Tuesday, 28 June 2016

मोदी की सफल अमेरिकी यात्रा से चीन को चिंतित होना ही था

डॉ. अरूण जैन
अमेरिका के लिए नए संबंधों की वर्णमाला नरेंद्र मोदी ने रची है। यह वर्णमाला है भारत के हित साधने के लिए अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन जिसे देखकर चीन का चिन्तित होना स्वाभाविक ही था। अमेरिकी संसद में भारतीय प्रधानमंत्री का शानदार संबोधन और अमेरिकी सांसदों को उनके भाषण के हर मिनट पर जोरदार करतल ध्वनि से स्वागत हर भारतीय के लिए सुखद, गर्वीली अनुभूति का कारण होना चाहिए। राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और विपक्षी तेवर के विरोधी पहलू ऐसे मौकों पर भूल जाने चाहिए। खाड़ी के देशों और सऊदी अरब के सुन्नी क्षेत्रों के बाद शिया इरान की सफल यात्रा के भारत के प्रतिद्वंद्वी देशों की नींद उड़ा दी है। वे मानते थे कि हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा को मानने वाले जब सत्ता में आएंगे तो उनका न तो स्वदेश के विविध मतावलम्बी समुदायों के साथ सामंजस्य बैठेगा और न ही अतिरेकी तथा तीव्र वैचारिक भिन्नताओं वाले देशों से पट पाएगी। मुस्लिम देश और नरेंद्र मोदी? तौबा ही मानिए। अमेरिकी तथा यूरोपीय देशों के साथ मोदी का तालमेल? कोई कारण ही नहीं कि दोनों साथ जम पाएं। लेकिन यह भारत का बदलता मिजाज और बढ़ती धमक का ही नतीजा है कि न केवल लाहौर अचानक मोदी के आने से हक्का-बक्का रह गया बल्कि सऊदी अरब में भारतीयों ने भारत माता की जय के नारे लगाकर यह अंदाज बता दिया। अब अमेरिकी संसद में यदि वहां के सांसद चालीस बार तालियों से भारत के प्रधानमंत्री का स्वागत करते हैं तो यह मामला भाजपा-सपा-जद-कांग्रेस का नहीं बल्कि हिंदुस्तान को हो जाता है। दिलचस्प रहा चीन का खीझाकर बयान देना और भारत-अमेरिकी मैत्री के नए आयामों पर नकारात्मक बयान देना। क्यों? क्योंकि यह वह सहन नहीं कर पाया कि दो बड़े लोकतांत्रिक देश परमाणु शक्ति के क्षेत्र में सहयोग के लिए वचनबद्ध होकर चीन की परमाणु क्षेत्र में बढ़त को कम कर रहे हैं। परमाणु आपूर्ति समूल (एनएसजी) की सदस्यता भारत को मिले और वह विश्व की जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में उभरे यह चीन कतई नहीं चाहता। इसके पहले लखवी और मसूद अजहर के मामलों में भी चीन ने भारत का साथ नहीं दिया गया था विश्व-कुख्यात आतंकवादियों को कूटनीतिक रक्षा कवच प्रदान किया। ईरान के चाबहार बंदरगाह को विकसित करने, अफगानिस्तान की संसद के नए भवन और सलमा बांध के पूरे होने पर किए गए शानदार उद्घाटन का भी चीन और पाकिस्तान में दर्द भरा असर हुआ। भारतीय उपमहाद्वीप, जिसे अब सार्क या दक्षेस कहा जाने लगा है। चीन और पाकिस्तान भारत का बढ़ते देखना ही नहीं चाहते। जबकि इस क्षेत्र के साथ-साथ पूर्वी एशिया, दक्षिणपूर्वी एशिया एवं सुदूर पूर्व में भारत एक मैत्रीपूर्ण नेतृत्व की स्थिति रखता है। इसे अमेरिका, आस्ट्रेलियां, जापान, सिंगापुर, फिलीपीन्स, वियतनाम जैसे देश पूरी तरह समर्थन देते हैं जबकि चीन की प्रसारवादी नीतियों से उन्हें सदा आशंका रहती है। पिछले पखवाड़े शंगरीला संवाद में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर के भाषण तथा वियतनाम को ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र देने की पेशकश ने पूर्वी देशों को भारत की बढ़ती समुद्रीय आकांक्षाओं से आश्वस्त किया है। इस सभी देशों के साथ भारत के सैकड़ों वर्ष पुराने सांस्कृतिक सभ्यतामूलक मैत्री संबंध रहे हैं और इस कारण वहां के नेतृत्व और समाज में भारत के प्रति एक सहज आत्मीयता का भाव देखने को मिलता है। कांग्रेस के दो प्रधानमंत्रियों श्री नरसिंहाराव तथा डा. मनमोहन सिंह ने इसी वातावरण का भारत का हित में उपयोग किया तथा लुक-ईस्ट पालिसी अर्थात पूर्वोन्मुखी नीति का श्रेय उनको ही देना होगा। यह विडंबना ही है कि विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश होने के बावजूद न तो भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता और वीटो शक्ति संपन्न राष्ट्रसंघ में स्थिति मिली और न ही परमाणु आपूर्ति समूह की सदस्यता सरलता से मिलती दिख रही है। जबकि चीन, जो दुनिया में परमाणु बम के भय का विस्तार करने वाला सबसे कुख्यात परमाणु प्रसारक देश है- दोनों स्थितियों का प्रभुत्व प्राप्त आक्रामक विदेश नीति का देश बना है। उसने ही पाकिस्तान, ईरान, अरब जैसे देशों को परमाणु तकनीक दी। उत्तरी कोरिया जैसे देश के सर्वाधिक निकट चीन ही माना जाता है और एशिया में अपनी हमलावर कूटनीति से उसने ऐसा वातावरण बना दिया है कि विश्लेषक मानने लगे हैं कि मध्य एशिया के तनाव अब पूर्वी एशिया के दक्षिण चीन सागर क्षेत्र में स्थानांतरित हो रहे हैं। इस परिदृश्य में भारत का क्षेत्रीय शक्ति की धुरी बनना अपने लिए ही नहीं बल्कि आसपास के विश्व के लिए जरूरी है। यह अनिवार्य है कि भारत के राजनीतिक दल देश की मजबूती का एजेंडा जाति और निजी स्वार्थों की पूर्ति से बड़ा बने। पारिवारिक तथा अहंकार की निजी नेतृत्व केंद्रित राजनीति ने देश को बीस साल पीछे धकेल दिया। हममें सीना होना चाहिए कि मोदी की सफल विदेश नीति का गौरव मानने के साथ-साथ शिवराज सिंह चौहान, नीतिश कुमार, ममता और महबूबा की भी अच्छी नीतियों की प्रशंसा करें। दल और उनका रंग कोई भी हो, तिरंगे का मान और सम्मान बढ़े तो उसमें हर दल की इज्जत ही बढ़ती है। मोदी की सफल नीतियों, अमेरिका में मिला उनको सम्मान देश के लिए अच्छा ही मानना चाहिए। यह कह कर किसी का रूतबा कम नहीं होगा। परमाणु आपूर्ति समूह की सदस्यता का भारत के अनेकविध क्षेत्रों में व्यापक असर पड़ेगा। दवाओं के अनुसंधान के लिए आवश्यक सामग्री और उपकरण रक्षा निर्माण एवं चिकित्सा और संचार क्षेत्र में नवीनतम उपकरणों के आयात से बंधन हट जाएंगे और सामान्य गरीब लोगों की चिकित्सा एवं युवाओं के लिए नये कॅरियर विकल्प खुल जाएंगे। इसी कारण चीन भारत की बढ़त और इस नयी संभावना से परेशान है। जबकि भारत से किसी भी प्रकार के खतरे की आशंका होनी ही चाहिए। खतरा तो चीन से भारत को है इसलिए श्री नरेन्द्र मोदी की सफल अमेरिका यात्रा कई अर्थों के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है।

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