गई है। प्रेक्षक से सत्तारूढ़ दल के लिये ‘बेड-साइन’ मान रहे हैं। गौर ने कसा था शिवराज पर तंज नौकरशाही पर मुख्यमंत्री की पकड़ को लेकर सवाल खड़े हुए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर तो सार्वजनिक तौर पर तंज कस चुके हैं कि ‘घुड़सवार’ (निशाने पर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान थे) सही नहीं है। उन्होंने नौकरशाही रूपी घोड़े की तुलना खुद के मुख्यमंत्रित्वकाल से की है। गौर ने कहा कि घोड़ा वही है, जिसकी कुशल घुड़सवारी (खुद के मुख्यमंत्री रहने की ओर इशारा) वे कर चुके हैं। संकेतों में गौर ने जता दिया कि शिवराज को घुड़सवारी नहीं आती।

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