Tuesday, 28 June 2016

उप्र में भाजपा आलाकमान के सामने चुनौतियों का पहाड़

डॉ. अरूण जैन
उत्तर प्रदेश फिर से चुनावी मुहाने पर खड़ा है। राजनीति के गलियारों से लेकर गाँव की चौपालों, शहरों के नुक्कड़ों तक पर हर कोई यही सवाल पूछ रहा है कि कौन होगा यूपी का अगला मुख्यमंत्री? मुख्यमंत्री पद की दौड़ में कुछ पुराने चेहरे हैं तो कुछ नये चेहरों को भी संभावित दावेदार समझा जा रहा है। सपा की तरफ से अखिलेश यादव और बसपा की ओर से मायावती की दावेदारी तो पक्की है ही इसलिये सपा और बसपा में कहीं कोई उतावलापन नहीं है। चुनौती है तो भाजपा और कांग्रेस के सामने। इसमें भी भाजपा के बारे में ज्यादा पशोपेश है। सीएम की कुर्सी के लिये भाजपा के संभावित दावेदारों में कई नाम शामिल हैं। दोनों ही दलों ने अभी तक मुख्यमंत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं की है। कांग्रेस तो शायद ही मुख्यमंत्री उम्मीदवार के नाम की घोषणा करे, लेकिन भाजपा के बारे में कयास लगाया जा रहा है कि असम के नतीजों से उत्साहित पार्टी आलाकमान इलाहाबाद में 12−13 जून को होने वाली कार्यसमिति की बैठक में उत्तर प्रदेश के लिये मुख्यमंत्री का चेहरा सामने ला सकती है। भाजपा की तरफ से करीब आधा दर्जन नेताओं के नाम बतौर मुख्यमंत्री उम्मीदवार चर्चा में हैं लेकिन अंतिम फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को ही लेना है। इतना तय है कि भाजपा किसी विवादित छवि वाले नेता को मुख्यमंत्री के रूप में प्रोजेक्ट नहीं करेगी। इस बात का भी ध्यान रखा जायेगा कि मुख्यमंत्री की दौड़ में कोई ऐसा नेता भी आगे न किया जाये जिसके चलते एक वर्ग विशेष के वोटर पार्टी के खिलाफ लामबंद हो जायें। दिल्ली चुनावों से सबक लेकर आलाकमान पार्टी से बाहर का कोई चेहरा शायद सामने नहीं लायेगा।  भाजपा 14 वर्षों के अम्बे अंतराल के बाद पहली बार यूपी के विधानसभा चुनावों को लेकर उत्साहित दिखाई दे रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव के नतीजे आने से पहले तक गुटबाजी और टांग खिंचाई में जुटे प्रदेश नेताओं पर जब से दिल्ली आलाकमान की मजबूत पकड़ हुई है तब से हालात काफी बदल गये हैं। पार्टी के प्रदेश नेताओं की हठधर्मी पर लगाम लगा दी गई है। सारे फैसले अब दिल्ली से लिये जा रहे हैं। बात-बात पर लडऩे वाले यूपी के नेतागण दिल्ली के फैसलों के खिलाफ चूं भी नहीं कर पाते हैं। आलाकमान प्रदेश स्तर के नेताओं की एक−एक गतिविधि पर नजर जमाये रहता है। कौन क्या कर रहा है। पल−पल की जानकारी दिल्ली पहुंच जाती है। असम क तरह यूपी में भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) विधानसभा चुनाव के लिये सियासी जमीन तैयार करने में जुटा है। भाजपा नेताओं को बस इसी जमीन पर चुनावी फसल उगानी और काटनी होगी।
 बात 2012 के विधानसभा चुनाव की कि जाये तो उस समय समाजवादी पार्टी को 29.13, बहुजन समा पार्टी को 25.91, भारतीय जनता पार्टी को 15 और कांग्रेस को 11.65 प्रतिशत वोट मिले थे। इन वोटों के सहारे समाजवादी पार्टी 224, बसपा 80, भाजपा 47 और कांग्रेस 28 सीटों पर जीतने में सफल रही थी। दो वर्ष बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में स्थिति काफी बदल गई। मोदी लहर में सपा−बसपा और कांग्रेस सब उड़ गये। विधानसभा चुनाव के मुकाबले भाजपा के वोट प्रतिशत में 27 प्रतिशत से अधिक का इजाफा हुआ और उसको 42.63 प्रतिशत वोट मिले। वहीं सपा के वोटों में करीब 07 प्रतिशत और बसपा के वोटों में 06 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। कांग्रेस की स्थिति तो और भी बदतर रही उसे 2012 के विधानसभा चुनावों में मिले 11.65 प्रतिशत वोटों के मुकाबले मात्र 7.58 प्रतिशत वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। वोट प्रतिशत में आये बदलाव के कारण बसपा का खाता नहीं खुला वहीं समाजवादी पार्टी 05 और कांग्रेस 02 सीटों पर सिमट गई थी। भाजपा गठबंधन के खाते में 73 सींटे आईं जिसमें 71 भाजपा की थीं और 02 सीटें उसकी सहयोगी अपना दल की थीं। इसी के बाद से भाजपा के हौसले बुलंद हैं और वह यूपी में सत्ता हासिल करने का सपना देखने लगी है। पहले तो भाजपा आलाकमान मोदी के चेहरे को आगे करके यूपी फतह करने का मन बना रहा था परंतु बिहार के जख्मों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया और असम की जीत ने भाजपा को आगे का रास्ता दिखाया। यह तय माना जा रहा है कि यूपी चुनाव में मोदी का उपयोग जरूरत से अधिक नहीं किया जायेगा। इसकी जगह स्थानीय नेताओं को महत्व दिया जायेगा। असम में मुख्यमंत्री पद का चेहरा प्रोजक्ट करके मैदान मारने और यूपी में भी इसी तर्ज पर आगे बढऩे की भाजपा आलाकमान की मंशा को भांप कर यूपी भाजपा नेताओं के बीच यह चर्चा शुरू हो गई कि पार्टी किसे मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित करेगी। कई नाम सामने भी आये हैं। मगर आलाकमान फूंक-फूंक कर कदम रख रहा है। उसे डर भी सता रहा है कि जिसको मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित नहीं किया जायेगा वह विजय अभियान में रोड़ा बन सकता है। पार्टी के भीतर मौजूद तमाम तरह के सियासी समीकरण भाजपा नेतृत्व को इस मामले में आगे बढऩे से रोक रहे हैं तो आलाकमान की बाहरी चिंता यह है कि वह चाहता है कि मुख्यमंत्री उम्मीदवार का चेहरा ऐसा होना चाहिए जो बसपा सुप्रीमो मायावती, सपा नेता और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से 19 न हो, लेकिन यूपी की सियासत में ऐसा कोई चेहरा दिख नहीं रहा है। यूपी में जो दमदार चेहरे थे उसमें से कुछ उम्रदराज हो गये हैं तो कुछ दिल्ली की सियासत छोड़कर यूपी के दंगल में कूदने को तैयार नहीं हैं। भाजपा की तरफ से जब मुख्यमंत्री का चेहरा आगे करने की बात सोची जाती है तो पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह और राजनाथ सिंह का नाम सबसे पहले दिमाग में आता है। परंतु कल्याण सिंह के सक्रिय राजनीति से कट जाने और राजनाथ के मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत पर होने के कारण यूपी वापस आने की संभावनाएं बिल्कुल खत्म हो जाती हैं। मोदी सरकार के एक और मंत्री कलराज मिश्र भी दिल्ली छोड़कर यूपी नहीं आना चाह रहे हैं। इसके बाद जो नाम बचते हैं उनको लेकर नेतृत्व के भीतर ही असमंजस है।

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