Tuesday, 28 June 2016

एक वो सिंहस्थ था, एक यह सिंहस्थ है

डॉ. अरूण जैन

वैसे तो देश के चार शहरों में प्रत्येक 12 वर्ष बाद कुंभ/सिंहस्थ होता है। लेकिन उज्जैन का यह अकेला महापर्व है जो सिंहस्थ के नाम से जाना जाता है। यहां मेष राशि में सूर्य और सिंह राशि में गुरू होने से (अप्रैल-मई) शिप्रा नदी पर कुंभ का योग बनता है। शेष तीनो स्थानों पर ये महापर्व कुंभ कहलाते हैं। हरिद्वार में मेष राशि में सूर्य और कुंभ राशि में गुरू आने पर (अप्रैल-मई) गंगा नदी तट पर कुंभ होता है। इलाहाबाद में मकर राशि में सूर्य और वृषभ राशि में गुरू (जनवरी-फरवरी) होने पर गंगा-जमुना-सरस्वती संगम पर कुंभ महापर्व होता है। नासिक में सिंह राशि में गुरू-चन्द्रमा और सूर्य (जुलाई-अगस्त) आने पर गोदावरी नदी तट पर कुंभ होता है। उज्जैन सिंहस्थ पर दस पुण्यप्रद योग भी बनते हैं, जो और कहीं नही बनते-अवंतिका नगरी, वैशाख मास, शुक्ल पक्ष, सिंह राशि में गुरू, मेष राशि में सूर्य, तुला राशि में चंद्र, स्वाति नक्षत्र, पूर्णिमा तिथि, व्यतिपात योग और सोमवार ।
प्राचीन उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार सन् 1732 में उज्जैन में पहला सिंहस्थ हुवा था, जब मराठों का मालवा क्षेत्र पर अधिपत्य था। प्रत्येक सिंहस्थ, कुंभों की तरह किसी न किसी कारण के लिए जाना जाता है। वैसे मुझे 1968 और 1969 के, दो वर्ष लगातार हुए सिंहस्थ से महापर्व का आंखो देखा ज्ञान है। ग्रह योग और तिथियों को लेकर शैव और वैष्णव अखाड़ो में विवाद की स्थिति बन गई थी। वैष्णव अखाड़ों ने सन् 1968 मंे सिंहस्थ मनाया। शैव अखाड़ो ने आने से इंकार कर दया। 1969 में शैव अखाड़ो में सिंहस्थ महापर्व मनाया। 1968 के महापर्व पर 48.50 लाख रूपए व्यय हुए और 69 के सिंहस्थ पर 20 लाख रूपए मंजूर हुए थे। सन् 1980 का सिंहस्थ कई मानों में उल्लेखनीय था। एक तो उज्जैन नया-नया संभागीय मुख्यालय बना था और संभागआयुक्त पद पर संतोष कुमार शर्मा जैसे आयएएस अधिकारी आये थे, जो प्रशासनिक कम, धार्मिक ज्यादा थे। उन्होने शहर में पौराणिक नामों की कई कॉलोनियां विकसित करवाई। उस सिंहस्थ में रिकांडो कंपनी द्वारा बनाई गई सड़के अगले दो सिहंस्थ तक याद की जाती रही, जिन पर पेट का पानी तक नहीं हिलता था। इस सिंहस्थ का सर्वाधिक काला पक्ष था मंगलनाथ क्षेत्र में संतों का आपसी विवाद। संतो ने अंकपात चौराहे पर प्रदर्शन किया। विवाद बढने पर पुलिस ने डंडे चलाए और बैरागी संतों को गिरफ्तार कर भेरूगढ़ जेल भेज दिया। आग की तरह खबर दिल्ली पहुंची और तत्कालीन केन्द्रीय गृह मंत्री ज्ञानी जेलसिंह आनन-फानन में विशेष वायुयान से उज्जैन पहुंचे। सभी संतों को छुड़वाया गया और ज्ञानीजी ने उनसे प्रत्यक्ष जाकर क्षमा याचना की, तब मामला शांत हुवा। इसके पहले और बाद में कभी सिंहस्थ में ऐसी स्थिति निर्मित नही हुई। तीन शाही स्नानों को लेकर शैव और वैष्णव अखाड़ों के मध्य एक और विवाद हुवा था, पर वरिष्ठ धर्माचार्यों ने उसे सुलझा लिया। इस महापर्व का उजला पक्ष था स्थायी प्रकृति के सर्वाधिक कार्य होना। 10 करोड़ में से 9 करोड़ रूपए इन कामों पर खर्च हुए जिसमें माधवनगर ओवरब्रिज का 12 फीट चौड़ीकरण, बड़नगर रपट का 10 फीट चौड़ीकरण, गंभीर जल प्रदाय योजना, जीवाजीगंज अस्पताल, रिकांडो की सड़के और खान नदी प्रदूषण पर नियंत्रण। सन् 1992 का सिंहस्थ शताब्दी का अंतिम सिंहस्थ था। मेला क्षेत्र दुगुना हो गया। 100 करोड़ रूपए से भी ज्यादा खर्चा सरकार ने किया। स्थायी प्रकृति के काफी काम हुए। भूमि आवण्टन, समतलीकरण और जन सुविधा केन्द्र व्यवस्थित न होने से विवाद हुए। अंतिम शाही स्नान के दूसरे ही दिन अखाड़ों के नलों में पानी बंद हो गया, शौचालय उखाड़े जाने लगे। दूध का वितरण बंद हो गया। अग्नि अखाड़े के पीठाधीश्वर प्रकाशानंद जी के शिविर में बम मिला, पर इन सब विवादों पर प्रशासन ने सूझबूझ से नियंत्रण कर लिया। इस महापर्व पर सबसे बड़ी भद्द सरकार की हुई, संत आसाराम को लेकर। ग्वालियर राज्य की महारानी रही श्रीमती विजयाराजे सिंधिया सिंहस्थ समिति की अध्यक्ष थी। समापन पर संतों के सम्मान में आसाराम को मंच पर बिठा दिया गया। सारे अखाड़े उन्हे संत मानने पर उखड़कर मंच से उतर गए। श्रीमती सिंधिया दौड़कर रोते हुए मंच से उतरी और संतों से हाथ जोड़कर माफी मांगी। आसाराम को मंच से उतारकर वापस भेजने के बाद संत शांत हुए। इस महापर्व में हुई दो आगजनी में ढाई करोड़ की संपत्ति नष्ट हो गई। सन् 2004 के सिंहस्थ की शुरूआती तैयारी कांग्रेस सरकार ने दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री रहते की, 217 करोड़ रूपए स्वीकृत हुए। आरोपित है कि उन्होने पूरे मेला क्षेत्र को लिंटरलेंड नामक बहुराष्ट्रीय कंपनी को 7 करोड़ रूपए में बेच दिया और एक पुस्तक लिखने का अनुबंध भी एक करोड़ रूपए में विदेशी प्रकाशक हेडन से कर लिया। लेकिन सिंहस्थ प्रारंभ होने के पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा अस्तित्व में आ गई और उमाश्री भारती ने मुख्यमंत्री बनकर महापर्व करवाया। सारे विदेशी अनुबंध निरस्त किए गए। उमाश्री भारती के शासन ने दो गंभीर चूकें कर दी। महापर्व के तीन माह पूर्व संड़क चौड़ीकरण का अध्याय खोल दिया गया। शहर धूल धूसरित हो गया। ज्योतिर्विद पं. आनंदशंकर व्यास और पद्मभूषण सूर्यनारायण व्यास के मकान के हिस्से भी तोड़े गए। दूसरे चामुंडा माता चौराहे की एक मस्जिद पुलिस और प्रशासन नही हटा पाया। विरोध प्रदर्शन और पत्थरबाजी में आईजी सरबजीतसिंह घायल हुए, शहर कर्फ्यू के आगोश में चला गया। पहली बार सिंहस्थ का राजनीतिकरण हुवा। संतों ने ही संतों को शिप्रा स्नान से वंचित कर दिया। मेला प्रशासन के कई आवण्टन अखाड़ा परिषद ने निरस्त कर दिए। मुख्यमंत्री भी परिषद की गोद में बैठ गई। 40 खालसाओं के पांच हजार संत शाही स्नान के एक दिन पूर्व उज्जैन छोड़ गए। इसके पूर्व कलेक्टर राजेश राजौरा की संतों द्वारा मारपीट की घटना भी हुई।

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