Tuesday, 28 June 2016

कश्मीरियों की आकांक्षा को समझे नरेंद्र मोदी सरकार


डॉ. अरूण जैन
इस मामले में कश्मीर में हालात सामान्य हैं कि वहां पत्थर फेंकने की घटनाएं नहीं हो रही हैं। उग्रवाद भी अपने अंतिम दौर में है। फिर भी घाटी असंतोष से उबल रही है। इस स्थिति के पीछे कोई एक कारण बताना मुश्किल है। इसके लिए कई कारण जिम्मेदार हैं। इसका सबसे प्रमुख कारण यह आम भावना है कि कश्मीर ने भारत को सिर्फ रक्षा, विदेशी मामले और संचार पर नियंत्रण का अधिकार दिया था, लेकिन हर जगह भारत है। शिकायत वाजिब है कि कोई इकाई ही तय कर सकती है कि उसे अपनी संप्रभुता का कितना हिस्सा सौंपना है। कोई भी संघ खुद ही ज्यादा विषय हथिया नहीं सकता। लेकिन नई दिल्ली ने ठीक वही किया। प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला जो आपस में गहरे दोस्त थे के बीच यही बात आ गई। शेख ने 12 साल नजरबंदी में बिताए। नेहरू ने अपनी गलती महसूस की और इसे सुधारने के लिए शेख को प्रधानमंत्री आवास में ठहराया। ऐसी ही समस्या नई दिल्ली और श्रीनगर के बीच संबंधों में तकलीफ पैदा कर रही है। यह कैसे हो सकता है कि एक मुख्यमंत्री केंद्र से अच्छा संबंध रखेगा और घाटी में स्वतंत्र छवि की धारणा बनाए? राज्य की हर राजनीतिक पार्टी को हरदम यही चिंता लगी रहती है। कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग मानने वाले लोग इसे विशेष दर्जा देने वाली धारा 370 को खत्म करना चाहते हैं। वे एक ओर संविधान, दूसरी ओर कश्मीरियों के विश्वास के साथ धोखा कर रहे हैं। दुर्भाग्य से, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की अलग राय है, हालांकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई ऐसा काम नहीं किया है जिससे कश्मीर की स्वायत्तता कम होने वाली हो। लेकिन घाटी में यह डर फैला हुआ है। यही मुख्य वजह है कि कश्मीर के भारत में विलय पर गंभीरता से सवाल उठाए जाने लगे हैं। अतीत में उन लोगों को शायद ही समर्थन मिलता थ जो आजाद कश्मीर का नारा लगाते थे, लेकिन आज उन्हें सुनने वाल बहुत लोग हो गए हैं। यह अचरज की बात नहीं है कि ऐसे लोगों की संख्या रोज बढ़ रही है। नई दिल्ली को यह समझना होगा कि नई दिल्ली से श्रीनगर को सार्थक रूप से अधिकार हस्तांतरित करने में कश्मीरियों की नई दिल्ली से दूरी बनाने की इच्छा पर विचार नहीं हो सकता है। लेकिन यह भावना कायम रखनी पड़ेगी कि कश्मीरी अपना शासन खुद चलाते हैं। नेशनल कांफ्रेंस ने महाराजा हरि सिंह से मुक्ति पाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और राज्य को एक सेकुलर ओर लोकतांत्रिक शासन देने के लिए उसके पास शेख अब्दुल्ला जैसी हस्ती थी। लेकिन पार्टी को विधानसभा चुनावों में हार का सामना करना पडा़ क्योंकि इसे नई दिल्ली के नजदीक माना जाता था। पीपुल्स डेमोक्रटिक पार्टी (पीडीपी) इसलिए जीती कि इसके संस्थापक मुफ्ती मोहम्मद सईद ने नई दिल्ली से दूरी बनाए रखी, हालांकि इससे अलगाव नहीं रखा। कश्मीरियों ने इसे इसलिए वोट दिया कि पीडीपी ने लोगों को विद्रोह की भावना का अहसास कराया। उमर फारुख अब्दुल्ला को नेशनल कांफ्रेंस के नई दिल्ली समर्थक होने की छवि की कीमत चुकानी पड़ी। कश्मीर का भारत के साथ इतने नजदीकी संबंध हैं कि एक सीमा से ज्यादा इसे चुनौती नहीं दी जा सकती। फिर भी, चाहे जितना भी छोटा विरोध क्यों न हो, लोगों को यह नई दिल्ली के खिलाफ विद्रोह का एक काल्पनिक संतोष देता है। लार्ड सिरिल रेडक्लिफ ने कश्मीर को को महत्व नहीं दिया। वह लंदन में न्यायाधीश थे जिन्होंने दो अलग देश बनाने के लिए भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन की रेखा खींची। सालों बाद उन्होंने एक इंटरव्यू के दौरान मुझसे कहा कि उन्होंने कल्पना नहीं की थी कि कश्मीर वैसा महत्व हासिल कर लेगा जैसा उसने आज पा लिया है। मैंने इस उदाहरण को उस समय याद किया जब मैं एक उर्दू पत्रिका की पहली सालगिरह की अध्यक्षता करने कुछ सप्ताह पहले श्रीनगर गया। उर्दू को हर राज्य से खामोशी से बाहर निकला जा रहा है इसमें पंजाब भी शामिल है जहां कुछ साल पहले तक यह मुख्य भाषा थी। वास्तव में इसने भारत में उस समय अपना महत्व खो दिया जब पाकिस्तान ने इसे अपनी राष्ट्रभाषा बना लिया। उर्दू के प्रति नई दिल्ली के सातैले व्यवहार को लेकर कश्मीर में तीव्र भावना है और यह आम धारणा है कि उर्दू की उपेक्षा की जा रही है क्योंकि लोग इसे मुसलमानों की भाषा समझते हैं। अगर नई दिल्ली अपनी ओर से उर्दू को प्रोत्साहित करे तो कम से कम कश्मीरियों को दुख देने वाले कारणों में से एक कारण तो कम हो जाएगा। देश के बाकी हिस्सों की तरह यहां भी आमतौर पर लोग गरीब हैं और वे नौकरी चाहते हैं जो, उन्हें लगता है कि सिर्फ विकास से आ सकती है। इसमें पर्यटन शामिल है लेकिन वे उगव्रादियों को भगाने के लिए बंदूक या कोई अन्य हथियार नहीं उठा रहे हैं। एक तो वे उनसे डरते हैं, दूसरा यह धारणा है कि उग्रवादी जो कर रहे हैं उससे उन्हें पहचान मिलती है। इसलिए यह आलोचना कि उग्रवादियों के खिलाफ घाटी के अंदर से कोई प्रतिरोध नहीं है समझने लायक है क्योंकि यह अलगाव का हिस्सा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि नई दिल्ली ने वह पैकेज नहीं दिया जो इसने कश्मीर की बाढ़ के समय घोषित किया था। इस वायदे का पालन नहीं करने को लेकर मीडिया में कोई आलोचना नहीं हुई। किसी भारतीय नेता ने भी नई दिल्ली के ध्यान में नहीं लाया कि यह यह वायदे से मुकरना है कश्मीर में इन सब चीजों का यही मायने लगाया जाता है कि यह सतही होने की सोचा−समझा संकेत है। मैं अभी भी मानता हूँ कि 1953 की संधि, जिसने भारत को प्रतिरक्षा, विदेशी मामलों और संचार का नियंत्रण दिया, राज्य में स्थिति सुधार सकती है। कश्मीरी युवक जो राज्य की हैसियत और हालात को लेकर गुस्सा हैं, को यह भरोसा देकर जीता जा सकता है कि पूरे देश का बाजार और उसकी सेवाएं उनके लिए उपलब्ध हैं। लेकिन सिर्फ इससे काम नहीं चलेगा। नई दिल्ली को प्रतिरक्षा, विदेशी मामलों और संचार को छोड़ कर बाकी सभी क्षत्रों से अपने को हटाना पड़ेगा। आर्म्ड फोर्मेस (स्पेशल पावर्स) एक्ट जिसे 25 साल पहले असाधारण परिस्थितियों से निबटने के लिए लागू किया गया था, राज्य में अभी लागू है। सरकार अगर इस कानून को वापस ले ले तो यह एक ओर कश्मीरियों को संतुष्ट करेगा आरै दूसरी ओर सुरक्षा बलों को ज्यादा जिम्मेदार बनाएगा। सामान्य हालात मन की एक स्थिति भी है। यह जरूरी है कि कश्मीरी महसूस करें कि उनकी पहचान खतरे में नहीं है और नई दिल्ली समझे कि कश्मीरियों की आकांक्षा क्या है। नई दिल्ली को सिर्फ तीन विषयों का अधिकार देने वाली 1953 की संधि फिर से बहाल करने से परिस्थिति ठीक की जा सकती है। ध्यान नहीं देने पर परिस्थिति बिगड़ भी सकती है।

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