Monday, 9 July 2018

कैलाश विजयवर्गीय ने दिए संकेत ; मप्र की राजनीति में उतरने को तैयार

डाॅ. अरूण जैन
मध्यप्रदेश में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से नंदकुमार सिंह चौहान विदाई तय मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि नए नाम की तलाश जारी है। संघ और अमित शाह की पहली पसंद कैलाश विजयवर्गीय हैं परंतु वो मप्र में वापसी को लेकर मन नहीं बना पा रहे हैं लेकिन अब स्थिति स्पष्ट हो गई है। कैलाश विजयवर्गीय ने संकेत दे दिए हैं कि संगठन जो चाहेगा वो करने को तैयार हैं। संघ की बैठक में शामिल होने विदिशा पहुंचे कैलाश विजयवर्गीय ने प्रदेश भाजपा में बदलाव और नई जिम्मेदारी मिलने के सवाल पर कहा कि वे भाजपा के सामान्य कार्यकर्ता हैं। यदि संगठन उन्हें झाडू लगाने को भी कहेगा तो वे उसके लिए भी तैयार हैं। संघ प्रमुख भागवत से मुलाकात पर उन्होंने कोई भी टिप्पणी करने से इंकार कर दिया। मालूम हो विजयवर्गीय इस बैठक में शामिल होने के लिए दिल्ली से सीधे विदिशा आए थे। वे सुबह करीब 8 बजे विदिशा पहुंचे। संघ एवं भाजपा के एक वर्ग का मानना है कि यदि प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से नंदकुमार सिंह चौहान को हटा दिया जाए तो भाजपा कार्यकर्ताओं में मौजूद नाराजगी कम हो जाएगी। मप्र में भाजपा 2 उपचुनाव हार चुकी है। 2 उपचुनाव सिर पर हैं और विधानसभा के सामान्य चुनाव भी आने वाले हैं। मप्र में शिवराज सिंह विरोधी लहर भी है। ऐसे में बिना कार्यकर्ताओं के चुनाव जीतना असंभव है। अमित शाह किसी भी कीमत पर मप्र को हाथ से निकलते देखना नहीं चाहते। उनका लक्ष्य 27 राज्यों में भाजपा की सरकार बनाना है। कैलाश और अमित शाह के बीच अच्छी कैमिस्ट्री है। यदि कैलाश विजयवर्गीय को संगठन की कमान दी गई तो यह एक प्रकार से अमित शाह के हाथ में रहेगी। जबकि नंदकुमार सिंह की दौड़ सीएम हाउस तक ही है। 

पद्मावत से फिर दिखा कैसे क्षुद्र स्वार्थों के आगे घुटने टेक देते हैं राजनीतिक दल

डाॅ. अरूण जैन
वोटों की राजनीति किस तरह से देश और समाज को बांट कर कानून के शासन का मखौल उड़ा रही है, सुप्रीम कोर्ट द्वारा फिल्म पद्मावत पर चार राज्यों की सरकार के प्रतिबंध लगाने पर लगाई रोक हटाने से यह साबित हो गया है। सिद्धान्त और नैतिकता की दुहाई देने वाले राजनीतिक दल क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति करने के लिए घुटने टेकने को तैयार रहते हैं। यह फिल्म पद्मावत को लेकर ही नहीं बल्कि इससे पहले भी सरकारों ने जातीय पंचायतों, धर्म समूह या अन्य गुटों के दबाव में आकर कानून को आईना दिखाने वाले निर्णय लिए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले खाप पंचायतों के तुगलकी फैसलों पर भी रोक लगाई है। इस तरह के आदिम और बर्बर फरमानों−फतवों को जारी करने से रोकने में भी सरकारें नाकाम रही हैं। जिनमें सरेआम मानवाधिकारों का उल्लंघन होता रहा है और सरकारें तमाशबीन बने हुए देखती रही हैं। यह सरकारों के निकम्मेपन का सबूत है कि कुछ सिरफिरे सरेआम कानून को हाथ में लेकर धमकाने की कोशिश करते हैं। सरकारों की ऐसी निष्क्रियता और मिलीभगत पर अदालतों को ही समय−समय पर हस्तक्षेप करना पड़ता है। ऐसा नहीं है कि सत्ताधारी दल ही क्षुद्र राजनीतिक फायदे के लिए देश में कानून की धज्जियां उड़ते हुए देखने को जिम्मेदार हैं, विपक्षी दल भी इसमें पीछे नहीं हैं। सत्ताधारी दलों को हमेशा यह डर सताता रहता है कि विपक्षी दल उसके खिलाफ ऐसे मुद्दों को राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करेंगे। यही वजह भी है कि सत्तारुढ़ राजनीतिक दल ऐसे संवेदनशील ज्यादातर मामलों में खुद के हाथ बचाते हुए गेंद अदालत के पाले में डालते रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जानबूझ कर कानून का उल्लंघन होता हुए देख कर अदालत को हस्तक्षेप करने के लिए विवश करते रहे हैं, ताकि यह दलील देते हुए खुद को पाक साफ साबित किया जा सके कि अदालत के आदेश के कारण कठोर निर्णय लेना उनकी मजबूरी है। अलग−अलग राज्यों से उठने वाली आरक्षण की मांग इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चुनाव के दौरान राजनीतिक दल आरक्षण की मांग को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करते रहे हैं। सत्ता में आते ही ऐसे मुद्दे गले की हड्डी बन जाते हैं। हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक इसके भुक्तभोगी हैं। इन राज्यों में विभिन्न जाति−समुदाय के लोगों ने आरक्षण की मांग को लेकर कानून−व्यवस्था को ठेंगा दिखाने में कसर नहीं छोड़ी। सरकारें मूक दर्शक बन कर देखती रहीं। विपक्षी दल भी इस मुद्दे पर अपनी रोटी सेंकने में पीछे नहीं रहे। विपक्ष में चाहे कोई भी दल हो, सभी मानो इसी फिराक में रहते हैं कि कहीं आग लगे और भड़काने के लिए घी कैसे डाला जाए। सत्ता से बाहर आते ही दल ऐसे भड़काऊ मुद्दों की तलाश में रहते हैं कि कैसे इनका इस्तेमाल सत्तारुढ़ दल के खिलाफ किया जाए। इससे राज्य और देश को कानूनी और आर्थिक रूप से कितना नुकसान होगा, इसकी किसी को परवाह नहीं है। उन्हें सिर्फ अपना स्वार्थ नजर आता है, बेशक देश इसकी कोई भी कीमत चुकाए। उनकी बला से देश और समाज की समरसता−सौहार्द्र, एकता−अखंडता को पलीता लगता रहे। इससे राजनीतिक दलों को फर्क नहीं पड़ता। उनका एकमात्र लक्ष्य सत्ता पाना भर रह गया है। राजनीतिक दलों की ऐसी कमजोरियों का फायदा विभिन्न समूह जब−तब उठाते रहे हैं। चुनावों में जब कभी किसी राजनीतिक दल के पक्ष या खिलाफ में वोट देने का फतवा जारी किया जाता है, तब फायदा उठाने वाले दल देश को कमजोर करने वाली ऐसी हरकतों का कभी विरोध नहीं करते। ऐसे मुद्दों पर चुप्पी साधे रहते हैं। यहां तक की चुनावों में टिकटों के वितरण में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि किस जाति−धर्म या समुदाय की जनसंख्या के आधार पर टिकट बांटे जाएं। यह नौबत तब आती है जब सत्तारुढ़ दलों को अपने कामकाज पर भरोसा नहीं होता। राजनीतिक दल सत्ता में स्वार्थों की पूर्ति का औजार बन जाते हैं। आम लोगों के विकास और भ्रष्टाचार से मुंह फेरे रहते हैं। दबाव की राजनीति करने वाले चुनिंदा लोगों के सामने दृढ़ता दिखाने का साहस नहीं जुटा पाते। सत्ता में गलत हथकंडे अपना कर घर भरने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से कतराते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो राजनीतिक दलों के लिए विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे सिर्फ चुनावी जुमलों तक सीमित रह गए हैं। सत्ता में आते ही दल गिरगिट की तरह रंग बदलने लगते हैं। धार्मिक, जातीय या अन्य संवेदनशील मुद्दों पर सख्ती से पेश नहीं आते। सख्ती दिखाने पर वोट बैंक खिसकने का खतरा सताता रहता है। इस ढुलमुल रवैये से ही आत्मविश्वास कमजोर होता है। सत्तारुढ़ दल यह भूल जाते हैं कि यह देश चुनिंदा लोगों, जातीय या धार्मिक समूह से नहीं चल रहा है। देश कानून के शासन से संचालित हो रहा है। इसके अलावा भी यदि कोई जाति या समूह आंदोलन−धरने−प्रदर्शन के जरिए अपनी गैर कानूनी या गैरवाजिब मांगों को मंगवाने के लिए अनुचित दबाव डालने की कोशिश करता है तो देश की बाकी आबादी को ऐसा करना बिल्कुल पसंद नहीं है। यही वजह भी है कि मतदाताओं ने जातिवाद या ऐसे ही गैरलोकतांत्रिक तरीके से राजनीति के भरोसे सत्ता की ऊंचाई तय करने वाले नेताओं की गलतफहमी चुनावों में दूर की है। इनमें से कई तो जेल की सलाखों के पीछे हैं। मतदाताओं ने परिवार और जातिवाद के आधार पर राजनीति करने वाले नेताओं का राजनीति से सफाया कर दिया।  देष के आम लोगों को सिर्फ विकास और लोकतांत्रिक तौर−तरीके पसंद हैं। यदि देश का आम मतदाता इसमें भरोसा नहीं रखता तो केंद्र में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार नहीं बना पाती। मतदाताओं ने मोदी के विकास करने और भ्रष्टाचार को दूर करने के वायदों पर भरोसा किया। लोकसभा के बाद हुए राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी मतदाताओं ने मोदी सरकार के कामकाज और बेबाकी के अंदाज पर अपनी मुहर लगाई।  यह निश्चित है कि राज्य हों या केंद्र सरकार जब तक नाजायज और गैर कानूनी मांगों के सामने सख्ती से पेश नहीं आएंगी तब तक कानून के शासन को चुनौतियां मिलती रहेंगी। राजनीतिक दलों को यह भ्रम दूर करना होगा कि कोई जाति या समूह अपनी गलत मांगों से उन्हें सत्ता से बाहर कर सकता है। देश के दूसरे मतदाता ऐसा कभी नहीं होने देंगे। देश का चुनावी इतिहास इसका गवाह रहा है।

मप्र, छग और राजस्थान ; क्चछ्वक्क में होंगे बड़े बदलाव, प्रेशर में सरकारें


डाॅ. अरूण जैन
        मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं राजस्थान को लेकर अब पीएम नरेंद्र मोदी भी चिंतित हैं। अमित शाह लगातार फीकबैक ले रहे हैं। हालांकि चुनाव साल के अंत में आने वाले हैं लेकिन भाजपा के दोनों दिग्गजों के माथे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही हैं। माना जा रहा है कि जल्द ही तीनों राज्यों के संगठन में बड़े बदलाव होंगे। तीनों सरकारें दिल्ली के दवाब में हैं। उन्हे टारगेट दिया गया है कि वो अपने पक्ष में लहर चलाएं। यदि माहौल नहीं बदला तो सीएम कैंडिडेट बदल दिया जाएगा। क्चछ्वक्क नेताओं की चिंता कर्नाटक से ज्यादा साल के अंत में मध्यप्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों की है। यही वजह है कि अब पार्टी इन राज्यों के लिए संगठन में बदलाव भी कर सकती है। पार्टी नेताओं का मानना है कि ये तीनों राज्यों की स्थिति लगभग गुजरात वाली ही है, जहां पार्टी की साख दांव पर है। यही वजह है कि पार्टी अब इन राज्यों के लिए अपने संगठन में कुछ बदलाव कर सकती है। फिर आएंगे अमित शाह पार्टी सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय नेतृत्व फिलहाल चाहता है कि इन तीनों ही राज्यों में सरकार और संगठन के बीच तालमेल और बेहतर हो ताकि जिन कमियों को महसूस किया जा रहा है, उन्हें राज्य सरकारें वक्त रहते दुरुस्त करे लें। इसके अलावा पार्टी इन तीनों राज्यों में न सिर्फ सरकार के कामकाज बल्कि विधायकों के बारे में भी सर्वे करा रही है ताकि जिन क्षेत्रों में पार्टी की स्थिति कमजोर हो, वहां अभी से काम शुरू कर दिया जाए। हाल ही में खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने इन तीनों ही राज्यों की स्थिति के बारे में आकलन भी किया और फिर राज्य सरकारों को कुछ जनता से जुड़ी योजनाओं पर काम करने के भी निर्देश दिए हैं। माना जा रहा है कि अगले कुछ महीनों में एक बार फिर शाह इन राज्यों का दौरा करके वहां के संगठन पदाधिकारियों के साथ बैठक करके जमीनी हकीकत का आकलन करेंगे। ग्रामीण इलाकों पर फोकस, कांग्रेस में तोडफ़ोड़ गुजरात चुनाव के बाद अब पार्टी इन तीनों ही राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों पर फोकस करना चाहती है। पार्टी ने खासतौर पर मध्यप्रदेश सरकार से कहा है कि वह संगठन के जरिए ग्रामीण क्षेत्रों में फीडबैक लेकर वहां आवश्यकतानुसार राहत योजनाएं लागू करे। इसी तरह से छत्तीसगढ़ में पार्टी ने अभी से उन नेताओं को भी टटोलना शुरू कर दिया है, जिनको अपने साथ लाकर कांग्रेस को झटका दिया जा सके। क्या चुनौतियां हैं तीनों राज्यों में पार्टी को लग रहा है कि अगर इन तीनों राज्यों में निगेटिव नतीजे आए तो उससे लोकसभा चुनाव से ऐन पहले उसके लिए माहौल खराब हो सकता है। चिंता की बात यह है कि राजस्थान में यह परंपरा रही है कि हर बार सरकार बदल जाती है। मध्यप्रदेश में भाजपा से ज्यादा सीएम शिवराज सिंह चौहान का विरोध हो रहा है जबकि 2013 तक शिवराज सिंह मप्र के सबसे लोकप्रिय भाजपा नेता थे। छत्तीसगढ़ में भी भाजपा से ज्यादा रमन सिंह का विरोध है। यहां त्रिकोणीयक मुकाबला हो सकता है। यह भाजपा को फायदा पहुंचाएगा या नहीं, अभी समझ नहीं आ रहा है।

इस नये साल में कई राज्यों में ककुरमुत्ते की तरह फिर कई चैनल-अखबार खुलेंगे

डाॅ. अरूण जैन
अभी कुछ देर पहले एक उत्साही युवा पत्रकार का पोस्ट पढ़ा। पोस्ट में बीते किसी संस्थान में काम करने के बाद तनख्वाह नहीं देने की पीड़ा थी और उस युवा पत्रकार की ये पीड़ा अमूमन ज़्यादातर पत्रकारों के मन में पल ही रही होगी, भले ही अधिकतर लोग अपना दर्द मन में छिपा लेते हैं, लिखते नहीं, कहते नहीं। पर आज मीडिया संस्थानों द्वारा पत्रकारों को मज़दूर समझकर काम कराने और फिऱ मेहनताना नहीं देने की घटना आम है। इस नये साल में चुनावी साल होने के लिहाज से ये साल ऐसे युवा, उत्साही, कर्मठ पत्रकारों के लिए कई मीडिया संस्थानों के आ जाने से जितना मौक़ा देने वाला होगा, उससे ज़्यादा रिस्क लेने वाला भी रहेगा। मुझे याद आता है जब मैंने भी कई युवाओं की तरह आँख़ों में एक अच्छा पत्रकार बनने का सपना पाला था। तबसे काम करने का ये कीड़ा, पीड़ाओं को दरकिनार करता बढ़ता चला गया। कई मीडिया संस्थानों में काम करने, मीडिया की नियमित पढाई में बीजेएमसी में तीन बरस, एमजे में दो बरस, एम फिल में एक बरस देने के बाद इतना समझ आ गया कि आपको उपयोग करने वालों की फ़ौज पैसा लिए, और पैसे के दम पर किसी मीडिया संस्थान को जेब में लिए, पैदा किये खड़ी है।  वो बेरोजगारों, केटीयू से निकलते अनगिनत प्रतिभावान प्रोडक्ट को अपने प्रोडक्शन का हिस्सा बनने जीभ लपलपाये, आपको इमोशनल मोड, लालच मोड, स्वप्न सुनहरे मोड में लाने आतुर खड़ी हुई है, इस उम्मीद से कि आपकी छाती में छपे मीडिया स्टूडेंट, मीडिया का कीड़ा कटवाने वाले बंदे का पूरा फ़ायदा उठाने का मौक़ा उन्हें मिल जाये! ऐसा नहीं है कि मीडिया संस्थानों में सिफऱ् शोषण करने, ठगने वाले, मीडियेटर की भूमिका में कमीशनखोरी करने वाले ही हैं, बल्कि आपकी प्रतिभा को निखारने, आपको मंच देने, आपको बेहतरीन बनाने वालों की संख्या भी तगड़ी है। बस ये हमारा विवेक है कि हम आयाराम-गयाराम बनकर ही न रह जाएं, आज भी जब हम मीडियाकर्मी एक दूसरे से मिलते हैं तो ज़्यादातर हाल चाल पूछने के बाद ये पूछते ही हैं कि अभी कहाँ काम चल रहा है? अरे फ़लाना चैनल, या फ़लाना अखबार छोड़ दिये क्या? ओह, तो ये कब जॉइन किये? और न जाने कितने सवाल आपको एहसास बड़ी मज़बूती से दिलाते हैं, और आपको बताते हैं कि मीडिया की नौकरी, स्थायी नहीं है। आज इसका माईक थामे घूमो, कल किसी और कि आईडी थामे निकल पड़ो, ख़ुदको ये झूठा भरोसा दिलाते कि चल भाई, मंत्री भाव दे देगा, टीआई से परिचय हो जाएगा, कोई काम निकल जायेगा, क्योंकि पत्रकार होने का तमगा जो है! आज इस साल का आखिऱी दिन है, और कल से फिऱ एक नई सुबह के साथ हम एक नये साल में नई उम्मीदों, नई आशाओं के साथ अपना जीवन गुज़ारेंगे, 2018 के आखिऱ में छत्तीसगढ़ में विधानसभा के चुनाव हैं, तो ये तय है कि कई नए मीडिया संस्थानों का उदय होगा, इस उदयमान होते नये अध्यायों के साथ फिऱ ढूंढे जाएंगे, कुशाभाऊ ठाकरे से मार्कशीट थामे निकले पत्रकारिता के छात्र, जिन्हें चंद पैसे देकर दौड़ाया जाएगा, न उन्हें एंकरिंग, स्क्रिप्टिंग, एडिटिंग, रिपोर्टिंग की ट्रेनिंग मिलेगी, न उन्हें बतलाया जाएगा कि ये सब सीखना क्यों जरूरी है, बस कोल्हू का बैल बना ढील दिए जाएंगे, फ़ील्ड में, कि संस्थान की पहचान बन जाये, फिऱ लिस्ट में नाम पक्का, और जब वही मेहनतकश पैसे के लिए आये, तो भगा दीजिये, उन्हें बिना कुछ सिखाये, बिना कोई बड़ा मौका दिए, कोल्हू के बैलों की कमी थोड़ी ही न है! अब ये पत्रकारिता के छात्रों को समझना होगा कि चुनावी मौसम में वो ठगाई जनता की तरह अपनों से छले गए पत्रकार न बन जाएं, वो अपने मौक़े का भरपूर फ़ायदा उठाएं, खुदकी अलग पहचान बनायें, जितना हो सकता है इस युवा उम्र में ज़्यादा से ज़्यादा चीजें सीखें, कैमरा हैंडलिंग से एडिटिंग तक, वीओ से ग्राफिक्स तक, रिपोर्टिंग से स्क्रिप्टिंग और पीटीसी से इंटरव्यू तक, ताकि़ ये नया साल आने वाले साल में कुछ बेहतर प्रतिभा, कुछ बेहतर ज्ञान, बेहतर कौशल उन्नयन की चीज़ें सीखाकर जाए, एक बेहतर सुबह के भरोसे आपको छोड़कर जाए, एक सुकून भरी रात देकर जाए।

खाने के साथ, आगे पांच साल खाने की भी व्यवस्था हो जाये तो क्या बात है....।




डाॅ. अरूण जैन
सुबह सुबह जैसे ही वाट्सएप के पट खोले तो कई ग्रुप में माननीय मुख्यमंत्री जी के बिल्कुल देसी अंदाज में सपरिवार खाना खाते हुए के फोटो झपाझप गिरने लगे ...। देखकर वाकई अच्छा लगा...बीते 12 सालों में चाहे   कसमसाती सत्ता को अपनी जकड़ से आज़ाद न होने दिया हो ...आम जनता को खूब झुनझुना पकड़ाया हो...लेकिन बन्दा है खालिस देसी..।अचानक ख्याल आया कि फ़ोटो आखिर किसने खींच मारा और इतने जल्दी सोशल मीडिया पर शेयर भी कर दिया ! साहब का परिवार तो खाना खा रहा है और जहां तक रसोईघर का सवाल है तो यह जगह बड़ी निजी व्यवस्था होती है..जहां हर कोई व्यक्ति अक्सर दाखिल नही हो पाता ...! तो भइया कौन था जो बेचारा अपनी भूख मारकर फ़ोटो खींच रहा था ? या फिर खास तौर फ़ोटो खींचने के लिए उस भाई को तैनात किया गया था ? छोडि़ए...लेकिन कुछ बात तो है ...जो अचानक ही मुख्यमंत्री जी का साधारण और देसी अंदाज फिर कैसे सुर्खियां बनने लगा ? सहसा याद आया कि चुनाव आने वाले हैं...। उपलब्धि के नाम पर महज़ भाषण और घोषणाएं हैं तो जाहिर हैं पुरानी वाली ब्रांडिंग फिर पकेगी ..। अरे वही... विनम्र, सरल, सहज, साधारण और देसी भैया वाली...। प्रदेश में यह ब्रांडिंग अब तक बहुत कारगर साबित हुई है । इस छवि पर कौन न नम्र पड़ जाए...। खैर..खाने के साथ आगे पांच साल खाने की भी व्यवस्था हो जाये तो क्या बात है....।

कुली, कारपेंटर और अब राजनेता, ऐसे फैन्स के बीच भगवान बने रजनीकांत

डाॅ. अरूण जैन
दक्षिण भारत में रजनीकांत को भगवान की तरह पूजा जाता है और अब तो रजनीकांत राजनीति में आएंगे।  इस हफ्ते के शुरू में अपने फैन्स को संबोधित करते हुए रजनीकांत ने चेन्नै में कहा था कि वह दिसंबर के आखिरी दिन अपने राजनीतिक कदम का ऐलान करेंगे और आज यानी 31 दिसंबर को चेन्नई में अपने संबोधन के दौरान रजनीकांत ने कहा कि वे अगला विधानसभा चुनाव लड़ेंगे। उन्होंने कहा कि वे नई पार्टी बनाएंगे और चेन्नई की सभी सीटों से अपने उम्मीदवार उतारेंगे। उनके इस ऐलान के बाद ही समर्थकों में जबरदस्त उत्साह देखा गया और लोग झूमने लगे। बता दें कि रजनीकांत ऐसे ही नहीं फैन्स के लिए भगवान बनें। इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने खूब संघर्ष किया। इस खास मौके पर बताते हैं रजनीकांत के संघर्ष की कहानी। बता दें कि रजनीकांत का असली नाम शिवाजी राव गायकवाड़ है। तमिल और हिन्दी फिल्मों में दमदार एक्टिंग कर रजनीकांत ने करोड़ों प्रशंसक बना लिए हैं। रजनीकांत को साल 2000 में भारत सरकार की तरफ से पद्म भूषण और पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।  रजनीकांत का जन्म 12 दिसम्बर 1950 को बेंगलुरु के एक मराठी परिवार में हुआ था। उन्होंने साल 1975 में फिल्म अपूर्व रागंगल से अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने अंधा कानून, इंसाफ कौन करेगा, कबाली और शिवाजी द बॉस जैसी कई दमदार फिल्मों में अहम भूमिका निभाई। रजनीकांत की अगली फिल्म रोबोट 2.0 अगले साल 25 जनवरी को रिलीज हो रही है। रजनीकांत का जीवन संघर्ष से भरा रहा। वो चार भाई-बहनों में रजनीकांत सबसे छोटे हैं। बचपन में ही उनकी मां का निधन हो गया। रजनीकांत के घर की हालत अच्छी नहीं थी, इसलिए उन्हें कई छोटे-मोटे काम करने पड़े। रजनीकांत ने परिवार की मदद करने के लिए कारपेंटर से लेकर कुली तक का काम किया। इसी बीच उनका झुकाव सिनेमा की तरफ बना रहा। वो अक्सर स्कूल प्ले में हिस्सा लेते थे। स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद रजनीकांत ने बंगलुरू ट्रांसपोर्ट सर्विस में बतौर बस कंडक्टर काम करना शुरू कर दिया। इसके बाद साल 1973 में वह मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट से जुड़े। यहां उनकी मुलाकात फिल्म डायरेक्टर के. बालचंद्र से हुई। हालांकि उस वक्त बालचंद्र खास प्रभावित नहीं हुए थे। साल 1975 में रजनीकांत और के. बालंचद्र एक बार फिर मुलाकात हुई। तब बालचंद्र ने उन्हें एक छोटा रोल ऑफर किया। रजनीकांत को पहली सफलता फिल्म भैरवी से मिली। इस फिल्म में वो मुख्य भूमिका में थे। इसके बाद रजनीकांत के सफर ने रफ्तार पकड़ी और उन्होंने एक से बढ़कर एक फिल्मों में दमदार अभिनय किया। उनकी एक्टिंग दक्षिण भारत में इतनी लोकप्रिय है कि वहां उन्हें भगवान की तरह पूजा जाता है। 

मनमोहन तब क्या महसूस करते थे जब प्रधानमंत्री रहते उनके सीमित अधिकार थे

डाॅ. अरूण जैन
वर्तमान में चल रहे संसद के शीतकालीन सत्र में भारतीय लोकतंत्र की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस चुनावों के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा माफी की मांग पर सदन की कार्यवाही में लगातार बाधा डालने का काम कर रही है। वैसे ऐसा पहली बार नहीं है कि कांग्रेस के द्वारा संसद की कार्यवाही ऐसे मुद्दों के लिए बाधित की जा रही हो जिनका देश से कोई लेना देना नहीं हो। इससे पहले भी वह कई देशहित से परे स्वार्थ की राजनीति से प्रेरित मुद्दे उठाकर संसद सत्र को ठप्प करने का काम कर चुकी है। चाहे नैशनल हेराल्ड का मामला हो, या फिर सुषमा स्वराज द्वारा ललित मोदी की कथित मदद का मुद्दा हो, अथवा मोदी द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर उनका बाथरूम में रेनकोट पहन कर नहाने वाला बयान हो। ताजा हंगामा गुजरात चुनाव के दौरान पाक के एक पूर्व मंत्री और कुछ पूर्व भारतीय राजनयिक के साथ मणिशंकर अय्यर द्वारा आयोजित रात्रि भोज में देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शामिल होने पर प्रधानमंत्री की ओर से दिये गये बयान को लेकर किया जा रहा है। और इन परिस्थितियों में जब काँग्रेस प्रधानमंत्री पद की गरिमा की बात करती है तो वह भूल जाती है कि इस पद की गरिमा का जितना अपमान खुद उसके द्वारा हुआ उतना आजाद भारत के इतिहास में शायद पहले कभी नहीं हुआ। आश्चर्य तो यह है कि स्वयं मनमोहन सिंह को जिस मान सम्मान का बोध विपक्ष में रहते हुए हुआ उसका एहसास या फिर उसके 'अभाव का एहसासÓ वो प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए कभी क्यों नहीं कर पाए। शायद इसलिए कि वे काँग्रेस और गाँधी परिवार को ही भारत समझने की भूल करते आए हैं और अपनी निष्ठा का दायरा इस परिवार से परे कभी बढ़ा नहीं पाए। नहीं तो क्या वजह है कि जो व्यक्ति आज उनके एक मीटिंग में शामिल होने के प्रधानमंत्री के वक्तव्य से "आहत" है उसने इससे पहले स्वयं को कभी "अपमानित" भी महसूस नहीं किया? और प्रधानमंत्री पद की गरिमा का प्रश्न काँग्रेस या फिर स्वयं उनके समक्ष इससे पहले कभी क्यों उत्पन्न नहीं हुआ? न तब जब 2004 में प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के तुरंत बाद सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनाते हुए उस नैशनल एडवाइजरी काउंसिल का गठन किया गया जिसके पास केंद्रीय मंत्रिमंडल के समान अधिकार थे। न तब जब 2005 में मनमोहन सिंह ने पूरे देश के प्रधानमंत्री होते हुए भी लाल किले से अपने सम्बोधन में कहा था कि इस देश के संसाधनों पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। न तब जब 2006 में उन्होंने भारत के प्रधानमंत्री होते हुए कहा था कि पाकिस्तान भी भारत की ही तरह आतंकवाद का शिकार है"। न तब जब 2013 में भरे पत्रकार सम्मेलन में राहुल गाँधी ने मनमोहन सरकार का एक अध्यादेश फाड़ दिया था। न तब जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने भारतीय पत्रकारों के सामने उन्हें देहाती औरत कहा था। न ही तब जब देश में एक के बाद एक घोटालों का पर्दाफाश हो रहा था। आश्चर्य का विषय है कि पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जो काँग्रेस प्रधानमंत्री मोदी पर चुनावों के मद्देनजर संसद के शीतकालीन सत्र को देर से शुरू करने को लेकर निशाना साधती रही (यह भुलाकर कि उसके कार्यकाल में भी पहले 2008 और फिर 2011 में संसद के सत्र टाले गए थे) आज सत्र चलने ही नहीं दे रही। इसके अलावा यह बात भी समझ से परे है कि प्रधानमंत्री के पद की गरिमा की दुहाई देकर जब एक प्रधानमंत्री से ही माफी की मांग उनके द्वारा की जा रही है तो क्या उस प्रधानमंत्री पद की गरिमा नहीं गिराई जा रही? वैसे बात तो यह भी देश के गले नहीं उतर रही, जैसा कि उपराष्ट्रपति एवं राज्यसभा के सभापति वेंकैया नायडू ने कहा कि जो बयान सदन के बाहर दिया गया उसकी माफी की मांग सदन में करना कहाँ तक उचित है। आज जो काँग्रेस प्रधानमंत्री पद की गरिमा की बात कर रही है उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने सबसे पहले ऐसी किसी मीटिंग से ही इंकार करके देश को गुमराह करने की नाकाम कोशिश की थी लेकिन मीडिया में खबरें आने के बाद मजबूरन स्वीकार करना पड़ा। सोचने वाली बात यह है कि इस कथित भोज को ऐसी कोई मीटिंग नहीं हुई, और यह केवल प्रधानमंत्री मोदी के दिमाग की उपज है लोगों को गुमराह करके चुनाव में फायदा उठाने के उद्देश्य से, ऐसा कहकर उसे गोपनीय रखने की सर्वप्रथम कोशिशें तो कांग्रेस की ही तरफ से की गईं लेकिन अगले ही दिन अखबार में पूरी खबर छप जाने के बाद उसे स्वीकार करना अपने आप में बहुत कुछ कहता है। प्रश्न तो यह भी उठता है कि जिस भोज में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व सेनाध्यक्ष, पूर्व विदेश मंत्री, कई पूर्व राजनयिक, पूर्व उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ पाकिस्तान की मुशर्रफ सरकार के पूर्व विदेश मंत्री मौजूद हों, वो एक साधारण भोज हो भी कैसे सकता है?माना कि खुर्शीद कसूरी (पूर्व पाक विदेश मंत्री) मणिशंकर के पुराने दोस्त हैं लेकिन उन्हें अकेले ही अपने घर भोजन पर बुलाकर अपनी दोस्ती की पुरानी यादें ताजा करके इसे पूर्ण रूप से एक व्यक्तिगत मिलन न रखते हुए पूर्व राजनयिकों, सेनाध्यक्ष और प्रधानमंत्री जैसे व्यक्तित्व बुलाकर इसे राजनैतिक रंग तो उन्हीं की ओर से दिया गया। प्रश्न तो यह भी है कि दोस्ती के नाते ही इस प्रकार का आयोजन किया गया था तो फिर जनरल कपूर की ओर से क्यों कहा गया कि मीटिंग के दौरान भारत पाक रिश्तों पर बात हुई थी गुजरात चुनाव पर नहीं? तो अब मुद्दा यह है कि क्या ऐसे नाजुक विषय पर पाक के (भूतपूर्व ही सही) मंत्री पद के व्यक्ति से बात करने का औचित्य (और नीयत) वे समझा पाएंगे? वो भी तब जब सोशल मीडिया में मणिशंकर का पाकिस्तान में मोदी को हटवाने वाला वीडियो वाइरल हो रहा हो। काँग्रेस इस समय वाकई बुरे दौर से गुजर रही है, क्योंकि वो समझ ही नहीं पा रही कि प्रधानमंत्री के जिस बयान पर गुजरात की जनता अपनी मुहर लगा चुकी है, उसी बयान के लिए मोदी से माफी की मांग करना कांग्रेस के लिए एक और घाटे का सौदा ही सिद्ध होगी। अपनी इन हरकतों से काँग्रेस लगातार अपने पतन की ओर अग्रसर है। इसलिए नहीं कि वो लगातार चुनाव हार रही है बल्कि इसलिए कि वो यह समझ नहीं पा रही कि वो बार बार देश की जनता के द्वारा क्यों नकारी जा रही है। इसलिए नहीं कि मोदी देश को अपने "जुमलों" से बहका रहे हैं जैसा कि वो समझ रही है बल्कि इसलिए कि वे देश के सामने स्वयं को मोदी के विकल्प के रूप में नहीं पेश ही कर पा रही। इसलिए नहीं कि वो अपनी पूरी ताकत मोदी की इमेज बिगाडऩे में लगा रही हैं बल्कि इसलिए कि वो अपनी इमेज सुधारने की दिशा में कोई कदम ही नहीं उठा रही। इसलिए कि वो लगातार नकारात्मक प्रतिक्रियाएँ देकर सकारात्मक परिणामों की आकांक्षा कर रही है। इसलिए कांग्रेस के लिए बेहतर होगा कि वह भूतपूर्व प्रधानमंत्री के पद की गरिमा के बजाय एक समझदार और जागरूक विपक्ष की अपनी गरिमा पर ज्यादा ध्यान दे।